भारतीय नववर्ष के शुभारंभ का दिन गुड़ी पाड़वा

सुधीर जोशी

5th April 2021

नव संवत्सर यानी नव वर्ष का पहिला दिन, जिस दिन हर घर के सामने गुड़ी उभार कर नए वर्ष का शुभारंभ किया जाता है। इस दिन गुड़ी उभारने की भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपरा है।

भारतीय नववर्ष  के शुभारंभ का दिन  गुड़ी पाड़वा

गुडी पाड़वा हर हिंदू के लिए गर्व की बात है। चैत्र माह मराठी महीना का पहला महीना है और इस माह का पहिला दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसा बताया जाता है कि ब्रह्मï देवता ने जब इस पूरी सृष्टि का निर्माण किया, उस सृष्टि का कार्यक्रम गुड़ी लगाकर किया गया। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या में वापस आने के दिन के रूप में इस दिन की गणना की जाती है।

चैत्रीय नवरात्र का पहला दिन

भारत में नव वर्ष का शुभारंभ चैत्र माह से होता है। भारतीय कैलेंडर के पहले दिन को गुड़ी पाड़वा नाम दिया गया है। गुढ़ी पाड़वा हर हिंदू के लिए गर्व की बात है। गुड़ी पाड़वा से ही चैत्रीय नवरात्र का भी शुभारंभ होता है। इसी दिन मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्री राम की आराधना का नवदिवसीय पर्व राम नवरात्र शुरू होता है।  

पहले से ही तय कर लें गुड़ी का स्थान

घर में गुड़ी कहां उभारनी है उस स्थान को चयन पहले ही कर लिया जाता है।  गुड़ी उभारने की जगह स्वच्छ तो होनी ही चाहिए, साथ ही जिस लकड़ी पर गुड़ी उभारनी है, उसका प्रतीकात्मक स्नान करके रंगोली भी बनायी जाती है। गुड़़ी पाड़वा को साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक माना जाता है। गुड़़ी पाड़वा के दिन सुबह अभ्यंगस्नान करने के बाद सूर्योदय से पूर्व गुड़ी उभारी जाती है। गुढ़ी उभारने के लिए एक डंडा को लेकर उसे गरम पानी में अच्छी तरह से पोंछ कर उस पर हल्दी चंदन, सुगंधित वस्तु लगाकर उसके ऊपर वस्त्र धारण कर उसकी पूजा की जाती है। शाम को  सूर्यास्त के पहले गुड़ी को नीचे उतारने की परंपरा है। इससे पहले गुढ़ी को धनिया तथा गुड़ का प्रसाद अर्पित करते हैं। चैत्र में कच्चे आम का शरबत पीने से पेट संबंधी विकार दूर होते हैं। गुढ़ी की लकड़ी वहां ठीक तरह से बांधनी चाहिए। लकड़ी पर चंदन, फूल, अक्षत लगाकर गुढ़ी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद दीप लगानी चाहिए। इसके बाद दूध, चीनी, पेड़ा का नैवैद्य गुढ़ी के समक्ष रखा जाता है। दोपहर को गुढ़ी पर मिष्ठïान का नैवेद्य दिखाया जाता है और सायंकाल सूर्यास्त के समय फिर हल्दी-कुमकुम, फूल, अक्षत अर्पित करने के बाद गुढ़ी उतारने की प्रथा है।

नव संवत्सर का फल वाचन

गुड़ी पाड़वा के दिन वर्षारंभ होता है, इसलिए इस दिन पंचांग का पूजन करके उसमें उल्लिखित नव संवत्सर का फल वाचन किया जाता है। इस दिन नई वस्तु खरीदने, व्यवसाय प्रारंभ, नव उपक्रम का प्रारंभ जैसे उपक्रम किए जाते हैं। इस दिन कुछ लोग स्वर्णाभूषण खरीदते हैं, क्योंकि अक्षय तृतीया की तरह ही गुढ़ी पाड़वा का दिन भी स्वर्ण खरीदने की दृष्टि से अच्छा माना जाता है। इस दिन मां, दादा-दादी बच्चों को नीम की पत्ती खाने के लिए देते हैं। इसके पीछे की धारणा यह है कि नीम की पत्ती खाने से पाचनक्रिया अच्छी हो जाती है। यह कड़वी पेट की बिमारियों से बचाव तो करती ही है साथ ही पेट तथा दांत के कीटाणुओं का भी नाश करती है। नीम की पत्ती से पित्त का नाश होने के साथ-साथ इससे त्वचा संबंधी रोगों का भी निदान होता है। यह दिन पूरे महाराष्ट्र में नए वर्ष शुभारंभ के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन दिवशी सातवाहन राजवंश ने विदेशी शासकों को हराया तथा महाराष्ट्र की भूमि को विदेशी शासकों के कब्जे से मुक्त भी कराया था। 

भगवान श्री राम का अयोध्या आगमन

भगवान श्रीराम ने इसी दिन चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर लंकाधिपति रावण तथा अन्य राक्षसों का वध कर अयोध्या में प्रवेश किया था। गुड़ी पाड़वा के दिन कई शुभ बातें हुईं, इसलिए घर-घर वर्ष प्रतिपदा के दिन बांस की लकड़ी को अच्छी तरह से साफ धोकर उसे भगवा वस्त्र पहनाकर उसमें फूलों की माला तथा चीनी के बताशों की माला बांधी जाती है। लकड़ी के अंतिम छोर पर चांदी अथवा तांबे का लोटा उल्टा करके लगाते हैं। फिर उसे घर के दरवाजे के पास या छत पर लगाकर उसको नमस्कार किया जाता है। पुराणों में कहा गया है कि यह साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है। इस पर्व को महाराष्ट्र में गुढ़ी पाड़वा का नाम दिया गया तो लोक कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में यह पर्व उगादी के नाम से मनाया जाता है। गुढ़ी अथवा ब्रह्मïध्वज आनंद और विजय का प्रतीक है। 

कोयल की कूक सुनकर मन हो जाता है आनंदित

चैत्र माह में अगर हम प्रकृति का अवलोकन करें तो पता चलेगा कि इस माह में शुष्क हुई सृष्टि में हरियाली आ जाती है। पतझड़ में पत्तों से विहीन हुए वृक्षों में नए पत्ते आ जाते हैं। एक तरह से चैत्र माह में वसंत ऋतु की शुरुआत ही हो जाती है। बागों में, जंगलों में कोयल की कूक सुनायी देने लगती है। कोयल की कूक सुनकर मन आनंदित हो जाता है। कोयल के कंठ से निकला स्वर प्रकृति के परिवर्तन का संकेत देता है। नव चैतन्य, नव सृष्टि का स्वागत प्रवेश द्वार पर गुड़ी लगाकर करने की परंपरा भी इस पर्व में निहित है। वर्ष के प्रारंभ में बीते साल में हुई अप्रिय घटना को भूलकर नई स्फूर्ति के साथ नए साल का आनंद  मन में भर कर नई स्फूर्ति के साथ नए सकंल्प लेना भी इस पर्व के साथ जुड़ा हुआ है।  इस पर्व पर नीम की पत्तियां नहाने के पानी में डालकर स्नान करने की भी परंपरा है। गुड़ी पाड़वा का पूरा उल्लेख शालिवाहन अर्थात् सातवाहन के शासनकाल में मिलता है। 

सातवाहन राजवंश की नई शताब्दी का पहला दिन

गुड़ी पाड़वा से नए सातवाहन शक वर्षारंभ तो होता ही है साथ ही नवीन पंचांग की भी शुरुआत होती है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ व फाल्गुन ये चंद्र मास एक के बाद एक करके आते रहते हैं। भारतीय कालमाप प्रक्रिया में ऋतु तथा पर्व का विशिष्ट महत्त्व है, इसके लिए सूर्य तथा चांद पद्धति को एक में मिलाया गया है। माह के नाम तथा आकाश का भी संबंध है। चैत्र माह में चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में रात शुरू होने से पहले पूर्व में उगकर सुबह पश्चिम में डूबता है। वैशाख माह में विशाखा, ज्येष्ठ में ज्येष्ठा और इसी तरह उन महिनों में पड़ने  वाले पूर्णिमा के चांद नक्षत्र के पास ही रहता है। चैत्र माह का पूर्णिमा चंद्र चित्रा के पास रहता है।   

यह भी पढ़ें -मानव जाति के आदर्श श्रीराम

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