लॉटरी - गृहलक्ष्मी प्रेमचंद कहानियां

गृहलक्ष्मी टीम

7th April 2021

जल्दी से मालदार हो जाने की हवस किसे नहीं होती? उन दिनों जब लॉटरी के टिकट आए तो मेरे दोस्त विक्रम के पिता, चचा, अम्मा और भाई, सभी ने एक-एक टिकट ख़रीद लिया। कौन जाने किसकी तकदीर ज़ोर करे? किसी के नाम आए रुपया, रहेगा तो घर में ही।

लॉटरी - गृहलक्ष्मी प्रेमचंद कहानियां

मगर विक्रम को सब्र न हुआ। औरों के नाम रुपए आएँगे, तो बहुत होगा, दस-पाँच हज़ार उसे मिल जाएँगे। इतने रुपयों में उसका क्या होगा? उसकी ज़िंदगी में बड़े-बड़े मंसूबे थे। पहले तो उसे संपूर्ण जगत की यात्रा करनी थी। पीरू और ब्राज़ील और टिंबकटू और होनोलूलू‒ ये सब उसके प्रोग्राम में थे। वह आँधी की तरह महीने-दो-महीने उड़कर लौट आनेवालों में न था। वह एक-एक स्थान में कई-कई दिन ठहरकर वहाँ के रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि का अध्ययन करना और संसार-यात्रा पर एक वृहद ग्रंथ लिखना चाहता था। फिर उसे एक बहुत बड़ा पुस्तकालय बनवाना था, जिसमें दुनिया-भर की उत्तम रचनाएँ जमा की जाएँ। पुस्तकालय के लिए वह दो लाख तक ख़र्च करने को तैयार था। बँगला, कार और फ़र्नीचर तो मामूली बातें थीं। पिता या चचा के नाम रुपए आए, तो पाँच हज़ार से ज़्यादा का डौल नहीं, अम्मा के नाम आए, तो बीस हज़ार मिल जाएँगे; लेकिन भाई साहब के नाम आ गए, तो उसके हाथ धेला भी न लगेगा। वह स्वाभिमानी था। घरवालों से खैरात या पुरस्कार के रूप में कुछ लेने की बात उसे अपमान-सी लगती थी। कहा करता था‒ भाई, किसी के सामने हाथ फैलाने से तो किसी गड्ढे में डूब मरना अच्छा है। जब आदमी अपने लिए संसार में कोई स्थान न निकाल सके, तो यहाँ से प्रस्थान कर जाए।

वह बहुत बेक़रार था। घर में लॉटरी-टिकट के लिए उसे कौन रुपए देगा? वह माँगे भी तो कैसे? उसने बहुत सोच-विचारकर कहा‒ क्यों न हम-तुम साझे में एक टिकट ले लें?

तजवीज़ मुझे भी पसंद आई। मैं उन दिनों स्कूल-मास्टर था। बीस रुपए मिलते थे। उसमें बड़ी मुश्किल से गुज़र होती थी। दस रुपए का टिकट ख़रीदना मेरे लिए सफ़ेद हाथी ख़रीदना था। हाँ, एक महीना दूध घी, जलपान और ऊपर के सारे ख़र्च तोड़कर पाँच रुपए की गुंजाइश निकल सकती थी। फिर भी जी डरता था। कहीं से कोई रकम मिल जाए, तो कुछ हिम्मत बढ़े।

विक्रम ने कहा‒ कहो तो अपनी अँगूठी बेच डालूँ? कह दूँगा, उँगली से फिसल पड़ी।

अँगूठी दस रुपए से कम न थी। उसमें पूरा टिकट आ सकता था। अगर कुछ ख़र्च किए बिना ही टिकट में आधा-साझा हुआ जाता है, तो क्या बुरा है?

सहसा विक्रम फिर बोला‒ लेकिन भई, तुम्हें नकद देने पड़ेंगे। मैं पाँच रुपए नकद लिए बग़ैरर साझा न करूँगा।

अब मुझे औचित्य का ध्यान आ गया। बोला‒ नहीं दोस्त, यह बुरी बात है, चोरी खुल जाएगी, तो शर्मिंदा होना पड़ेगा और तुम्हारे साथ मुझे भी डाँट पड़ेगी।

आख़िर यह तय हुआ कि पुरानी किताबें किसी सेकेंड हैंड किताबों की दुकान पर बेच डाली जाएँ और उस रुपए से टिकट लिया जाए। हमारी पुराने पुस्तकें अब दीमकों के सिवा हमारे किसी काम की न थीं। हमसे जितना चाटते बना, चाटा; उनका सत्त निकाल लिया। अब चूहें चाटें या दीमक, हमें परवाह न थी। मैं मास्टर था, किसी बुकसलेर की दुकान पर किताब बेचते हुए झेंपता था। मुझे सभी पहचानते थे, इसलिए यह ख़िदमत विक्रम के सुपुर्द हुई और वह आधे घंटे में दस रुपए का एक नोट लिए उछलता-कूदता आ पहुँचा। मैंने उसे इतना प्रसन्न कभी न देखा था। किताबें चालीस रुपए से कम की न थीं; पर यह दस रुपए उस वक्त में हमें जैसे पड़े हुए मिले। अब टिकट में आधा साझा होगा। दस लाख की रकम मिलेगी। पाँच लाख मेरे हिस्से में आएँगे, पाँच विक्रम के।

मैंने संतोष का भाव दिखाकर कहा‒ पाँच लाख भी कुछ कम नहीं होते जी। विक्रम इतना संतोषी न था। बोला‒ पाँच लाख क्या, हमारे लिए तो इस वक्त पाँच सौ भी बहुत हैं भाई, मगर ज़िंदगी का प्रोग्राम तो बदलना पड़ गया। मेरी यात्रा वाली स्कीम तो टल नहीं सकती। हाँ, पुस्तकालय ग़ायब हो गया।

मैंने आपत्ति की‒ आख़िर यात्रा में तुम दो लाख से ज़्यादा तो न ख़र्च करोगे?

विक्रम ने गर्म होकर कहा‒ मैं शान से रहना चाहता हूँ; भिखारियों की तरह नहीं। जब तक आप अपने हिस्से में से दो लाख मुझे न दे देंगे, पुस्तकालय न बन सकेगा।

‘कोई ज़रूरी नहीं कि तुम्हारा पुस्तकालय शहर में बेजोड़ हो? मेरे रुपए में से तुम्हें कुछ न मिल सकेगा। मेरी ज़रूरतें देखो। तुम्हारी घर में काफ़ी जायदाद है। तुम्हारे सिर कोई बोझ नहीं, मेरे सिर तो सारी गृहस्थी का बोझ है। दो बहनों का विवाह है, दो भाइयों की शिक्षा है, नया मकान बनवाना है। मैंने तो निश्चय कर लिया है कि सब रुपए सीधे बैंक में जमा कर दूँगा। उनके सूद से काम चलाऊँगा।

विक्रम ने सहानुभूति के भाव से कहा‒ हाँ, ऐसी दशा में तुमसे कुछ माँगना अन्याय है। खैर, मैं ही तकलीफ़ उठा लूँगा।

अब यह प्रश्न उठा कि टिकट पर किसका नाम रहे। विक्रम ने अपना नाम रखने के लिए बड़ा आग्रह किया। अगर उसका नाम न रहा, तो वह टिकट ही न लेगा। मैंने कोई उपाय न देखकर मंजूर कर लिया‒ बिना किसी लिखा-पढ़ी के, जिससे आगे चलकर मुझे बड़ी परेशानी हुई।

हम एक-एक करके इंतज़ार के दिन काटने लगे। भोर होते ही हमारी आँखें कैलेंडर पर जातीं। मेरा मकान विक्रम के मकान से मिला हुआ था। स्कूल जाने के पहले और स्कूल से आने के बाद हम दोनों साथ बैठकर अपने-अपने मंसूबे बाँधा करते और इस तरह सायँ-सायँ कि कोई सुन न ले। हम अपने टिकट ख़रीदने का रहस्य छिपाए रखना चाहते थे। यह रहस्य जब सत्य का रूप धारण कर लेगा, उस वक्त लोगों को कितना विस्मय होगा! उस दृश्य का नाटकीय आनंद हम नहीं छोड़ना चाहते थे।

एक दिन हम लोग ऐसी ही कल्पनाओं में डूबे हुए थे कि कमरे में कुंती आ गई। वह विक्रम की छोटी बहन थी, कोई ग्यारह साल की। छठे की पढ़ती थी और बराबर फेल होती थी। बड़ी चिबिल्ली, बड़ी शोख़। इतने धमाके से द्वार खोला कि हम दोनों चौंककर उठ खड़े हुए।

विक्रम बिगड़ने लगा‒ कुंती, तुझे किसने बुलाया यहाँ?

कुंती ने खुफ़िया पुलिस की तरह कमरे में नज़र दौड़ाकर कहा‒ तुम लोग हरदम यहाँ किवाड़ बंद किए बैठे क्या बातें किया करते हो? जब देखो, यहीं बैठे रहते हो। न कहीं घूमने जाते हो, न तमाशा देखने; कोई जादू-मंतर जगाते होगे।

विक्रम ने उसकी गर्दन पकड़कर हिलाते हुए कहा‒ हाँ, एक मंतर जगा रहे हैं, जिसमें तुझे ऐसा दूल्हा मिले, जो रोज़ गिनकर पाँच हज़ार हंटर जमाए सड़ासड़।

कुंती उसकी पीठ पर बैठकर बोली‒ मैं ऐसे दूल्हे से ब्याह करूँगी, जो मेरे सामने खड़ा पूँछ हिलाता रहेगा। मैं मिठाई के दोने फेंक दूँगी और वह चाटेगा। अम्मा को लॉटरी के रुपए मिलेंगे, तो पचास हज़ार मुझे दे दें। बस, चैन करूँगी। मैं दोनों वक्त ठाकुरजी से अम्मा के लिए प्रार्थना करती हूँ। अम्मा कहती है, कुँवारी लड़कियों की दुआ कभी निष्फल नहीं होती। मेरा मन तो कहता है, अम्मा को ज़रूर रुपए मिलेंगे।

मुझे याद आया, एक बार मैं अपने ननिहाल गया था, तो वहाँ सूखा पड़ा हुआ था। भादों का महीना आ गया था; मगर पानी की बूँद नहीं। लोगों ने चंदा एकत्र करके गाँव की सब कुँवारी लड़कियों की दावत की थी और उसके तीसरे ही दिन मूसलाधार वर्षा हुई थी। अवश्य ही कुँवारियों की दुआ में असर होता है।

मैंने विक्रम को अर्थपूर्ण आँखों से देखा, विक्रम ने मुझे। आँखों ही में हमने सलाह कर ली और निश्चय भी कर लिया। विक्रम ने कुंती से कहा‒ अच्छा, तुझसे एक बात कहें, किसी से कहोगी तो नहीं? नहीं तू तो बड़ी अच्छी लड़की है, किसी से न कहेगी। मैं अब की तुझे ख़ूब पढ़ाऊँगा और पास करा दूँगा। बात यह है कि हम दोनों ने भी लॉटरी का टिकट लिया है। हम लोगों के लिए भी ईश्वर से प्रार्थना किया कर। अगर हमें रुपए मिले, तो तेरे लिए अच्छे-अच्छे गहने बनवा देंगे। सच!

कुंती को विश्वास न आया। हमने कसमें खाईं। वह नखरे करने लगी। जब हमने उसे सिर से पाँव तक सोने-हीरे से मढ़ देने की प्रतिज्ञा की, तब वह हमारे लिए दुआ करने को राज़ी हुई।

लेकिन उसके पेट में मनों मिठाई पच सकती थी; वह ज़रा-सी बात न पची। सीधे अंदर भागी और एक क्षण में सारे घर में वह ख़बर फैल गई। अब जिसे देखिए, विक्रम को डाँट रहा है, अम्मा भी, चचा भी, पिता भी‒ बैठे-बैठे तुम्हें हिमाक़त ही सूझती है। रुपए लेकर पानी में फेंक दिए। घर में इतने आदमियों ने तो टिकट लिया ही था, तुम्हें लेने की क्या ज़रूरत थी? क्या तुम्हें उसमें से कुछ न मिलते? और तुम भी मास्टर साहब, बिलकुल घोंघा हो। लड़के को अच्छी बातें क्या सिखाओगे, उसे और चौपट किए डालते हो।

विक्रम तो लाड़ला बेटा था। उसे और क्या कहते। कहीं रूठकर एक-दो जून खाना न खाए, तो आफ़त ही आ जाए। मुझपर सार गुस्सा उतरा।

विक्रम के पिता, बड़े ठाकुर साहब और ताऊ, छोटे ठाकुर साहब दोनों नास्तिक थे, पूजा-पाठ की हँसी उड़ानेवाले। मगर अब दोनों बड़े निष्ठावान और ईश्वरभक्त हो गए थे। बड़े ठाकुर साहब प्रात:काल गंगास्नान करने जाते और मंदिरों के चक्कर लगाते हुए दोपहर को सारी देह में चंदन लपेटे घर लौटते। छोटे ठाकुर साहब घर पर ही गर्म पानी से स्नान करते और गठिया से ग्रस्त होने पर भी राम नाम लिखना शुरू कर देते। धूप निकल आने पर पार्क की ओर निकल जाते और चींटियों को आटा खिलाते। शाम होते ही दोनों भाई अपने ठाकुरद्वारे में जा बैठते और आधी रात तक भागवत-कथा तन्मय होकर सुनते। विक्रम के बड़े भाई, प्रकाश को साधु महात्माओं पर अधिक विश्वास था। वह मठों और साधुओं के अखाड़ों तथा कुटियों की खाक छानते और माताजी को तो भोर से आधी रात तक स्नान, पूजा और व्रत के सिवा दूसरा काम ही न था। उस उम्र में भी उन्हें सिंगार का शौक था; पर आजकल पूरी तपस्विनी बनी हुई थीं। लोग नाहक लालसा को बुरा कहते हैं। वह केवल हमारी लालसा, हमारी हवस के कारण। हमारा धर्म स्वार्थ के बल पर टिका हुआ है। हवस मनुष्य के मन और बुद्धि का इतना संस्कार कर सकती है, यह मेरे लिए बिलकुल नया अनुभव था। हम दोनों भी ज्योतिषियों और पंडितों से कभी-कभी प्रश्न कर लिया करते थे।

ज्यों-ज्यों लॉटरी का दिन समीप आता जाता था, हमारे चित्त की शांति उड़ती जाती थी। हमेशा उसी ओर से मन टँगा रहता। मुझे अकारण संदेह होने लगा कि कहीं विक्रम मुझे हिस्सा देने से इनकार कर दे, तो मैं क्या करूँगा। साफ़ इन्कार कर जाए कि तुमने टिकट में साझा किया ही नहीं। न कोई तहरीर है, न कोई दूसरा सबूत। सब कुछ विक्रम की नीयत पर है। आदमी ऐसा तो नहीं है; मगर भाई, दौलत पाकर ईमान सलामत रखना कठिन है। अभी ईमानदार बनने में क्या ख़र्च होता है? परीक्षा का समय तो तब आएगा, जब दस लाख रुपए हाथ में होंगे। मैंने अपने अंत:करण को टटोला‒ अगर टिकट मेरे नाम का होता और मुझे दस लाख मिल जाते, तो क्या मैं आधे रुपए बिना कान-पूँछ हिलाए विक्रम के हवाले कर देता? कौन कह सकता है; मगर अधिक संभव यही था कि में हीले-हवाले करता, कहता‒ तुमने मुझे पाँच रुपए उधार दिए थे। उसके दस ले लो, सौ ले लो और क्या करोगे; मगर नहीं, मुझसे इतनी बेईमानी न होती।

दूसरे दिन हम दोनों अख़बार देख रहे थे कि सहसा विक्रम ने कहा‒ कहीं हमारा टिकट निकल आए, तो मुझे अफ़सोस होगा कि नाहक तुमसे साझा किया।

वह सरल भाव से मुसकुराया, मगर यह थी उसकी आत्मा की झलक, जिसे वह मज़ाक की आड़ में छिपाना चाहता था।

मैंने चौंककर कहा‒ सच! लेकिन इसी तरह मुझे भी तो अफ़सोस हो सकता है?

‘लेकिन टिकट तो मेरे नाम का है ... अच्छा मान लो, मैं तुम्हारे साझे से इनकार कर जाऊँ?'

मेरा ख़ून सर्द हो गया। आँखों के सामने अँधेरा छा गया।

‘मैं तुम्हें इतना बदनीयत नहीं समझता था।'

‘मगर पाँच लाख! सोचो तो दिमाग़ चकरा जाता है।'

‘तो अब से लिखा-पढ़ी कर लो। यह संशय रहे ही न!'

विक्रम ले हँसकर कहा‒ तुम बड़े शक्की हो यार! मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। भला, ऐसा कहीं हो सकता है? पाँच लाख क्या, पाँच करोड़ भी हों, तब भी ईश्वर चाहेगा, तो नीयत में फ़र्क न आने दूँगा।

किंतु मुझे उसके इस आश्वासन पर बिलकुल विश्वास न आया। मन में एक संशय बैठ गया।

मैंने कहा‒ मैं जानता हूँ, तुम्हारी नीयत कभी विचलित नहीं हो सकती, पर लिखा-पढ़ी कर लेने में क्या हर्ज़ है?

‘तो पक्के काग़ज़ पर लिखना पड़ेगा। दस लाख की कोर्ट फीस ही साढ़े सात हज़ार हो जाएगी। किस भ्रम में हैं आप?'

मैंने सोचा, सादी लिखा-पढ़ी के बल पर क़ानूनी कार्यवाही न कर सकूँगा। पर इन्हें लज्जित करने का, इन्हें जलील करने का, और इन्हें सबके सामने बेईमान सिद्ध करने का अवसर मेरे हाथ आएगा। बोला‒ मुझे सादे काग़ज़ पर ही विश्वास आ जाएगा।

विक्रम ने लापरवाही से कहा‒ जिस काग़ज़ का कोई क़ानूनी महत्त्व नहीं, उसे लिखकर क्या समय नष्ट करें?

मुझे निश्चय हो गया कि विक्रम की नीयत में अभी से फ़र्क आ गया। नहीं तो सारा काग़ज़ लिखने में क्या बाधा हो सकती है? बिगड़कर कहा‒ तुम्हारी नीयत तो अभी से ख़राब हो गई।

उसने निर्लज्जता से कहा‒ तो क्या तुम साबित करना चाहते हो कि ऐसी दशा में तुम्हारी नीयत न बदलती?

‘मेरी नीयत इतनी कमज़ोर नहीं है।'

‘रहने भी दो। अच्छे-अच्छों की नीयत बदलते देखा है। तुम्हें इसी वक्त लेखाबद्ध होना पड़ेगा। मुझे तुम पर विश्वास नहीं रहा।'

‘यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं, तो मैं भी नहीं लिखता।'

‘तो क्या तुम समझते हो, तुम मेरे रुपए हज़म कर जाओगे?'

‘किसके रुपए और कैसे रुपए?'

‘मैं कहे देता हूँ विक्रम, हमारी दोस्ती का ही अंत न हो जाएगा, बल्कि इससे कहीं भयंकर परिणाम होगा।'

हिंसा की एक ज्वाला-सी मेरे अंदर दहक उठी।

सहसा दीवानख़ाने में झड़प की आवाज़ सुनकर मेरा ध्यान उधर चला गया। यहाँ दोनों ठाकुर बैठा करते थे। उनमें ऐसी मैत्री थी, जो आदर्श भाइयों में हो सकती है। बड़े ठाकुर जो कह दें, वह छोटे ठाकुर के लिए क़ानून था और छोटे ठाकुर की इच्छा देखकर ही बड़े ठाकुर कोई बात कहते थे। हम दोनों दीवानख़ाने के द्वार पर जाकर खड़े हो गए। दोनों भाई अपनी-अपनी कुर्सियों से उठकर खड़े हो गए थे, एक-एक क़दम आगे भी बढ़ आए थे, आँखें लाल, मुख विकृत, त्योरियाँ चढ़ी हुई, मुट्ठियाँ बँधी हुई। मालूम होता था, बस हाथापाई हुई ही समझो।

छोटे ठाकुर ने हमें देखकर पीछे हटते हुए कहा‒ सम्मिलित परिवार में जो कुछ भी और कहीं से भी और किसी के नाम भी आए, वह सबका है, बराबर।

बड़े ठाकुर ने विक्रम को देखकर एक क़दम और आगे बढ़ाया‒ हरगिज़ नहीं, अगर मैं कोई जुर्म करूँ, तो मैं पकड़ा जाऊँगा, सम्मिलित परिवार नहीं। मुझे सज़ा मिलेगी, सम्मिलित परिवार को नहीं। यह वैयक्तिक प्रश्न है।

‘इसका फ़ैसला अदालत से होगा।'

‘शौक से अदालत जाइए। अगर मेरे लड़के, मेरी बीवी या मेरे ना लॉटरी निकली, तो आपका उससे कोई संबंध न होगा, उसी तरह जैसे आपके नाम लॉटरी निकले, तो मुझसे, मेरी बीवी से या मेरे लड़के से उसका कोई संबंध न होगा।'

‘अगर मैं जानता कि आपकी ऐसी नीयत है, तो मैं भी बीवी-बच्चों के नाम से टिकट ले सकता था।'

‘यह आपकी ग़लती है।'

‘इसीलिए कि मुझे विश्वास था, आप भाई हैं।'

‘यह जुआ है, आपको समझ लेना चाहिए था। जुए की हार-जीत का ख़ानदान पर कोई असर नहीं पड़ सकता। अगर आप कल को दस-पाँच हज़ार रेस में हार आएँ तो ख़ानदान उसका जिम्मेदार न होगा।'

‘मगर भाई का हक दबाकर आप सुखी नहीं रह सकते।'

‘आप न ब्रह्मा हैं, न ईश्वर और न कोई महात्मा।'

विक्रम की माता ने सुना कि दोनों भाइयों में ठनी हुई है और मल्लयुद्ध हुआ चाहता है, तो दौड़ी हुई बाहर आईं और दोनों को समझाने लगीं।

छोटे ठाकुर ने बिगड़कर कहा‒ आप मुझे क्या समझाती हैं, उन्हें समझाइए जो चार-चार टिकट लिए हुए बैठे हैं। मेरे पास क्या है, एक टिकट। उसका क्या भरोसा! मेरी अपेक्षा जिन्हें रुपए मिलने का चौगुना चांस है, उनकी नीयत बिगड़ जाए, तो लज्जा और दुख की बात है।

ठकुराइन ने देवर को दिलासा देते हुए कहा‒ अच्छा, मेरे रुपए में से आधे तुम्हारे। अब तो खुश हो।

बड़े ठाकुर ने बीवी की जबान पकड़ी‒ क्यों आधे ले लेंगे? मैं एक धेला भी न दूँगा। हम उदारता से काम लें, फिर भी उन्हें पाँचवें हिस्से से ज़्यादा किसी तरह न मिलेगा। आधे का दावा किस नियम से हो सकता है?‒ न बौद्धिक, न धार्मिक, न नैतिक।

छोटे ठाकुर ने खिसियाकर कहा‒ सारी दुनिया का क़ानून आप ही तो जानते हैं!

‘जानते ही हैं, तीस साल तक वक़ालत नहीं की है?'

‘यह वक़ालत निकल जाएगी, जब सामने कलकत्ते का बैरिस्टर खड़ कर दूँगा।'

‘बैरिस्टर की ऐसी-तैसी, चाहे वह कलकत्ते का हो या लंदन का।'

इतने में विक्रम के बड़े भाई साहब सिर और हाथ में पट्टी बाँधे, लँगड़ाते हुए कपड़ों पर ताज़ा खून के दाग लगाए, प्रसन्न मुख आकर एक आरामकुर्सी पर गिर पड़े। बड़े ठाकुर ने घबराकर पूछा‒ यह तुम्हारी क्या हालत है जी? ऐं, यह चोट कैसे लगी? किसी से मार-पीट तो नहीं हो गई।

प्रकाश कुर्सी पर लेटकर एक बार कराहे, फिर मुस्कुराकर बोले‒ जी, कोई बात नहीं ऐसी कुछ बहुत चोट नहीं लगी।

‘कैसे कहते हो कि चोट नहीं लगी? सारा हाथ और सिर सूज गया है। कपड़े ख़ून से तर। यह मुआमला क्या है? कोई मोटर दुर्घटना तो नहीं हो गई?'

‘बहुत मामूली चोट है, दो-चार दिन में अच्छी हो जाएगी। घबराने की कोई बात नहीं।'

प्रकाश के मुख पर आशापूर्ण, शांत मुस्कान थी। क्रोध, लज्जा या प्रतिशोध की भावना का नाम भी न था।

बड़े ठाकुर ने व्यग्र होकर पूछा‒ लेकिन हुआ क्या, बताते क्यों नहीं? मार-पीट हुई हो तो थाने में रपट करवा दूँ?

प्रकाश ने हलके मन से कहा‒ मार-पीट किसी से नहीं हुई। बात यह है कि मैं ज़रा झक्कड़ बाबा के पास चला गया था। आप तो जानते हैं, वह आदमियों की सूरत से भागते हैं और पत्थर लेकर मारने दौड़ते हैं। जो डरकर भागा, वह गया। जो पत्थर की चोट खाकर भी उनके पीछे लगा रहा, वह पारस हो गया। वह यही परीक्षा लेते हैं। आज मैं वहाँ पहुँचा, तो कोई पचास आदमी जमा थे, कोई बहुमूल्य भेंट लिए, कोई कपड़ों का थान लिए। झक्कड़ बाबा ध्यानावस्था में बैठे थे। एकाएक उन्होंने आँखें खोलीं और यह जन-समूह देखा, तो कोई पत्थर चुनकर उनके पीछे दौड़े। फिर क्या था, भगदड़ मच गई। एक भी न टिका। अकेला मैं घंटाघर की तरह वहीं डटा रहा। बस उन्होंने पत्थर चला ही दिया। पहला निशाना सिर में लगा। खोपड़ी भन्ना गई, ख़ून की धारा बह चली; लेकिन मैं हिला नहीं। फिर बाबा जी ने दूसरा पत्थर फेंका। वह हाथ में लगा। मैं गिर पड़ा और बेहोश हो गया। जब होश आया, तो वहाँ सन्नाटा था। बााबजी भी ग़ायब हो गए थे। अंतर्धान हो जाया करते हैं। किसी तरह उठा और सीधा डाक्टर के पास गया। उन्होंने देखकर कहा‒ हड्डी टूट गई है और पट्टी बाँध दी; गर्म पानी से सेंकने को कहा है। चोट लगी तो लगी; अब लाटरी मेरे नाम आई धरी है। यह निश्चित है। ऐसा कभी हुआ ही नहीं कि झक्कड़ बाबा की मार खाकर कोई नामुराद रह गया हो। मैं तो सबसे पहले बाबा की कुटी बनवा दूँगा।

बड़े ठाकुर साहब के मुख पर संतोष की झलक दिखाई दी। फ़ौरन पलंग बिछ गया। प्रकाश उस पर लेटे। ठकुराइन पंखा झलने लगीं, उनका भी मुख प्रसन्न था। इतनी चोट खाकर दस लाख पा जाना कोई बुरा सौदा न था।

छोटे ठाकुर के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। ज्यों ही बड़े ठाकुर भोजन करने गए और ठकुराइन भी प्रकाश के लिए भोजन का प्रबंध करने गईं, त्यों ही छोटे ठाकुर ने प्रकाश से पूछा‒ क्या बहुत ज़ोर से पत्थर मारते हैं? ज़ोर से तो क्या मारते होंगे?

प्रकाश ने उनका आशय समझकर कहा‒ अरे, पत्थर नहीं मारते, बमगोला मारते हैं। कोई ऐसा-वैसा आदमी ही, तो एक ही पत्थर में टें हो जाएं। कितने ही तो मर गए; मगर आज तक झक्कड़ बाबा पर मुक़दमा नहीं चला। और दो-चार पत्थर मारकर ही नहीं रह जाते, जब तक आप गिर न पड़े और बेहोश न हो जाएँ, वह मारते ही जाएँगे़; मगर रहस्य यही है कि आप कितनी ज़्यादा चोटें खाएँगे, उतने ही अपने उद्देश्य के निकट पहुँचेंगे....।

प्रकाश ने ऐसा रोएँ खड़े कर देने वाला चित्र खींचा कि छोटे ठाकुर साहब थर्रा उठे। पत्थर खाने की हिम्मत न पड़ी।

आख़िर भाग्य के निपटारे का दिन आया‒ जुलाई की बीसवीं तारीख़ क़त्ल की रात। हम प्रात:काल उठे, तो जैसे एक नशा चढ़ा था, आशा और भय के द्वंद्व का। दोनों ठाकुरों ने घड़ी रात रहे गंगास्नान किया था और मंदिर में बैठे पूजन कर रहे थे। आज मेरे मन में श्रद्धा जागी। मंदिर में जाकर मन-ही-मन ठाकुरजी की स्तुति करने लगा‒अनाथों के नाथ, तुम्हारी कृपादृष्टि क्या हमारे ऊपर न होगी? तुम्हें क्या मालूम नहीं, हमसे ज़्यादा तुम्हारी दया कौन डिज़र्व (deserve) करता है? विक्रम सूट-बूट पहने मंदिर के द्वार पर आया, मुझे इशारे से बुलाकर इतना कहा‒ मैं डाक़ख़ाने जाता हूँ और हवा हो गया। ज़रा देर में प्रकाश मिठाई के थाल लिए हुए घर में से निकले और मंदिर के द्वार पर खड़े कंगालों को बाँटने लगे। दोनों ठाकुर भगवान के चरणों में लौ लगाए हुए थे‒ सिर झुकाए, आँखें बंद किए और अनुराग में डूबे हुए।

बड़े ठाकुर ने सिर उठाकर पुजारी की ओर देखा और बोले‒ भगवान तो बड़े भक्त-वत्सल हैं, क्यों पुजारी जी?

पुजारी ने समर्थन किया‒ हाँ सरकार, भक्तों की रक्षा के लिए तो क्षीरसागर से दौड़े और गज को ग्राह के मुँह से बचाया।

पूजन समाप्त हुआ। आरती हुई। दोनों भाइयों ने आज ऊँचे स्वर में आरती गाई और बड़े ठाकुर ने दो रुपए थाल में डाले। छोटे ठाकुर ने चार रुपए डाले। बड़े ठाकुर ने एक बार कोप-दृष्टि से देखा और मुँह फेर लिया।

बड़े ठाकुर श्रद्धा में डूबे भजन गाते हुए मंदिर से निकले।

एक मिनट में छोटे ठाकुर भी मंदिर से गाते हुए निकले।

मैं भी डाकख़ाने की तरफ़ चला कि तभी विक्रम मुस्कुराता हुआ साइकिल पर आ पहुँचा। उसे देखते ही सभी जैसे पागल हो गए। दानों ठाकुर बाज की तरह झपटे। प्रकाश ने भी थाल ज़मीन पर पटका और दौड़ा। और मैंने तो उस उन्माद में विक्रम को गोद में उठा लिया; मगर कोई उससे कुछ पूछता नहीं, सभी जय-जयकार की हाँक लगा रहे हैं।

बड़े ठाकुर ने आकाश की ओर देखा‒ बोलो राजा रामचंद्र की जय!

छोटे ठाकुर ने छलाँग मारी‒ बोलो हनुमान जी की जय!

प्रकाश भी चीख़ा‒ दुहाई झक्कड़ बाबा की।

विक्रम ने ज़ोर से कहकहा लगाया और बोला‒ जिसका नाम आया है, उससे एक लाख लूँगा। बोलो, है मंजूर?

बड़े ठाकुर ने उसका हाथ पकड़ा‒ पहले बता तो।

‘ना! यों नहीं बताता।'

छोटे ठाकुर बिगड़े‒ बताने के लिए एक लाख?

प्रकाश ने भी त्योरी चढ़ाई‒ क्या डाकख़ाना हमने देखा नहीं है?

‘अब अपना-अपना नाम सुनने के लिए तैयार हो जाओ।'

सभी लोग फ़ौजी-अटेंशन की दशा में निश्चल खड़े हो गए।

‘अच्छा, तो सुनिए कान खोलकर। इस शहर का सफ़ाया है। इस शहर का ही नहीं, संपूर्ण भारत का सफ़ाया है। अमरीका के एक हब्शी का नाम आया है।

बड़े ठाकुर झल्लाए‒ झूठ-झूठ, बिलकुल झूठ।

छोटे ठाकुर ने पैंतरा बदला‒ कभी नहीं। तीन महीने की तपस्या यों ही रही? वाह!

प्रकाश ने छाती ठोंककर कहा‒ यहाँ सिर मुड़वाए और हाथ तुड़वाए बैठे हैं, दिल्लगी है।

इतने में और पचासों आदमी उधर से रोनी सूरत लिए निकले। वे बेचारे भी डाकखाने से अपनी किस्मत को रोते चले आ रहे थे‒ मार ले गया, अमरीका हब्शी! अभागा! पिशाच! दुष्ट!

अब कैसे किसी को विश्वास न आता? बड़े ठाकुर झल्लाए हुए मंदिर में गए और पुजारी को डिसमिस कर दिया‒ इसीलिए तुम्हें इतने दिनों से पाल रखा हैं हराम का माल खाते हो और चैन करते हो!

छोटे ठाकुर साहब ने सिर पीटा और वहीं बैठ गए; मगर प्रकाश के क्रोध का पारावार न था। उसने अपना मोटा सोटा लिया और झक्कड़ बाबा की मरम्मत करने चला।

माता जी ने केवल इतना कहा‒ हमारे देवता क्या करें? किसी के हाथ से थोड़े ही छीन लाएँगे?

रात को किसी ने खाना नहीं खाया। मैं भी उदास बैठा हुआ था कि विक्रम आकर बोला‒ चलो, होटल से कुछ खा जाएँ। घर में तो चूल्हा नहीं जला।

मैंने पूछा‒ तुम डाकख़ाने से आए तो बहुत प्रसन्न क्यों थे?

उसने कहा‒ जब मैंने डाकख़ाने के सामने हज़ारों की भीड़ देखी, तो मुझे अपने लोगों के गधेपन पर हँसी आई। एक शहर में जब इतने आदमी हैं, तो सारे हिंदुस्तान में इसके हज़ार गुने से कम न होंगे और दुनिया में तो लाख गुने से भी ज़्यादा हो जाएँगे। मैंने आशा का जो एक पर्वत-सा खड़ा कर रखा था, वह एकबारगी इतना छोटा हुआ कि राई बन गया और मुझे हँसी आई। जैसे कोई दानी पुरुष छटाँक भर अन्न हाथ में लेकर एक लाख आदमियों को न्यौता दे बैठे‒ और यहाँ हमारे घर का एक-एक आदमी समझ रहा है कि....

मैं भी हँसा‒हाँ, बात तो यथार्थ में यही है और हम दोनों लिखा-पढ़ी के लिए लड़े मरते थे; मगर सच बताना, तुम्हारी नीयत ख़राब हुई थी कि नहीं?

विक्रम मुस्कुराकर बोला‒ अब क्या करोगे पूछकर? पर्दा ढका रहने दो।

यह भी पढ़ें -कुंठित भूख - गृहलक्ष्मी कहानियां

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