जिएं जिंदगी 60 के बाद भी

प्रीता जैन

4th May 2021

जब पूरी जि़ंदगी एक स्वाभिमान और रौब के साथ जीते हुए गुजारी हो तो जीवन-संध्या में क्यों किसी पर इस तरह से निर्भर हो जाएं कि बुढ़ापा बेबसी में बदल जाए। जब तक जिएं, जि़ंदगी से भरपूर रहिए।

जिएं जिंदगी 60 के बाद भी

अभी गर्मी की छुट्टियों में मायके गई तो मन किया रमा आंटी से मिलकर आऊं, काफी दिन से नहीं मिली थी। आंटी से जान-पहचान बहुत समय से है, असल में पापा व अंकल एक ही विभाग में इंजीनियर थे, इसलिए 2-3 बार पोस्टिंग एक ही जगह होने से साथ-साथ रहना हुआ। आंटी का व्यक्तित्व मुझे शुरू से ही अच्छा लगता था। बाहरी दिखावे से दूर अपने सीमित साधनों में ही खुश रहती थीं, उनकी बातें, उनके कर्म स्पष्ट व आशावादी हुआ करते थे, जिससे सबके बीच अलग ही पहचान बनी हुई थी। खैर! आंटी के घर जाकर उनसे मिल बड़ा ही अच्छा लगा, उनकी बेटी की तो शादी हो गई थी पर बेटा-बहू सब साथ में ही थे।

बातों- बातों में मुझे महसूस हुआ आंटी अपनी बहू की कुछ ज्यादा ही तारीफ कर रही हैं और जो बाहरी-घरेलू कार्य शायद आंटी करती होंगी, उनके भी करने का श्रेय बहू को दे रही थीं। मुझसे भी बोलीं, 'अब घर-बाहर का कुछ अता-पता नहीं रहता श्वेता ही संभालती है। मैं ही इससे पूछ-पूछकर सब काम करती रहती हूं। कहीं आना-जाना हो, लेना-देना हो, वह इसी की जिम्मेदारी है, रिश्ते-नाते सब यही निभा रही है। हां, अगर कहीं जरूरी जाना होता है, तभी जाती हूं, वरना श्वेता ही इधर-उधर का काम निपटा लेती है। भई, अब हमने तो सोच-समझ लिया बेटा-बहू को ही जब सारा कामकाज देखना है, यही घर के मालिक कर्ता-धर्ता हैं तो क्यों हम बीच में अपना वर्चस्व रखें। जैसा भी ये कर रहे हैं, निभा रहे हैं, सब सही है। मैं और तुम्हारे अंकल तो बस। इनकी राय से सहमत हुए रहते हैं। इसी से घर में सुख-शान्ति बनी रहती है।

वैसे भी हम अब बुढ़ापे की ओर हैं। कब हाथ-पैर चलने बंद हो जाए पता नहीं, इसलिए पहले से ही हर बात में हस्तक्षेप किए बिना अपनी सलाह-मशविरा दिए बिना चुपचाप सब देखते-भालते रहो, वही अच्छा है। बेटा-बहू जरूरत मुताबिक खैर खबर लेते रहें, हमारी पूछताछ करते रहे, बुढ़ापे के दिन भलीभांति कट जाए इतना ही हमारे लिए बहुत है। खैर, आंटी को जो सही लगा, उन्होंने किया, किंतु जैसी उनकी छवि मेरे मन में थी, उससे एकदम विपरीत ही वे मुझे लगीं, मानो उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनका कोई अस्तित्व, अपनी कोई पहचान ही नहीं रह गई हो। स्वयं की सोच-इच्छा के मायने भूल कर औरों पर निर्भर रहकर जीवन जीने के लिए मजबूर हो गए हों।

ध्यान रहे! बढ़ती उम्र किसी पर बोझ या किसी तरह का अभिशाप नहीं होती। जीवन की जैसे और अवस्थाएं हैं, वैसे ही वृद्धावस्था भी है। कहीं से कहीं तक किसी भी दृष्टिकोण या कायदे-कानून से वृद्ध व्यक्ति कमजोर असहाय नहीं हो जाता, ना ही आत्मनिर्भरता छोड़ किसी और के कंधे का सहारा लेना अनिवार्य हो जाता है। बस, जरूरत है खुद की मानसिक सोच तथा विचारधारा के आगे उम्र को बाधक नहीं बनने देने की और दिल व दिमाग दोनों से पहले की तरह स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त महसूस करते हुए खुश रहकर जीवन जीने की बिना किसी तनाव के उमंग और उल्लास से परिपूर्ण जिंदगी के पल बिताने की। आइए, कुछ टिप्स पर ध्यान देकर प्रसन्नता व उत्साह से भरपूर जीवन साठ के बाद भी बिताया जा सकता है

1- उम्र के बढ़ने और आपके तन-मन से कमजोर होने का कोई तालमेल नहीं है। सर्वप्रथम तो मन से यह वहम निकाल दीजिए कि आप पहले जैसे नहीं रहें। बढ़ती उम्र से सब बदल गया। बदलता कुछ भी नहीं है, जो थोड़े-बहुत बदलाव आते भी हैं, वे स्वाभाविक व प्राकृतिक ही हैं। उनके अनुसार स्वयं में सामंजस्य बनाकर रखें और सामान्य व्यवहार रखते हुए जिंदगी को खुशनुमा बनाते हुए जीवन जिएं।

2- जीवन की एक महत्वपूर्ण अवस्था वृद्धावस्था है, इसलिए तन-मन से अपने में किसी तरह का कोई अंतर महसूस ना करें। लोग क्या कहेंगे, इसकी परवाह नहीं करते हुए जैसी दिनचर्या बितानी चाहें, वैसी ही बिताएं। जो आपके शौक-इच्छाएं हैं, उन्हें अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा बनाए रखें। उम्र को निर्भरता का सूचक ना मानते हुए स्वयं की मन-मर्जी से जिंदादिली के साथ जिएं और किसी को ज्यादा अपनी पर्सनल जिंदगी में हावी ना होने दें।

3- परिवार आपके साथ है, एक छत के नीचे बेटा-बहू और अन्य पारिवारिक सदस्यों के साथ मिलजुल कर रहना अच्छी बात है, परंतु अपनी बढ़ती उम्र को देखते हुए सबके साथ रहने को अपनी कमजोरी या बेबसी ना बना लें, ना ही सबकी हां में हां मिलाते हुए असहाय बने रहकर स्वयं के व्यक्तित्व को कमजोर अथवा अस्तित्वहीन बनने दें।

4- जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे पारिवारिक जिम्मेदारियां कम होती जाती हैं, तो अनावश्यक खर्च भी कम होते हैं, इसलिए आॢथक रूप से आप इतने सक्षम तो रहते ही हैं कि स्वयं की आवश्यकताओं की पूॢत उचित ढंग से कर अपने अरमान, अपनी जरूरतें पूर्ण कर सकें। अत: आत्मनिर्भरता के साथ तनावरहित रह खुद को बोझ ना समझते हुए खुशी से स्वेच्छानुसार जिंदगी बिताएं। उचित व सही मान-सम्मान के हकदार बने रहें।

5- अपने तजुर्बे-अनुभव के आधार पर प्रियजनों की हरसंभव सहायता करें। उन्हें भरपूर प्यार देते हुए उचित मार्गदर्शन दें, लेकिन यह नहीं सोचें कि आगे जाकर यही हमारे काम आएंगे। हमें बुढ़ापे में सहारा देंगे तो उनकी अनावश्यक जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ले लें। उनके कार्य-फर्ज को स्वयं पूरा कर उन्हें तो आराम करने दें और बेवजह ही स्वयं को थकाते हुए जीवन जीते रहें। याद रहे, घर में जो जिसका काम है, वही करे तो अच्छा रहता है। इससे संतुलन बना रहने से सुख-शांति भी कायम रहती है।

6- ताउम्र जिस आदर्श दमदार व्यक्तित्व से आप जाने जाते रहे हैं, उसे हमेशा बरकरार रहने दें। ढलती उम्र में औरों पर अपनी निर्भरता के भय से खुद के सोच-विचारों को बदलने का प्रयास नहीं करें। पारिवारिक सदस्यों की कही बातों में सही और गलत का भेद रखते हुए निर्णय ले। अतिमहत्वपूर्ण यह है कि वास्तविकता में ही घर में अपना स्थान सर्वोच्चता और बड़प्पन से परिपूर्ण रहने दें।

7-  जिंदगी में जिस स्नेह व इज्जत से आप रहते आए हैं, वही प्रेम जीवन संध्या में भी बना रहे तो भला इससे अच्छा और क्या हो सकता है, क्योंकि इससे जहां मनोबल मिलता रहेगा वही मानसिक सुकून भी। अतएव अपनी भावनाओं-संवेगों पर नियंत्रण रखते हुए बेटे-बहू या अन्य सदस्यों के सामने शारीरिक रूप से कमजोर ना पड़ें। अपनी क्षमता- काबिलियत के सहारे दमदार व मजबूत व्यक्तित्व के मालिक बने रहें। बढ़ती उम्र के भय से धीरे-धीरे अपनी सोच- मानसिकता को बदलते हुए जबरदस्ती खुश रहने का प्रयास नहीं करें। वास्तव में जैसे आप रहते आए हैं, वैसे ही आगे भी रहते रहें। अपनी लाइफ स्टाइल अपनी आदतों में थोड़ा-बहुत ही समझौता करें। और कुंठित होकर ना रहें। दिल से स्वीकार कीजिए कि बढ़ती उम्र एक सामान्य व कुदरती प्रक्रिया है। इसे अन्यथा ना लेते हुए जीवन के शेष दिन इच्छानुसार मानमाफिक ढंग से बिताएं। एक बुलंद हौसले व सकारात्मक सोच के साथ भरपूर जीवन खुशी-खुशी जीते रहें और अंत तक अपने व्यक्तित्व को गरिमामय प्रभावशाली बनाए रखें।

यह भी पढ़ें -हुनर से बनाएं जिंदगी की राह आसान

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