अपनी शिक्षा से दिखा रही हैं समाज को रास्ता

गरिमा अनुराग

3rd May 2021

ये सभी जानते हैं कि एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित बनाती है, लेकिन इन महिलाओं की कहानी बताती है कि वास्तव में कैसे महिलाएं शिक्षा को सिर्फ घर तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि पूरे समाज की सेवा और उत्थान के लिए उपयोगी बनाती हैं।

अपनी शिक्षा से दिखा रही हैं समाज को रास्ता

अंकों से डरकर नहीं, खेलकर पाई सफलता

नम्बर्स से हमेशा रहा प्यार

मैथ्स पढ़ने से घबराने वाली लड़कियां स्वाति से प्रेरणा ले सकती हैं। स्वाति मैथ्स से डरती नहीं थीं, बल्कि मैथ्स पढ़ना एंजॉय करती थी। यही वजह है कि पहले उन्हें सिंगापुर की सरकार की तरफ से स्कॉलरशिप मिला, फिर उन्हें लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की ओर से स्कॉलरशिप मिला। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से निकलते ही उन्होंने गोल्डमैन सैक्स में काम शुरू किया और पांच साल काम सीखने के बाद बिज़नेस शुरू करने का मन बनाया।

अंबाला में पली-बढ़ी स्वाति भार्गव हमेशा से ये जानती थीं कि ज्ञान और शिक्षा के माध्यम से ही वे अपने सपनों को पूरा कर सकती थीं और यही उन्होंने किया भी।

मेहनत से पाई सफलता

स्वाति ने अपने हस्बेंड के साथ मिलकर कैशबैक बिज़नेस शुरू किया और फिर अथक मेहनत और लगन से भारतीय बाज़ार में अपनी उपस्थिति कैशकरो डॉट कॉम के रूप में दर्ज कराई। ये साइट अपने जैसी देश की इकमात्र साइट है, जिसमें रकम के साथ कैशबैक की सुविधा है।

उद्यमी ही नहीं, सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर भी

स्वाति हमेशा से अपने अनुभव को बांटने और दूसरों से सीखने की कोशिश करती हैं और सही लोगों से जुड़ने के लिए अग्रसर भी रहती हैं। इसी दिशा में काम करते हुए विश्व स्तर पर डिजिटल इंडस्ट्री को जोड़ने वाले मंच एच 2 इंडिया से भी जुड़ी हैं। स्वाति का नाम देश की टॉप इ कॉमर्स इंडस्ट्री से जुड़ी उद्यमियों में शामिल हैं और वे कई अंतरराष्ट्रिय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। 

दल को मांगना चाहिए

मोर स्वाति चाहती हैं कि वे अपनी सफलता से युवा पीढ़ी को प्रेरणा दे और इसके लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कई संस्थान के मंच से अपने अनुभव युवाओं तक पहुंचाती रही हैं।

असंवेदनशीलता भी विकलांगता ही है

हमेशा से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही अनामिका छाबड़ा ने उस वक्त दिव्यांग बच्चों के लिए काम करने का मन बना लिया, जब उन्हें खुद अपने बेटे को बोलना सिखाने में थोड़ी मेहनत करनी पड़ी। उन्हें एहसास हुआ कि जब उन्हें सिर्फ बोलना सिखाने में इतनी मेहनत करनी पड़ रही है तो जो दिव्यांग बच्चों के लिए जागरूक नहीं हैं, उन्हें कितनी दिक्कतें आती होंगी। यहीं से उन्होंने मन बनाया कि दिव्यांग बच्चों के लिए काम करेंगी। 

लोगों में जागरुकता लाने का है प्रयास

अपने काम के बारे में बात करते हुए अनामिका कहती हैं, आम बच्चों के विकास में भी अभिभावक कभी उन्हें समझ नहीं पाने की स्थिति से गुजरते हैं तो सोचिए दिव्यांग बच्चों के लिए चीज़ें कितनी चुनौतिपूर्ण होती होंगी। मैं इनके लिए इनके अभिभावकों को सही प्रशिक्षण देने की राह में काम करती हूं। जो गरीब हैं, अभाव में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उन्हें काउंसलिंग के साथ-साथ कपड़े, किताबें व दूसरी तरह से भी मदद मुहैया करवाती हूं।

बेहतर जीवन पर है सबका अधिकार

'आज में जियो और इसका सर्वश्रेष्ठ संभव इस्तेमाल करो, ताकि इस दुनिया को हर व्यक्ति के लिए एक बेहतर स्थान बनाया जा सके।' यही उनके जीवन का मूल मंत्र है। एक शिक्षक होने के नाते वे हमेशा से बच्चों से जुड़ी रही हैं। स्कूल में इंटर्नशिप के दौरान ही उन्होंने जाना कि उनका जीवन 'अंकों और शब्दों' के दायरे से कहीं अधिक विस्तारित है। लोग कहते हैं कि अनामिका बड़ी ही आसानी से कुछ खास शिक्षा देती हैं, लेकिन उनका मानना है कि उन्हें हर दिन कुछ नया सीखने का मिलता है। उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा, 'जब हम जागरूक नहीं होते, समाज के प्रति संवेदनशील नहीं होते हैं तो हम भी अपंग हो जाते हैं। मेरी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा लोग समाज के जरूरतमंद लोगों के प्रति संवेदनशील होकर आगे आएं। अपनी बात को रखने के लिए अनामिका मंच की तलाश करते हुए मिस इंडिया क्वीन ऑफ सब्सटेंस 2019 से भी जुड़ी और बतौर फायनलिस्ट अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

मुश्किलों से जीतकर पाती हैं आगे बढ़ने का हौसला

 

ना रंग सेवा की निदेशक और समाज सेविका

वंदना अग्रवाल के मन में समाज सेवा का ख्याल तो उस समय ही आ गया था, जब वे पढ़ाई कर रही थीं और अपनी तैयारी के लिए पुस्तकालयों में जाती थीं। उस वक्त भी वे सोचतीं कि अगर मैं आईपीएस बन गई तो गरीब बच्चों के लिए बड़ा पुस्कालय बनाऊंगी ताकी उन्हें मेरी तरह परेशानी न हो। सेवा तो उन्हें करनी ही थी, मगर और वृहत रूप में। 

लोगों के आग्रह ने किया विवश

उन दिनों वंदना अपने पति को दोपहर में लंच पहुंचाने हॉस्पिटल जाती थीं। उस वक्त डॉक्टर से मिलने जो मरीज आते थे, उनमें से कई लोग उनसे पूछा करते थे कि आप बताइए कि डॉक्टर साहब ने क्या लिखा है। जब मैं डॉक्टर साहब से पूछने जाती तो वे मुझसे कहते कि मैं ऐसे तो आपको बता दूंगा, मगर इसे पूरी तरह समझने के लिए आपको इसे समय देना होगा। पांच-सात दिन मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन रोज़-रोज़ लोग मुझसे पूछते और जब मैं उन्हें जवाब नहीं दे पाती तो मुझे कुछ कमी सी लगने लगी। मैं भी असंतुष्ट महसूस करती थी कि कोई मुझसे कुछ पूछ रहा है और मैं उसका जवाब नहीं दे पा रही हूं। बस फिर क्या था, उन्होंने प्रशिक्षण लिया और सिर्फ मरीजों की परेशानियों को ही नहीं दूर किया, बल्कि पूरे हॉस्पिटल को संभालने लगीं। 

सफलता ने दिए हौसले

हॉस्पिटल में लोगों की दिक्कत, परेशानियां सुनते-सुनते वंदना ने महसूस किया कि हर कोई सिर्फ शरीर की पीड़ा से ग्रस्त नहीं है। उनके मन ज्यादा उलझें हुए हैं। उन्होंने धीरे-धीरे लोगों के रोज़गार के लिए काम किया और तरह-तरह के प्रशिक्षण शुरू करवाए। फिर ट्राइबल बेल्ट में बच्चों की शिक्षा के लिए काम करना शुरू किया। गांव की औरतों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा किए। जरूरतमंद परिवारों को उनकी जरूरत के अनुसार काम करना सिखाया।

सेवा का प्रताप देता है प्रेरणा

अपने स्ट्रगल के बारे में बात करते हुए वंदना कहती हैं कि मैंने एक बार जानलेवा हमला झेला हैं। एक बार ब्रेस्ट में गांठ थी। फिर शाम को वॉक करते हुए किसी ने मुझ पर हमला किया था और डॉक्टर्स ने कहा कि मुझे रिकवर होने के लिए कई दिन लगेंगे, लेकिन इनके बाद मैं मात्र पंद्रह दिनों में उठ कर खड़ी हो गई। मुझे लगता है कि अगर भगवान ने मुझे ठीक किया है तो उसका कोई न कोई उद्देश्य जरूर है। मैंने जि़ंदगी को जीत लिया है और अब मैं पीछे पलटने वाली नहीं हूं।'

लक्ष्य के लिए जिद्दी बनें

वंदना कहती हैं, 'लेडिज़ को जिद्दी होना चाहिए। ये बात मेरे ससुर मुझे हमेशा कहा करते थे और मैं भी चाहती हूं कि सभी औरतें ये लाइन हमेशा याद रखें, वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हों, नाविक की धैर्य परीक्षा क्या, यदि धाराएं प्रतिकूल न हों। हर औरत में शक्ति है, लेकिन उसने खुद को पहचाना नहीं है। मैं चाहती हूं कि वह अपनी ताकत को समझे, इसलिए नहीं कि उसे किसी को दबाना है, बल्कि इसलिए कि कोई उसे दबा न सके।

यह भी पढ़ें -क्रियेटिविटी से छिपाएं अपने घर की कमिया

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