पहली नजर का प्यार है...

प्राची प्रवीण महेश्वरी

9th March 2021

...और आखिरी सांस तक इसी प्यार में जीना है और इसी प्यार में मरना है। प्रेमी जोड़े इस कदर इस प्रेम के सागर में डूबते हैं कि दो बदन एक जान बन दुनिया के लिए मिसाल बन जाते हैं। और दुनिया की कौन कहे, इस प्रेम की गलियों से तो स्वर्ग के देवी-देवता और भगवान् भी अछूते नहीं रहे!

पहली नजर का  प्यार है...

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया ना कोय।

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय॥

जी हां, प्रेम के ढाई अक्षर में वो ताकत होती है जिसको पढ़ने के बाद इंसान ऐसी सुध-बुध खोता है कि दुनिया को ही भुला बैठता है। प्यार वो बीज है जिसका अंकुर इंसान ही नहीं भगवान् के अंतरर्मन को भी छूने से नहीं चूकता। भगवान् भी प्रेमरस में डूबने से खुद को बचा नहीं पाते और प्रेम की दीवानगी में अपना सुध खो बैठते हैं। उन्हें यह भी एहसास नहीं रहता कि वो तो सृष्टि के रचियता हैं। तभी तो वो शिव बन सती के बैराग में दर-दर भटकते हैं तो पार्वती के मिलन से शांत होते हैं, राम बन सीता की वन-वन खोज करते हैं, तो कृष्ण बनकर राधा रानी के चरण तक दबाते हैं तो मीरा का विष का प्याला अमृत में बदल देते हैं। प्रेम इतना पावन एवं अनूठा होता है कि प्रेम रस में हमारी सृष्टि के रचियता और पालनहार भी सराबोर होकर एक दूसरे के बन गए सदा के लिए-

शिव, सती व पार्वती की प्रेम कथा

शिव व सती की कहानी शिव व आदि शक्ति के पुन: मिलन की प्रेम कथा है। शिव की पत्नी सती दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं। धीरे-धीरे सती शिव भक्ति में लग गईं। इसके लिए उन्होंने पिता के घर को भी त्याग दिया। घोर तप से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पत्नी बना लिया पर सती के पिता इस विवाह से प्रसन्न नहीं थे। विवाह के बाद सती कैलाश चली गईं। कुछ समय बाद दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया पर शिव-सती को नहीं बुलाया। फिर भी सती वहां गईं पर पिता द्वारा शिव जी का अपमान करने से वो पिता के हवन कुंड में भस्म हो गईं। सती के भस्म होते ही शिव क्रोध में तांडव करने लगे। सती के शरीर के साथ घूमते रहे। विष्णु जी ने अपने चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े किये, तब शिव जी वियोग से बाहर आये। सती के हर अंग पर शक्ति पीठ बन गए, उधर सती पुन: हिमालय के घर जन्मीं। समय आने पर पार्वती के रूप में सती का मिलन फिर से शिव से हुआ और शिव पार्वती जनमानस के लिए एक आर्दश युगल बन गए।

रति और कामदेव

कामदेव और रति दोनो ही प्रेम का ऐसा प्रतीक युगल जोड़ा है जो हर दम्पति को प्रेम का संदेश देता है। भगवान् शिव के क्रोध से भस्म होने के बाद रति की घोर तपस्या के उपरांत श्री कृष्ण पुत्र प्रदुम्र के रूप में कामदेव ने जन्म लिया और फिर रति ने पुन: उनसे विवाह करके उनको पाया था।

विष्णु-लक्ष्मी

समुद्र मंथन में जब रूपवती लक्ष्मी निकली तब उन्हें देखकर सब देव-राक्षस उनको पाने के लिए लालायित हो गए परंतु लक्ष्मी जी ने जब विष्णु जी की तरफ प्रणय निवेदन से निहारा तो लक्ष्मी जी से सम्मोहित होकर विष्णु जी ने भी उन्हें अपनी पत्नी स्वीकार कर लिया।

सीता-राम

सीता-राम का प्रेम अनूठा, अनन्य भक्ति और निष्ठïा से भरा है। जनकपुरी की वाटिका में राम और सीता ने प्रेम के गठबंधन को बिना कुछ कहे आंखों ही आंखों में बांध लिया था और राम ने भी एक पत्नी व्रत लेकर उम्र भर अपने प्रेम को निभाया। 

कृष्ण-राधा, रुक्मणी और मीरा

कृष्ण का प्रेम राधा, रुक्मनी और मीरा के लिए अनूठा रहा। रुक्मणी को कृष्ण ने अपनी पटरानी बनाया। मीरा कृष्ण की भक्ति में इतनी लीन थीं कि कृष्ण का नाम उनके होठों पर रहता था। कृष्ण का प्रेम इन तीन रूपों में आज भी अमर हैं।

पहले राधा के रूप में जो उनकी प्रेयसी बनी पर पत्नी कभी नहीं बन पाई पर कृष्ण राधा के बिना सदैव अधूरे रहे तो राधा भी अधूरी रही। राधा कृष्ण की प्रेमिका बन पत्नी से बड़ा पद पाकर लोगों के जबान पर प्रेम का प्रतीक बन गईं। कृष्ण के हर मंदिर में राधा उनके साथ हैं, रुक्मणी नहीं।

रुक्मणी ने कृष्ण की प्रेम रस को पत्नी बनके सदैव पिया, कृष्ण की पटरानी बनकर गृहस्थ का हर सुख भोगा पर वो कृष्ण की पत्नी कहलाईं, प्रेमिका नहीं। तो मीरा ना कृष्ण की प्रेमिका बनी ना पत्नी बनी, बल्कि एक जोगन बनकर उम्र भर कृष्ण का नाम जपती रही।

सामान्य जनमानस में भी अनेक युगल जोड़ों ने अपना प्रेम अमर किया जो आज भी प्रेम की अनूठी मिसाल हैं-

हीर रांझा 

हीर पंजाब के झंग में एक समृद्ध परिवार में जन्मी और रांझा चनाब नदी के किनारे तख्त हजारा नामक गांव के एक साधारण परिवार में जन्मा था। दोनों ने एक दूसरे को देखा और खो गए प्रेम में पर हीर के पिता ने उसकी शादी किसी और से कर दी तो रांझा टूट गया और जोगी बन गया। बंसी बजाता हुआ रांझा जब एक दिन हीर के ससुराल पहुंच गया तो दोनों के मन में सोया प्रेम फिर से जाग उठा और दोनों भागकर हीर के गांव आ गए। हीर का पिता तो उनकी शादी कराने को तैयार हो गए परंतु हीर का चाचा नहीं माना और उसने हीर को जहर का लड्डïू खिलाकर मार दिया। कहते हैं हीर के मरते ही रांझा ने भी उस बचे हुए लड्डïू को खाकर तुरंत अपनी जान दे दी थी और सदा के लिए अमर हो गए। दोनों एक साथ आस-पास दफनाए गए। झंग में दोनों की कब्र आज भी प्रेम की मिसाल है।

आज भी कई ऐसे प्रेमी जोड़े हैं जिन्होंने उम्र, धर्म की सीमाओं को लांघकर प्यार किया और आज तक साथ खड़े हैं। प्यार तो हर पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका का अपने आप में मिसाल ही होता है। प्यार तो प्यार ही है। असीमित, अटूट और पावन।

शीरीं फरहाद

आर्मेनिया के बादशाह की बेटी शीरीं का विवाह पर्शिया के बादशाह खुसरो से इस शर्त पर हुआ था कि वो पर्शिया के लोगों के लिए दूध की दरिया बनाकर दे, खुसरो ने इस कार्य के लिए फरहाद को चुना पर फरहाद नहर खोदते-खोदते खुद शीरी से प्रेम करने लगा। उसने शीरीं से बताया तो शीरीं नहीं मानी और खुसरो आग बबूला हो गया और उसने एक चाल खेली की अगर तुम नहर खोदकर उसी पहाड़ी के आस-पास चलने के लिए रास्ता भी बना देगा तो उसकी शादी शीरीं से कर दी जाएगी। सब जानते थे ये काम मुमकिन नहीं है परंतु शीरीं के प्रति फरहाद की दीवानगी ने समय से पहले की कार्य पूरा कर दिया और शीरीं का हाथ मांगने गया तो खुसरो ने उससे झूठ कहा कि शीरीं ने आत्महत्या कर ली है। इतना सुनते ही फरहाद ने भी अपने सर पर कुल्हाड़ी मार कर जान दे दी। जब शीरीं को ये पता चला कि खुसरो ने फरहाद के साथ छल किया है तो उसने महल में जाने से मना कर दिया और वहीं शीरीं ने फरहाद के कदमों पर सर पटक-पटककर दम तोड़ दिया। इन दोनों प्रेमियों को एक साथ दफन किया गया और प्रेम के दीवानों में इसका नाम सदा-सदा के लिए अमर हो गया।

सोहनी महिवाल

सोहनी पंजाब के एक कुम्हार परिवार की बेटी थी और महिवाल बुखारा के एक समृद्ध अमीर व्यापारी का बेटा था। उसका असली नाम इज्जत बेग था। व्यापार के बहाने वो पंजाब आया और सोहनी के रूप का इस कदर दीवाना हो गया कि नाम महिवाल रखकर सोहनी के घर में नौकर बनकर रहने लगा और उसके पिता की भैसों को चराने लगा। जब सोहनी के घर वालों को पता चला तो वो इन दोनों को अलग करने के लिए सोहनी का विवाह किसी और से करने को तैयार हो गए और विवाह करके सोहनी अपनी ससुराल चली गई। वहां भी महिवाल वेश बदलकर पहुंच गया और सोहनी से रोज नदी किनारे मिलने लगा। सोहनी मटके के सहारे नदी पार करती थी। एक दिन उसके ससुराल वालों ने देख लिया और पक्के मटके की जगह कच्चा मटका रख दिया। मटका कच्चा होने के कारण सोहनी डूबने लगी। जब महिवाल उसको बचाने के लिए नदी में कूदा तो सोहनी को बचाते- बचाते खुद भी डूब गया। बाद में दोनों की लाशें मिलीं और सोहनी महिवाल पंजाब की धरती पर सदा के लिए अमर हो गए।

लैला मजनूं

अरब के प्रेमी युगल लैला मजनूं की प्रेम कहानी सदियों से एक उदाहरण प्रस्तुत करती रही है जो आज तक कायम है। आज भी लोग प्रेमी जोड़े को उलाहना देकर कहते हैं कि अरे वो तो लैला मजनूं जैसे हो गए हैं एक-दूसरे के प्यार में। अरब की अमीर जाति का लड़का कैस (मजनूं) दमिश्क के मदरसे में पढ़ने वाली लड़की लैला का दावाना हो गया। कैस का पिता दोनों के विवाह के लिए राजी था पर लैला का पिता नहीं माना और उसने लैला का विवाह अमीर इंसान बख्त से कर दिया पर लैला ने बख्त को सब बातें बताकर उसे अपना शौहर मानने से ही इंकार कर दिया तो बख्त ने उसे बहुत यातनाएं दी। लैला उसके प्यार में पागल हो गई। मजनूं के गम में लैला ने दम तोड़ दिया। लैला की मौत की खबर सुनकर मजनूं भी चल बसा। बाद में दोनों को एक साथ दफदाया गया।

प्यार तो सभ करते हैं परंतु कुछ का प्यार सदा के लिए अमर होकर मिसाल बन जाता है। आज भी इनके नक्शे कदम पर चलते हुए अनेक जोड़े प्रेम रस का स्वाद चख रहे हैं। आम आदमी का प्यार घर तक रह जाता है तो सेलिब्रिट्रीज का प्यार नाम पा लेता है। आज भी कई ऐसे प्रेमी जोड़े हैं जिन्होंने उम्र, धर्म की सीमाओं को लांघकर प्यार किया और आज तक साथ खड़े हैं। प्यार तो हर पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका का अपने आप में मिसाल ही होता है। प्यार तो प्यार ही है। असीमित, अटूट और पावन। 

यह भी पढ़ें -असल जिंदगी के प्यार से क्यों अलग है फिल्मी प्यार?

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