ज्वर रोगों की आयुर्वेदिक चिकित्सा

सिद्धार्थ शंकर

8th April 2021

प्राचीन समय से ही आयुर्वेद का उपयोग कई रोगों को दूर करने में किया जाता रहा है। आयुर्वेद का उपयोग ज्वर रोगों को दूर करने में किस प्रकार सहायक है साथ ही जानें कैसे हुई उत्पत्ति ज्वर रोगों की आइए जानते हैं लेख से-

ज्वर रोगों की आयुर्वेदिक चिकित्सा

आयुर्वेद के अनुसार दक्ष प्रजापति द्वारा किए गए अपमान से नाराज रुद्र के नाक से ज्वर रोग की उत्पत्ति हुई है। यह प्रमाण (मधु कोश-विद्योतिनी टीका-अथज्वर निदानम् सुश्रुत उ. अ. उ.) देते हुए हमको लगता है कि आयुर्वेद भारतीय अध्यात्म के कितना निकट है। यह ज्वर आठ प्रकार का बताया गया है। वातज, पित्तज, कफज, वात पित्तज, वात कफज, पित्त कफज, त्रिदोषज एवं आगंतुक (बाहर से आए रोगाणुओं या कारणों द्वारा)। ज्वर (फीवर, पायरेक्सिया) सभी रोगों में मुख्य माना गया है। कई बार यह कई दिनों तक बना रहता है एवं एलोपैथी के आधुनिकतम उपकरणों के बावजूद उसका कारण पकड़ में नहीं आता। इनका अभाव इतने सूक्ष्म स्तर पर होता है कि उसके लिए ऋषि की नजर न हो तो कारण (डायग्नोसिस) संभव ही नहीं हो पाता। ज्वर महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इसका होना, न होना किसी भी बीमारी के उपचार में महत्त्पूर्ण स्थान रखता है। इसीलिए आयुर्वेद उपचार प्रक्रिया में सर्व प्रथम ज्वर का ही वर्णन किया जाता है। चरक ने इसे बलवान मानते हुए 'मृत्यु' नाम दिया है। इससे शरीर व मन दोनों ही बराबर रूप से प्रभावित होते हैं।

शरीर में तजोगुण की अधिकता से ही ज्वर की उत्पत्ति होती है। क्रोध को आग्नेय माना गया है। चरक ने कहा है- क्रोधात् पित्तम, क्रोध से पित्त की वृद्धि होती है। इसीलिए प्रत्येक ज्वर में पित्त की वृद्धि होती है। इसीलिए प्रत्येक ज्वर में पित्त को आम प्रकृति स्थान बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। शरीर में विभिन्न स्थानों पर दर्द-अंग मर्द, मालेज (malaise) अरुचि जैसे लक्षणों के साथ जब शरीर के तापक्रम की वृद्धि होती है, तो इसे ज्वर कहते हैं। तापक्रम एवं लक्षणों के आधार पर ही ज्वर की सापेक्षता तय होती है। मुख्य लक्षणों का राशि होने के कारण ज्वर भी अन्य रोगों के समान एक रोग ही माना जाता है, पर कभी-कभी कई रोगों में यह एक लक्षण के रूप में भी जाहिर होता है। आयुर्वेद के अनुसार क्रोध आदि मानसिक विकारों के कारण भी ज्वर की उत्पत्ति होती है। कई बुखार ऐसे होते हैं, जिनमें बाहर से ताप नहीं होता, अंदर से बुखार होता है। सामान्यतया मुख का तापमान 97.4 से 98.4 डिग्री फारेनहाइट होता है। जीव कोशों के स्तर पर यह इससे एक डिग्री कम होता है। प्रात: व सायं के तापमान में भी परिवर्तन होता है। जब भी 98.4 डिग्री से ऊपर तापमान है तो यह ज्वर है। इस लेख के आरंभ में दक्ष, रुद्र एवं क्रोध जन्य नि:श्वास से ज्वर की उत्पत्ति की बात कही गई थी। यह चरक द्वारा लिखे गए वर्णन की रूपक कथन है। दक्ष, क्रोध एवं रुद्र का अर्थ समझ लेंगे तो सब समझ में आ जाएगा दक्ष, का अर्थ है इंद्रियां उनके अविवेक पूर्ण प्रयोग से असत्य अहारा विहार, जीवाणु-विषाणु जन्य ज्वर के विशेष लक्षण ताप की वृद्धि करने के कारण अपमान स्वरूप माने जाते हैं। क्रोध तेजस का प्रतीक है अत: प्रतिक्रिया से उत्पन्न शरीर की तेजस प्रवृत्ति को क्रोध माना गया है। क्रोध का अधिष्ठता देेवता रुद्र को माना गया है। अत: जहां भी क्रोध की सत्ता होगी वहां सब जगह रुद्र की उपस्थिति भी अनिवार्य है। तेजस प्रवृति एक शक्ति है, जिसका काम तापनियंत्रक केंद्र का नियमन है। जहर द्वारा विकार होने से ताप की वृद्धि होती है। इस प्रकार ज्वर को रुद्र कोप माना गया है।

इस प्रकार विषोत्पत्ति (दक्ष द्वारा शिव का अपमान) ताप नियंत्रक केंद्र की विकार (रुद्र कोप) धात्वग्नि रक्त-प्रवाह की वृद्धि (कुपित रुद्र का नि:श्वास) त्वचा द्वारा ताप निर्हरण की कमी एवं तत्पश्चात ताप की वृद्धि ज्वर यह क्रम बनता है। बड़ी ही सुंदर अभिव्यक्ति है। आहार का झूठा योग (आठ अंगों का) एवं विहार का झूठा योग ज्वर का कारण बनता है, ऐसा चरक कहते हैं। विहार में अधिक व्यायाम उपवास, रात्रि जागरण, धातु क्षय आदि बातें आती हैं। झूठा आहार-विहार से प्रकुपित वात पित्त या कफ अमाशय में जमा हो कर सारे शरीर में फैल जाते हैं और कोष्ठïग्नि को बहार कर ज्वर उत्पन्न करते हैं, यह चरक और सुश्रुत का मत है।

आयुर्वेद के अनुसार सभी ज्वरों का महास्रोत है अमाशय (स्टॉमक) में विकार। हमारे ऋषिगण यह मानते रहे हैं कि जीवाणुवाद को अगर माना भी जाए तो भी त्रिदोष की थ्योरी पहले स्वीकार करनी होगी, क्योंकि त्रिदोष का कार्य क्षेत्र शरीर है। जीवाणु-विषाणु से प्रकुपित हुए त्रिदोष ही शरीर में विकार पैदा कर रोगों की उत्पत्ति करते हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) अगर मजबूत है तो त्रिदोष सम अवस्था में रहेंगे। जब तक उनकी साम्यावस्था है, तब तक कोई जीवाणु-विषाणु आक्रमण नहीं कर सकते, न रोग, न ज्वर उत्पन्न होगा। सुश्रुत आगे कहते हैं कि स्वेद का रुकावट (पसीने का न निकलना) दुख एवं सम्पूर्ण शरीर पीड़ा रोग, ये लक्षण जहां एक साथ हो उसे ज्वर कहते हैं (सु.उ.अ. 39)। ज्वर की अवस्था में पसीना नहीं निकलता। ताप जो भी शरीर में होता है, उसका बाहर जाना पसीने के आने-जाने पर निर्भर करता है। स्वेदावरोध से ही तापक्रम की वृद्धि होती है। आमरसों द्वारा स्वेद ग्रंथियों में रुकावट ही पसीना न निकलने का कारण बन जाता है। यही नहीं, सभी सिक्रीशंस (स्राव) मुख, आंत नली लिवर, पैंक्रियाज आदि में निकलना कम हो जाते हैं।

दुख से अर्थ है- देहेन्द्रिय मन स्तापी- देह, इंद्रिय और मन सभी में ताप की अनुभूति। पित्त की वृद्धि होने पर ही दुख हो सकता है, इसीलिए सभी आयुर्वेदिक औषधियां जो ज्वर के लिए सम्मिलित होती हैं पित्त शमन की चिकित्सा करती हैं। शरीर के सारे अंगों में पीड़ा के साथ जो आम लक्षण पाए जाते हैं वे हैं-थकावट, किसी काम में मन न लगना, मुख का स्वाद खराब होना, जंभाई, शरीर में भारीपन, आंखों से पानी आना, रोंगटे खड़े होना, अरुचि, कुछ सर्दी जैसी ज्ञात होना। यद्यपि वेदना सारे शरीर में होती है, फिर भी सिर और हृदय क्षेत्र को सर्वाधिक पीड़ा उठानी पड़ती है। वात ज्वर में ज्वर की प्रवृति या वृद्धि नियमित नहीं होती। इसका विशेष काल वर्षा ऋतु है। शरीर में कंपकंपी, तेज वेग, होंठों व गले का सूखना, नींद नहीं आना, छींक  रुक जाना, शरीर में रुखापन, मल सख्त हो जाना, उदर शूल ये वातिक ज्वर के लक्षण हैं। इसके अतिरिक्त वात ज्वर की पहचान यह है कि यह कभी सिर से कभी पीठ या जंघा से आरंभ होता है। कभी तेज होता है, कभी सुस्त। छींक की रुकावट को वाग्भट वात ज्वर का मुख्य लक्षण मानते हैं। पित्त ज्वर, में अतिसार (डायरिया) निद्रा की कमी तथा उलटियां भी होती हैं। मुंह कड़वा रहता है। कभी-कभी मूर्च्छा आ जाती है और कभी-कभी रोगी प्रलाप करने लगता है। प्यास ज्यादा लगती है। पित्त ज्वर शरद ऋतु में होता है। कफज ज्वर में ऐसा ज्ञात होता है, मानो शरीर गीले कपड़ों से ढका है, हमेशा आलस्य लगता है, मुख का स्वाद मीठा होता है। अन्न में अरुचि, शरीर में भारीपन, बार-बार कफ निकलने का मन एवं रोंगटे खड़े रहते हैं। इसका वेग सारे शरीर में एक साथ होता है। इन लक्षणों का वर्णन जान लेने पर उनका कारण एवं चिकित्सा का क्रम निर्धारित किया जा सकता है।

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