सुन्दर कांड की सुंदरता

सुरेश चंद्रा

5th April 2021

सत्यम का संबंध परम अस्तित्त्व के साथ है, इसी तरह शिवम् शब्द परम कल्याण को व्यक्त करता है एवं 'सुंदरम् तो परम सुंदरम है ही। इन तीनों में एक तात्विक संबंध है। जो कुछ सत्य है, वही कल्याणकारी है एवं वही सुंदर भी होता है। अर्थात्ï सत्यम् एवं शिवम्ï ही सुंदरता का आधार है। इसी आधार पर परम रूपवती कैकेयी को सुंदर नहीं माना जा सकता।

सुन्दर कांड की सुंदरता

महर्षि वाल्मीकि की रामायण एवं गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस की अध्याय योजना लगभग समान है। दोनों में ही सात सात कांड है। वाल्मीकि रामायण के सातों कांडों के नाम हैं। बालकांड, अयोध्या कांड, किष्किंधा कांड, सुन्दर कांड, युद्ध कांड एवं उत्तर कांड। गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस में एक से पांच एवं सातवें कांडों के यही नाम हैं केवल छठे कांड का नाम लंका कांड है। दोनों में ही इन कांडों के नाम राम के जीवन की अवस्था विशेष अथवा जहां वे निवास कर रहे हैं अथवा कर्मरत हैं, के आधार पर रखे गए हैं। बालकांड में राम के जन्म, बाल्याकाल एवं विवाह का विवरण दिया गया है। 

अयोध्या कांड में उनके राज्यभिषेक, वनवास, अरण्य कांड में पंचवटी निवास एवं किष्किंधा कांड में बाली तथा सुग्रीव की कथा का वर्णन किया गया है। सुन्दर कांड में हनुमान के चरित्र को अंकित किया है तथा लंका या युद्ध कांड में सेतुबंध तथा रावण वध के हैं। उत्तर कांड की कथा गोस्वामी जी तथा महर्षि वाल्मीकि ने अलग प्रकार से वर्णित की है।

सुन्दर कांड का नामकरण और कांडों से अलग क्यों किया गया है, इस कांड को सुन्दर क्यों कहा गया है एवं इस कांड में क्या सुंदरता है यही बिंदु इस लेख की विषय वस्तु है।सुन्दर शब्द का आखिर अर्थ क्या है। सामान्य रूप से सुंदर का अर्थ दिखने में अच्छा, रमणीय, मनोहर, या रूपवान होना जाना जाता है। भारत में 'सत्यम, शिवम्  सुन्दरम्ï की पर्याप्त महिमा गाई गयी है।

 सुंदर कांड वास्तव में हनुमान के पराक्रम, बुद्धि चातुर्य एवं राम के प्रति उनकी भक्ति की गाथा है। इसमें वे सीता की खोज में निकलते हैं एवं अनेक बाधाओं को पार करके समुद्र लांघ कर लंका पहुंच जाते हैं। लंका में अशोक वाटिका में विरहिणी सीता से उनकी भेंट होती है एवं वे राम द्वारा दी गयी मुद्रिका सीता को भेंट करते हंै। सीता उन्हें राम के लिए चूड़ामणि देती हैं। सीता की आज्ञा पाकर वे अशोक वाटिका में अपनी क्षुधा तृप्त करने के लिए फल खाते हैं। और वृक्षों को भी उजाड़ देते हैं। तब रावण के सैनिक उन्हें पकड़ कर रावण के समक्ष पेश करते हैं जहां वे रावण को समझाते हैं कि वह सीता को राम को वापस लोटा दें एवं इसी में उसकी भलाई है। किंतु काल के वशीभूत रावण उलटे हनुमान की पूंछ में आग लगाने का दंड उन्हें देता है। तब हनुमान लंका को जलाकर राम के पास वापस आ जाते हैं एवं उन्हें सीता का संदेश तथा चिह्नï दे देते हैं। सुंदरकांड की यही कथा है।

सुंदर कांड का नाम हनुमान कांड भी हो सकता था एवं वास्तव में यह है भी हनुमान कांड किंतु महर्षि वाल्मीकि एवं गोस्वामी तुलसी दास दोनों ने ही हनुमान के चरित्र की सुंदरता उजागर करते हुए इस कांड का नाम सुन्दर कांड रखा है। हनुमान के चरित्र की प्रथम विशेषता है उनका पराक्रम। समुद्र को पार करने के लिए जिस प्रचंड संकल्पशक्ति की आवश्यकता है वह केवल हनुमान के ही पास है। किंतु केवल पराक्रम ही पर्याप्त नहीं है, उसके साथ समय पर निर्णय लेने की विवेक शक्ति यदि आपके पास नहीं है तो काम के बिगड़ जाने की पूरी संभावना है। सुंदर कांड के प्रारंभ में हनुमान की स्तुति करते समय गोस्वामी तुलसी दास ने उन्हें ज्ञानियों में अग्रगण्य एवं सकल गुण निधान कहा है। इन्हीं दो विशेषणों से हमें उनके पराक्रम की सुंदरता का साक्षात्कार होता है। लंका में पहुंचने पर हनुमान अनेकों राक्षसों का वध करते हंै किंतु जब इंद्रजीत सामने आता है तो उससे अपने को पकड़वा देते हैं एवं रावण की सभा में जाकर उससे बात भी करते हंै। उन्हें शत्रु की शक्ति का अनुमान लगाना था अत: ऐसा करना अनिवार्य था। रावण का दरबार छोड़ने के बाद हनुमान स्वयं अपनी देह में लगी आग से लंका दहन का कार्य पूरा करते हैं।

श्रेष्ठï सेवक वह है जो स्वामी के बतलाए हुए काम को पूरा करता है किंतु जो सेवक निश्चित कार्य के अतिरिक्त अन्य अनुषांगिक कार्यों को भी बिना स्वामी के कहे हुए अपनी बुद्धि का प्रयोग करके पूर्ण कर देता है वह श्रेष्ठïतर है। हनुमान ने न केवल सीता का पता लगाया अपितु रावण की सैन्य शक्ति का भी अनुमान लगा लिया एवं विभीषण के रूप में राम के पक्षधर एक रक्षक को भी ढूंढ़ निकाला। पराक्रम के साथ दूरदर्शिता एवं चातुर्य यही हनुमान के चरित्र की प्रथम सुंदरता है। हनुमान केवल एक पराक्रमी एवं बुद्धिमान सेवक ही नहीं हैं अपितु अपने स्वामी राम के परम भक्त भी हैं। मानव इतिहास में अमर हो चुकी हनुमान की राम भक्ति तथा भक्त वत्सल राम से उनकी अंतरंग एकता को लेकर अनेक कथानकों, चित्रों एवं काव्यों की रचना हो चुकी है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं एवं महामानव हैं। मनुष्य जाति का इतिहास दर्शाता है कि पृथ्वी पर जहां-जहां, जब-जब रामत्व प्रकट होता है, तब-तब, वहां वहां किसी न किसी न रूप में हनुमानत्व भी जन्म लेता है। यह तो एक मान्यता है।

आज भी जहां राम कथा चल रही होती है, वहां सूक्ष्म रूप में हनुमान भी उपस्थित होते हैं।

सच्चे सेवक - हनुमान

राम का कार्य भी महासेवक हनुमान के बिना नहीं चलता। हनुमान एवं राम के मिलन के बाद रामकथा एक नया एवं परम सुंदर रूप ले लेती है। उस पर हनुमान कि स्वामी भक्ति का अनुपम रंग चढ़ जाता है।

हनुमान स्वधर्म एवं स्वभाव दोनों ही प्रकार से नखशिख सेवक थे। सेवक का स्वधर्म होता है सेवा धर्म। लंका को जीत कर राम जब अयोध्या लौटे तो उनके साथ सुग्रीव, अंगद, हनुमान इत्यादि अनेक लोग भी अयोध्या आये थे। राम के गद्दी पर बैठने के कुछ दिनों के पश्चात राम के कहने पर अन्य सब लोग वापस लौट गये किंतु हनुमान ने लौटना स्वीकार नहीं किया एवं वे अयोध्या में ही बने रहे। सेवकत्व की रक्षा करते हुए जीवित रहना कोई आसान कार्य नहीं है। सेवक किसी पर उपकार नहीं करता। स्वामी की पीड़ा उसकी स्वयं की पीड़ा हो जाती है। उसमें और स्वामी में अपने पराये का भेद मिट जाता है। स्वामी की सेवा कर के वह उन पर कोई उपकार नहीं करता। उपकार पराये पर होता है अपनों पर नहीं। हनुमान ने एक सच्चे सेवक के गुणों को आत्मसात किया था। वे सेवा की प्रतिमूर्ति थे।

प्रत्येक सेवक मूलत: साधु होता है एवं साधु भगवद्ïभाव से परिपूर्ण होता है। सच्चा सेवक प्रत्येक मनुष्य में भगवान का दर्शन करता है। सच्चे सेवक के सर्वश्रेष्ठ आदर्श हनुमान ही रहेंगे। वे राम का काम राममय होकर करने वाले सेवक शिरोमणि माने जाते हैं। साधु जहां मनुष्य को आध्यात्मिक दृस्टि  से देखता है। वहीं सेवक मानवीय दृस्टि से अध्यात्म की सेवा करता है। हनुमान अहम्ï सेवा के अधिदेवता हैं।  हृदय में जैसे-जैसे अहम् भाव कम होता जाता है, वैसे-वैसे आत्मभाव अर्थात् रामभाव बढ़ता जाता है। इस आत्मभाव के अभाव में सेवा के मार्ग में अनके प्रलोभन आने लगते हैं जो सेवक को उसके मार्ग से विचलित कर देते हैं। हनुमान के सेवा के मार्ग में भी अनेक बाधाएं आईं किंतु वे विचलित नहीं हुए।

हनुमान बलवान, बुद्धिमान एवं शीलवान हैं किंतु इन तीन गुणों वाले उत्तम सेवक भी कई बार संवेदन शून्य वैराग्य के कारन कठोर बन जाया करते हैं। उनका वैराग्य शुष्क एवं कंटीला लगने लगता है। प्राय: ऐसे सेवकों के परिवार शुष्कता, जड़ता एवं जिद्दीपन का अभिशाप भोगने को विवश होते हैं। पर हनुमान का सेवकत्व एवं सयम संवेदनहीन नहीं है। उनका ब्रह्मïचर्य निष्ठपूर्ण किंतु लचीला है। वे संयम का पालन करते हैं किंतु नारियों से न तो दूर भागते हैं एवं न हीं उनसे डरते हैं। वे एक मर्यादाशील सेवक होने के नाते सीता की खोज में रावण के अंत:पुर में प्रवेश करने में भी नहीं हिचकिचाते। वस्तुत: वे एक जड़ता विहीन दृढ़ता एवं अहंकार विहीन सेवकत्व के स्वामी हैं। यही उनके चरित्र का सबसे उत्कर्ष सौंदर्य है। यदि हमने हनुमान को समझ लिया तो समझ लीजिए की हमने ज्ञानयोग, कर्मयोग एवं भक्ति योग को समझ लिया। अर्थात्ï उक्त तीनों साधनों (ज्ञान, कर्म एवं भक्ति) को समझने की कुंजी हनुमान को समझने में है और हनुमान को समझने की कुंजी सुंदरकांड में है। 

यह भी पढ़ें -बच्चों में बढ़ता तनाव और अभिभावक

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

श्रीराम द्वा...

श्रीराम द्वारा स्थापित शिवधाम है रामेश्वरम्...

शुभ फलदायी ह...

शुभ फलदायी है केले का पूजन 

बुद्घि व परा...

बुद्घि व पराक्रम के देवता हनुमान

श्री राम से ...

श्री राम से जुड़े प्रमुख तीर्थ व मंदिर

पोल

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत किस देश से हुई थी ?

वोट करने क लिए धन्यवाद

इंग्लैण्ड

जर्मनी

गृहलक्ष्मी गपशप

जन-जन के प्र...

जन-जन के प्रिय तुलसीदास...

भगवान राम के नाम का ऐसा प्रताप है कि जिस व्यक्ति को...

भक्ति एवं शक...

भक्ति एवं शक्ति...

शास्त्रों में नागों के दो खास रूपों का उल्लेख मिलता...

संपादक की पसंद

अभूतपूर्व दा...

अभूतपूर्व दार्शनिक...

श्री अरविन्द एक महान दार्शनिक थे। उनका साहित्य, उनकी...

जब मॉनसून मे...

जब मॉनसून में सताए...

मॉनसून आते ही हमें डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, जैसी...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription