हिन्दू नववर्ष प्रतिपदा विक्रम संवत्

- महेश चन्द्र शर्मा

5th April 2021

जिस प्रकार ईसाई जनवरी की पहली तारीख से तथा मुसलमान मुर्हरम से नववर्ष का प्रारम्भ मानते हैं उसी प्रकार हिन्दू विक्रम संवत्ï को अपने नववर्ष का प्रारम्भ मानते हैं। आइए इसके बारे में विस्तार से जानें।

हिन्दू नववर्ष प्रतिपदा विक्रम संवत्

भारतीय नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही होता है और इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोलशास्त्रीय संगणना के अनुसार होता है। आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत कालगणना व्यावहारिकता की कसौटी पर भी खरी उतरी है।

यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है। इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति नया रूप धर लेती है। प्रतीत होता है कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जस्वित तैयार होती है। मानव, पशु-पक्षी, यहां तक कि जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद और आलस्य को त्याग सचेतन हो जाती है। वसंतोत्सव का भी यही आधार है। इसी समय बर्फ  पिघलने लगती है। आमों पर बौर आ जाता है। प्रकृति की हरीतिमा नवजीवन का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ जाती है।

यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है। इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति नया रूप धर लेती है। प्रतीत होता है कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जस्वित तैयार होती है।

इसी प्रतिपदा के दिन उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांत शकों से भारत का  रक्षण किया अत: इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की। उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमी संवत् कह कर पुकारा। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2070 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का उन्मूलन कर देश से भगा दिया और उनके ही मूल स्थान अरब में विजयश्री प्राप्त की। साथ ही यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कंबोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहराई। उसी के स्मृति स्वरूप यह प्रतिपदा नव संवत्सर के रूप में मनाई जाती थी और यह क्रम पृथ्वीराज चौहान के समय तक चला। महाराजा विक्रमादित्य ने भारत की ही नहीं, अपितु समस्त विश्व की रचना की। सबसे प्राचीन कालगणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन को विक्रम संवत् के रूप में मनाना प्रारम्भ किया। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह पवित्र दिन ही वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय दिलाने वाला है। इसी दिन महाराज युधिष्ठिïर का भी राज्याभिषेक हुआ और महाराजा विक्रमादित्य ने भी शकों पर विजय के उत्सव के रूप में मनाया। आज भी यह दिन हमारे सामाजिक और धार्मिक कार्यों के अनुष्ठान की धुरी के रूप में तिथि बनाकर मान्यता प्राप्त कर चुका है। यह राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने वाला पुण्य दिवस है। हम प्रतिपदा से प्रारंभ कर नौ दिन वासन्तिक नवरात्रों में छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं, फिर अश्विन मास के शारदीय नवरात्रों में शेष छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं।चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को 'गुड़ी पड़वा या 'वर्ष प्रतिपदा या 'उगादि (युगादि) भी कहा जाता हैं, क्योंकि इस दिन हिन्दू नववर्ष का आरम्भ होता है। शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। 'युग और 'आदि शब्दों की संधि से बना है 'युगादि। 

कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्मजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसी दिन से नया संवत्सर शुरू होता है। अत: इस तिथि को 'नवसंवत्सर' भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। 

नव वर्ष में प्रवेश करते समय मनुष्य आगामी वर्ष की सुखद कल्पना से आनन्दित होता है। मन में नई-नई उमंगें उठती हैं। उसकी आयु एक वर्ष और बढ़ गई, इसका उसे ज्ञान भी होता है। उसे स्मरण नहीं होता कि उसकी मृत्यु, एक वर्ष से और समीप आ गई। यथार्थ में इस दृष्टि को सामने रखते हुए उसे समाज सेवा कार्य और भी अधिक शक्ति, गति तथा बुद्धि लगाकर करना चाहिए। जिससे वह अपनी कमी को पूरा कर आगे बढ़ सके परंतु वह कभी-कभी अपनी उमंग में यह भी भूल जाता है कि बीते हुए समय में उसने देश और समाज के लिये कुछ भी नहीं किया, उसे अपने ऊंचे विचारों और कार्य की विषमता का ज्ञान तक नहीं होता। यह बात केवल साधारण लोगों में भी मिलती है। ऊंचा से ऊंचा निश्चय करने के पश्चात् मनुष्य का कार्य साधारण ही रह जाता है, उसका जीवन यों ही बीत जाता है। परन्तु धार्मिक और सामाजिक व्यक्ति को ध्यान में रखें कि उसने एक बार दृढ़ विचार कर लिया है और वह उसे पूरा करेगा।

हमारे अंत:करण के ऊंचे विचार केवल हमारे अन्तर्गत ही न रहें, उनका विकास अन्य लोगों में भी होना चाहिए।

ऐतिहासिक दृष्टि में वर्ष प्रतिपदा का महत्त्व इस प्रकार है-

1. भारतीय प्राचीन वांगमय के अनुसार सृष्टि का प्रारम्भ इसी दिन से हुआ। सृष्टि के रचयिता ब्रम्हा  ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही ब्रह्मïण्ड की रचना प्रारम्भ की। यही कारण है कि अपने देश में प्रचलित सभी के सभी संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (वर्ष प्रतिपदा) से प्रारम्भ होते हैं। 

2. प्रचलित संवतों में सर्वाधिक प्राचीन युगाब्द है। इसे 'युधिष्ठिर संवत् भी कहते हैं, क्योंकि महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था।

3. प्रभु रामचन्द्र का राज्याभिषेक उत्सव वर्ष प्रतिपदा के दिन नहीं हुआ। 

4. वासन्तिक नवरात्र (शक्ति की उपासना पर्व) इसी दिन से प्रारम्भ होता है। 

5. सम्राट विक्रमादित्य ने आक्रमणकारी शकों को पूरी तरह से भारतभूमि से निकालकर उन्हें निर्णायक रूप से पराजित किया था उसी स्मृति में आज के दिन विक्रम संवत् प्रारम्भ हुआ। 

6. महर्षि दयानंद सरस्वती जी द्वारा आर्य समाज की स्थापना वर्ष प्रतिपदा को ही की थी। 

7. सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक करुणावतार संत झूले लाल का जन्म दिन भी वर्ष प्रतिपदा ही है।

8. भारत का राष्ट्रीय संवत् (शालिवाहन शक संवत्) भी आज से ही प्रारम्भ होता है।

9. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक श्रद्धेय श्री केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी आज के दिन अर्थात् नव-वर्ष प्रतिपदा को ही हुआ था। 

यह भी पढ़ें -क्या रिश्तो को महसूस किया जा सकता है

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