प्रोजेक्ट सास- बनें हेल्पिंग सासू मां

मोनिका अग्रवाल

19th April 2021

अपने घर परिवार को छोड़कर हमेशा के लिए दूसरे के घर में बस जाना आसान नहीं होता। हर बेटी को इस परिस्थिति से गुजरना ही पड़ता है। जब भी उसकी शादी होती है तो उसे वो घर छोड़ना ही पड़ता है जिस घर में उसने अपना बचपन और जवानी बिताई होती है।

प्रोजेक्ट सास- बनें हेल्पिंग सासू मां

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शादी के बाद दूसरे के घर में पूरी जिंदगी गुजारना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता। अपने पैरेंट्स से बे-इन्तहां प्यार और केयर के बाद किसी दूसरे के पैरंट्स को अपनाना डरावना लगता है। जितना एक बहू इस रिश्ते को समझने की कोशिश करती है, एक सास को भी उसे अपनी बेटी की तरह ही समझना चाहिए।

दुबई एयरपोर्ट पर जया को देखकर गायत्री जी का मन बुझ गया.

"आशीष नहीं आया?" चरण स्पर्श करती बहू से उन्होंने शुष्क स्वर में पूछा

"नहीं ममाँ,अचानक उनके बॉस ने ऑनलाइन मीटिंग फिक्स कर दी इसलिए नहीं आ पाए वरना हम दोनों साथ ही आ रहे थे.मैं भी आपको ड्रॉप करके ऑफिस निकल जाऊँगी."

सुनते ही गायत्री जी और परेशान हो गयीं.जिस दिन आशीष ने उन्हें दुबई आने की बात की थी ,उसी दिन से उन्होंने देवेंद्र जी के सामने राग अलापना शुरू कर दिया था...

"मैं दुबई नहीं जाएंगे"

"लेकिन क्यों?"

"बस यूँ ही.."कहकर उन्होंने बात टाल दी तो  देवेंद्र जी ने भी विशेष पूछताछ नहीं की.बेटी नेहा भी शारजाह में थी.इसी बहाने उससे भी भेंट हो जाएगी .यही सोचकर उन्होंने,आशीष से कहकर उसे दो टिकट भेजने के लिए कह दिया था.अमेरिका वीज़ा होने के कारण ,दुबई वीजा लेने की कोई औपचारिकता भी नहीं थी.वो आराम से पंद्रह दिन दुबई में रह सकते थे.

     उधर गायत्री जी की अपनी समस्या थी.उन्हें जया फूटी आँख नहीं सुहाती थी.सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उनके इकलौते बेटे ने विजातीय जया से प्रेम विवाह किया था बल्कि इसलिए कि उन्हें बहू की बोलचाल और तौर तरीक़े ज़रा नहीं भाते थे.पंद्रह दिन तो क्या ,उन्हें बहू के साथ पंद्रह मिनट रहना भी गंवारा नहीं था.

रास्ते भर जया उन्हें दुबई की गगनचुंबी इमारतों,मॉल,और सर्पाकार सड़कों की जानकारी देती रही.हालांकि विदेश में पली बढ़ी जया की हिंदी पर अच्छी पकड़ नहीं थी फिर भी वो भरपूर कोशिश कर रही थी कि गायत्री जी के साथ हिंदी में ही बात करें.

    दुबई के पॉश इलाके में आशीष का चार बेडरूम का फ्लैट था.जितना सुंदर फ्लैट था,उतनी ही सुंदर सजावट भी थी.मख़मली सोफा के साथ ग्लास टॉप टेबल और डाइनिंग टेबल ,लेस के परदों से छनती सूर्य की किरणें,और दुबई क्रीक का मनोहारी दृश्य फ्लैट की सज्जा में चार चाँद लगा रहे थे.

गाड़ी पार्किंग में पार्क करके जया ,ट्राली में सामान रखकर गायत्री जी के बेडरूम तक खींच कर ले आयी.और चाय नाश्ते का प्रबंध करने के लिए चौके में घुस गयी.आशीष ने ,मीटिंग के चलते अपने कंप्यूटर रूम से ही हाथ हिला कर माता पिता का अभिवादन किया और पुन:अपनी मीटिंग में व्यस्त हो गया.

"जया को जरा समझा दीजिए हम दोनों बिना चीनी की चाय पीते हैं"जया जी ने देवेंद्र जी से कहा .इतने में चहकती हुई जया कमरे में आ गई.बोली,

"मुझे याद है माँ.और ये भी याद है कि आप और पापा चाय के साथ बिस्कुट ज़रूर लेते हैं.खाने में तला भुना तो बिलकुल भी नहीं,सब्जियों में भी कम घी तेल पसंद करते हैं"

"ऐसा कोई नियम कानून तो नहीं है,मौके बेमौके खा भी लेते हैं"

"सौरी मम्मा,आज तो मैंने ऐसा ही खाना बनाया है,कल आप जैसा सिखाएँगीं ,सीख जाऊँगी"

"कितनी प्यारी है हमारी बहू,शांत और विनम्र"देवेंद्र जी ने पुलक कर कहा तो गायत्री जी चिढ़ गयीं,

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"चालाक भी.पंद्रह दिन में भी चक्की पिसवाएगी,सुना नहीं आपने ?कल से उसे ,खाना पकाना मुझे सिखाना है.ये सब तो माँ को सिखा कर भेजना चाहिए था न?"

गायत्री जी जानबूझकर ऊँची आवाज़ में तंज कसा ताकि जया उनकी बात सुन ले.वैसा ही हुआ.जया ने गायत्री जी और देवेंद्र जी के कपड़े अलमारी में टाँगते समय गायत्री जी के शब्द सुन लिए थे.हैरान वो इस बात पर थी कि,जितना ही उसने,गायत्री जी के खाने पीने ,यहाँ तक कि बाथरूम में नहाने के साबुन से लेकर,उनकी पसंद का शैम्पू,कलर ,साबुन तक का ध्यान रखा था,उतना ही वो उसकी प्रशंसा तो दूर, उसके हर काम में मीन मेख निकालने पर तुली हुए थीं.अचानक उसे आशीष के शब्द याद आ गए,

"माँ का दिल है कोई संकरी गली नहीं,तुम्हें माँ का प्यार और विश्वास ज़रूर मिलेगा"

"अटैच बाथरूम वाला कमरा हमारे लिए रखते तो सही रहता,रात बेरात ठोकर लगी तो बूढ़ी हड्डियों चरमरा जाएँगी"जया ने चौंक कर आशीष को देखा.

"हम दोनों ने जानबूझकर ये कमरा आपके और पापा के लिए रखा है माँ,क्योंकि क्रीक का व्यू यहाँ से अच्छा दिखता है,आप कहें तो आपका कमरा हम अपने कमरे से एक्सचेंज कर लेते हैं"

गायत्री जी क्रीक के दृश्यावलोकन का मोह संवरण नहीं कर पाईं सो उन्होंने कमरा बदलने का विचार तुरंत बदल दिया

थोड़ी देर में किचन से बर्तन खटकने की आवाज़ आयी.आशीष और जया खाना गर्म करके टेबल पर लगा  रहे थे,

"इतना जल्दी लंच?"

उन्होने घड़ी की ओर देखा.बेटे का अपनी पत्नी के साथ हाथ बँटाना उन्हें ज़रा गँवारा नहीं हो रहा था

"माँ एक बजे तक मुझे भी ओफिस पहुँचना है,लंच के बाद आप भी थोड़ा आराम कर लीजिएगा.शाम को बर्तन करने सूजी आएगी,तो आप उससे काम करवा लीजिएगा,...रात का खाना मैं वापस लौट कर बना लूंगी"उसके शब्दों में अपनेपन की खुशबू थी....

"क्या ,आज भी तुम्हें ऑफिस जाना है?"

"इम्पोर्टेंट प्रेजेंटेशन है माँ,इसलिए जाना ज़रूरी है"सास का दंभ प्रबल हो उठा था

जब तक जया लंच टेबल पर सर्व करती,तब तक आशीष भी मीटिंग के बीच से उठ कर टेबल पर आ गया था.गायत्री जी ने अपने हाथ से बनाए हुए ढोकले,पापड़ी,बेसन के लडू से टेबल सज़ा दी.बेटे और पति को वो रज रज कर परोसती रहीं,जया चुपचाप अपने हाथ से पका खाना खाती रहीं.

रात में ही उन्होने नेहा को फ़ोन घुमा दिया .काफ़ी देर तक बातचीत चलती रही.गायत्री जी ने ताक़ीद की,

"जितने दिन हम यहाँ हैं वो भी हमारे साथ आकर रहे"

  नेहा ने उनके साथ आकर रहने की बात टाल दी,और फ़ोन अपनी सासू माँ को थमा दिया,

"ख़ुश ख़बरी है गायत्री तुम नानी बनने वाली हो"नेहा की सास उसके बचपन की सहेली थीं

"क्या.."गायत्री जी का दिल बाग़ बाग़ हो उठा.शब्द होंठों में क़ैद होकर रह गए.तीन साल बाद नेहा ख़ुशख़बरी सुनाने जा रही थी.एक दो अबॉर्शन भी हुए थे इसलिए उसकी सास चाह रही थीं वो पूरी तरह बेडरेस्ट पर रहे.

नेहा की सास ने उनसे वादा लिया कि ,जुम्मे को उनके बेटे राघव की छुट्टी होती है ,जया और आशीष भी घर पर होंगे .सो वो सब सुबह ही सपरिवार उनके साथ शारजाह आकर पूरा दिन व्यतीत करें.

गायत्री जी ने वो दो दिन बमुश्किल काटे.चौके में जाकर कभी बादाम देसी घी में भूनतीं कभी,गर्भवती के लिए यूट्यूब पर नए नए व्यंजनों की रेसिपी ढूँढती.समय काटे नहीं कट रहा था.जया ने ,उस दिन अपनी सभी मीटिंग कैंसिल कर दीं थीं.मार्केट जाकर नेहा के लिए गिफ्ट ले आयी ,गायत्री जी के उठने से पहले ही उसने,सैंडविच,खजूर,और फल भी टोकरी में सहेज कर रख दिए."सास ससुर दोनों ही शुगर पेशेंट हैं"इसलिए वो उनके प्रति पूर्ण सतर्कता बरत रही थी गायत्री जी उस दिन विशेष प्रसन्न दिख रही थीं,बेटी के घर पहुँचने की ख़ुशी में उनका हर दुख दर्द छूमंतर हो गया था.

नेहा पलंग पर लेटी थी.माँ को देखते ही उसने उठने का प्रयासों किया तो उसकी सास ने इशारे से रोक दिया था.डॉक्टर की हिदायत के चलते उसके करवट बदलने पर भी रोक लगायी गयी थी.

   हँसी ख़ुशी का माहौल था,नेहा की सास चौके में जाकर पकवान,मिष्ठान और कोल्ड ड्रिंक तैयार करती रहीं. जया बराबर उनका हाथ बंटाती रही

"कितनी प्यारी बहू है तुम्हारी!"

"मेरी नेहा से कम"गायत्री जी ने उदास स्वर में कहा तो धीरे से था पर नेहा की सास ने सुन लिया था

"बहुएँ तो सभी प्यारी होती हैं गायत्री,सिर्फ़ अपने सांचे में ढालना होता है"

"बशर्ते वो साँचे में ढलना चाहे तो..."

नेहा की सास समझ गई थीं कि गायत्री के मन में बहू के प्रति कोई कंटक गहरे तक पैठा हुआ है.जिसे निकालना जरूरी है

"गायत्री !कोई भी इंसान सर्वगुण संपन्न नहीं होता.अपनी बेटी को अपने सांचे में ढालने में हर माँ अपनी पूरी ज़िंदगी लगा देती है फिर भी कुछ कमी रह जाती है तो उसकी कमियों पर पर्दा डाल देती है,और बहू को हर समय अपने तराजू पर तौलती रहती है.उसके साथ भी बेटी जैसा व्यवहार क्यों नहीं करती?बात तो तब बने जब उसकी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ उसे अपनाया जाय,न कि दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर दूर छिटक दिया जाय"

उन्होने मुस्कुरा कर कहा फिर ,चम्मच हाथ में लेकर धीरे धीरे नेहा को दलिया खिलाने लगीं.

गायत्री जी की आँखों से झर झर आँसू बहने लगे.उन्होने मन ही मन निर्णय लिया कि अब ,आशीष से कहकर अपनी टिकट पंद्रह दिन से आगे बढ़ाने के लिए कहकर अपनी दुबई यात्रा को सुखद बनाएँगी.दिल के इर्द गिर्द उगा हुआ खरपतवार छँट चुका था…

संवाद

अपने घर परिवार को छोड़कर हमेशा के लिए दूसरे के घर में बस जाना आसान नहीं होता। हर बेटी को इस परिस्थिति से गुजरना ही पड़ता है। जब भी उसकी शादी होती है तो उसे वो घर छोड़ना ही पड़ता है जिस घर में उसने अपना बचपन और जवानी बिताई होती है। उसके जीवन में नये रिश्तों की दस्तक किसी सपने से कम नहीं होती। नये चेहरों और नये रिश्तों के साथ एक नई शुरुआत चुनौती भरी हो सकती है। वैसे तो कई रिश्ते ऐसे होते हैं, जो अपने आप ही करीब आ जाते हैं, लेकिन एक लड़की के लिए उसकी सास का रिश्ता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि सास ही पूरे परिवार की वो डोर होती है जिसका सपोर्ट और प्यार जरूरी होता है। इस सब से हटकर बात जब सास की आती है तो बहू के साथ साथ उन्हें भी थोड़ा समझने की जरूरत होती है कि जिस तरह से उनकी बेटी है ठीक उसी तरह से उनकी बहू भी है जो सब कुछ छोड़कर उनके पास आती है। उसे भी बेटी की तरह प्यार दें। ये लेख खास इसी विषय में आपकी मदद करेगा। चलिए जानिए कैसे आपकी राह और भी आसान बन सकती है।

1. बेटी की तरह ही दें प्यार- अगर आप सास बनने वाली हैं तो आप इस बात को समझें कि आपके घर में जो भी बहु आने वाली है वो आपकी बहु से पहले किसी की बेटी भी है। उसे भी उतनी ही नाजों से पाला गया है, जितना आप अपनी बेटी को पालती हैं। आप अपनी बहु को उतना ही प्यार दें जितना आप अपनी बेटी को देती हैं। ये आपकी जिम्मेदारी भी है। आगर आपकी बेटी उसकी पसंदीदा चीज़ें करने की परमिशन मांगती है तो आप अपनी बहू को भी इस बात की परमिशन दें, कि जो उसका दिल करता है और वो खुश रहती है, तो उसे भी करने दें।

2. बहू की बनिये प्रेरणा- कोई भी लड़की अपनी आंखों में कई तरह के सपने संजोये हुए अपने ससुराल जाती है। जहां उसे सास का या तो प्यार मिलता है, या फिर प्रतारणा। जिस तरह एक मां अपनी बेटी की परवरिश नाजों से करती है, शादी के बाद वो अपनी मां की सीरत अपनी सास में देखती है। वो चाहती है कि उसकी सास उसे अच्छा मार्गदर्शक करे और उसकी सराहना करें। एक पत्नी और एक कामकाजी महिला के रूप में दोनों किरदारों के बीच संतुलन कैसे करना है, ये आप उसे सिखाईये। उसे ये भी सिखाएं कि परिवार और करियर के बीच सही तालमेट कैसे बिठाएं। आपकी सही और अच्छी सलाह उसे हमेशा प्रेरित करेगी।

3. तारीफ़ भी करें- कभी कभी बहू की तारीफ बेवजह ही कर देने से उसे बड़ी ख़ुशी दे सकती है। अगर आपको अपनी बहू में कुछ अच्छाई दिखती है तो उस अच्छाई की तारीफ करें। अगर आप ये तारीफ दूसरों के सामने करेंगी तो इससे आपकी बहू के मन में आपके लिए इज्जत, लगाव बढ़ा जाएगा। साथ ही उसका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। क्योंकि तारीफ ही एक मात्र ऐसी चीज होती है जो इसी भी इंसान के आत्मविश्वास को दोगुना कर सकती है। उसे हताश नहीं होने देती। वो आपको अपनी मां की तरह मानेगी। अगर वो गलती कर रही है तो उसपर चिल्लाने की जगह उसे प्यार से समझाएं।

4. बहू को हमेशा करें प्रेरित-  आप अपनी बहू को हमेशा उसकी लाइफ में करियर में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। आप उसे अपना पूरा समर्थन दें, उसे एहसास दिलाएं कि आप उसके हर फैसले में उसके साथ हैं। आप उसकी देखभाल भी वैसे ही कीजिये जैसे अपनी बेटी की करती हैं। अगर आप उसके फैसले से सहमत नहीं है तो उसे समझते हुए उसके अनुसार ही उसे प्रेरित करें।

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5. दोस्त की तरह बांटे दुःख- अगर आप अपनी बेटी के साथ दोस्ताना व्यवहार रखती हैं, तो आप अपनी बहू के साथ भी दोस्ती करें। उसे दोस्तों की तरह समझें। ताकि वो अपने सुख दुःख आपसे बांट सके। जैसे वो अपनी माँ से बांटती थी। ये स्वभाव आपके रिश्ते को नये सांचे में ढलने में मदद करेगा।

निष्कर्ष

अगर आप के अंदर भी ये गुण हैं, तो आप एक बेहतरीन मां के साथ एक बेहतरीन सास बनने के भी काबिल हैं। अगर आप अपनी बहू से अपनी बेटी की तरह प्यार करेंगी और उसका ख्याल रखेंगी तो बदले में वो भी आपको अपनी मां ही मानेगी और आप पर अपना प्यार लुटाएगीं।

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