शांति की तलाश-श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार

मोनिका अग्रवाल

18th April 2021

सच मायने में धर्म वह है जो इंसान को इंसान से,आत्मा को परमात्मा से प्रेम करें और सभी को एक रखे.

शांति की तलाश-श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार

शांति की तलाश-श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार

भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में युद्ध और धर्म क्षेत्र के बीच अर्जुन को जो गीता का उपदेश दिया,वह ईश्वरीय ज्ञान है क्योंकि सांसारिक दुखों में भटके अर्जुन को विराट स्वरूप देखकर उन्होंने विश्व कल्याण की बात समझाई थी. महाभारत युद्ध के पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को माध्यम बनाकर पूरे विश्व को जो संदेश दिया,वह ज्ञान का भी सागर है.भगवान के संदेशों को गीता में पिरोया गया है.भगवान ने अपने चरित्र व उपदेश से जगत को प्रेम का जो संदेश दिया है वह अनंत है.सच मायने में धर्म वह है जो इंसान को इंसान से,आत्मा को परमात्मा से प्रेम करें और सभी को एक रखे. 

भगवान कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य का अधिकार कर्म करने में ही है.उसके फल में नहीं.अतः तू फल की इच्छा किए बिना कर्म किए जा.तेरी कर्म न करने में ही आसक्ति न हो.जीवन में समर्पण भाव ज़रूरी है.अशक्ती नहीं होनी चाहिए.इस पाठ से जीवन में सकारात्मक भाव जागृत होते हैं.

इसका अर्थ है मनुष्य को भविष्य की इच्छा किए बिना वर्तमान में रहते हुए अपने काम पर ध्यान देना चाहिए.यदि हम वर्तमान में मेहनत और लगन से काम करेंगे तो भविष्य में उसका फल अवश्य मिलेगा.

श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार भगवान कृष्ण ने गीता में दूसरा महत्वपूर्ण उपदेश दिया है कि गलती से बचने के लिए ,कोई अतिविशिष्ट काम करने पर हमें अति हर्षित होने से बचना चाहिए.इसी के साथ किसी से द्वेष भाव नहीं रखना चाहिए.श्रीमद् गीता में भगवान ने भक्ति योग प्रसंग में भक्ति के लक्षण बताए हैं इसमें करुणा,दया,विनम्रता,अहिंसा समेत ३२ लक्षण शामिल हैं.इनमें से किसी एक को भी अपने व्यावहारिक जीवन में उतारकर जीवन को सफल बनाया जा सकता है.

गीता का तीसरा उपदेश है हर मनुष्य के लिए इस धरती पर कोई न कोई कर्म नियत है,और वो उसे करने के लिए बाध्य भी है.प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से विशिष्ट भी है,ज़रूरत है उसे ख़ुद को पहचानने की.

गीता का चौथा उपदेश है कि ऐसा व्यक्ति जो अपनी इंद्रियों पर केवल ऊपर से नियंत्रण करने का दिखावा करता है,और अंदर से उसका मन चलायमान है,ऐसा व्यक्ति झूठ और कपटी कहलाता है और उसे कभी भी शांति नहीं मिल सकती.

पाँचवाँ उपदेश है ईश्वर को सच्चे मन से स्वीकार.जो व्यक्ति ईश्वर की शक्ति को सच्चे मन से स्वीकार करता है और परमात्मा में पूरी आस्था रखता है भगवान उसका बुरा कभी नहीं करते.

पन्द्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने प्राणियों में समानता की शिक्षा दी है.कृष्ण कहते हैं -इस संसार में सारे जीव मेरे अंश है .वे छः इंद्रियों से घोर संघर्ष कर रहे हैं,जिसमें मन सम्मिलित है.भगवान स्पष्ट करते हैं,विनम्र पुरुष अपने ज्ञान के कारण सभी को समान दृष्टि से देखता है.अर्थात जब आप किसी भूखे की भूख मिटाते हैं तो भगवान की भूख मिटाते हैं.प्रत्येक प्राणी में ईश्वर है,फिर भेदभाव कैसा? किसी भी जीव को प्रताड़ित करना,यानी ईश्वर को कष्ट पहुँचाना है.स्पष्ट है हमारे सांसारिक संबंध कैसे भी हों,पर हमारे व्यवहार में समानता का भाव होना चाहिए.

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