धैर्य व त्याग के प्रतिरूप भगवान महावीर

देवप्रिया सिंह

7th April 2021

भगवान महावीर ने अपने धैर्य व त्याग से भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के समक्ष एक उदाहरण पेश किया है, आइए उनके बारे में विस्तार से जानें इस लेख के माध्यम से।

धैर्य व त्याग के प्रतिरूप भगवान महावीर

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसापूर्व के लगभग वैशाली के निकट कुण्डलपुर के समीप हुआ था, इनके पिता का नाम सिद्धार्थ और इनकी माता का नाम त्रिशला था तथा ये लिच्छेवी राजवंश से संबंधित थे। इनके बचपन का नाम वर्द्धमान था कहते हैं। कि वर्द्धमान बचपन से बहुत शान्तिप्रिय थे इन्होंने 30 वर्ष की अवस्था तक गृहस्थ जीवन व्यतीत किया। माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् इन्होंने गृह त्याग कर दिया और आरंभ में इन्होंने वस्त्र धारण किया परंतु तेरह महीने तक इन्होंने वस्त्र नहीं बदला। सभी प्रकार के जीव जन्तु इनके शरीर पर रेंगते थे परंतु फिर भी ये अपनी साधना में लीन रहे। उसके पश्चात् इन्होंने वस्त्र का पूर्णत: त्याग कर दिया और ये दिगम्बर ही विचरण करने लगे इनके ऊपर नाना प्रकार के अत्याचार हुए इन्हें कई बार पीटा गया किंतु इन्होंने धैर्य नहीं खोया। 12 वर्षों की कठोर तपस्या एवं साधना के पश्चात् जृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर सोलवृक्ष के नीचे इन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ, ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् ये केवलिन जिन (विजेता) कहे गये, अपनी साधना में अटल रहने तथा अतुल शौर्य एवं धैर्य के कारण इन्हें महावीर की उपाधि दी गई।

चाह से बनती है राह

महावीर स्वामी ने कहा जीवन में कठिनाइयां आती हैं किन्तु यह आवश्यक है कि मनुष्य आशावादी रहे, उन्होंने बताया कि आंतरिक क्षमता का आध्यात्मिक मूल्य है। उनका एक प्रमुख शिष्य था गोशालक।

महावीर स्वामी और गोशालक पास के एक ग्रामीण क्षेत्र से गुजर रहे थे, दोनों को समीप ही एक पौधा दिखाई दिया। गोशालक ने महावीर से पूछा क्या इस पौधे में फूल लगेंगे महावीर ने आंखें बन्द कर लीं, उस पौधे के पास खड़े हो गये कहा फूल लगेंगे। गोशालक ने पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया और हंसने लगा सात दिनों बाद जब गुरु शिष्य उसी रास्ते से लौट रहे थे दोनों उसी स्थान पर पहुंचे जहां गोशालक ने पौधा उखाड़ा था उन्होंने देखा पौधा वहां खड़ा है इसी बीच तेज वर्षा हुई थी और उस पौधे की जड़ें जमीन को पकड़ गयीं थीं इसलिए वह पौधा खड़ा हो गया, पौधे को खड़ा देखकर गोशालक बहुत परेशान हुआ, महावीर उसकी मन:स्थिति को समझ गये, उन्होंने कहा जब मैं इस पौधे को देख रहा था तब तुम पास खड़े थे मैं जानता था तुम इसे उखाड़ फेंकोगे मैं यह जानने का प्रयत्न कर रहा था कि पौधे में खड़े रहने की क्षमता कितनी है गोशालक ने पुन: उस पौधे को नहीं उखाड़ा महावीर हंसने लगे, गोशालक ने हंसी का कारण जानना चाहा, उसने पूछा इस बार आपने क्या देखा मैं इसे फिर नहीं उखाडूंगा, स्वामी जी ने कहा यह सोचना व्यर्थ है। यह पौधा अभी जीना चाहता है तुम इसे उखाड़ों या नहीं यह तुम पर निर्भर है लेकिन पौधे में जिजीविषा है यह महत्त्वपूर्ण है। तुम पौधे से कमजोर सिद्ध हुए हो और हार गये। जीवन हमेशा ही जीतता है।

सब कर्मों का खेल है

एक बार इनकी समाधि नहीं लग रही थी ये जब भी ध्यान करते उसमें बाधा उत्पन्न हो जाती इन्होंने ध्यान की गहराइयों में जाकर देखा और अन्त: चेतना से पुकारा, 'ऐ आत्मा! तुम यहां आओ और मुझे दंडित करो।' देखते ही वहां एक किसान आया बोला-'ढोगी बैठा-बैठा क्या कर रहा है देख मेरे बैल यहां घास चर रहे हैं तू देखते रहना। महावीर फिर ध्यान में लग गये, बैल भाग गये, अरहर की खूंटी लेकर किसान आया और उनके कान में ठूंस दी जिससे उनका कान बुरी तरह जख्मी हो गया। वैद्यों ने इलाज किया, शिष्यों ने पता लगाया कौन था अकारण कान में खूंटी गाड़ दी, महावीर ने कहा, 'मैंने उसे स्वयं बुलाया था पूर्वजन्म में मैं एक चक्रवर्ती सम्राट था, संगीत का शौक था, शय्यापाल दास मेरे वीणावादन को सुन रहा था, सहन नहीं हुआ पिघलता हुआ शीशा उसके कान में डलवा दिया वह तड़पकर रह गया उसके मन में बैर की तीव्र गांठ बनी, उसी गांठ को खोलने के लिए मैंने शय्यापाल दास को बुलाया था जो इस जन्म में किसान बना था। यही अभिनिवेश है, यही मनुष्य को बांधता है। हम बुरे कर्म करते हैं और आसक्ति भी उनमें होती है और हमें आसक्ति के साथ ही बुरे कर्मों का भोग करना पड़ता है।

एक बार भगवान महावीर कौशाम्बी उपदेश देने गये सबने सुना कि भगवान आये हैं वहां के महाराज विजयप्रताप ने अनुपम व्यवस्था की। राजोधान में महावीर पधारे, उनके दर्शनों की आकांक्षा लेकर स्त्री-पुरुष, महाराज महारानी सभी लोग पहुंचे। इसी नगर में एक दीन-हीन किंतु वीभत्स मनुष्य रहता था उसकी शक्ल बहुत भद्दी थी उसके आस-पास मंक्खियां मंडराया करती थीं और वह अन्धा भी था। जब उनके शिष्य गौतम ने उसे देखा तो उन्होंने कहा भगवान इस अंधे मनुष्य का जीवन इतना दुखपूर्ण क्यों हुआ? मेरे विचार से इस संसार में इससे बढ़कर कोई और दुखी नहीं हो सकता, महावीर ने उत्तर दिया इस संसार में इससे भी दुखी व्यक्ति है गौतम ने पूछा कौन है? इसी नगर के राजा का पुत्र मकराक्ष उसने जब से जन्म लिया है तलघर में रहता है। गौतम ने भगवान महावीर से मकराक्ष को देखने की अनुमति मांगी, गौतम राजभवन गये राजा की पत्नी सुनन्दा उन्हें देखकर प्रसन्न हो उठीं, गौतम ने कहा देवी मैं तुम्हारे पुत्र को देखने आया हूं, सुनन्दा ने अपने सभी पुत्रों को दिखाया वे सभी सुन्दर और सुसज्जित थे गौतम ने कहा भद्रे मैं तुम्हारे उस पुत्र को देखने आया हूं जिसे तुमने जन्म से ही तलघर में छिपा रखा है। सुनन्दा को आश्चर्य हुआ, क्योंकि राजा, रानी और सेविका को छोड़कर इस सत्य को कोई नहीं जानता था। गौतम ने रानी के विचारों को जान कर कहा, 'परेशान मत हो! मुझे भगवान महावीर ने बताया है।' मकराक्ष के भोजन का समय हो चुका था। सुनन्दा भोजन, जल और मुंह ढकने का वस्त्र लेकर, गौतम के साथ तलघर को चल दीं। उन्होंने गौतम से कहा वह भी मुंह पर कपड़ा बांध लें, क्योंकि जिस तलघर में मकराक्ष रहता था वह भयंकर दुर्गंध से भरा पड़ा था तलघर का द्वार खुला। मांस के पिण्ड की तरह मकराक्ष बैठा हुआ मां की राह देख रहा था वह भूख से व्याकुल था सुनन्दा ने भोजन रख दिया, मकराक्ष श्वान की तरह भोजन पर टूट गया। भोजन उसके शरीर में जाकर जल्द ही मवाद और रक्त के रूप में परिवर्तित हो गया फिर उसके शरीर में रक्त और मवाद टपकने लगा। गौतम ये देखकर कांप उठे। महावीर ने बताया मकराक्ष को अपने पूर्व जन्म के बुरे कर्मों के कारण भयंकर दुख का सामना करना पड़ रहा है। इसी भरतपुर क्षेत्र में सुकर्णपुर नाम का एक नगर था, इसमें एक इक्काई नाम का क्षमतावार मनुष्य रहता था वह नगर का स्वामी था उसके अधीन पांच सौ गांव थे लेकिन वह बड़ा अधर्मी और लोभी था। लूट, हत्या और अपहरण ही उसके जीवन का व्यापार था। इक्काई दूसरों की सुन्दर बहू-बेटियों को जबरन उठा लाता था, इक्काई वृद्ध हो गया उसके शरीर में कई प्रकार के रोग पैदा हो गये मृत्यु सभी की होती है अपने जीवन की अन्तिम बेला में भी चारो तरफ डाकुओं को लूट-खसोट के लिए उकसाता रहा। मृत्यु होने पर यही इक्काई मकराक्ष के रूप में जन्म लिया।

हम स्वर्ग और नरक की बातें तो करते हैं लेकिन भगवान महावीर ने बताया भौतिक सुख साधनों का मोह नहीं करना चाहिए, मनुष्य का साथ सिर्फ उसके सत्कर्म देते हैं। राजा-बिंबिसार के समय का एक प्रसंग है-

एक बार भगवान महावीर राजा बिंबिसार के यहां पधारे, बिंबिसार के कर्मों का अवलोकन करने के बाद कहा, राजन तुम्हारे पास भले ही असीमित संपत्ति है पर अपने कर्मों के कारण तुम्हें नरक में जाना पड़ेगा ये सुनते ही बिंबिसार बेचैन हो गये उन्हें नींद नहीं आई, सुबह फिर भगवान महावीर के चरणों में जा पहुंचे और प्रणाम कर बोले प्रभु समस्त साम्राज्य आपके चरणों में समर्पित करता हूं बस आप मुझे नरक में जाने की आशंका से मुक्त होने का उपाय बतायें। महावीर समझ गये कि बिंबिसार साम्राज्य और संपित्त के अहंकार से ग्रस्त है। उन्होंने कहा तुम पुण्य नामक श्रावक के पास जाओ उससे किसी तरह सामयिक फल प्राप्त कर लो वही तुम्हें नरक से बचा सकता है। राजा भागे-भागे श्रावक की शरण में पहुंचे और कहा महात्मन मुझे सामियक फल चाहिए उसके बदले मैं तुम्हें सब कुछ देने के लिए तैयार हूं। श्रावक ने सुना तो मुस्कराते हुए बोले राजन सामयिक समता को कहते हैं धन और संपत्ति का अहंकार रहते समता कैसे प्राप्त हो सकती है। सत्ता और संपत्ति के अहंकार में किये गये गलत कर्म ही नरक का कारण बनते हैं।

ये सुनते ही राजा बिंबिसार की आंखें खुल गयी और उन्होंने मानव सेवा का संकल्प लिया। इस प्रकार महावीर स्वामी ने मनुष्य को मनुष्य जीवन का सही अर्थ बताया।

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