गर्माहट - गृहलक्ष्मी लघुकथा

प्रतिभा श्रीवास्तव अंश

3rd May 2021

बैठक खाने में बैठकर खाने का मेन्यु बनाने से खाना नहीं बनता, खाना बनाने के लिए तो रसोई घर में काम करना पड़ता है, बुझे बुझे मन से रश्मि बैठक खाने से पास हुये मेन्यु पर जुट गई। उसके लिए तो यह रोज का ही था। ठंड है ठंड है कहकर, सारी ननदे रजाई में या धूप सेकने बैठ जातीं। और वही से खाने में क्या क्या बनेगा डिसाईड करतीं। शाम शुरू होते.

गर्माहट - गृहलक्ष्मी लघुकथा

टीवी पर डेली सोप सास-बहू वाला सीरियल लग जाता। और स्टार प्लस की बहू जैसी बहू की कामना की जाती। रसोई घर में काम करती रश्मि सास-ननद की बातें सुनती कभी हँसती। कभी नाराज होती। पर कभी कह ना पाती कि थोड़ी मदद कर दो। सब उसे अकेले ही करना है यह सोचते हुये रसोई का काम जल्दी जल्दी निपटाती। और बैठक खाने से चाय के लिए आवाज लगाई जाती। रश्मि चाय में अदरक ज्यादा डालना... आज ठंड ज्यादा है ठण्ड तो घर की बहू को भी लगती है ना!! आखिरकार वो भी हाड़-मांस की ही बनी है...। पर खुद को मशीन मानते हुए रश्मि सारी नाराजगी झटक कर चाय बनाने लगती है। ठण्ड कितनी भी हो... रिश्तों में गर्मी का होना जरूरी है... और यह काम बहू ही कर सकती है।

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