जैन धर्म के संस्थापक भगवान महावीर

मीना भण्डारी

7th April 2021

भगवान महावीर ने अपना संपूर्ण जीवन मानव के उत्थान एवं कल्याण के लिए समर्पित किया तथा दुनिया को सत्य अहिंसा का पाठ पढ़ाया। महावीर की संपूर्ण जीवन यात्रा को जाने लेख से।

जैन धर्म के संस्थापक भगवान महावीर

जैन धर्म की स्थापना स्वामी महावीर ने की थी। हिंदुओं के विभिन्न अवतारों की तरह जैन धर्म में भी 24 तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर का अर्थ है, 'लोगों को संसार रूपी सागर के पार उतारने वाले महापुरुष।' इन्हीं तीर्थंकरों के उपदेशों और सिद्धांतों पर जैन धर्म आधारित है। 'ऋषभ देव' पहले तीर्थंकर थे। इनका समय वही बताया जाता है जो 'ऋग्वेद' का था। जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर 'स्वामी महावीर' को विशेष महत्त्व दिया जाता है। उनके ही उपदेशों पर जैन धर्म के मुख्य सिद्धांतों का निर्माण हुआ है।

जन्म एवं बचपन

महावीर का जन्म 599 ई. पूर्व में बिहार राज्य के अंतर्गत कुण्डलपुर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता का नाम 'सिद्धार्थ' और माता का नाम 'त्रिशला' था। त्रिशला पड़ोस के प्रसिद्ध गणराज्य वैशाली की राजकन्या थी। सिद्धार्थ भी कुण्डलपुर के शासक थे। दोनों लिच्छवि थे। जिस दिन महावीर का जन्म हुआ वह चैत सुदी तेरस का दिन था। उनकी स्मृति में हर वर्ष सारे देश में 'महावीर जयंती' का पर्व मनाया जाता है।

बचपन से ही महावीर बहुत प्रतिभाशाली और तेज बुद्धि वाले थे। बड़े-बड़े साधु और महात्मा भी अपनी शंकाएं लेकर उनके पास आते थे। उनका समाधान बालक महावीर कुछ ही क्षण में कर देते थे। इसलिए उनका नाम 'सन्मति' अर्थात उत्तम गति वाला पड़ गया। वे बड़े ही विनम्र स्वभाव के थे। इसलिए उनका नाम महावीर पड़ा। निरंतर बढ़ती हुई प्रतिभा के कारण वह 'वर्द्धमान' कहलाने लगे।

मानव पर हो रहे अत्याचारों से त्रस्त हुए

वर्द्धमान महावीर ज्यों-ज्यों बड़े होते गए अपने चारों ओर की हालत देखकर उनका मन दुखी रहने लगा। उस समय समाज में अव्यवस्था और अशांति फैली हुई थी। शूद्र कहे जाने वाले लोग सवर्णों के अत्याचारों से त्रस्त थे। स्त्रियों की दशा बहुत गिरी हुई थी। जनता अशिक्षित थी और तरह-तरह की बुराइयों और शोषणों का शिकार हो रही थी। जीव हिंसा, असत्य भाषण, चोरी, बेईमानी, कलह चारों ओर फैली हुई थी। महावीर इस स्थिति से बहुत दुखी थे। वह इस बात से चिंतामय रहने लगे कि लोगों को सच्चे धर्म और मानवता के मार्ग पर कैसे चलाया जा सकता है? उन्हें एकांत अच्छा लगने लगा।

उनकी ऐसी प्रवृत्ति देखकर उनके माता-पिता को चिंता हुई। उनका मन संसार की ओर मोड़ने के लिए मां-बाप ने उनका विवाह कर देना चाहा। उनके विवाह के बारे में दो मत हैं। कहीं तो यह लिखा हुआ मिलता है कि उनका विवाह 'यशोदा' नाम की सुंदर कन्या से हुआ था और उससे उनको 'प्रियदर्शन' नाम की पुत्री हुई थी। दूसरी तरफ यह उल्लेख मिलता है कि महावीर ने सारी तैयारियां पूरी हो चुकने के बाद, विवाह करने से मना कर दिया था।

संन्यासी बने महावीर

30 वर्ष की आयु में महावीर माता-पिता से आज्ञा लेकर घर का परित्याग कर संन्यासी बन गए। 12 वर्ष उन्होंने घोर तपस्या की। महावीर एक गांव से दूसरे गांव, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र का भ्रमण करते रहे। उनका मन निरंतर चिंतन में लगा रहता। वह ग्रीष्म की ऋतु में जलती हुई शिलाओं पर, वर्षा में वृक्षों के नीचे और जाड़े में नदी तट पर या मैदान में तपस्या करते थे। भिक्षा में जो कुछ मिल जाता उसे प्रसन्नता से ग्रहण कर लेते थे। उन्होंने निद्रा को भी वशीभूत कर लिया था। तपस्या और साधना के जितने प्रयोग हो सकते थे, उन सबका अभ्यास महावीर ने 12 वर्षों की अवधि में किया। इसके बाद उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई।

एक दिन महावीर जुम्भी ग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर शाल वृक्ष के नीचे ध्यान मग्न बैठे थे। वह वैशाख सुदी दशमी का दिन था। उन्हें अनुभव हुआ कि उनके सामने से अज्ञान, मोह और श्रद्धा का पर्दा एक के बाद एक हटता जा रहा है। उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया। वह जीवन मुक्त हो गए। इस समय उनकी आयु 42 वर्ष की थी।

अपने ज्ञान को लोक कल्याण में लगाया

स्वामी महावीर ने निश्चय किया कि उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे लोक कल्याण के लिए जन-जन तक पहुंचाएंगे। उन्होंने उस समय की जनभाषा प्राकृत में अपने उपदेश दिए। जैन धर्म के सभी मूल ग्रंथ इसी प्राकृत भाषा में मिलते हैं।

स्वामी महावीर के उपदेश सुनने के लिए राजा-महाराजा से लेकर साधारण जन तक आते थे। उनके उपदेश सुनने के लिए विराट सभाओं का आयोजन होता था। उनकी यह सभा 'समवशरण सभाÓ कहलाती थी। इस सभा में प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के आ सकता था। समता के इसी नियम के कारण इस सभा को समवशरण कहा जाता था। इस तरह की प्रथम सभा बिहार में राजगृह के विपुलांचल नामक पर्वत पर हुई थी। 

उनका उपदेश किसी जाति या वर्ग विशेष के लिए नहीं था। वे सारी मानवता का कल्याण चाहते थे। उन्होंने उत्तर भारत के नगर तथा ग्रामों की यात्राएं करके अपने उपदेशों से लाखों-करोड़ों नर-नारियों का कल्याण किया। उनके उपदेश पंच व्रत कहलाते हैं, क्योंकि उनमें पांच बातों का वर्णन है। गृहस्थों के लिए उनकी यही आचार संहिता है। उनके उपदेशों का सार है कि हम दूसरों को कष्ट न पहुंचाएं, किसी को धोखा न दें, अपने दिए हुए वचन को पूरा करें, अपने परिश्रम और न्याय से कमाए हुए धन पर ही अपना अधिकार मानें, सांसारिक भोगों में आसक्ति से अपने को बचाएं। धन-संग्रह, चिंता और कलह का कारण होता है, उससे बच कर रहें। साधुओं और श्रावकों के लिए उन्होंने अलग से नियम बताएं।

तीर्थंकर महावीर की उपलब्धियां

महावीर ने बारह वर्ष कठोर तप करके अपने विकारों पर विजय प्राप्त की और अरिहंत अर्थात् तीर्थंकर बने। 

समाज में प्याप्त कुरीतियों को मिटाया

कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपनी आयु के शेष 30 वर्ष उन्होंने जनकल्याण में बिताए। तत्कालीन समाज घोर आडम्बरों, बलिप्रथा और पारंपरिक कुरीतियों के मकड़जाल में उलझा हुआ था, महावीर ने न केवल सामाजिक बुराइयों को दूर करने का मार्ग प्रशस्त किया बल्कि ज्ञान का दीपक भी जलाया।

उन्होंने धर्म के नाम पर यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठानों में दी जाने वाली मनमानी नर एवं पशु बलियों का विरोध किया। विकल्प के तौर पर उन्होंने अहिंसा का मार्ग दिखाया।

महिलाओं और नीची जाति के लोगों को विभिन्न सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में भाग नहीं लेने दिया जाता था, उन्हें धर्म ग्रंथों को पढ़ने की मनाही थी- महावीर ने इन स्थापित मान्यताओं को तोड़ा। उन्होंने इन वर्गों को अपने संघ में शामिल करके साहसिक कदम उठाया। उन्होंने जाति-संप्रदाय, ऊंच-नीच, महिला-पुरुष आदि के भेद-भाव को समाप्त कर सबको अपने संघ में बराबरी का दर्जा दिया।

उनके प्रभाव से जाति, धर्म और सत्ता के आधार पर निर्मित मापदंड ध्वस्त हो गए और सदाचरण, नैतिकता और चारित्रिक मूल्यों पर आधारित सामाजिक मापदंड स्थापित हुए।

महावीर जी की शिक्षा

महावीर अर्द्ध-मागधी भाषा में उपदेश देते थे जोकि अधिसंख्य लोगों की भाषा थी, जबकि संस्कृत विद्वानों की भाषा थी जो सीमित जनसमुदाय को ही समझ में आती थी, अत: महावीर के अनुयायी दिन-प्रतिदिन बढ़ते गए।

अपने संघ के मुनियों को वे अनुशासन, तप, मंत्रोच्चारण और ध्यान द्वारा अनासक्त होने का उपदेश देते थे, वहीं गृहस्थों को मर्यादित जीवन के साथ इन गुणों को अपनाने को कहते थे। यह उनकी शिक्षा का ही प्रभाव था कि इंद्रभूति गौतम जैसे ब्राह्मïण, शैलभद्र और धन्ना जैसे वैश्य, मेघ कुमार और नंदसेन जैसे क्षत्रिय और मैत्रेय और अर्जुनमाली जैसे शूद्र जाति के प्रसिद्ध लोग उनके अनुयायी बने। महिलाओं में चंदनबाला, मृगावती, काली आदि राजपरिवारों से थीं और सुभद्रा, रेवती आदि व्यापारिक घरानों से।

महावीर का सबसे बड़ा मूल योगदान रहा- अहिंसा का प्रचार-प्रसार। बाद में 'अहिंसा परमो धर्म:' वैष्णव धर्म का मूल वाक्य बना। महात्मा गांधी भी अहिंसा की शक्ति से ही महात्मा और राष्ट्रपिता बने। इसी शक्ति से उन्होंने हमारे देश को आजाद करवाया।

जामालि 5-6 वर्ष तक महावीर का शिष्य रहा और उनके साथ चला। बाद में उनकी लोकप्रियता से जलकर उसने भी महावीर का विरोध आरंभ कर दिया और स्वयं को सर्वज्ञ और तीर्थंकर घोषित कर दिया। इतना ही नहीं, उसने महावीर पर हमला भी किया और उन्हें जलवाने की कोशिश भी की। लेकिन तीर्थंकर महावीर का कोई अहित नहीं हुआ। फिर भी सहृदय महावीर ने उसे क्षमा कर दिया और आत्मा को निर्मल करने के लिए तप करने का परामर्श दिया।

महावीर का महानिर्वाण

राजा हस्तिपाल की प्रार्थना पर महावीर ने अपना अंतिम चातुर्मास पावापुरी (बिहार) में बिताया। जब उन्होंने देखा कि उनकी आयु के दो दिन शेष हैं तो उन्होंने उपवास रखा और समवशरण में अपना अंतिम उपदेश दिया जो उत्तरध्यायक, विपाक सूत्र आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ।

कार्तिक माह की अमावस्या को दीपावली के दिन (नवम्बर, 527 वर्ष ई.पू.) उन्हें महानिर्वाण प्राप्त हुआ। कुछ क्षणों के लिए मानो संसार अंधेरे में डूब गया, तब देवताओं ने रत्नों की रोशनी से अंधकार दूर किया और मनुष्यों ने दीप जलाकर अपने भगवान को विदाई दी। उनकी याद में जैनी लोग दीपावली मनाते हैं।

परम्परानुसार देवराज इंद्र ने महावीर का निर्वाण कल्याणक मनाया और सभी श्रद्धालुओं ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से उन्हें अंतिम विदाई दी।

उनके बाद कोई तीर्थंकर नहीं हुआ। वर्तमान में उनका ही तीर्थ चल रहा है।

स्वामी महावीर का जन्मदिवस हर वर्ष चैत सुदी तेरस को मनाया जाता है। इसी को महावीर जयंती कहते हैं। उस दिन मंदिर में जाकर जैन लोग महावीर जी की प्रतिमा पर फूल माला चढ़ाते हैं, आरती करते हैं तथा उनके उपदेशों पर व्याख्यान सुनते हैं। उस दिन गरीबों को दान देना विशेष पुण्य का कार्य समझा जाता है।

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