गर्मी नाशक, रोग रक्षक-मट्ठा

नीलम

7th April 2021

पुराने जमाने से ही मट्ठा (छाछ) हमारे खान-पान का एक अहम हिस्सा रहा है, क्योंकि यह पाचन में हल्का, शक्तिदायक और रोगनाशक पेय है। इसीलिए हमारे प्राचीन चिकित्सा ग्रन्थों में इसे अमृत तुल्य बताया गया है। मट्ठे की कढ़ी बड़ी स्वादिष्ट और पाचक होती है। उत्तर भारत में मट्ठे की स्वादिष्ट और पौष्टिक लस्सी बड़े चाव से पी जाती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से इसकी उपयोगिता देखते हुए आजकल मट्ठा पीने का प्रचलन इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि कई शहरों में इसकी दुकानें खुलने लगी हैं।

गर्मी नाशक, रोग रक्षक-मट्ठा

दूध से दही बनने पर उसके गुण बहुत अधिक बढ़ जाते हैं और दही जब मट्ठे का रूप ले लेता है, तब तो वह दही से भी अधिक गुणकारी बन जाता है। अब तो इस तथ्य को अन्य चिकित्सा पद्धतियां भी स्वीकारने लगी हैं। प्रोफेसर ड्यूकेल और मैचनीकाफ जैसे विश्व प्रसिद्ध जीवशास्त्रियों का कहना है कि मट्ठे में मौजूद 'लैक्टिव' नामक जीवाणु आंतों में क्रियाशील हानिकारक कीटाणुओं का समूल नाश कर देता है। यह शरीर के विषैले तत्त्वों को बाहर निकाल कर नवजीवन प्रदान करता है। साथ ही शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को भी बढ़ाता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में कहा गया है कि दिन के भोजन के अन्त में मट्ठा पीने वाला व्यक्ति सदा स्वस्थ रहता है।

मट्ठे की विशेषताएं

  • मट्ठा तीनो दोषों (वात-पित्त-कफ) के विकारों का नाश करता है। मट्ठे का मधुर रस पित्त को शान्त करके पोषण प्रदान करता है। खट्टा रस वात (वायु) को दूर करके बल प्रदान करता है जबकि कसैला रस कफ-दोष के विकारों को दूर करता है।
  • दूध और दही दोनों की अपेक्षा अधिक हल्का एवं पाचक होने के कारण मट्ठा पेट में भारीपन और शरीर में आलस्य का एहसास नहीं होने देता। इसके सेवन से शरीर में शक्ति, स्फूर्ति और ताजगी बनी रहती है।
  • मट्ठा इतना पाचक होता है कि कमजोरों के लिए यह संजीवनी का काम करता है।
  • लैक्टिक एसिड प्रधान होने के कारण मट्ठा आंतों में उत्पन्न होने वाले विषों से हमारी रक्षा करता है। यह आंतों में स्वास्थ्यवर्धक कीटाणुओं की वृद्धि करता है और आंतों में संड़ाध को रोकता है, इसलिए मट्ठा सेवन करने से आंतों से संबंधित कोई रोग नहीं होता।
  • मट्ठा 'आमज दोषों' को दूर करता है। प्रश्न यह उठता है कि 'आमज दोष' क्या है? दरअसल जब हम भोजन करते हैं, तो हमारा शरीर हमारे आहार से पोषण के लिए उपयोगी रसों को अलग कर पाचन की क्रिया द्वारा उनका अवशोषण कर लेता है। लेकिन यह रस जब बिना पचे ही पड़ा होता है तो उसे 'आम' कहते हैं। यही 'आम' अनेक प्रकार के रोग पैदा करता है। मट्ठे की खटास (एसिड) 'आम' की चिकनाहट को तोड़कर धीरे-धीरे आंतों से बगैर पचे रस को पचाकर बाहर की ओर ठेल देती है। इस तरह मट्ठे की खटास आंतों और ग्रहणी के लोच को पुन: पैदा कर देती है, जिससे अधपचा भोजन आमाशय में रुककर पचने  के बाद ही बाहर की ओर बढ़ता है। यही कारण है कि पेचिश (Dysentry) सहित अन्य सभी संग्रहणी रोगों (दस्त के रोगों)में वैद्य मट्ठे के सेवन की सलाह देते हैं।
  • मट्ठा के सेवन से एक ओर जहां सभी प्रकार के दस्तों से लाभ होता है, वहीं दूसरी ओर कब्ज भी ठीक हो जाती है।
  • मट्ठा पीने वाले की आंखें सदा निरोगी रहती हैं। आयुर्वेद में मट्ठे को 'नेत्ररूजापट्टम' कहा गया है। यानी मट्ठा नेत्र रोगों को दूर करने वाला है।
  • ताजा मट्ठा एक श्रेष्ठ सात्विक आहार है।

कैसे बनता है मट्ठा?

मलाई निकाल लेने के बाद दही को बिलोकर (मथकर) मक्खन निकाल लेने के बाद जो वस्तु शेष रह जाती है, उसे मट्ठा कहते हैं। इसे तैयार करने के लिए दही का ऊपर वाला हिस्सा (मलाई) निकाल लेने के बाद बचे हुए दही में उसकी चौथाई मात्रा पानी डालते हुए मथा जाये तो मक्खन ऊपर आ जाता है। उसे निकाल कर अलग रख दिया जाता है। इस तरह मलाई और मक्खन शेष बच जाता है, उसे मट्ठा कहते हैं।

औषधीय गुण

आयुर्वेद के अनुसार मट्ठा स्वादिष्ट, खट्टा और कसैला होता है। यह जठराग्रि (पेट में मौजूद अग्रि या गर्मी, जो अन्न को पचाती है) को जागृत रख पाचन-तंत्र को क्रियाशील बनाए रखता है। मट्ठे में खटाई होने से यह भूख को बढ़ाता है, आहार में रुचि उत्पन्न करता है और आहार को पचाता भी है। इसलिए जिन्हें भूख न लगती हो, जिनका पाचन ठीक से न होता हो, खट्टी डकारें आती हों और पेट फूलने-अफरा चढ़ने से छाती में घबराहट होती हो, उनके लिए मट्ठा अमृत के समान है। भारी तले भोजन के बाद मट्ठे का प्रयोग विशेष रूप से करना चाहिए। कई बार गलत आहार के सेवन से आंतों की क्रियाशीलता में कमी आ जाती है, जिसे मट्ठे के सेवन से बढ़ाया जा सकता है। यह पीलिया में भी खूब उपयोगी है।

मट्ठा पीने से शारीरिक शक्ति बढ़ती है, शरीर में स्फूर्ति आती है, मन प्रसन्न रहता है, और चेहरे पर शांति रहती है। गर्मी के दिनों में यह धूप और लू के हानिकारक प्रभाव से बचा कर शीतलता देता है।

मट्ठा वायु का नाश करता है, इसलिए मलदोष के कारण पेट में उत्पन्न वायु यानी पेट में गैस बनने की समस्या में मट्ठे का सेवन बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। वातरोग में सोंठ और सेंधा नमक से युक्त खट्टे मट्ठे का सेवन उत्तम माना गया है।

मट्ठा पित्तनाशक भी है। यह व्यक्ति को ठंडक और पोषण देता है। पित्त दोष में शक्करयुक्त मट्ठे का सेवन उत्तम माना गया है। कफ दोष में सोंठ, काली मिर्च और पीपर युक्त मट्ठा आराम देता है। 

मट्ठे का सेवन हृदय रोग के लिए विशेष लाभदायक सिद्ध हुआ है, क्योंकि इसमें चिकनाई बहुत ही कम (केवल 1.1 फीसदी) रहती है। यह वसा को कम करके उसके ज्यादा सेवन से उत्पन्न रोग का नाश करता है एवं हृदय को बल देता है। 

ब्लडप्रेशर, दमा, गठिया आदि बिमारियां मट्ठे के सेवन से पास नहीं फटकती हैं। यह रक्त और मांस की वृद्धि करता है।

इलाज में उपयोग

भोजन में अन्न, दाल आदि अधिक खाने से शरीर में यूरिक एसिड बनने लगता है। शरीर के भीतर जमा होने पर यह बहुत सी बिमारियों को पैदा करता है। रक्त वाहिनियों और आंतों में इसका जमाव कम आयु में ही मनुष्य को बूढ़ा बना देता है। ऐसे व्यक्ति के बाल असमय सफेद हो जाते हैं, त्वचा में झुर्रियां पड़ने लगती हैं और त्वचा का रंग खराब होकर बदरंग हो जाता है। जब यूरिक एसिड संधि स्थानों (जोड़ों) में इकट्ठा हो जाता है, तब उन्हें हिलाने-डुलाने में दर्द महसूस होने लगता है। इसी को संधि वात, गठिया आदि नाम से पुकारा जाता है। मट्ठे में पाये जाने वाले लैक्टिक एसिड द्वारा यूरिक एसिड धुलकर शरीर के बाहर निकल जाता है। इस तरह जब रक्त शुद्ध हो जाता है, तो तमाम रोगों पर अपने आप कंट्रोल होने लगता है। फलस्वरूप शरीर पर जो वृद्धवस्था के चिन्ह जैसे चेहरे पर झुर्रियां पड़ना, अपने आप कम हो जाते हैं या मिट जाते हैं, त्वचा का रंग निखर आता है और उस पर नयी कान्ति आ जाती है। नित्य सुबह नाश्ते और दिन के भोजन के बाद मट्ठा पीने से शारीरिक शक्ति बढ़ती है और हमेशा बनी रहती है तथा बाल असमय सफेद नहीं होते। इन गुणों के कारण ही मट्ठा पीने वाले अधिकांश लोगों की उम्र लंबी पाई गई है और वृद्धावस्था में भी वे स्वस्थ रहते हैं।

कब्ज

मट्ठा पीने वाले को कब्ज की शिकायत हो ही नहीं सकती। यदि पेट दो-तीन दिन से कड़ा हो रहा हो, तो दो चुटकी अजवाइन पीस कर मट्ठे में मिलाकर पीने से शीघ्र आराम मिलता है। दो-तीन दिनों का बासी मट्ठा नमक मिलाकर सेवन करने से आंतों और पेट की सफाई हो जाती है तथा कब्जियत से राहत मिलती है।

दस्त 

दस्त होने पर शहद के साथ मट्ठे का सेवन करने से लाभ होता है। एक कप मट्ठा में एक चम्मच शहद पर्याप्त है। यह मिश्रण दिन भर में तीन-चार बार लेने से दस्त ठीक हो जाता है। मट्ठे में सेंधा नमक, भुना हुआ जीरा और भुनी हुई हींग मिलाकर पीने से पुराने दस्त की बीमारी से छुटकारा मिल जाता है।

अजीर्ण

अजीर्ण की शिकायत होने पर भोजन की जगह गाय के दूध से तैयार दही का मट्ïठा पीना चाहिए। चुटकी भर जीरा, थोड़ी-सी काली मिर्च और थोड़ा सा लाहौरी नमक (सेंधा नकम) पीसकर मट्ठे में मिलाकर एक-एक घूंट चुस्की लेकर पीने से पेट की पाचक अग्नि तेज होती है।

मंदाग्नि व अरुचि

भोजन का ठीक प्रकार से पाचन न होने से जठराग्नि मन्द पड़ जाती है और भोजन के प्रति अरुचि होने लगती है। सीने में भारीपन जैसा लगता है। कभी-कभी उबकाई आने जैसा अनुभव होता है, किन्तु उल्टी नहीं होती। इस रोग में मट्ठे का सेवन निम्न प्रकार करना चाहिए:

  • सेंधा नमक, सोंठ, राई तथा भुना जीरा चार-चार भाग और भुनी हींग एक भाग लेकर बारीक पीस लें। इसकी 3 से 6 ग्राम तक की मात्रा मट्ठे में मिलाकर सेवन करते रहने से मंदाग्रि व अरुचि की शिकायत दूर हो जाती है।
  • जीरा, अजवाइन, सोंठ और काली मिर्च दो-दो भाग तथा भुनी हींग और छोटी पीपल एक-एक भाग लेकर बारीक पीस लें। इस मिश्रण को मट्ठे के साथ सेवन करने से मंदाग्नि दूर होती है और भोजन में रुचि बढ़ती है।

कृमि

गाय के दूध से तैयार दही के मट्ठे में नमक मिलाकर प्रात: पीने से आंतों के हानिकारक कृमि मर जाते हैं।

बवासीर

बवासीर चाहे कफज हो या वातज या कफवातज, उसके लिए मट्ठा श्रेष्ठतम औषधियों में से एक है। एक भाग सेंधा नमक और तीन भाग भुना हुआ जीरा लेकर बारीक पीस लें। इस मिश्रण को गाय के दूध से तैयाद दही के ताजा मट्ठे में मिलाकर प्रतिदिन तीन-चार बार सेवन करने से कुछ ही दिनों में बवासीर ठीक हो जाता है।

पीलिया

गाय के दूध से तैयार दही के मट्ठा में शहद मिलाकर रोज सुबह पीने से पीलिया रोग का शमन होता है।

गाय के मट्ठे में उसके चौथाई भाग में गन्ने का रस मिलाकर नित्य सेवन करना पीलिया रोग में बहुत ही लाभकारी है।

मोटापा

मोटापे का कारण शरीर में वसा (चर्बी) की वृद्धि है। इसके चलते शरीर बेडौल हो जाता है। इससे आलस्य में वृद्धि होती है और शारीरिक परिश्रम करने की इच्छा नहीं होती। इस रोग में मट्ठे का सेवन निम्न प्रकार करना चाहिए:

  • त्रिफला (आंवला, हरड़ और बहेड़ा) का चूर्ण 3 से 4 ग्राम की मात्रा में मट्ठे के साथ नित्य प्रात: काल नियमित रूप से सेवन करने से मोटापा दूर करने में सहायता मिलती है। 
  • 20 से 25 ग्राम शहद 200 मिली लिटर मट्ठे में मिलाकर प्रात: काल नियमित रूप से सेवन करने से मोटापा दूर करने में सहायता मिलती है।

सफेद दाग

स्नान के समय चने के बेसन में मट्ठा मिलाकर कुछ सप्ताह नित्य लगाते रहने से सफेद दाग ठीक हो जाते हैं।

बाल झड़ना

बासी मट्ठा से रोज सिर के बालों को धोने से बाल झड़ने की शिकायत दूर हो जाती है। 

झाइयां और झुर्रियां

एक दिन का बासी मट्ठा सुबह नहाने से पहले चेहरे पर मलें और 10 मिनट रुकने के बाद स्नान कर लें। एक सप्ताह तक नित्य ऐसा करने से चेहरे की झाइयां, दाग और झुर्रियां खत्म हो जाती हैं।

दाद

मिश्री, गंघक और सुहागा (बोरेक्स) मट्ठा के साथ पीसकर लगाने से दाद में लाभ होता है। समान मात्रा में हरी दूब और हल्दी लेकर मट्ठा के साथ पीसकर लेप तैयार करें। लेप को दाद और खुजली पर लगाने से लाभ होता है।

नीम की पत्ती, हल्दी और काली मिर्च मट्ठे के साथ पीसकर लेप तैयार करें। इस लेप को दाद पर लगाने से दाद सूखकर खत्म हो जाता है।

मट्ठे के सेवन से संबंधित सावधानियां

  • मट्ठे में घी नहीं होना चाहिए।
  • मट्ठे का सेवन दिन में ही करना चाहिए। शाम के बाद मट्ठे का सेवन न करें।
  • मट्ठा हमेशा ताजा ही सेवन करना चाहिए, जिसमें खटास बहुत कम हो। अधिक खट्टे या देर क रखे हुए मट्ठे का सेवन नहीं करना  चाहिए, क्योंकि ऐसा मट्ठा देर से पचता है।
  • मट्ठे का सेवन कभी-कभी कफ की वृद्धि में सहायक होता है। इसलिए शीत ऋतु में कम पानी वाले मट्ठे का सेवन अधिक उपयुक्त रहता है।
  • वर्षा ऋतु में मट्ठे का सेवन अधिक उपयुक्त नहीं है। वर्षा में इनका सेवन तभी करना चाहिए, जब किसी अनुभवी वैद्य द्वारा इसका प्रयोग किसी औषधि के अनुपान रूप में आवश्यक समझा गया हो, क्योंकि औषधि योग से इसे गुणों में परिवर्तन किया जाता है।

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