सच्चा प्रेम - गृहलक्ष्मी कहानियां

वीरेन्द्र बहादुर सिंह

6th March 2021

प्रताप की जि़ंदगी से अनुपमा जा चुकी थी और अब उसकी जि़ंदगी में ल्युसी ही सब कुछ थी। और एक दिन अचानक अनुपमा और ल्युसी दोनों ही संसार से विदा हो गए। अपनी पत्नी की मौत की खबर पर वह लाख कोशिशों के बावजूद एक आंसू न बहा सका, लेकिन अपने पालतू जानवर की मौत पर उसके आंसू रोके न रुके।

सच्चा प्रेम - गृहलक्ष्मी कहानियां

कनाट प्लेस की उस दस मंजिली इमारत की नौंवी मंजिल पर अपने ऑफिस में बैठे प्रताप ने घड़ी पर नजर डाली, आठ बज रहे थे। वैसे तो वह सात-साढ़े सात बजे ही ऑफिस से निकल जाता था, लेकिन आज नवीन ने आने के लिए कहा था, इसलिए वह ऑफिस में बैठा उसी का इंतजार कर रहा था। नवीन की अभी नई-नई शादी हुई थी। उसी के उपलक्ष्य में आज उसने पीने-पिलाने का इंतजाम किया था।

आखिर साढ़े आठ बजे नवीन आया। उसके साथ अश्विनी और राजन भी थे। नवीन ने नीचे से ही प्रताप को फोन किया तो वह नीचे आ गया था। जनवरी का महीना और फिर हल्की-फुल्की बूंदाबांदी होने से ठंड एकदम से बढ़ गई थी। शाम होते ही कोहरे ने भी अपना साम्राज्य फैलाना शुरू कर दिया था। प्रताप के नीचे आते ही नवीन ने कहा, 'यार! जल्दी गाड़ी निकाल, ठंड बहुत है।'

प्रताप को भी ठंड लग रही थी। उसने जैकेट का कॉलर खड़ा कर के कान ढकने का प्रयास किया। फिर दोनों हथेलियां रगड़ते हुए पाॄकग की ओर बढ़ गया। उसके गाड़ी लाते ही तीनों जल्दी-जल्दी गाड़ी में घुस गए। गाड़ी बिल्डिंग के गेट तक पहुंचती, उसके पहले ही तीनों ने तय कर लिया कि कहां खाना-पीना होगा।

बिल्डिंग के गेट से गाड़ी सड़क पर आई तो सड़क पर वाहनों की रेलमपेल थी। धीरे-धीरे चलते हुए वे एक शराब की दुकान पर पहुंचे। शराब खरीदने के बाद उन्होंने एक रेस्टोरेंंट से खाना पैक कराया और चल पड़े राजन के घर की ओर। राजन वहीं करीब ही रहता था। गाड़ी इमारत के नीचे खड़ी करके सभी राजन के फ्लैट में पहुंच गए। राजन उन दिनों अकेला ही था। इसलिए उसका घर अस्तव्यस्त था। उसने पानी वगैरह का इंतजाम किया और फिर सभी पीने बैठ गए। दो-दो पैग गले से नीचे उतरे तो सब के मुंह खुलने लगे। नवीन ने प्रताप के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, 'यार! प्रताप, तुझे भाभी की याद नहीं आती?'

'जो मुझे छोड़ कर चला गया, उसकी याद करने से क्या फायदा...?' प्रताप ने उदास हो कर कहा।

'तो क्या अब वह वापस नहीं आ सकती?' अश्विनी ने पूछा।

'यदि वापस आना होता, तो वह जाती ही क्यों?' सिगरेट सुलगाते हुए प्रताप ने कहा।

शराब के साथ इसी तरह की बातों में किसी को समय का भी ख्याल नहीं रहा। शराब खत्म हुई, तभी उन्हें खाने का ख्याल आया। तब प्रताप ने कहा, 'यार जल्दी करो, बहुत देर हो गई।'

'तू तो ऐसे कह रहा है, जैसे घर में बीवी तेरा इंतजार कर रही है।'

'भई बीवी नहीं है तो क्या हुआ, ल्यूसी तो है। वैसे भी दो दिनों से वह ठीक से खाना नहीं खा रही है।' प्रताप ने बाहर की ओर देखते हुए कहा।

फिर जल्दी-जल्दी खाना खा कर प्रताप चलने के लिए तैयार हुआ। अश्विनी और नवीन का राजन के यहां ही रुकने का प्रोग्राम था। वे प्रताप को भी रोक रहे थे, लेकिन उसे तो ल्युसी की चिंता थी।

प्रताप नीचे आया तो वातावरण में कोहरे की सफेद चादर फैल गई थी। ठंड भी बहुत तेज थी। प्रताप ने पीछे की सीट पर रखे ऑफिस बैग से टोपी निकालकर लगाई और घर की ओर चल पड़ा। सड़कें सूनी थीं, फिर भी कोहरे की वजह से वह गाड़ी बहुत तेज नहीं चला पा रहा था। घर पहुंचते-पहुंचते उसे रात के 1 बज गए। नोएडा के सेक्टर 56 में साढ़े तीन सौ गज में बनी उसकी कोठी में अंधेरा छाया था। उसने गेट का ताला खोला, गाड़ी अंदर की, फिर घर का ताला खोल कर अंदर घुसते ही आवाज लगाई, 'ल्युसी...ल्युसी...।'

उसके ये शब्द दीवारों से टकरा कर वापस आ गए।

'ल्युसी...ल्युसी...मैं यहां हूं' कहते हुए प्रताप ड्राइंगरूम से अंदर कमरे की ओर बढ़ा तो उसने महसूस किया कि किचन से 'कूं...कूं...' की आवाज आ रही है, उसने किचन में जाकर देखा तो ल्युसी उस तेज ठंड में भी पैर फैलाए लेटी थी। प्रताप ने उसे सहलाते हुए कहा, 'तू यहां है?'

ल्युसी ने गर्दन उठा कर अधखुली आंखों से प्रताप की ओर देखा, लेकिन उठी नहीं। ऐसा लग रहा था, जैसे आज उसमें उठने की शक्ति नहीं रह गई है। प्रताप उसकी बगल में बैठ गया। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, 'लगता है, आज तूने कुछ खाया नहीं है।'

ल्युसी ने बिना कुछ बोले गर्दन नीची करके आंखें बंद कर ली। प्रताप ने उसकी गर्दन पर हाथ रख कर कहा, 'इस तरह नाराज नहीं होते। चल, मैं तुझे खाना खिलाता हूं।'

ल्युसी ने कोई हरकत नहीं की। प्रताप ने ध्यान से देखा तो उसे लगा ल्युसी की सांसें भारी हैं। उसकी खुली निश्चल आंखों के खालीपन ने उसे द्रवित कर दिया। उसका नशा गायब हो गया। कपड़े बदलने का इरादा छोड़ कर वह बड़बड़ाया, 'लगता है, तुझे डॉक्टर के पास ले जाना होगा। मुझे पता है, अब तू कुछ बोलेगी नहीं।'

ल्युसी ने धीरे से 'कूं...कूं...' किया। प्रताप की चिंता दोगुनी हो गई। वह बड़बड़ाया, 'इसे डॉक्टर के पास ले ही जाना पड़ेगा।' डॉक्टर उसका परिचित था। ल्युसी को गाड़ी में ले कर वह डाक्टर के यहां पहुंच गया। ल्युसी को देखने के बाद डॉक्टर ने कहा, 'प्रताप, लगता है इसे न्युमोनिया हो गया है। इसे यहीं छोड़ दो, हमारा नौकर इसकी देखभाल कर लेगा।'

ल्युसी का सिर चूम कर प्रताप लौट आया। कपड़े उतार कर बेड पर लेटा तो रात के ढाई बज रहे थे। इतनी भाग दौड़ के बाद भी नींद नहीं आ रही थी। विरह की वह रात बड़ी लंबी लग रही थी।

वह उठ कर बैठ गया। आज वह एकदम अकेला था। उसकी ओर कोई भी देखने वाला नहीं था। उसे कोई प्यार करने वाला भी नहीं था। बिना किसी के जीना भी कोई जीना है। कोई तो चाहने वाला होना ही चाहिए, चाहे वह जानवर ही क्यों न हो। कोई साथ होता है तो आनंद से जीवन बीतता है। वह लेट गया। ल्युसी की याद में करवटें बदलता रहा। व्यग्र मन में ल्युसी की याद आती रही। वह सोना चाहता था, पर ल्युसी की यादें सोने नहीं दे रही थीं। तभी टेलीफोन की घंटी बजी। वह फट से उठ कर बैठ गया। झट से रिसीवर उठा कर कान से इस तरह लगाया, जैसे वह किसी की आवाज सुनने के लिए उतावला हो।

'प्रताप...प्रताप...' विषादयुक्त स्वर सुनाई दिया।

'जी...' सामनेवाले व्यक्ति की आवाज प्रताप को परिचित लगी। लेकिन यह आवाज काफी दिनों बाद उसे सुनाई दी थी।

'इतनी रात को फोन करने के लिए माफ करना।'

'ठीक है' प्रताप से वह बात करना चाहता है, यह जानकर उसे प्रसन्नता हुई।

'एक बैड न्यूज है।' सामने वाले व्यक्ति ने कहा।

'बैड न्यूज...?' आवाज में आशंका उपजी, हृदय धड़का, 'क्या है बैड न्यूज...?'

'तुम्हारी पत्नी...' सामने वाले की आवाज धीमी पड़ गई।

'मेरी पत्नी...?'

'मेरा मतलब है, तुम्हारी एक्स पत्नी अब इस दुनिया में नहीं रही...' यह कहते हुए सामने वाले व्यक्ति की आवाज लड़खड़ा गई।

प्रताप चुप रह गया। उसकी आंखों के सामने अंतिम बार देखा गया अनुपमा का चेहरा उभर आया। अनुपमा अब इस दुनिया में नहीं रही। प्रताप के चुप रह जाने पर सामनेवाला व्यक्ति बोला, 'प्रताप, तुम ठीक तो हो?'

'हां, मैं ठीक हूं, फोन करने के लिए धन्यवाद।' बात को आगे न बढ़ाते हुए प्रताप ने फोन रख दिया। एकांत और अकेलेपन ने उसे फिर घेर लिया। वह क्या मिस कर रहा, किससे कहे। 'सुन कर उसे बहुत दुख हुआ' जैसे शब्द भी वह नहीं कह पाया था। उसे इस बात पर आश्चर्य हुआ। इसका मतलब वह बदल गया है।

अब अनुपमा के प्रति न उस के मन में प्रेम था, न तिरस्कार। इसलिए वह क्या कहे। इस संसार में आने वाला हर कोई जाता है। उसका अनुपमा से पहले ही संबंध विच्छेद हो चुका था। जीवन का एक खूबसूरत मोड़ दिखा कर वह गायब हो गई थी। अब तो ल्युसी ही उसके जीवन में सब कुछ थी।

प्रताप के दिल से आवाज आई। अनुपमा के लिए अपने हृदय के किसी कोने में थोड़ा बहुत प्रेम खोजना चाहिए। उसकी मृत्यु का उसे दु:ख तो मनाना ही चाहिए। इसके लिए उसे थोड़ा रोना चाहिए। कम-से-कम आंखें तो नम कर ही लेनी चाहिए। आखिर तीन साल वह उसके साथ रही थी। उसके साथ कुछ रेखाएं तो खींची थी, भले ही चित्र नहीं बन पाया। लोग दूसरे की मृत्यु पर दु:खी होते हैं। अनुपमा तो कभी उसकी अपनी थी। मृत्यु पर शोक प्रकट करने की जो हमारे यहां परंपरा है, उसे निभाना ही चाहिए। वह इंसान हैं, इसलिए उसके अंदर इंसानियत तो होनी ही चाहिए। इतने प्रयास के बाद भी अंदर से ऐसा भाव नहीं उपजा कि आंखें नम हो जाती। वह लाचारी का अनुभव करने लगा। इस बेरुखी का उपाय वह खोजने लगा। अनुपमा के लिए थोड़े आंसू हृदय से निकालने के लिए वह प्रयास करता रहा, पर सफल नहीं हुआ। इसी कशमकश में वह करवट बदलता रहा। ऐसे में ही उसकी आंखें लग गईं, तो सुबह फोन की घंटी बजने पर खुलीं। आंखों की पलकें भारी थीं। काफी कोशिश के बाद खुलीं तो देखा धूप निकल आई थी।

जमहाई लेते हुए प्रताप ने रिसीवर उठा कर कान से लगाते हुए कहा, 'हैलो।'

'प्रताप...?' सामने वाले ने कहा, 'लगता है फोन की घंटी सुन कर उठे हो।'

'कोई बात नहीं डॉक्टर साहब, दरअसल रात सोने में देर हो गई थी न, अब ल्यूसी की तबीयत कैसी है?' प्रताप ने पूछा।

'प्रताप, ल्युसी तो नहीं रही। काफी प्रयास के बाद भी मैं उसे नहीं बचा सका।'

'हे भगवान!'

'प्रताप.... प्रताप...!'

लेकिन प्रताप तो खामोश था। उसका हृदय जोर से धड़क उठा। उसकी देह उस ठंड में भी पसीने से भीग गई। रिसीवर उसके हाथ से छूट गया। उसका सिर जैसे चकरा रहा था। वह वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। दोनों हथेलियां उसने आंखों पर रख लीं। आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। फिर वह फफक कर रो पड़ा। 

यह भी पढ़ें -धूप की तलाश - गृहलक्ष्मी कहानियां

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