भांग, धतूरा, चंदन, सफल करें शिव वंदन

श्वेता राकेश

8th March 2021

'शिव' अर्थात् देवों के देव 'महादेव'। शिव यानि 'महाकाल' अर्थात् समय, जिसका न कोई ओर है ना छोर। और ऐसे ही महाकाल की आराधना का पर्व है महाशिवरात्रि। शिवपूजन में शिवलिंग आराधना और अभिषेक का बड़ा महत्त्व है। वह बेहद सरल पूजा-आराधना से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव का रूप कल्याणकारी है। महाशिवरात्रि पर अपनी आराधना से महादेव प्रसन्न होते हैं और वांछित कामनाएं पूर्ण होती हैं।

भांग, धतूरा, चंदन, सफल करें शिव वंदन

भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए किसी महंगी वस्तु या मिठाई की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। महाशिवरात्रि पूजन में दूध, जल, सुपारी, बिल्वपत्र, धतूरा आदि का विशेष महत्त्व है क्योंकि ये सभी फल-फूल भोलेनाथ को अत्यधिक प्रिय हैं-

जल- भगवान शंकर एक लोटा जल चढ़ाने से भी प्रसन्न हो जाते हैं। भोलेनाथ को जल अर्पित करते समय 'ऊं नम: शिवाय' मंत्र का जाप लाभकारी है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने से चित्त शांत होता है। पौराणिक मान्यतानुसार समुद्र मंथन से निकले विष का प्रभाव कम करने हेतु देवताओं ने उनपर जल डाला था।

भांग और धतूरा- संपूर्ण सृष्टि की रक्षा हेतु हलाहल विष का पान करने से भगवान शिव व्याकुलता बढ़ गई। मान्यतानुसार विष का प्रभाव समाप्त करने के लिए भांग और धतूरा का प्रयोग किया गया। धतूरा एक विषैला फल होता है शिवपूजन में धतूरा जैसे जहरीले फल चढ़ाने के पीछे संभवत: यह संदेश निहित है कि जीवन में कटु व्यवहार से बचें और स्वहित की बजाय परहित को महत्त्व दें जैसे भोलेशंकर ने विषपान कर जगत को परोपकार एवं सहनशीलता का संदेश दिया। मांग चढ़ाने से नकारात्मक शक्तियां, भूत-प्रेत बाधा खत्म होती है। इसलिए शिवपूजन में भांग-धतूरा का विशेष महत्त्व है, खासकर जब अवसर हो महाशिवरात्रि का।

दूध-दही- भोलेनाथ को दूध का अभिषेक अत्यंत प्रचलित व पुण्यकारी है। शिवलिंग पर दूध का अभिषेक करने से भक्त स्वस्थ एवं नीरोग रहते हैं। पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को शिव ने अपने कंठ में ग्रहण कर लिया, जिसके कारण उनका पूरा शरीर नीला पड़ गया। विष का असर समाप्त करने हेतु समस्त देवताओं ने दूध से उनका अभिषेक किया। इस कारण उन्हें दूध का अभिषेक प्रिय है। वहीं शिवलिंग पर दही अर्पित करने से भक्त के स्वभाव में गंभीरता और परिपक्वता आती है। इससे जीवन की कठिनाइयां और कमियां दूर होती है तथा जीवन में स्थिरता आती है।

बिल्व-पत्र- बिल्व-पत्र यानि बेलपत्र को भगवान शंकर के तीन नेत्रों का प्रतीक माना जाता है। अत: तीन पत्तियों वाला बिना कंटा-छंटा बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। शिव शंकर की पूजा-आराधना में इसका स्थान सर्वोपरि माना जाता है। बेलपत्र को सदा उल्टा अर्पित करना चाहिए, अर्थात् उसका चिकना भाग शिवलिंग के ऊपर हो। तीन से लेकर ग्यारह तक की संख्या में बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं। मान्यता है कि बेलपत्र चढ़ाने से धन-संपत्ति की वृद्धि होती है। सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। बेलपत्र चढ़ाने के बाद जल का अभिषेक भी किया जाता है।

चंदन- भगवान शंकर भी मस्तक पर चंदन का त्रिपुंड लगाते हैं। चंदन का संबंध शीतलता से है। भगवान शंकर को चंदन चढ़ाने से मान-सम्मान में वृद्धि होती है।

शमी एवं आंकड़े के फूल- भोलेनाथ को शमी के फूल बेहद प्रिय हैं। शमी के फूल अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। मान्यतानुसार घर में शमी का वृक्ष हो तो शनि महाराज की कृपा रहती है और अशुभ ग्रहों का नाश होता है। वहीं आक या आंकड़े अथवा मदार का फूल भी शिव को खास प्रिय है। पुराणों के अनुसार भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग पर मदार के पत्ते या पुष्प अर्पित करने से भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं। सफेद रंग का यह पुष्प चढ़ाने से कष्ट का अंत होता है। इससेअतिरिक्त अगस्त्य के फूल, चमेली के फूल, हरसिंगार के फूल आदि भी उन्हें अर्पित किए जाते हैं। हालांकि शिव को सफेद फूल प्रिय हैं, लेकिन उन्हें सभी सफेद फूल नहीं चढ़ाए जाते, खास कर केतकी के फूल। साथ ही तुलसी, नारियल, कुमकुम, हल्दी का प्रयोग भी उनकी पूजा में वर्जित हैं।

भांग, धतूरा, बेलपत्र आदि के अतिरिक्त आप चाहे तो शिवलिंग पर इत्र, शहद और घी, शक्कर भी अर्पित कर सकते हैं। शिवलिंग पर इत्र चढ़ाने से विचार में पवित्रता आती है, घी, शक्कर अर्पित करने से व्यक्ति शक्तिशाली होता है, शहद अर्पित करने से वाणी में मधुरता आती है और शक्कर चढ़ाने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।

यू तो महादेव की कृपा पूरे साल ही अपने भक्तों पर बनी रहती है किंतु महाशिवरात्रि पर भोलेशंकर की पूजा करने से भक्तों को सभी कष्ट से मुक्ति और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

यह भी पढ़ें -किन 7 चीजों से करें शिवलिंग का अभिषेक

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