लिव इन रिलेशनशिप कितनी खुशियां कितने गम

पूनम अरोड़ा

6th March 2021

लिव-इन-रिलेशनशिप एक आभासी परिदृश्य है जहां रंग भी हैं, फूल भी हैं और बेपनाह प्रेम भी है। यहां संबंधों के मायने भी अलग हैं और उन्हें निभाने के तौर-तरीके भी जुदा से हैं।

लिव इन  रिलेशनशिप  कितनी खुशियां  कितने गम

पिछले कुछ सालों से भारत में पाश्चात्य त्योहारों जैसे- फादर्स डे, मदर्स डे, डॉटर्स डे और वैलेंटाइंस डे आदि बड़े जोश के साथ मनाये जा रहे हैं। पाश्चात्य भाषा के साथ-साथ विचार भी क्रांतिकारी रूप से भारतीयों की सोच में परिवर्तन कर रहे हैं। इसे पाश्चात्य सभ्यता का गहरा असर नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे कि भारत में भी लिव-इन संबंध अस्तित्व में आ रहे हैं, लगातार पनप रहे हैं और अपनी सहजवृति से जीवन का एक अभिन्न अंग भी बनते जा रहे हैं। नई पीढ़ी अर्थात युवा पीढ़ी की मनोवैज्ञानिक, भौतिक और शारीरिक जरूरत का नाम भी इसे दिया जा सकता है। यहां भावनाएं भी हैं, फिजिकल साथ भी और तथाकथित आज़ादी भी। अब जरा इसका दूसरा पक्ष देखें तो स्थिति बिल्कुल उलट भी है। एक व्यक्ति चाहे वो पुरुष हो या महिला प्रेम की स्थायी पीड़ा को सामाजिक बदलाव के परिदृश्य से जब देखने का प्रयास करता है तो उसके ही मन में एक तरह की बेचैनी और कृत्रिमता पनपने लगती है।

ऐसे संबंधों की आवश्यकता क्यों?

लिव-इन-रिलेशनशिप आखिर है क्या और इसकी आवश्यकता क्यों है? ऐसे संबंधों पर बारीकी से नजर डाली जाए तो पता चलता है कि आधुनिकता के नाम पर बिना सामाजिक स्वीकृति के स्त्री-पुरुष का साथ रहना आज की पीढ़ी के लिए फैशनपरस्ती और स्वछंदता है, जिसमें शारीरिक सुख की चाह बिना किसी कमिटमेंट के पूरी हो सकती है। न केवल शारीरिक जरूरत बल्कि खर्चों का बंटवारा भी पार्टनर्स में होता है। आज का युवा वर्ग इन संबंधों को खुले मन से अपना रहा है। यह संबंध इतने लचीले होते हैं कि जब तक साथ रहना अच्छा लगे तब तक ठीक है, नहीं तो ऐसे संबंधों को बिना किसी मानसिक दबाव के स्वेच्छा से तोड़ दिया जाता है। इस तरह साथी बदलते रहते हैं, प्रेम की नई दस्तकें बार-बार होती रहती हैं और यह सिलसिला इसी तरह लगातार बिना किसी अंत के चलता रहता है, क्योंकि यहां प्रेम की संवेदना यथार्थ के बोध में थोड़ी उदासीन होती है जबकि देह की संतुष्टि अपने चरम पर होती है तो यह एक तरह से जि़ंदगी का वह दस्तूर बन जाता है, जो अपनी ज़मीन से थोड़ा ऊपर उठा हो यानि एक मज़बूत प्लेटफॉर्म अक्सर ऐसे संबंधों के नीचे नहीं दिखाई देता।

क्या यही स्वतंत्रता के मायने हैं

हमें स्वतंत्रता है अपने विचार व्यक्त करने की, जीवन को स्वाभाविक रूप से जीने की, वैचारिक रूप से स्वयं को सफल बनाने की। हमें स्वतंत्रता है उन्नति करने की तथा एक ऐसी पीढ़ी तैयार करने की जिम्मेदारी भी हमारी है जिन्हें हम निर्भीक स्वर दें, अपना जीवन जीने का लेकिन आज स्वतंत्रता के मायने कई रूपों में बदल गए हैं। आज की युवा पीढ़ी केवल और केवल देह के बिंदु पर केंद्रित हो गई है। यह आनंद की क्षणिक क्षतिपूर्ति करता है और देह की सीमितताओं में खुद को परिपूर्ण साबित करना चाहता है। लेकिन एक पल ठहरकर सोचें तो क्या वाकई यह ऐसा है? युवा वर्ग ऐसी स्वतंत्रता चाहता है, जो उन्मुक्त हो, विलासितापूर्ण हो और उन्हें बगैर किसी जिम्मेदारी का निर्वाह किए दैहिक सुख की पूर्ति करा सके। काश युवा मन सोच पाए और समझ पाए स्वतंत्रता के सही मायने और चुन पाए अपने लिए एक सही राह जो जीवन के छोटे-छोटे भटकावों से उन्हें बचाकर एक संयमित जीवन धारा दे सके।

नैतिकता पर संकट

वह भी एक समय था जब विवाह पूर्व या बिना विवाह बनाए गए शारीरिक संबंधों को घोर अपराध माना जाता था लेकिन आज स्थिति यह है कि बेधड़क होकर लड़का-लड़की साथ-साथ एक ही घर में पति-पत्नी सामान रहते हैं। संबंधों में रहने वालों को शायद उस समय कोई फर्क न पड़ता होगा लेकिन बाद में कई बार एक कुंठा मन में आ जाती है। सन् 2004 में लक्ष्मी पंडित को मिस इंडिया चुना गया था और कुछ ही दिनों में पता चला कि वह तो विवाहित है, उनकी मकान मालकिन ने भी माना कि वह किसी पुरुष के साथ रहती हैं जिसे वह अपना पति बताती हैं। लेकिन मीडिया में जब यह खबर फैल गई तो छानबीन के पश्चात यह बात उजागर हुई कि वह अपने एक पुरुष मित्र के साथ लिव-इन संबंध में है और इसका खामियाजा लक्ष्मी को मिस इंडिया का टाइटल और क्राउन वापस लौटा कर भुगतना पड़ा। 

क्या कहता है समाज

आधुनिक समय में संबंधों की एक नई शाखा लिव-इन संबंधों के रूप में प्रस्फुटित हुई तो यह देख कर बड़ी हैरत हुई कि नगरों और महानगरों में यह शाखा किसी घनी बेल की भांति पूरी तरह से समाज में फैल चुकी है। हमारे समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा भी है, जो ऐसे संबंधों का तिरस्कार करता है। इस तरह के संबंध किसी भी देश तथा समाज के लिए कई रूपों में कई कारणों में अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी। समाज की परिकल्पना सदा से ही परिवार के रूप में की गई है। मुक्त और भोगी संबंध इस परिकल्पना से बाहर का हिस्सा माने जाते रहे हैं, क्योंकि सामाजिक तौर पर ऐसा माना जाता है कि यह समाज का आधुनिक पतन है, जिसे युवा पीढ़ी आधुनिक चकाचौंध में नहीं देख पाती और ऐसे संबंधों के ढांचे में कुछ सूक्ष्म खामियां हैं, जो धीरे-धीरे अपना रूप दिखाती हैं। बाहर से बेहद सुखद दिखने वाले ये संबंध दरअसल कई चुप्पियों में टूटे होते हैं। यहां आत्मीयता तो होती है लेकिन आत्मिक सहभागिता के अभाव में। यहां प्रेम तो होता है लेकिन कई विरोधों में जो अंत में एक दु:खद परिणति में भी तब्दील हो सकता है।

लिव-इन के नए मानदंड

लिव-इन-रिलेशनशिप में दो अविवाहित लोग अपनी मर्जी से एक साथ रहते हैं। इस तरह के संबंध कई कारणों से बनाए जाते हैं। स्थिति चाहे जो भी हो शारीरिक संबंध ऐसे में कायम होते ही हैं। ऐसे संबंधों को आजकल खुलेपन से अपनाया जा रहा है। जब तक दो लोग एक दूसरे के साथ रहना चाहते हैं वे साथ रहते हैं और जब साथ रहना मुमकिन नहीं लगता तो आपसी सहमति से संबंध तोड़ लिया जाता है। लेकिन इस रिश्ते में विवादास्पद मोड़ तब आता है जब इस संबंध में रहने के बाद कोई स्त्री गुजारे भत्ते की मांग करती है। ऐसी स्थिति की गंभीरता को देखते और समझते हुए इसके लिए कानूनी मानदंड तय कर दिए गए हैं, जिसके अंतर्गत चार शर्तें पूरी करने पर ही लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही स्त्री गुजारे भत्ते की हकदार होगी। केवल सप्ताहांत एक दूसरे के साथ बिताने या रात भर किसी के साथ गुजारने से इसे घरेलू संबंध नहीं कहा जा सकता।

वे चार शर्तं हैं-

1. इसमें युवक युवती को समाज के समक्ष खुद को पति पत्नी की तरह प्रस्तुत करना होगा।

2. दोनों की उम्र कानून के अनुसार विवाह के लायक हो।

3. दोनों अविवाहित हों तथा विवाह योग्य हों।

4. दोनों स्वेच्छा से एक दूसरे के साथ रह रहे हों और समाज के सामने खुद को एक खास अवधि के लिए जीवन साथी के रूप में दिखाएं।

शीर्ष अदालत के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के  जीवन में कोई स्त्री है, जिसकी वह वित्तीय जिम्मेदारी उठाता है और उसका इस्तेमाल मुख्य रूप से शारीरिक संतुष्टि के लिए करता है या फिर एक नौकरानी के रूप में रखता है तो वह ऐसा संबंध नहीं होगा जिसे वैवाहिक संबंधों जैसा माना जा सके। ऐसे संबंधों को कानूनी मानदंडों के अनुसार सबूतों के जरिए साबित भी करना होगा तभी कोई स्त्री जो लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही है, गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है। कानून के अनुसार गुजारे भत्ते के संबंध में अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में इसकी व्याख्या की गई है कि कानूनन ब्याहता पत्नी के अलावा निर्भर माता-पिता तथा बच्चे ही किसी व्यक्ति से गुजारा भत्ता पाने के हकदार हैं। कानून में वैवाहिक संबंधों के लिए घरेलू संबंध शब्द इस्तेमाल किया गया है और इस शब्द का इस्तेमाल गुजारा भत्ते का दायरा बढ़ा देता है, जिसमें न केवल वैवाहिक संबंध शामिल है बल्कि विवाह की प्रकृति का संबंध भी शामिल है। ऐसा लिव-इन-रिलेशनशिप के मद्देनजर किया गया है। संसद में इससे संबंधित कानून बनाकर इसे मान्यता भी दी गई है, ताकि ऐसे संबंधों की पारदर्शिता एवं विश्वसनीयता बनी रहे।

आज हमारी कानून व्यवस्था भी लिव- इन-रिलेशनशिप को गैरकानूनी नहीं मानती तो भी हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है, जिनके द्वारा इन्हें समूचे तौर पर नहीं अपनाया गया और इसलिए समाज के बदलते स्वरूप को देखते हुए कानून में कुछ मानदंड आवश्यक रूप से इसके लिए तय कर दिए गए हैं।

यह भी पढ़ें -बेहतर सेक्स लाइफ़ के ६ सीक्रेटस

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