ओशो ने मेरे अंदर की हर संभावना को प्रतिभा बनाया है

शशिकांत 'सदैव'

15th March 2021

ओशो के विदेशी संन्यासियों में से एक मुख्य नाम है 'मा प्रेम मनीषा'। जो न केवल ओशो के अंग्रेजी प्रवचनों में प्रश्न पूछती हुई नजर आती हैं बल्कि, आपने ओशो के संध्या दर्शन की 'दर्शन डायरी ' भी तैयार की हैं। प्रस्तुत है ओशो कम्यून में लिए गए साक्षात्कार के प्रमुख अंश।

ओशो ने मेरे अंदर की हर संभावना को प्रतिभा बनाया है

प्र. आपकी नजर में ओशो कौन हैं तथा आपका उनसे मिलना कब और कैसे संभव हुआ ?

उ. ओशो अपने आप में बहुत कुछ और सब कुछ हैं। ओशो गुरुओं के गुरु हैं, उनके जैसी गहराई मैंने और किसी में नहीं देखी। उनका जो विजन है वह अद्भूत और अतुलनीय है।

मुझे उनके साथ बिताये गए वो सारे सुनहरे पल याद हैं, जब वह शरीर में थे। उनका प्रेम, सेन्स ऑफ ह्यूमर, सब कुछ बहुत अद्भूत है। ओशो मेरे जीवन में वह पहले पुरुष हैं जिन्होंने न केवल मुझे बेशर्त प्यार किया बल्कि बेशर्त प्यार करना भी सिखाया। शारीरिक रूप से न सही, आध्यात्मिक रूप से उन्होंने मुझे जन्म दिया है। ओशो वह व्यक्ति हैं जिन्हें मैं सबसे ज्यादा सराहती व प्रेम करती हूं। उन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया है। मेरे अंदर की हर संभावना को मेरी प्रतिभा बनाया है। 

70 के दशक के आरंभ की बात है उस वक्त मैं व मेरी ही तरह यूरोप और अमेरिका के बहुत से लोग अपने भीतरी विकास के लिए भटक रहे थे। उस वक्त मैं पहली बार ओशो के संन्यासियों से लंदन में मिली थी, जो कि संतरी रंग के चोगों में थे। उनमें से किसी ने मुझे एक पुस्तक दी थी, जिसे पढ़कर मैंने अपने आप से यह सवाल किया 'कि क्या यह संभव है?' साथ ही यह भी विश्वास हुआ कि, यह आदमी जो बोल रहा है वह है तो सत्य। ओशो की बातें सीधी और साफ थीं, सीधे अंदर उतरती थी। मेरे लिए किसी इंसान में ह्यूमर बहुत मायने रखता है और ओशो का सेन्स ऑफ ह्यूमर ही बहुत गजब का है।

 

प्र. कैसी थी ओशो से पहली मुलाकात ?

. मैं 24 वर्ष की थी ,जब मैं ओशो से मिली। मैं एक बहादुर, साहसी और स्वावलंबी लड़की थी ,जो हर एक पर यूं ही विश्वास नहीं करती थी न ही मैं किसी गुरु इत्यादि में यकीन करती थी न ही मुझे किसी गुरु की जरूरत थी। पर जब मैं संध्या दर्शन में ओशो के पास गई, ओशो ने कहा 'तुम क्या सोच रही हो' मैंने कहा, 'कुछ नहीं क्योंकि मैं सोच-सोच कर थक चुकी हूं।' ओशो ने कहा 'मुझे ऐसे ही लोगों की तलाश है जो सोच-सोच कर थक चुके हैं।' उसके बाद उन्होंने मुझे माला पहनाई संन्यास दिया और नाम दिया। तभी से मैं ओशो के साथ रहने लगी।

प्र. जब आपने संन्यास लिया, इस पर आपके घर वालों की क्या प्रतिक्रिया थी ?

उ. मेरे संन्यास के इस फैसले से मेरी मां खुश नहीं थी। मेरे लिए उन्हें वो समझाना, जो मेरे साथ घटित हुआ था बहुत मुश्किल था, क्योंकि  वह शदों से बाहर की बात थी ऌपरंतु मैं फिर भी कुछ टूटे-फूटे शब्दों में अटक-अटक के बोलने की कोशिश कर रही थी। मेरी इस अवस्था को देखकर मांं संतुष्टï स्वर में बोली 'मेरे लिए इतना बहुत है कि तुम खुश हो।' लगभग अठारह महीने बाद मेरे माता-पिता भारत आए और ओशो से मिले और उनके प्रवचन भी सुने जिसे वह रिकॉर्ड करके ऑस्ट्रेलिया ले गए, वह बहुत खुश थे।

 

प्र. आश्रम में आपको किस प्रकार के कार्य करने का सुअवसर प्राप्त हुआ ?

उ. शुरू के नौ महीने मुझे ओशो का लाओत्से हाऊस साफ रखने का काम मिला। उसके बाद मैंने 'प्रधान संपादन का काम किया। बाद में फिर मैंने दर्शन डायरी पर काम किया। इसमें वो वार्तालाप व प्रश्न -उत्तर हैं जो संध्या दर्शन में लोग ओशो से पूछते थे। ओशो ने मुझे उन दर्शनों को रिकॉर्डिग करने का काम दिया जो छ: वर्षों तक चला। जिससे 'दर्शन डायरी' के नाम से 70 पुस्तकें निर्मित हुई, इसके साथ-साथ दर्शन में मिलने आने वाले सेलिब्रिटीज का मैं इंटरव्यू भी लेती थी।

मुझे याद है जब पहली 'दर्शन डायरी' पूरी होने के बाद उसे ओशो के पास ले गई थी और मैंने उन्होंने देते हुए कहा था - 'यह देखिए आपकी दर्शन डायरी' तो उन्होंने बड़े प्यार से हंसते हुए कहा था 'मेरी नहीं तुम्हारी।' उन्होंने मुझे कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता दी, कभी कुछ नहीं पूछा, कि प्रिंट में जाने से पहले मुझे दिखाना। उनका मेरे ऊपर इतना भरोसा मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।

 

प्र. जिस दिन ओशो ने अपनी देह त्यागी तब आपकी मन:स्थिति क्या थी ?

उ. जिस दिन ओशो ने शरीर छोड़ा मैं एक दम हैरान थी, एक शोक से भर गई थी। एक तरफ यह खबर मेरे लिए एक बहुत बड़े नुकसान की तरह थी, तो वहीं मुझे उनके वह वाक्य याद आए कि 'एक दिन मैं इस शरीर को भी छोड़ दूंगा तब तुम्हें शोक नहीं उत्सव मनाना है।' इस वाक्य की याद के साथ मैं पुन: जोश और आनंद से भर गई और ओशो को हंसते-गाते, उत्सव के साथ विदा किया।

प्र. ओशो के साथ बिताए दिनों के बारे में आपका क्या कहना है ?

उ. ओशो के साथ बिताया गया हर दिन,हर पल अनोखा और खूबसूरत था। मैं किसी दिन या पल की तुलना नहीं कर सकती। उनके आस-पास होना ही अपने आप में अद्भूत था। मैं ओशो को मन के स्तर पर नहीं तोलती न ही सोचती हूं, हर पल उन्हें जीती और महसूस करती हूं।

 

प्र. अपनी रोज दिनचर्या में आप ओशो को किस तरह जीती हैं ?

. मैं हर पल जागरूक होने की कोशिश करती हूं, वर्तमान में रहने की कोशिश करती हूं, साथ ही मैं लोगों में उन्हें उनके अपने प्रति जागरूक बनाए रखने का प्रयास करती हूं, प्रेम बांटती हूं। कैसे वर्तमान क्षण में आनंदपूर्ण हुआ जा सकता है ,साथ ही जागरूक होकर कैसे मरा जा सकता है। सच तो यह है मैं कुछ करने की कोशिश नहीं करती। ओशो कहते हैं 'न तुम कोई मिशनरी नहीं हो, होना सीखो।'ओशो की एक बात मुझे हमेशा याद रहती है और वह यह कि 'सदा याद रखो कि तुम बुद्घ हो।'

यह भी पढ़ें --धर्म की साधना होती है, शिक्षा नहीं

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