राशियों में शनि की साढ़ेसाती प्रभाव एवं उपाय

डॉ. भगवान सहाय श्रीवास्तव

8th April 2021

शनि की साढ़े साती, साढ़े सात वर्ष चलने वाली एक प्रकार की ग्रह दशा होती है। शनि की ढईया और साढ़े साती को प्राय: अशुभ एवं हानिकारक ही माना जाता है। आइये जानें इसके शांति के उपाय।

राशियों में शनि की साढ़ेसाती प्रभाव एवं उपाय

शनि परिचय- नवग्रह मण्डल में शनि को सेवक का पद दिया गया है। शनि आकाश मण्डल का सबसे सुन्दर ग्रह माना जाता है। इसके चारों ओर तीन वलय- ककण जैसे चक्र एक दूसरे से अलग रहते हुए घूमा करते हैं। 'शनि' इन्हीं वलयों के साथ-साथ ग्रहों की अपेक्षा अत्यन्त हल्का ग्रह है तथा ब्रहस्पति की तुलना में अधिक ठण्डा भी है। तथा मंद गति से चलता है।

शनि का जन्म सूर्य की द्वितीय पत्नी छाया की गर्भ से हुआ है। बृहस्पति से दो लाख योजन ऊपर शनैश्चर की स्थिति है। यह एक राशि पर भ्रमण करने में लगभग तीस महीने का समय लेता है। समस्त राशियों का परिभ्रमण तीस वर्ष में पूरा करता है। यह एक राशि पर ढाई वर्ष तथा बारह राशियों को पार कराने में तीस वर्ष का समय लगाता है।

प्रमुख गोचर और साढ़ेसाती- यदि गोचर में संक्रमण करता शनि जन्म लग्न में आ जाये तो इस समय जातक के स्वास्थ्य में खराबी हो जाती है। नौकरी, व्यापार व स्वास्थ्य में परेशानी, मान-अपमान, बहिष्कार-तिरस्कार, जमीन-जायदाद का बिक जाना, वहान दुर्घटना या चोरी हो जाती है। या फिर नौकरी, व्यापार में उन्नति सम्मान और मकान, वाहन का सुख मिलता है लेकिन ग्रहस्थ जीवन में कष्ट व परेशानी होती है। इस समय जातक की साढ़ेसाती की दूसरी ढैय्या होती है एवं सिर पर साढ़ेसाती होती है।

● शनि इस समय अपनी उच्च राशि में प्रवेश करेगा। साढ़ेसाती के प्रभाव का अंधविश्वास के साथ देखने के बजाय विचार आवश्यक है। शनि प्रत्येक राशि में अधिपति के साथ अपने संबंध के अनुसार ही फल देता है। गोचरवश शनि जिस राशि में भ्रमण कर रहा है वह शनि की उच्च, नीच, स्व, मित्र अथवा शत्रु राशि होगी। उस राशि में शनि का संबंध, शनि किस भाव का स्वामी है तथा जन्मांग में शनि की स्थिति इन सब पर विचार करना चाहिए।

● महत्त्वपूर्ण तथ्य के अनुसार साढ़ेसाती के समय किसी योग के कारण ग्रह की शुभदशा चल रही हो तो साढ़ेसाती का प्रभाव काफी कम होता है। साढ़ेसाती में शनि जन्मकालीन ग्रह स्थितियों के फलाफल को बढ़ाता घटाता है। जन्मकुण्डली से हटकर अप्रत्याशित रूप से कोई फल नहीं देता है बल्कि यह घटना के समय का निर्धारण करता है। शनि अपना अशुभ प्रभाव कमोवेश अवश्य दिखाता है, किस रूप में दिखाता है इसकी विवेचना जरूरी है।

● शनि के गोचर में भय के अनेक क्षण आते हैं। लेकिन इसके साथ हमारी भूल और समय की बर्बादी का हल भी निकलता है। हमारी संवेदनशीलता बढ़ जाती है। आलोचना और जजमेंट की स्थिति मन को परेशान करती है भविष्य की बहुत सी बातों को हम नजरअंदाज करते या टाल देते हैं। साइकोलोजिकल बहानों द्वारा असफलता की भावना को छिपाने की कोशिश करते हैं । हालांकि शनि के गोचर की उस लड़ाई में हम बिल्कुल अकेले पड़ जाते हैं। लेकिन इस अकेलेपन में भी हमारे आगे अनेक संभावनाएं होती हैं। आत्म संतुष्टिï की स्थिति के साथ हमारे आत्म जागृह मन में सुधार की इच्छा भी होती है।

● शनि के गोचर का जादू देखना हो तो स्थिर, स्थित, द्रष्टïभाव में सब कुछ देखना चाहिए। इस प्रकार की स्थिरता एकांतता में पनपती है। इस धीमी गति वाले समय का स्वागत करना चाहिए तथा अपनी ऊर्जा को बाहरी और निरुपयोगी होने से बचाना चाहिए।

● यह गोचर हमारे कार्यों के प्रति हमारे एटीट्ïयूड का मूल्यांकन और हमारी मैटीरियलिस्टिक इच्छाओं से जुड़ा हुआ है। भटकन से बचाकर हममें सही रास्ते की तलाश पूरी करने में जुड़ा है। यह हमें आत्मघाती प्रेम संबंधों से छुटकारा दिलाता है। निरर्थक नौकरी प्रेम की इच्छा अथवा भावना को तरसते विवाह, कष्टïकारी आदतें तथा तकलीफों से छुटकारा देने वाला होगा। यदि हम सजग सतर्क नहीं रहेंगे तथा सहयोग नहीं करेंगे, तब परिस्थितियां हमें बुरी स्थिति की ओर ढकेल देंगी। शनि कमजोरी में फंसाने की बजाय मजबूत बनाता है जिससे मजबूत ढांचा तैयार होता है। मन की नकारात्मक ऊर्जा खत्म करता है। अतीत के खराब संबंधों में मुक्ति दिलाता है। इसके लिए धैर्यपूर्वक जीवन की घटनाओं- दुर्घटनाओं को समझना आवश्यक है।

शनि ग्रहों से भ्रमण फल

सूर्य- गोचर में संक्रमण करता हुआ शनि जन्म कालिक सूर्य के ऊपर से गुजरता है तो यह समय बहुत अशुभ होता है। बनते और चलते कामों में रुकावट, बेकार के कामों में समय बरबाद होता है। इस समय ग्रहस्थ जीवन में परेशानी, स्त्री से दूरी होती है तथा संबंध विच्छेद या स्त्री की सेहत खराब, कर्ज का बोझ बढ़ता है।

चन्द्र- गोचर में संक्रमण करता शनि जन्मकालिक चन्द्र के ऊपर से गुजरता है तो  जातक को दो नंबर के कामों में धन लाभ होता है। नौकरी व्यापार में परिवर्तन, मन अशांत हो जाता है। नशीली चीजों का सेवन कर सकता है। सरकारी विभाग से परेशानी, वाहन सुख की चिन्ता, धन का व्यय व भाग दौड़ रहेगी।

मंगल- गोचर में संक्रमण करता हुआ शनि जन्मकालिक मंगल के ऊपर से गुजरता है तो बहुत अशुभ होता है। परंतु षष्ठï और दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो तो कई बार राजयोग बना देता है। धन, जमीन जायदाद संबंधी विवाद व समस्याएं उत्पन्न होती हैं। शारीरिक व मानसिक कष्टï होता है। चोरी, डकैती की घटनाएं होती हैं तथा ससुराल से अनुकूलता व लाभ मिलता है।

बुध- गोचर में संक्रमण करता हुआ शनि जन्मकालिक बुध के ऊपर से गुजरता है तो स्त्री को कष्टï, कड़ी मेहनत और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। दिमागी परेशानी व कई कमियां बन सकती है या विद्या में रुकावट आदि।

बृहस्पति- गोचर में संक्रमण करता हुआ शनि जन्मकालिक बृहस्पति के ऊपर से गुजरता है तो जातक का हर समय हर स्थान पर सम्मान होता है योग्यता में वृद्धि, नौकरी व्यापार में परिवर्तन होता है। मांस, शराब का सेवन करने लगता है। धन की कमी से चिंताएं बढ़ती है। काम नहीं रुकता है। जमीन जायदाद और वाहन का सुख प्राप्त होता है।

शुक्र- गोचर में संक्रमण करता हुआ शनि जन्मकालिक शुक्र के ऊपर से गुजरता है तो इस समय ग्रहस्थ जीवन में मधुरता से बाहरी संपर्क बढ़ते हैं। वाहन, मकान का लाभ होता है। बड़े-बड़े नुकसान भी अचानक होते हैं। स्त्रियों पर आसक्त व सम्मोहित रहता है। सुख के साधनों और सुंदरता पर धन खर्चा करता है। रात की नींद या खून खराब होता है।

शनि- गोचर में संक्रमण करता हुआ शनि जन्मकालिक शनि के ऊपर से गुजरता है तो इस समय जातक परिवर्तन के साथ उन्नति करता है। वाहन, जमीन, फैक्ट्री या शनि से  संबंधित कार्य (लोहा, मशीनरी, शराब, तेल, लकड़ी, जहर, दवाईयां, कोयला, पत्थर, प्लास्टिक आदि) और दो नंबर के कार्यां से लाभ होता है। नशे की आदत तरक्की में बाधक बन सकती है तथा सरकारी विभागीय डर-भय रहता है।

राहु- गोचर में संक्रमण करता हुआ शनि जन्मकालिक राहु के ऊपर से गुजरता है तो इस समय राजयोग का समय होता है। कई बार जातक संन्यासी वैरागी बन जाते है। धार्मिक कार्यों में रुचि, समाज में मान प्रतिष्ठï बढ़ती है। आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है। ससुराल, ननिहाल से लाभ मिलता है। दुखद समाचार भी मिल सकता है।

केतु- गोचर में संक्रमण करता हुआ शनि जन्मकालिक केतु के ऊपर से गुजरता है तो जातक एकांतवासी होता है या (कथावाचक) शास्त्री, पंडित आदि बन सकता है। नौकरी व्यापार में परिवर्तन के प्रयास करता है। यात्रा की संभावना व मन चिंतित रहेगा। ग्रहस्थ जीवन में सुख की कमी या यौन सुख में कमी व संतान की चिंता रहेगी।

तीन चरणों में प्रभाव: 'शनि' अपना प्रभाव तीन चरणों में दिखाते हैं जो साढ़े सात (7-1/2) सप्ताह से साढ़े सात (7-1/2) वर्ष तक के समय के लिए होता है। पहले चरण में जातक का अपना संतुलन बिगड़ जाता है और वह अपने निश्चय विचार से इधर-उधर भटक जाता है अर्थात् उसके हर कार्य में, उसके विचारों में अस्थिरता का आभाव होने लगता है और वह बेकार की परेशानियों से घिरने लगता है। दूसरे चरण में उसे कुछ मानसिक तथा शारीरिक रोग भी धरने लगते हैं और उसका कष्टï और बढ़ जाता है। तीसरे तथा अंतिम चरण तक पहुंचते-पहुंचते जातक का मस्तिष्क ठीक काम नहीं करता है और उसमें क्रोध की मात्रा और अधिक हो जाती है। इस समय कोई और ग्रह भी गलत स्थान पर चल रहा हो तो जातक के दुखों में और बढ़ोत्तरी हो जाती है। 

शनि-शमन के उपाय व सुझाव: शनि की शांति के लिए महामृत्युंजय जप, नीलम या फिरोजा का धारण करना तथा तिल, उड़द, लोहा, तेल, काला वस्त्र, नीलम कुल्थी, काली गौ, काले पुष्प, कस्तूरी, स्वर्ण आदि का दान श्रेष्ठï माना जाता है। परंतु शनि मंत्र के जप, स्रोत, स्तुति आदि के पाठ करने से शनि शीघ्र प्रसन्न होते हैं और कार्य की सिद्धि प्राप्त होती है। मंत्र जप स्वयं किया जा सकता है। यह मंत्र जाप तथा स्रोत आदि का पाठ 21 दिन में पूरा करना चाहिए और विधि विधानपूर्वक यज्ञ आदि कर के दान दक्षिणा देकर शनिदेव से कामना करनी चाहिए कि वह जीवन में आयी आपदाओं, विपदाओं से हमारी रक्षा करें। यह सब शास्त्र सम्मत नियमानुसार करें अन्यथा सिद्धि संदेहास्पद है।

शनि गायत्री मंत्र:

ऊं शनैश्चराय विद्महे सूर्य पुत्राय धीमहि। 

तन्नो मंद: प्रचोद्ïयात॥ 

आराधना: शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव, सूर्य और हनुमान जी की आराधना भी फलदायी होती है। शिवजी शनि देव के ज्ञान गुरु हैं तथा गुरु के कृपा पात्र पर शनि अपनी वक्री दृष्टिï नहीं डालते हैं। अत: शनि को प्रसन्न करने के लिए उनके गुरु की कृपा व प्रसन्नता बनाये रखें। शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव स्तुति, मृत संजीवनी कवच और महामृत्युंजय जप करना चाहिए।

शनि सूर्य के पुत्र है। सूर्य पूर्व हैं तो शनि पश्चिम। इन दोनों में हर विपरीत अवस्था में संबंध भी मधुर नहीं है। लेकिन शनि सूर्य से प्रभावित होता है। अत: शनि को प्रसन्न करने के लिए सूर्य की आराधना करें। सूर्य के बीज मंत्र का 7,500 बार जप करने पर चमत्कारिक फल मिलता है। आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ शुभ फल देता है।

● सूर्योदय के समय सूर्य दर्शन करते हुए 7 बार अथवा 21 बार यह श्लोक पढ़ें।

सूर्य पुत्रों दीधदिहो विशालक्ष: शिवप्रिय: मन्दवार: प्रसन्नात्मा पीड़ा दहतु में शनि:॥

● लोहे की कटोरी में सरसों का तेल भरकर शनिवार को उसमें अपना चेहरा दिखाकर कटोरी तेल सहित कुएं को दान कर दें।

शनि से बचाये मां काली: शनि पीड़ाशमन करती है मां काली! काली की उपासना से दैहिक, दैविक और भौतिक सारे तापों का क्षय होता है। जिन लोगों को शनि का प्रकोप हो, वे कालभैरव और माता-महाकाली दोनों की ही आराधना करें सरसों के तेल, काले तिल, काले उड़द से देवी भगवती और भैरव बाबा की आराधना अर्चना करें। शनि कष्टï तो दूर होगा ही, मनोरथ मनोकामना भी पूर्ण होगी। अमावस्या की अर्धरात्रि बेला में महाकाली का पूजन हर प्रकार के मनोरथ पूर्ण करता है।

अमावस्या के दिन पूजन एवं भोग से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और शनिवार के दिन पूजन से शनिदोष निवारण होता है। दुर्गा सप्तशती के इस सिद्ध एवं सरल मंत्र का जाप करके समस्त रोगादि विकारों से मुक्त होकर व्यक्ति दीर्घायु जीवन व्यतीत करता है।

जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नोस्तुते॥

काली साधना से सहज ही सब सिद्धियां प्राप्त हो जाती है। साधक को मां काली से असीम सिद्धियां प्राप्त हो जाती है। साधक को मां काली असीम आशीष, सुरक्षा-संरणक-कवच के अतिरिक्त सुख-सौभाग्य, सम्पन्नता, वैभव व श्रेष्ठïता का वरदान प्रदान करती है। शिव पुराण के अनुसार महादेव के महाकाल अवतार में देवी महाकाली के रूप में उनके साथ थीं।

इस प्रकार विभिन्न रूप से शनि पीड़ा का निवारण होकर सांसारिक तथा आध्यात्मिक मार्ग में आई रुकावटें व कष्टïदि काफी कुछ रंगत हो जायेंगे और आगे का मार्ग राजमार्ग बन जायेगा। यह अतुलनीय दुख तथा आधि-व्याधियों का कारक हैं। शनि की 'साढ़ेसाती' तथा शनी 'ढैय्या' जिन्हें क्रमश: 'बृहत्कल्याणी' तथा 'लघुकल्याणी' दशायें अपना जन्म प्रभाव प्रकट करती हैं। पापग्रह होते हुए भी यह मनुष्य को दुख रूपी देवाग्नि में तपाकर कुंदन की भांति निखारने और कल्याण का मार्ग-प्रशस्त करने वाला ग्रह है। इसी प्रकार भगवान हनुमान की आराधना से भी शनिदेव प्रसन्न होते हैं। शनि हनुमान जी के प्रति वचनबद्ध हैं क्योंकि हनुमान जी ने शनिदेव को रावण के काराग्रह से मुक्त कराया था। शनि हनुमान जी के प्रति वचनबद्ध हैं कि हनुमान जी के कृपा तथा आराधना से शनि द्वारा उत्पन्न बुरे परिणाम नष्ट होंगे। हनुमान जी के मंदिर में मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करने से उत्तम फल मिलते हैं। इसके अलावा मंगलवार का व्रत और सुंदरकाण्ड का पाठ भी उत्तम फल देता है। साढ़ेसाती की स्थिति अवस्था में यदि कष्टों का अनुभव हो, रुकावटें लगें तो निम्न प्रकार शनि के उपाय लाभदायक रहेंगे।

● शनिवार को सौंफ खिरेटी, लोध, खस, लोबान, काला तिल, गोंद इत्यादि। जल में डालकर औषधि स्नान करने से शनि का अशुभ प्रभाव कम होता है।

● शनि को पीपल वृक्ष के चारों ओर सात बार कच्चा सूत लपेटें। इस समय शनि के मंत्र जपते रहें। तत्पश्चात पीपल को दीपक दिखाकर पूजन करें।

● शनिवार का व्रत रखें तथा सूर्यास्त के बाद हनुमान जी का पूजन करके व्रत संपन्न करें। पूजन के समय काले तिल का तेल, इसी तेल का दीपक तथा लाल फूल का प्रयोग करें।

● प्रत्येक शनिवार वट वृक्ष और पीपल के पेड़ के नीचे सूर्योदय से पहले कड़वे तेल का दीपक जलाकर शुद्ध दूध तथा धूपादि अर्पित करें।

● काली गाय की सेवा से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। गाय के माथे पर रोली का तिलक लगाकर सीगों में मौली बांधनी चाहिए। तत्पश्चात परिक्रमा करके कम से कम बूंदी के चार लड्ïडू खिलायें।

● अरिष्ट की स्थिति में नीलम धारण करें। नीलम के विकल्प संगलिनी, संग जमुनिया अथवा बिच्छुत की जड़ है। काले घोड़े की नाल (जो सड़क पर छूट जाती है) अथवा नाव की सतह की कील से बना छल्ला पहनना चाहिए।

● शनिवार को काले, नीले रंग की चिड़िया दोनों हाथों से आकाश में उड़ा दें। तकलीफों, रुकावटों में कमी आयेगी।

● शनि पत्नी के अनेक नामों का नित्य पाठ करना चाहिए।

'ध्वनिजी धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिया। कंटकी-कलही चाथ तुरंगी महिषी अज।

शनेनामानि पत्नीना में तानि संजयन पुमान। दु:रकनि नाश यैन्नित्यं सौभाग्य मेधते सुखम।'

राशिगत उपाय

मेष राशि- स्वास्थ्य लाभ व रक्षार्थ महामृत्यंजय मंत्र की स्थापना कराना भी श्रेयस्कर है। रोगमुक्ति हेतु 7 मुखी रुद्राक्ष पहने तथा स्वास्थ्य वृद्धि के लिए मूंगा धारण करें।

वृष राशि- एक मुखी रुद्राक्ष रविवार को धारण करने से सूर्य शुभत्व मिलेगा।

मिथुन राशि- शनि यंत्र पूजा घर में स्थापित कर पूजा करें। शराब व नशीले पदार्थों का सेवन न करें।

कर्क राशि- गौरीशंकर रुद्राक्ष या 14 मुखी रुद्राक्ष स्वास्थ्य सुख बढ़ायेगा।

सिंह राशि- शनि मंत्र का पूजन करें। काले तिलों का दान करें। शनिवार व मंगलवार हनुमान जी के श्रद्धापूर्वक दर्शन करें।

कन्या राशि- शुद्ध गंगा जल से धोकर गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करें।

तुला राशि- पारद शिवलिंग परिवार का दर्शन व पूजन करें।

वृश्चिक राशि- आठ मुखी रुद्राक्ष राहु की अशुभता को दूर कर सकते हैं।

धनु राशि- शनि स्तोत्र का पाठ करें। अमावस्या को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों तेल का दीपक रखें।

मकर राशि- स्वास्थ्य हेतु भैरव उपासना एवं गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करे मंगल मंत्र की पूजा करें।

कुंभ राशि- शिव चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। रुद्राक्ष की माला धारण करें। प्रत्येक गुरुवार गणेश आराधना करें व गाय को गुड़ चना खिलायें।

मीन राशि- शनि मंत्र की पूजा करें व प्रत्येक गुरुवार को गाय को चने की दाल व रोटी खिलाएं लाभ मिलेगा। 

यह भी पढ़ें -पूजा में क्यों जलाते हैं दीया, क्या है इसका वैज्ञानिक कारण

 

 

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