पहल - गृहलक्ष्मी कहानियां

प्रेमलता यदु

6th March 2021

आज जैसे ही मैं कालेज से घर पहुंची, पूरे घर पर सन्नाटा पसरा हुआ था.रोज इस वक्त मां दादी के पैर दबा रही होती हैं, बड़ी भाभी बच्चों को होम वर्क और छोटी भाभी खाने पर मेरा इंतजार कर रही होती है, परन्तु आज का दृश्य कुछ और ही था. मैं समझ गई आज फिर छोटी भाभी को लेकर अवश्य कोई विवाद उत्पन्न हुआ होगा.

पहल - गृहलक्ष्मी कहानियां

 कहने को छोटी भाभी और मेरा रिश्ता ननद भाभी का है परन्तु हम‌ उम्र होने की वज़ह से कुछ ही महीनों में वह मेरी सब से अच्छी और सच्ची सखी बन गई .मैं अपने मन की हर बात बेझिझक उनसे साझा कर लेती हूं और वह भी मुझे अपने हृदय की वेदना बिना किसी संकोच के जाहिर करती है.

  पूरे घर पर खामोशी का बसेरा देख ऐसा लग रहा था मानो अभी अभी कोई तूफ़ान यहां से हो कर गुजरा है.वैसे तो छोटे भैया संजीव के इस दुनिया से जाने के पश्चात हर रोज़ किसी ना किसी में रूप में एक आंधी गाहे-बगाहे चलती ही रहती है जो हर किसी को किसी ना किसी रूप में क्षतिग्रस्त करती हुई निकलती है लेकिन इसका सबसे अधिक खामियाजा छोटी भाभी सुमन को ही उठाना पड़ता है जो भैया के जाने के पश्चात पूरी तरह से कुम्हला सी गई है उनके चेहरे पर तो उदासी ने जैसे अपना स्थाई वास ही बना लिया है.जो दिखता तो घर के हर सदस्य को है किन्तु देखना कोई नहीं चाहता.

 दादी को तो ऐसा लगता है जैसे छोटे भैया का इस दुनिया को अलविदा कहने में छोटी भाभी का ही दोष है .वैसे छोटी भाभी दादी की ही पसंद से इस घर में आई है। पूरी जन्म पत्री, कुंडली मिलाने के बाद  ही पंडित जी ने कहां था-

  "संजीव के लिए इससे अच्छी कन्या कोई हो ही नहीं सकती है। दोनों के छत्तीस के छत्तीस गुण मिलते हैं यह बहुत ही शुभ है, कन्या भाग्यशाली हैं. "

   यह सुनते ही दादी ने फरमान जारी कर दिया था अगर कोई लड़की संजीव की पत्नी और इस घर की बहू बनकर आएगी तो वो सुमन ही होगी.

  उस वक्त बड़े भैया और पापा ने दादी तो कितना समझाया था कि संजीव अपने ही ऑफिस की एक सहकर्मी को पसंद करता है और उसी से शादी करना चाहता है .यह सुनने के उपरांत दादी अन्न जल त्याग धरने पर बैठ गई थी, कि वह संजीव की शादी किसी विजातीय लड़की से जीते जी तो नहीं होने देगी यदि उनकी मर्जी के खिलाफ शादी हुई तो इधर डोली उतरेगी और उधर उनकी अर्थी उठेगी, यह सुन संजीव भैया ने दादी के जिद के आगे और घर की  झूठी शान की खातिर अपने अरमानों की बली चढ़ा दी और हार कर सर झुकाए चुप चाप सुमन भाभी के संग सात फेरे ले लिए.

  संजीव भैया दादी और घर वालों को खुश करने के लिए सुमन भाभी के संग रिश्तों की डोर में तो बंध ग‌ए परन्तु ना वो अपना प्यार भुला पाए और ना ही सुमन भाभी को उनका अधिकार ही दे पाए, शायद यही गम उन्हें अंदर ही अंदर खाएं जा रही थी इसलिए वो शराब का सहारा लेने लगे और एक दिन नशें में ड्राईव करते हुए शादी के आठ महीने के भीतर ही रोड एक्सीडेंट में मृत्यु के काल में समां गए और दादी  सुमन भाभी और उनके परिवार पर सारा दोष यह कह कर मढ़ने लगी कि उन लोगों ने हमारे साथ धोखा किया है गलत जन्म पत्री और गलत कुंडली दे कर.

   घर में हर किसी को संजीव भैया के अकास्मिक मौत का दुःख है परन्तु किसी को भी सुमन भाभी की चिंता नहीं. हर दिन किसी ना किसी बहाने से कभी दादी, कभी मम्मी तो कभी बड़ी भाभी उन्हें संजीव भैया के मौत का उलाहना देने से नहीं चूकती और बेचारी भाभी मौन रहकर सब के ताने सुनती रहती है.

   संजीव भैया वन विभाग में राज्य सरकार के कर्मचारी थे इसलिए भैया की मृत्यु के पश्चात सारे सरकारी रूपए पैसे छोटी भाभी को ही मिले यह भी दादी को गवारा नही था. बेटा उनके घर का तो रूपए पैसे पराएं घर से आई बहू को क्यों मिलना चाहिए.रोज रोज़ के कलह से तंग आकर भाभी ने सारा पैसा दादी के खाते में हस्तांतरित कर दिया इस पर उनका जी नही भरा अब कहती हैं.अनुकंपा नियुक्ति में नौकरी भाभी के स्थान पर मुझ से छोटा भाई संजय को किसी तरह मिल जाए क्योंकि वह इस घर का बेटा है और पिछले दो सालों से सरकारी नौकरी के लिए प्रयासरत हैं.

    पापा और बड़े भैया ने दादी को बहुत समझाया कि सरकारी नौकरी में अनुकंपा नियुक्ति केवल कर्मचारी की पत्नी या बच्चों को मिलती हैं पर नहीं उन्हें तो कुछ सुनना नही है और ना समझना है बस उन्होंने जो कह दिया वो पत्थर की लकीर है. हर बात में ज़िद पकड़ कर अड़ जाना दादी की आदत में शुमार है .

   आज भी ऐसी ही कुछ बात हुई होगी और भाभी ने खाना भी नहीं खाया होगा यही सोच मैं भाभी के लिए भी खाना परोस उनके कमरे की ओर बढ़ी मुझे खाना ले जाता देख मां मुझ पर बरस पड़ी और कहने लगी

 "  कोई जरूरत नही है उस महारानी के लिए खाना ले जाने की तुम्हारी दादी ने सक्त मना किया है.उसे भूखा-प्यासा ही रहने दो,जब भूख लगेगी तो खुद ही ले कर खा लेगी. किसी को उसे खाना देने की जरूरत नही.उसे खानदान के इज्जत का ज़रा भी ख्याल नहीं, मैडम को नौकरी करना है.विधवा हो कर सज धज कर घर से बाहर निकलना है".

     मां के मुंह से यह सब सुन मुझसे रहा नही गया और मैं मां से वह सब कह ग‌ई जो क‌ई महीनों से मन दबा बैठी थी.

    " आप की बेटी घर से बाहर जाती है नौकरी करती है यह बात तो आप बड़े शान से सब को बताती फिरती है.तब आप के खानदान की इज्जत पर कोई फर्क नहीं पड़ता और आप की बहू नौकरी करना चाहती है तो आपकी इज्जत घटती है यह कैसी दोहरी मानसिकता है,यदि मैं इस तरह भूखी-प्यासी पड़ी रहती तो क्या तब भी आप मुझे खाने को नहीं पूछती.यह सब आखिर क्यों...? वो जो आपके घर पर है, वो  खुद चल कर नहीं आई है.आप सब उसे बाजे गाजे के साथ ढोल नगाड़े पीटते हुए ले कर आएं हैं. यह घर जितना दादी का, आप का है, मेरा है उतना ही छोटी भाभी का भी, वह कुछ नहीं कहती इसका यह मतलब कतई नहीं है आप सब उन पर अन्याय करे, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर दे."

   मेरा ऐसा कहने पर मां चुप हो गई क्योंकि वह भी यह जानती थी दादी गलत है और मैं इस बात से भली-भांति परिचित हूं कि मां आज तक चाह कर भी कभी अपने लिए दादी के विरोध आवाज ही नहीं उठा पाई.

    जैसे ही मैं कमरे में पहुंची भाभी बिस्तर पर औंधे मुंह लेटी सुबक रही थी.मुझे देखते ही वह मुझसे लिपट गई और रोते हुए कहने लगी-

   "मेरा क्या दोष. मैं क्यों इस घर में नहीं रह सकती,मैं क्यों नौकरी नही कर सकती, संजीव के इस नौकरी के अलावा मेरे पास आजीविका का और कोई साधन भी तो नहीं है और दादी नौकरी करने से मना कर रही है. "

    मैं भाभी को शांत करती हुई बोली-

    " आप चिंता ना करें सब ठीक हो जाएगा. आप को नौकरी करने से कोई नहीं रोकेगा"

    मैंने भाभी से यह कह तो दिया किन्तु मैं स्वयं दुविधा में थी सब ठीक कैसे होगा. क्योंकि दादी के विरोध ना मां कुछ कह पाती है, ना पापा और ना ही बड़े भैया. मेरे कुछ भी कहने का असर किसी पर होगा नही और आज फिर वही होगा जो दादी का निर्णय होगा.मैं सोच रही थी कि छोटी भाभी के माता पिता आ ग‌ए.दादी ने ही अपना फैसला सुनाने उन्हें बुलवाया था.

    मैं भी बैठक में जा पहुंची जहां दोनों परिवार मिल कर छोटी भाभी के भविष्य का फैसला करने वाले थे. दादी ने बड़े गर्व से कहा -

   "हमारे घर की बहुएं केवल घर संभालती है नौकरी नही करती.आप की बेटी नौकरी करना चाहती है इसलिए आप उसे अपने साथ ले जाईए".

    यह सुनते ही भाभी की मां दोनों हाथों को जोड़ती दादी को संबोधित करती हुई बोली-

   " बेटी तो पराया धन होती है और ब्याहता बेटी अपने मायके में नहीं ससुराल में शोभा देती है.आप जो चाहेंगी वही होगा सुमन नौकरी नही केरेगी".

    यह सुन मैंने जैसे ही विरोध करना चाहा मां ने मुझे रोक दिया और स्वयं दृढ़ता पूर्वक दादी से कहने लगी-  " मां जी पूरा परिवार आप का सम्मान करता है.मैंने तो आप से बहुत कुछ सीखा है.आपका आदेश सिरोधार्य है किन्तु जिस प्रकार आप इस घर की बहू थी फिर मैं इस घर की बहू बनी वैसे ही सुमन भी इस घर की बहू है और इस घर में उसका भी उतना ही अधिकार है जितना आप का और मेरा इसलिए सुमन इस घर में ही रहेगी.आप उसके सारे रूप‌ए उसे लौटा दीजिए वो संजीव की अमानत है जिसमें उसकी पत्नी का हक है और रही बात नौकरी करने की तो यह निर्णय आप, मैं या कोई और नही उसे स्वयं लेने दीजिए".

   यह सब सुन मैं मां से लिपट गई.मां आज पहली बार दादी के समक्ष अपनी बात रख पाई थी. दादी ने भी मां से कुछ नहीं कहा,शायद मां की यह छोटी सी पहल से दादी को भी बदलते वक्त का अहसास हो गया था.

यह भी पढ़ें -बरसेगा सावन - गृहलक्ष्मी कहानियां

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