उम्मीद की एक नई सुबह - गृहलक्ष्मी कहानियां

सुजीत सिन्हा

13th April 2021

मुझे एहसास हुआ कि मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई है। मैंने अंजलि को अनब्लॉक किया और मैसेज कर बात करने की कोशिश की। पर कोई रेस्पॉन्स न पा कर उसे फोन करने की हिम्मत नहीं हुई। मैं समझ गया कि देर हो चुकी है। मैं माथा पकड़ कर बैठ गया। मेरी उम्मीद का सूरज डूब चुका था।

उम्मीद की एक नई सुबह - गृहलक्ष्मी कहानियां

'सरजी, मैंने कुछ लड़कियों की तस्वीरें व्हाट्सएप कर दी है। पसंद कर बता देना। शाम में आपकी पसंद की लड़की मिल जाएगी। दूसरी ओर मोबाइल पर जसबीर था।

ऑफिस के काम को निपटा कर मैंने अपना व्हाट्सएप चेक किया। जसबीर के द्वारा भेजे गए फोटो में से एक फोटो पसंद की और जसबीर को वापस फॉरवर्ड कर दिया।

'ओके! शाम में मिलते हैं,' जसबीर का रिप्लाई स्क्रीन पर चमक रहा था।

सप्ताह के अंतिम दिन ऑफिस में काम का दबाव कुछ ज्यादा ही होता है। मुझ पर दिन भर की थकान तारी थी। मैं कुरसी पर पीछे सिर को टिका कर पावर नैप लेने की कोशिश कर रहा था। आज जबकि मुझे किसी नई लड़की के साथ रात गुजारना था, मुझे फिर अंजलि की बेइंतहा याद आ रही थी।

'हैलो सर, गुड मोॄनग,' अंजलि ने अपनी खनकती आवाज में विश किया तो मैं उसके दिलकश अदा पर मुग्ध हो गया। मैंने उसे बैठने का इशारा किया और इंटरकोम पर दो कप कॉफी का ऑर्डर दिया।

'थैंक यू सर फोर कॉफी।'

'किस बात की थैंक यू, दो कप कॉफी तो खुद के लिए मंगाई है,' मैंने कहा तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी।

अंजलि के ऑफिस जॉइन करने के कुछ ही दिनों के बाद मैं सुबह की कॉफी अंजलि के साथ पीने लगा था। मेरे सहकर्मियो के लिए यह बिलकुल अनोखी बात थी। इसका कारण मेरा रिजर्व स्वभाव था। ऑफिस में मुझे सख्त मैनेजर माना जाता था। खासकर इंटर्नशिप करने वालों के साथ सख्ती से पेश आना मेरे प्रोफाइल की डिमांड थी।

अंजलि कंप्यूटर साइंस में एमटेक थी। उसका 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर इंटर्नशिप के लिए कैम्पस सेलेक्शन हुआ था। अंजलि मेरे टीम में इंटर्न थी। अंजलि का कॉन्फिडेंस लेवल अलग लेवल का था। वह जल्द से जल्द सब कुछ सीख लेना चाहती थी। अंजलि जितनी इंटेलिजेंट थी उतनी ही खूबसूरत भी। लंबी, गोरी, छरहरी काया, बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें और खनकती आवाज वाली अंजलि बेहद आकर्षक थी।

अंजलि की ओर मैं आकॢषत हो रहा था। यह आग उधर भी लगी थी। वह भी मुझे पसंद करने लगी थी। पहले इशारों और फिर कॉफी से शुरू हुआ रिश्ता जल्दी ही रोमांस में तब्दील हो गया। अंजलि के लिए अब मैं केवल 'राजेश' था। वह मुझ से उम्र में छोटी थी। पर उम्र का यह अंतर रिश्ते में आड़े नहीं आया। हम बाहर मिलने लगे। प्रेम में पड़कर पता चला कि दिल्ली कितनी रोमांटिक है।

इस तरह 6 महीने गुजर गए। अंजलि की इंटर्नशिप खत्म होने वाली थी। उसे मेरी ही कंपनी में जॉब का ऑफर था। रिलेशन में रह कर एक ऑफिस में काम करना दोनों के करियर को नुकसान पहुंचा सकता था। मैंने एक दूसरी कंपनी में उसकी सिफारिश कर दी। अंजलि टैलेंटेड तो थी ही, उसे अच्छे पैकेज पर जॉब मिल गई। अंजलि का नया ऑफिस मेरे ऑफिस के पास में ही था। हमलोग अब पहले की तरह मिल नहीं पाते थे। नई नौकरी, नए ऑफिस में खुद को सेट करने के लिए अंजलि खूब मेहनत करती थी। मैं उसकी व्यस्तता को समझता था और हमेशा उसका हौसला बढ़ाता रहता था।

1 साल और गुजर गए। साल भर में ही अंजलि ने प्रतिभा और मेहनत के बल पर अपनी खास पहचान बना ली थी। अब मैं शादी कर सैटल्ड हो जाना चाहता था। जबकि अंजलि का अभी ऐसा कोई प्लान नहीं था। वह अभी अपने करियर पर फोकस रहना चाहती थी। उसकी आंखों में अनगिनत सपने झिलमिला रहे थे।

एक दिन मैंने अंजलि से कहा, 'अंजलि, हम कब तक इस तरह मिलते रहेंगे, क्यों न इस रिश्ते को अब मुकम्मल किया जाए?'

राजेश, अभी तो मैंने अपने करियर की शुरुआत की है। थोड़ा ठहर कर शादी कर लेंगे न,' मेरी आंखों में झांकते हुए अंजलि ने कहा तो मैं मान गया कि वह बिलकुल सही कह रही है।

इस तरह 1 साल और गुजर गए। अंजलि का प्रोमोशन भी हो गया। अंजलि अपने काम में काफी व्यस्त हो गई थी। उसका इस तरह से व्यस्त हो जाना और मुझे समय न दे पाना, मुझे खलने लगा था। 'कहीं अंजलि किसी और के साथ सेट तो नहीं हो गई। 2 साल में उसने जितना ग्रोथ लिया है, क्या बिना किसी सेटिंग के पौसिबल है? इंटर्नशिप के दौरान वह मुझ से क्लोज हुई थी और मैंने जॉब के लिए उसकी सिफारिश की थी। क्या गारंटी है कि अपने ग्रोथ के लिए वह किसी और पर डोरे न डाल रही हो। कॉर्पोरेट में यह गेम तो चलता रहता है,' मेरे मन में शक के कीड़े कुलबुलाने लगे थे।

शक मेरे मन में गहराता जा रहा था। अंजलि को जब भी फोन करता, वह अकसर फोन रिसीव नहीं करती। कॉलबैक भी देर से करती। बेचैनी के आलम में एक दिन ऑफिस में बैठे-बैठे मैंने सोचा कि चल कर अंजलि से उसके ऑफिस में मिल लिया जाए। मैंने कार स्टार्ट की और उसके ऑफिस पहुंच गया। पाॄकग में जब मैं कार पार्क कर रहा था तो मुझे अंजलि की हंसी की आवाज सुनाई दी। मुड़कर देखा तो अंजलि अपने मैनेजर के साथ बतियाती हुई उसकी कार में बैठ रही थी। यह दृश्य देख कर मेरा दिल धक से रह गया। मैंने उसे टोका नहीं और बुझे मन से वापस आ गया। मेरा शक अब यकीन में बदल गया था।

'क्या अंजलि भी...अपने मैनेजर के साथ...नहीं, नहीं, अंजलि ऐसी नहीं है। वह इंटेलिजेंट है, कम्युनिकेटिव है, सोशल है, करियर ओरिएंटेड है। काम के सिलसिले में कहीं जा रही होगी,' मैंने अपने आपको समझाया।

काफी सोच विचार कर मैंने निर्णय लिया कि अंजलि से इस विषय पर खुल कर बात कर ली जाए। मैं अपने ख्यालों में डूबा हुआ ही था कि अंजलि का फोन आ गया।

'राजेश आज डिनर पर मिलते हैं न, बहुत दिन हो गए हम दोनों ने साथ डिनर नहीं किया है।'

'ओके।'

फिर थोड़ी देर इधर-उधर की बात होती रही। अंजलि रोमांटिक मूड में थी। पर मेरा मूड सही नहीं था। 'मम्मी का फोन आ रहा है' का बहाना कर मैंने फोन रख दिया।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मुझे क्या हो रहा है। अंजलि पर विश्वास हो रहा था और नहीं भी हो रहा था। कभी वह मुझे भोली लगती तो कभी चालाक, इसी उहापोह में कब आंख लगी पता ही नहीं चला।

अगली शाम हम अपने पसंदीदा रेस्टोरेंट में थे। अंजलि आज कुछ ज्यादा ही चहक रही थी। और बार-बार मेरी हथेली को दबा रही थी गोया अपनी खुशी को संभाल न पा रही हो।

'क्या बात है अंजलि? कुछ स्पेशल? खूब चमक रही हो?'

'हां, एक सरप्राइज है।'

'क्या?' मैं अधीर हो रहा था।

'मैं 6 महीने के लिए लंदन जा रही हूं। एक ऑनसाइट् प्रोजेक्ट के सिलसिले में। मैंने तुम्हें अब तक जानबूझ कर नहीं बताया था। सोचा कि जब सारी फॉर्मेलिटी पूरी हो जाएगी तो सरप्राइज दूंगी। राजेश, मेरे लिए यह सपना सच होने जैसा है। सच कहूं, राजेश यह उपलब्धि सिर्फ मेरी नहीं, हमारी है। तुमने मुझे काम के गुर सिखाए, जब-जब मैं निराश हुई तुमने मेरा हौसला बढ़ाया...' अंजलि भावविभोर बोले जा रही थी।

अंजलि खुश थी पर मैं खुश नहीं हो पा रहा था। मैं यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि मुझ से बिना परामर्श किए अंजलि ने लंदन जाने का फैसला ले लिया, वह भी 6 महीने के लिए। अचानक मैं पूछ बैठा, 'अकेली जा रही हो?'

'नहीं, निखिल भी जा रहे हैं, मेरे मैनेजर,' अंजलि सहजता से बोली।

निखिल का नाम सुन कर मैं जलभुन गया। अब मुझे कोई शक नहीं रह गया था। मेरे चेहरे के चढ़ते उतरते भाव को अंंजलि भांप गई। उसका दमकता चेहरा बुझ गया।

'तुम्हें मेरा लंदन जाना अच्छा नहीं लग रहा है न?' अंजलि ने उदास स्वर में पूछा।

'नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। इन्फेक्ट मैं बहुत खुश हूं। पर...' मैंने हकलाते हुए बोला।

'पर क्या राजेश?'

'तुम यहां भी अच्छा काम कर रही हो। सब कुछ ठीक ही चल रहा है...और फिर निखिल के साथ ही क्यों अंजलि?'

मेरे प्रश्न से अंजलि स्तब्ध रह गई। वह समझ गई कि निखिल और उसे लेकर मेरे मन में कुछ चल रहा है। 'राजेश तुम समझ रहे हो न यह प्रोजेक्ट मेरे करियर में माइल स्टोन साबित होगा। फाइनेंसियल बेनिफिट तो है ही। रही निखिल की बात तो वह मेरे मैनेजर हैं, मुझे उनके साथ ही तो ऑनसाइट वर्क करना है,' अंजलि ने समझाने की कोशिश की।

'अंजलि, मुझे भी पता है कि कॉर्पोरेट में फॉरेन ट्रिप के नाम पर क्या होता है। मुझे अब शक ही नहीं विश्वास भी हो गया है कि तुम अपने मैनेजर को उसी तरह यूज कर रही हो जैसा मेरा किया था,' मैं गुस्से में तमतमाते हुए बोले जा रहा था। मुझे यह भी ध्यान नहीं रहा कि हम एक पब्लिक प्लेस में थे।

अंजलि को मुझ से ऐसी उम्मीद नहीं थी। वह खुद को अपमानित महसूस कर रही थी। फिर भी उसने समझाने की कोशिश की पर मैं समझने के लिए तैयार नहीं था। अंजलि रोते हुए रेस्टॉरेंट से निकल गई।

उस दिन मैंने पहली बार बेहिसाब शराब पी। लड़खड़ाते हुए किसी तरह कार चला कर अपने फ्लैट पर पहुंचा ही था कि अंजलि का एक लंबा व्हाट््सएप्प मैसेज आया, 'राजेश, मैं तुम्हें बेहद प्यार करती रही हूं, पर अब ऐसा संभव नहीं है। इंटर्नशिप के दौरान जिस तरह से तुमने मेरी मदद की थी, करियर को लेकर आत्मविश्वास भरा था, मुझे लगता था कि तुम उन चंद लोगों में से हो जो स्त्रियों के स्वतंत्र अस्तित्व के पक्षधर हैं। तुम्हारा विनम्र और पारिवारिक होना मुझे भा गया था। मैं खूब मेहनत करती रही। ताकि खुद को प्रूव कर सकूं। याद है न राजेश, मैंने तुम्हें बताया था कि मैं अपने गांव की पहली लड़की हूं जो पढ़ने के लिए बाहर निकली। मेरी मां ने मुझे बाहर भेजने के लिए पूरे परिवार से लड़ाई लड़ी थी। मुझ पर एक जिम्मेवारी रही है कि मैं अपने परिवार और गांव वालों को दिखा सकूं कि लड़कियां भी सब कुछ कर सकती हैं। समय तेजी से बदल रहा है। हमें उस बदलाव के साथ चलना है। रही निखिल की बात तो मैंने कई बार कहा है कि वे मेरे बॉस हैं, बस बॉस। किसी के साथ किसी ट्रिप पर जाने का मतलब यह नहीं कि मैं उसकी बाहों में सो रही हूं। और हां, सबसे इम्पोर्टंेट एक और बात, मुझे किसकी बाहों में सोना है या नहीं सोना है, यह केवल मेरा फैसला है। मैं ऐसे किसी व्यक्ति के साथ पूरी जिंदगी नहीं गुजार सकती जिसे मेरे चरित्र पर शक हो।'

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। गुस्से में आ कर उसे व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर सब जगह ब्लॉक कर दिया। मैं डिप्रेशन में था। समझ नहीं आ रहा था कि खुद को कैसे संभालू। अंजलि लंदन जा चुकी थी। मैं उसके और निखिल के बारे में सोच-सोच कर पागल हो रहा था।

निराशा के उस दौर में मेरा साथी बना जसबीर। जसबीर मेरा मुंहलगा जूनियर था। एक दिन मुझे परेशान देख कर उसने कुरेदने की कोशिश की तो मैंने उसे पूरी कहानी सुना दी। मेरी कहानी सुन कर जसबीर ने कहा, 'सर, आपके मर्ज की दवा है लड़की। हर वीक नई लड़की के साथ रात गुजारिए देखिए कैसे आपका डिप्रेशन छूमंतर हो जाता है।'

मैंने उसे लड़की इंतजाम करने को कहा और हिदायत दी कि इस बात का पता किसी को भी न चले। जसबीर का अपना लिंक था। वह मेरे लिए हर वीकेंड पर लड़की अरेंज करने लगा। हर वीकेंड जसबीर मुझे कुछ लड़कियों की फोटो व्हाट्सएप करता, मैं कोई एक लड़की सेलेक्ट करता और वह उस लड़की को शाम में मेरे फ्लैट् पर पहुंचा जाता था।

मुझे किसी भी लड़की के साथ सेक्स करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। मैं उन लड़कियों से पूरी रात बात करता। उसे अंजलि की बेवफाई की कहानी सुनाता, उसकी सहानुभूति पाने की कोशिश करता। कुछ लड़कियां ध्यान से सुनती थीं, सहानुभूति प्रकट करती थी। कुछ झिड़क देती थीं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था। बस आदत सी हो गई थी इन लड़कियों की...

'साहब जी, सारे लोग जा चुके हैं। आपको अभी रुकना है क्या?' ऑफिस बॉय के टोकने से मेरी तंद्रा भंग हुई। घड़ी पर नजर डाली तो शाम के 7 बज चुके थे। यह याद आते कि जसबीर आने वाला ही होगा, मैं ऑफिस से पाॄकग की ओर भागा।

उस शाम जो लड़की आई। वह कमसिन थी। 20 साल से ज्यादा की उम्र नहीं रही होगी उसकी। 'क्या नाम है और पढ़ाई वढ़ाई की हो या नही? मैंने आदतन पूछा।

'इससे क्या फर्क पड़ता है। आप नाम पूछोगे। मैं गलत नाम बताऊंगी। सुबह आप मुझे भूल जाएंगे और मैं आपको।'

उसका जवाब सुन कर मुझे कुछ कहते नहीं बना। अलबत्ता मैंने भांप लिया कि यह लड़की औरों से अलग है। मुझे चुप देख कर वह बोली, 'मेरा नाम माधवी है। दिल्ली यूनिवॢसटी से इसी साल इंग्लिश ऑनर्स की है।'

मुझे हैरानी हो रही थी कि इतनी कम उम्र में दिल्ली यूनिवॢसटी से पढ़ी लिखी लड़की इस धंधे में कैसे आ गई। मेरा अनुभव था कि कुछ लड़कियां मजे करने तो कुछ खूब पैसा कमाने की हसरत से भी इस धंधे मेें आती हैं। कम पढ़ी लिखी आॢथक रूप से कमजोर लड़कियां मजबूरी में इस धंधे में आती हैं। थोड़ी बातचीत के बाद माधवी मेरे साथ सहज हो गई और खुल कर बात कर रही थी। माधवी की बातों से मैं समझ गया कि उसकी अपनी कुछ मजबूरियां हैं।

'माधवी, तुम अच्छी पढ़ी लिखी हो। तुम्हारा कम्युनिकेशन स्किल अच्छा है। तुम किसी जॉब के लिए क्यों नहीं ट्राय करती। यह धंधा एक अंधा कुआं है, जहां भय और बदनामी के सिवाय कुछ नहीं मिलता।Ó मैंने उसे समझाने की कोशिश की।

'साहब, मुझे शीघ्र पैसे की जरूरत थी। कोई जॉब मुझे मिल नहीं रही थी। मेरी एक सहेली ने मुझे इस काम के लिए तैयार किया। अब मुझे बुरा नहीं लगता।

माधवी ने बताया कि उसके पिता का देहांत हो चुका था। मां बीमार रहती थी और भाई पियक्कड़ था। माधवी की एक छोटी बहन थी, जो ग्यारहवीं में पढ़ती थी। ब्राइट् स्टूडेंट होने के बावजूद माधवी की पारिवारिक स्थिति ने उसे इस धंधे में उतरने के लिए विवश किया।

मैंने मन ही मन हिसाब लगाया कि इन 3 महीनों में लगभग 1.5 लाख रुपये मैंने लड़कियों पर खर्च किए थे। जबकि महज कुछ पैसों के लिए माधवी जैसी लड़की की ङ्क्षजदगी खराब हो रही है।

मैंने देखा कि माधवी अपने कपड़े उतार रही थी। मैंने इशारे से उसे कपड़े उतारने से मना किया और बोला, 'माधवी इज्जत से कमाई गई 2 रोटी भी सुकून देती है। अगर तुम जॉब करना चाहो तो मैं तुम्हें जॉब दिला सकता हूं और तुम्हारी मां के इलाज में मदद कर सकता हूं । बोलो मंजूर है, तुम्हें मेरा ऑफर?'

'साहब, बेड पर पहले भी कई लोग मुझे ताजमहल खरीद कर देने का वादा कर चुके हैं,' माधवी ने तंज किया।

माधवी के तंज से मैं तिलमिला उठा। पर उसकी बातों में सचाई थी। उसके कटाक्ष को अनसुना करते हुए मैंने उसे अपना विजिटिंग कार्ड दिया और कहा कि एक बार विश्वास कर वह अपनी किस्मत आजमा ले। अगर वह जॉब करना चाहती है तो अगले सोमवार को इंटरव्यू के लिए उसके ऑफिस आ जाए।

मुझे अपने लिए एक असिस्टेंट की जरूरत थी। इसके लिए ऑफिस में वाक-इन-इंटरव्यू चल रहा था। उम्मीद के विपरीत माधवी समय पर इंटरव्यू के लिए आई। इंटरव्यू के दौरान मैंने पाया कि जितना मैंने सोचा था वह उससे कहीं ज्यादा योग्य थी। उसका सेलेक्शन हो गया।

'थैंक यू सर, आपने मेरी जिंदगी बदल दी। मैं आपका एहसान कभी नहीं भूलूंगी। आपने मुझे उन आंधी गलियों से बाहर निकाल कर इज्जत की रौशनी दी है।'

मुझे भी संतुष्टि महसूस हो रही थी। उस दिन महीनों बाद मैं प्रफुल्लित था।

माधवी मन लगा कर काम करने लगी। मां के इलाज के लिए मैंने माधवी को कुछ रुपये उधार दिए। उसने प्रॉमिस किया कि वह धीरे-धीरे रुपया लौटा देगी। माधवी के ऑफिस जॉइन करने का मुझ पर यह फर्क पड़ा कि किसी अंत: प्रेरणा से मैंने लड़की मंगवाना बंद कर दिया था।

माधवी को भी उड़ान भरने को आकाश मिल गया था। उसके कई सपने थे जो अब वह पूरा करना चाहती थी। उसने एमबीए (फाइनेंस) में कोरेस्पोंडेंट से एडमिशन ले लिया था।

मेरी लाइफ ठीकठाक चल रही थी। बस दिल में एक हूक उठती थी तो अंजलि को ले कर। मैं अंजलि को भूल नहीं पाया था। 6 महीने बीत गए थे। अंजलि लंदन से आ चुकी होगी। उसके करियर को हाइप भी मिल चुका होगा। क्या पता निखिल के साथ शादी का प्लान भी कर चुकी हो,' अंजलि को ले कर मेरे मन में तरह-तरह के ख्याल आते थे। माधवी मुझे निराश देख दु:खी हो जाती थी। उसे अंजलि के साथ मेरे अफेयर और उसके खत्म हो जाने के बारे में किसी ने बता दिया था।

मुझे परेशान देख कर एक दिन उसने पूछा, 'सर अगर आप कहें तो मैं कुछ कहूं?'

'तुम मुझे कुछ भी कहने के लिए फ्री हो माधवी।'

'सर, सच कहूं तो गलती आपकी थी। आपने अंजलि मैम पर शक किया। उनकी सफलता ने कहीं न कहीं आपको इनसिक्योर किया था। उसी कुंठा में आपने मैम का अपमान किया। आपने उन्हें हर जगह से ब्लॉॅक किया, जबकि होना यह चाहिए था कि अपनी गलती मान कर रिश्ते को सुधारने की पहल आपको करनी चाहिए थी।'

माधवी की बात सुन कर मैं सन्न रह गया। माधवी ने मुझे सचाई का आईना दिखा दिया। यह सच था कि अपनी कुंठा छुपाने के लिए मैंने अंजलि पर दोषारोपण किए। मैं खुद कई बार महिला सहकर्मियों के साथ ट्रिप पर जा चुका था। फिर भी अंजलि का जाना मुझे बुरा लगा था।

अंजलि को भुलाने के लिए मैंने खुद को काम में झोंक दिया। मुझे दुनिया या खुद की कोई सुधबुध नहीं रह गई थी। माधवी भी आजकल छुट्टी पर रहने लगी थी। मैंने कभी नहीं पूछा कि उसे इतनी छुट्टी क्यों चाहिए।

एक रविवार माधवी ने मुझे लंच के लिए अपने घर बुलाया। मैं जाना नहीं चाहता था। माधवी के बार-बार के आग्रह पर मैंने हां कह दिया। दोपहर में जब माधवी के घर पहुंचा तो वहां अंजलि को देख कर मैं हैरान हो गया।

'अंजलि तुम यहां...' मैं कभी माधवी का मुंह देख रहा था तो कभी अंजलि का।

मुझे लग रहा था कि मैं कोई सपना देख रहा हूं। मैं धम से वहीं सोफे पर धंस गया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या चल रहा है।

'सर, आपके पश्चाताप और मैम के लिए प्यार को देख कर मैंने मैम से बात करने की ठानी। मैंने पहले उन्हें फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा। मैसेंजर पर थोड़ी बहुत बात हुई तो मैंने उनसे मिलने का समय मांगा। एक महिला एम्प्लोयी को हेल्प करने के उद्देश्य से इन्होंने मिलने का समय दे दिया। कुछ ही दिनों में मैंने मैम का भरोसा जीत लिया। मैं किसी न किसी बहाने उनसे मिलती रही। मैंने यह महसूस किया कि मैम भी आपको भूल नहीं पाई थी। हालांकि आपके व्यवहार से उनका दिल बुरी तरह टूटा था। उन्हें आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। उन्हें लगा था कि जब आपको अपनी गलती का एहसास होगा तो आप लौट कर आएंगे। पर आपने तो उन्हें सब जगह से ब्लॉक कर संवाद के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ा था। मैंने मैम को बताया कि आप अपने किए पर शॄमदा हैं और उन्हें भूल नहीं पा रहे रहे हैं। फिर मैंने यह योजना बनाई और एक जगह आप दोनों को ले आई।

'एक मुलाकात के लिए मैंने आप दोनों को यहां बुलाया। नाउम्मीदगी की काली रात कितनी लंबी और स्याह क्यों न हो, हमें सुबह होने की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए,' माधवी की आंखों में उम्मीद का सागर लहरा रहा था।

'मुझे माफ कर दो अंजलि। मैं ऐसा नहीं हूं। मैं बहक गया था...,' मैं फूट-फूट कर रोने लगा।

अंजलि ने मुझे अपनी बाहों में भींच लिया। मेरी नाउम्मीदगी की रात ढल चुकी थी और उम्मीद की एक नई सुबह मेरा इंतजार कर रही थी।

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