मौत को हराकर पाई है ये जि़ंदादिली- लक्ष्मी

दामिनी यादव

3rd May 2021

लक्ष्मी अग्रवाल एक दिलेर एसिड अटैक सरवाइवर होने के अलावा खूबसूरती की एक नई पहचान हैं। एसिड से झुलसे इसी चेहरे के साथ आज वे कई फैशन और ज्वैलरी हाउसेज़ की ब्रांड एंबेसेडर हैं। मिशेल ओबामा के निमंत्रण पर व्हाइट हाउस में पुरस्कृत होने, आमिर खान के शो 'सत्यमेव जयते' में भाग लेने के साथ ही वे अपनी मुहिम 'स्टॉप सेल एसिड' को आगे बढ़ाने में लगी हैं। इस जांबाज़ लड़की की कहानी जल्दी ही फिल्मी पर्दे पर भी नज़र आने जा रही है। पेश है, उनसे हुए खास बातचीत के कुछ अंश-

मौत को हराकर पाई है ये जि़ंदादिली- लक्ष्मी

अपकमिंग फिल्म 'छपाक' में दीपिका पादुकोण

आपकी जि़ंदगी को पर्दे पर जीने जा रही हैं। इस $खबर पर आपका पहला रियेक्शन क्या रहा? खुशी है मुझे इस बात की कि ये फिल्म आ रही है। जब ये फिल्म आएगी तो सोसायटी में इस बात को लेकर अवेयरनेस और बढ़ेगी। दूसरी बात, जब कोई सिलेब्रिटी किसी कॉज़ को रिप्रेज़ेंट करते हैं तो उसका इम्पैक्ट भी और ज़्यादा हो जाता है। जब दीपिका का इस फिल्म में फर्स्ट लुक आया था तो बहुत सारे मेकअप आर्टिस्ट, जिनका नॉर्मल फेस है, उन्होंने दीपिका के लुक की ही तरह मेकअप करके अपना फोटो सोशल मीडिया पर शेयर किया था। इससे ये बात और मज़बूत हुई कि दीपिका के इस कॉज़ में उतरने से लोगों ने इस बात की अहमियत समझी कि सिर्फ़ चेहरा ही इंपोर्टंट नहीं है, बल्कि किसी इंसान की शख्सयत के बहुत सारे दूसरे पहलू मिलकर उसे खूबसूरत बनाते हैं।

दुनिया लक्ष्मी को अब तक एक एसिड अटैक सरवाइवर के तौर पर ही पहचानती रही है। क्या आपको लगता है कि आपकी शख्सयत के कई दूसरे अहम पहलू इस पहचान के पीछे छिप गए हैं?

नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है। जो लक्ष्मी मैं घर से बाहर हूं, वही लक्ष्मी मैं घर के अंदर भी हूं। मैंने हमेशा दुनिया को वही दिखाया है, जो मैं असल में हूं। लक्ष्मी एक ऐसी लड़की है, जो खुलकर जीना जानती है, अपनी हर बात को खुलकर रखना जानती है। मैंने अपने-आपको ढककर कभी नहीं रखा, चाहे वह चेहरा हो, चाहे वह मन हो। हमेशा खुलकर बाहर आई हूं। कई बार दूर से लोगों ने सिर्फ़ मेरे एसिड अटैक से जले चेहरे को ही याद रखा, लेकिन मैंने अपने कामों से अपने दूसरे पहलू भी सामने लाने की कोशिश की कि मैं भी एक आम लड़की की तरह ही हूं। हंसना-बोलना, ढेर सारी बातें करना, डांस करना, गाना, ये सब मुझे भी $खूब पसंद है। हमें ये समझना चाहिए कि खूबसूरती के मामले में हमें अपनी धारणा बदलनी होगी।

आज आप अपने साथ हुए उस हादसे को कैसे याद करती हैं?

देखिए, दुख तो होता है। एक नॉर्मल लाइफ जीना और ऐसे हादसे के बाद दोबारा जीना शुरू करना आसान नहीं होता। हमारे यहां तो आम बात है कि अगर ये पता चल जाए कि कोख में लड़की है तो उसे भ्रूण हत्या के रूप में वहीं खत्म कर दो। अगर मैं एक आम सोच की बात करूं तो लड़की के पैदा होते ही पहली चिंता उसकी एक इंसान के रूप में परवरिश करने की नहीं, बल्कि उसकी शादी करने के लिए दहेज़ इकट्ठा करना शुरू कर देने की होती है। लड़की के लिए सोसायटी में नेगेटिव सोच की भरमार है। आज मैं अपने स्ट्रगल से यहां तक पहुंची हूं तो सोसायटी में मेरी पहचान है, इज़्ज़त है, लेकिन हज़ारों मेरे जैसी लड़कियों का सच यही है कि उन्हें एक विक्टिम की तरह ट्रीट किया जाता है। अपनी सोच से मान लिया जाता है कि इसी ने कुछ किया होगा, जबकि सच ये है कि एक लड़की का कुछ न करना भी उसी का अपराध होता है। मैंने भी तो अपनी उम्र से दोगुनी उम्र के आदमी के प्रपोज़ल को 'न' ही कहा था। तब क्या दोष था मेरा। इसी हादसे की वजह से मेरे पापा और भाई चले गए, वे इस दुनिया में नहीं रहे। मेरी पढ़ाई छूटी। कुछ करने का मेरा सपना टूटा। जि़ंदगी की दिशा ही ऐसी बदली कि हर रोज़ कुछ टूटा मेरे अंदर। बहुत कुछ खत्म हुआ। हां, मैं लकी हूं कि मेरे पेरेंट्स इतने मज़बूत और पॉजि़टिव थे कि वे इस हादसे के बाद मेरे साथ हर कदम पर रहे और मुझे दोबारा हिम्मत मिली। मेरी मां के लिए सोचिए, उनकी बेटी का चेहरा चला गया। उनके पति की डेथ हो गई, उनके बेटे की डेथ हो गई, कितने ही अपनों ने उनका साथ छोड़ा, इसलिए मैं अपने से ज़्यादा अपने पेरेंट्स को सरवाइवर मानती हूं, क्योंकि उन्होंने मुझसे ज़्यादा सरवाइव किया अपनी लाइफ में। उन्होंने मुझे एक नहीं, दो बार जन्म भी दिया और जि़ंदगी भी। मेरे साथ तो हुआ ये एक बड़ा हादसा है, लेकिन सैंकड़ों लड़कियों के साथ आए दिन छेड़खानी, बलात्कार जैसी कितनी ही घटनाएं होती हैं, जिसे किसी को बताना तो दूर, वे लड़कियां अपने-आप तक से छिपाती हैं उम्र भर। लोग सच सुनने से ज़्यादा, अपनी कल्पना की कहानियां गढ़ना पसंद करते हैं। इस सोच को बदलना बहुत ज़रूरी भी है और मुश्किल भी। 

लक्ष्मी, आपने हमारे समाज की कई चुनौतियों को अपनी हिम्मत से बदलकर रख दिया है। जैसाकि लोगों की धारणा बाहरी $खूबसूरती को लेकर होती है, लेकिन आपने एसिड से झुलसे इसी चेहरे को हौसले और हिम्मत से भरी खूबसूरती की पहचान दी। समाज में प्रेम करना ही काफी विवादास्पद विषय है, लेकिन आप लिव-इन तक में रहीं और उस प्रेम को एक बेटी 'पीहू' के रूप में जन्म भी दिया। आज आप एक सिंगल मदर के रूप में उसकी परवरिश भी कर रही हैं। हिम्मत और हौसले का इतना बड़ा समंदर आपके अंदर आता कहां से है?

अपने साथ हुई हादसे के बाद जब मैं स्टॉप एसिड अटैक कैम्पेनिंग से जुड़ी, उसी दरमियान मैं आलोक जी के संपर्क में आई थी। आलोक जी एक बेहद सुलझे हुए इंसान हैं। उन जैसे जज़्बे वाले लोगों की हमारी सोसायटी को बहुत ज़रूरत है, जो सोसायटी में बदलाव लाने को अपनी जि़ंदगी का मकसद मानते हैं। हम दोनों ने ही काम के दौरान एक-दूसरे की शख्सयत के कई पहलुओं को देखा-पहचाना। हम दोनों को ही एक-दूसरे से प्यार हुआ और दोनों ने ही साथ रहने का फैसला किया। इसमें सिर्फ़ एक-दूसरे के लिए प्यार और सम्मान की भावना थी। बाद में जब ये रिश्ता ज़्यादा लंबी उम्र नहीं जी पाया, तब भी हमें एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि हम आज भी एक-दूसरे की बहुत इज़्ज़त करते हैं। ऐसा इसीलिए मुमकिन हो पाया, क्योंकि इस रिश्ते में सिर्फ़ प्यार करना और प्यार पाना ही था, कोई एहसान या उपकार करने जैसा भाव नहीं था। हमें ये बात समझनी चाहिए कि अगर कोई एक रिश्ता खत्म हो गया है तो उस इंसान के अंदर के दूसरे सारे गुण ही खत्म नहीं हो गए हैं। जि़ंदगी उससे पहले भी होती है और उसके बाद भी। आलोक जी भी इंसान हैं और मैं भी इंसान ही हूं। मेरे चेहरे पर जो मुस्कुराहट है, वह मेरे मन से आती है, दिखावे से नहीं। यही बात मेरी जि़ंदगी का पूरा सच है। मैं किसी दूसरे के चेहरे पर भी मुस्कुराहट लाऊंगी तो दिल से, दिखावे के लिए नहीं। मैंने अपनी जि़ंदादिली मौत को हराकर पाई है।

एक सिंगल मदर के तौर पर अपनी बेटी की परवरिश में आप किन बातों का ध्यान रखती हैं?

इस रूप में मैं ये बात ज़रूर कहना चाहूंगी कि एक आम महिला दस किलो की बोरी आसानी से नहीं उठा पाती है, लेकिन अपने बीस-पच्चीस किलो तक के बच्चे को उठाकर भी महिलाएं आसानी से चल लेती हैं। बच्चे के तार मां के जिस्म से ही नहीं, उसके दिल से भी जुड़े होते हैं। मैंने पीहू को अपनी परवरिश में एक बेटी नहीं, दोस्त माना है और अभी छोटी उम्र से ही उसे सब-कुछ खुलकर बोलने, अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी दी है। मैं ज़ोर देकर कहती हूं कि आज के टाइम में बहुत ज़रूरी है कि पेरेंट्स अपने बच्चों के दोस्त बन जाएं। आज मैं बहुत से सिलेब्रिटीज़ से मिलती हूं, कई फैशन और ज्यूलरी हाउसेज़ की ब्रांड एंबेसेडर हूं, लोग मेरी लाइफ के बारे में जानना चाहते हैं, ये सब एक लंबे स्ट्रगल के बाद हुआ है। मैं अपनी बेटी को शुरुआत से ही स्ट्रगल की अहमियत समझा रही हूं। लोग कहते हैं कि औरतों की रिस्पैक्ट करनी चाहिए। मुझे समाज में रिस्पैक्ट नहीं, एक्वेलिटी चाहिए। वह रिस्पैक्ट ही क्या, जो मांग कर मिले। अपनी रिस्पैक्ट अपने दम पर कमाओ।

गृहलक्ष्मी के ज़रिये आप एक आम भारतीय महिला को क्या मैसेज देना चाहेंगी?

बस इतना कि अपने बच्चे को हर डर से डरे ब$गैर जीना सिखाएं। आस-पास के लोगों और माहौल के प्रति सतर्क और जागरूक रहें और अपने बच्चे को भी अलर्ट रहना सिखाएं।

यह भी पढ़ें -घरेलू हिंसा की गहरी होती जड़ें

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