कब तक? - गृहलक्ष्मी लघुकथा

ज्योत्स्ना कपिल

9th April 2021

उसकी सूनी नज़रें कोने में लगे जाले पर टिकी हुई थीं। तभी एक कीट उस जाले की ओर बढ़ता नज़र आया। वह ध्यान से उसे घूरे जा रही थी।

कब तक? - गृहलक्ष्मी लघुकथा

'अरे! यहाँ बैठी क्या कर रही हो? हॉस्पिटल नहीं जाना क्या?' पति ने टोका तो जैसे वह जाग पड़ी।

'सुनिए, मेरा जी चाहता है कि नौकरी छोड़ दूँ। बचपन से काम कर-कर के थक गई हूँ। शरीर टूट चला है। साथी डॉक्टरों की फ्लर्ट करने की कोशिश, मरीज और उनके तीमारदारों की भूखी निगाह, तो कभी हेय दृष्टि, अब बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया है।' आशिमा ने याचना भरी दृष्टि से पति को ताका।

'पागल हो गई हो क्या? बढ़ते बच्चों के पढ़ाई के खर्चे, फ्लैट और गाड़ी की किस्तें। ये सब कैसे पूरे होंगे?'

'मुझे बहुत बुरा लगता है जब डबल मीनिंग वाले मजाक करते हैं ये लोग। इन सबकी भूखी नज़रें जब अपने शरीर पर जमी देखती हूँ तो घिन आती है।'

'हद है आशिमा, अच्छी भली सरकारी नौकरी है। जिला अस्पताल में स्टाफ नर्स हो। अभी कितने साल बाकी हैं नौकरी को। तुम्हारे दिमाग में ये फ़ितूर आया कहाँ से? थोड़ा बर्दाश्त करना भी सीखो।' झिड़कते स्वर में पति ने जवाब दिया।

'चलो उठो, आज मैं तुम्हे ड्रॉप करके आता हूँ।' उन्होंने गाड़ी की चाभी उठाते हुए कहा। आशिमा की निगाह जाले की ओर गई तो देखा वह कीट जाले में फंसा फड़फड़ा रहा है और खूंखार दृष्टि जमाए एक मकड़ी उसकी ओर बढ़ रही है।

'नहीं' वह हौले से बुदबुदाई, फिर उसने आहिस्ता से जाला साफ करने वाला उठाया और उस जाले का अस्तित्व समाप्त कर दिया।

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