विधवा - गृहलक्ष्मी कहानियां

आबिद सुरती

5th May 2021

कुछ लोग इंसानियत की बहुत सुंदर-सुंदर बातें करते हैं। कुछ लोग इंसान होते हैं। क्या फर्क है इन दोनों बातों में, इसी पर गहरी रोशनी डालती है वरिष्ठ साहित्यकार आबिद सुरती की ये कहानी-

विधवा - गृहलक्ष्मी कहानियां

आग बरसाते हुए मई महीने का सूरज, चिलचिलाती धूप, हवाओं के साथ बहती लू, चौपाटी का उबलता हुआ समंदर, छिछले पानी में तपती काली शिलाओं के उठे हुए सिर... 123 नंबर की बस लड़कियों के हॉस्टल के सामने से सपाटे से गुजर गई।

श्री तोलाराम ने खिड़की से बाहर सिर निकालकर दौड़ती हुई बस से पान की पिचकारी छोड़ी। हवा के साथ उड़ता हुआ मैला लाल रस कई छींटों में कोलतार की सड़क पर फैल गया। सिर अंदर लेते हुए श्री तोलाराम ने जेब से रूमाल निकाला, मुंह पोंछा, माथे पर जमी हुई पसीने की बूंदें पोंछी। फिर चंद सेंटीमाटर उठकर अपने स्थूल जिस्म के नीचे दबे लॉन्ग कोट का छोर खींच निकाला और नोटबुक से हवा खाने लगे।

चहल-पहल, कारों, टैक्सियों और बसों से भरी सड़क, स्त्री-पुरुषों के पसीने से चूते जिस्म, मजदूरों से अधिक परेशान मालिकों के शरीर, होंठ, गाल, माथा, गरदन पर नाजुक रूमाल दबातीं, बड़बड़ातीं और आगे बढ़ जातीं लड़कियां। सड़कों के बीच द्वीप में खड़ी कारों के चमकते बदन। बस 'स्टैंड पर रुकी और एक के बाद एक तीन यात्री उतरकर शेड में दौड़ गए। 'चलो, आ जाओ...आ जाओ! कंडक्टर ने भीतर से आवाज दी।

एक यहूदी लड़की अंदर दौड़ आई। उसके पीछे एक मुसलमान बेवा थी। बेवा के सीने से एक अधनंगा, बीमार बच्चा चिपका हुआ था। यहूदी लड़की की ओर कनखियों से देखते हुए कंडक्टर ने अपनी ढीली पतलून थोड़ी ऊपर उठाई, घंटी बजाई, बस कोलाबा की ओर चल दी।

सिर्फ़ तीन यात्री थे इस बस में।

1. श्री तोलाराम : दो शख्सों की जगह रोककर, पैर फैलाए अकेले बैठे थे और नोटबुक से हवा खा रहे थे।

2. खादीधारी जवान : उजला कुर्ता, उजला पाजामा, काला वास्केट, चेहरे पर चांदी की चमक थी।

3. ओ.एन.जी.सी. का क्लर्क : सफेद कमीज़, गहरी नीली पैंट, जिस पर तेल के दाग थे, टाई हवा में लहरा रही थी।

अपने काले बुर्के को संभालते हुए मुसलमान विधवा प्रवेश के करीब की एक सीट पर बैठ गई। बच्चे को उसने गोद में लिटा दिया। एक सरसरी निगाह तीनों यात्रियों पर डाल यहूदी लड़की ने ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर जगह ली।

पसीने से गीला उसका तंग टी-शर्ट टुकड़ों में पारदर्शक हो गया था। शॉर्ट्स (नेकर) जांघों के ऊपर चढ़ आई थी। बाकी सारे अंग खुले थे, गोरे थे, गुलाबी भी थे, सिर्फ़ आंखों को छोड़कर। नाक पर धूप का काला चश्मा था। यहूदी लड़की के खुले अंगों ने बस के सुस्त माहौल में चुस्ती पैदा कर दी। क्लर्क के चश्मे की डंडी ऊपर-नीचे होने लगी।

खादीधारी युवक की आंखें गहरी सांसें लेने के बहाने सिर के साथ ऊंची होती और धीरे-धीरे वापस झुक जाती। श्री तोलाराम की मोटी गरदन के निकट गतिशील नोटबुक की गति थोड़ी और तेज हो गई थी।

कंडक्टर गला खंखार अपनी टोपी को तिरछी कर और सीना फुलाकर लड़की के सामने आ खड़ा हुआ। वह जैसे मैदान मार गया हो, ऐसे बाकी तीनों यात्रियों के चेहरे उतर गए। काले बुर्के के दो छेदों में से विधवा की कंचे जैसी आंखें घूर रही थीं- श्री तोलाराम के खुले मुंह को, क्लर्क की नाक पर उतर आई चश्मे की डंडी को, सिर खुजलाते खादीधारी युवक को। 'टिकट प्लीज... कंडक्टर के शब्दों में शहद घुला था।

लड़की ने बटुआ खोला। तीनों यात्री भीतर झांकने के लिए उत्सुक हो उठे। गरदनें ऊपर उठ गईं। नजरें बटुए में घुसने के लिए मार्ग ढूंढ़ने लगीं। आखिर  नाजुक-नाजुक रामतरोई-सी अंगुलियों की हरकत को गौर से देखकर संतोष मान लिया, लेकिन नजरें इंच-भर भी नहीं हटीं। रीगल सिनेमा से थोड़े फासले पर बस रुकी। ऊपर बैठे दो यात्री बाहर निकलकर सिनेमाघर की ओर बढ़ गए। 'स्पिलबर्ग की नई फिल्म इसी हफ्ते लगी होने के कारण भीड़ काफी थी। एक्स्ट्रा टिकट के लिए लोग छीना-झपटी कर रहे थे। यहां की धूप बेअसर थी।

घररररररररर....

यंत्र थरथराए। इंजिन तले से पानी की कुछ बूंदें टपकीं और बस फिर आगे बढ़ी। यहूदी लड़की की अंगुलियां अभी भी बटुए में भटक रही थीं। दैनिक इस्तेमाल की चीज़ें भीतरी हिस्सों से ऊपर आकर फिर गायब हो जाती थीं। नन्हासा जापानी पंखा, लिपस्टिक की ट्यूब, रूमाल, इत्र की शीशी, छोटा आईना अंगुलियों के बीच लुका-छिपी खेल रहे थे और...

अब भी सभी आंखें वहीं केंद्रित थीं। ऊपर के होंठ ऊपर और नीचे के नीचे स्थिर हो गए थे। सांसें जैसे रुक गई थीं। अंत में यहूदी लड़की ने बटुए में से बटुए के बेटे जैसा चमड़े का छोटासा पॉकिट निकाला, जि़प खोली और सौ का एक नोट कंडक्टर के आगे बढ़ दिया। यात्रियों की जान में जान आई। 'सॉरी, मैडम!' कंडक्टर ने कंधे से झूलते अपने पॉकिट में पूरा हाथ घुसा देते हुए दु:ख जताया, 'नो चेंज।' गोरी चमड़ी उलझन में पड़ गई।

यात्री परेशान हो उठे। कोई कुछ बोले इससे पहले श्री तोलाराम की हमदर्दी जाग उठी। उन्होंने मुस्कराकर पूछा, 'कहां जाना है, मैडम?' 'कोलाबा से आगे।' 'मैं भी वहीं जा रहा हूं...

कंडक्टर!' उनकी आवाज कड़ी हुई, 'पैसा हम देगा। मैडम को टिकट दो।' कंडक्टर ने चौड़ी आंखों से श्री तोलाराम के चेहरे को सीधा देखा। 'श्रीमान जी!' लड़की ने खड़े होते हुए सेठजी से कहा, 'मैं यहीं उतर जाऊंगी।' वह आगे बढ़ी! जैसे रैंप पर कोई फैशन मॉडल आगे बढ़ी। गोरे-गोरे अंग हिले। साथ क्लर्क का दिल भी हिल गया। वह भी खड़ा हो गया।

'इस धूप में आप कहां जाएंगी?' लड़की का रास्ता रोकते हुए उसने नम्रता से कहा, 'सिर्फ़ पचास पैसे का सवाल है न, मैं दूंगा।' श्री तोलाराम की आंखों में खून उतर आया। क्लर्क ने जेब में हाथ डाला। उसकी आंखें लड़की के टी-शर्ट के एक खुले बटन पर ठहरी थीं, दूसरे बटन को खोलने का प्रयास कर रही थीं। 'क्षमा कीजिए...' वह पैसे निकाले, इससे पहले लड़की बोल उठी,

'आपके जज़्बात की मैं कद्र करती हं, लेकिन...' 'मैडम!' मौका पाते ही खादीधारी युवक ने बीच में कहा, 'आप विदेशी हैं। हमारे देश की मेहमान हैं।

अगर आप उतर जाएंगी तो वह सिर्फ़ हमारा नहीं, बल्कि इस देश का भी अपमान होगा।' लड़की का चेहरा गद्गद् हो गया। क्लर्क का चेहरा सख्त हो गया। मन-ही-मन युवक के पुरखों की धूल झाड़ते हुए वह अभी जेब टटोल रहा था कि युवक ने पचास पैसे का सिक्का बढ़ाते हुए कंडक्टर से साफ शब्दों में कहा,

'एक टिकट मैडम के लिए।' क्लर्क बर्फ हो गया। उसे एहसास हुआ, युवक की आवाज में विजयी टार्जन की पुकार थी। गर्व था। कंडक्टर ने टिकट काटा।

'शुक्रिया।

' लड़की ने युवक से कहा, 'बहुतबहुत शुक्रिया।' पलभर में तो वह पानी-पानी हो गया, पचास पैसा वसूल हो गया। 'टिकट!' कंडक्टर ने मुसलमान विधवा के आगे खड़े होते हुए अपनी मूल खुरदुरी आवाज में कहा। विधवा ने चेहरा उठाया।

कंडक्टर के चेहरे पर एक नज़र डालकर उसने काले बुर्के में हाथ डाला। वह सीधा ही मैली चोली में उतर गया। चिथड़े-सा एक रूमाल हाथ में आया। बाहर निकालकर उसे खोला। पैसे गिने। पैंतालीस पैसे थे उसमें।

पांच पैसे का सिक्का कहां फिसल गया? उसने फिर भीतर हाथ डाला। पांच पैसे का सिक्का ढूंढ़ता हुआ हाथ चोली के दो-तीन हुक तोड़कर बाहर निकल आया। कमब$ख्त कहां छिपा था? या फिर कहीं गिर गया? यह मुमकिन न था, क्योंकि आज तक ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। घर से निकलने से पहले वह खर्च के पैसे पूरे गिनकर रूमाल में बांध लेती थी। वैसे आज वह तीन रुपये लेकर निकली थी।

सबसे पहले पचास पैसे का उसने एक टिकट कटवाया था। सार्वजनिक अस्पताल में बच्चे की दवाई के दो रुपये दिए थे। बाकी बचे थे, पचास वैसे और अब वह घर लौट रही थी। एक बार उसने हाथ पीठ पर भी फेरा देखा। निराशा के सिवा उसे कुछ न मिला। मायूस नज़रों से उसने कंडक्टर की ओर देखा।

'किधर जाना है?'

कंडक्टर ने पूछा।

'कोलाबा से आगे झुग्गी-झोंपड़ी में रहती हूं।' विधवा की आवाज में लाचारी थी, 'लेकिन...

पांच पैसे कम हैं।' 'कम हैं!' कंडक्टर की भौंहें तन गईं। हाथ बढ़ा। घंटी बजी। बस रुकी। ड्राइवर ने मुड़कर पीछे देखा। 'चलो नीचे...नीचे उतरो!' विधवा रुआंसी हो गई।

'कंडक्टर साहब!' उसने दोनों हाथ जोड़ते हुए गुज़ारिश की, 'मेरा बच्चा बीमार है। सवेरे से कुछ खाया भी नहीं। इस धूप में चलकर जाऊंगी तो मेरा बच्चा दम दोड़ देगा।'

'क्या है, मास्टर? क्या बात है?' ड्राइवर ने अपनी सीट पर से आवाज दी। कंडक्टर ने बताया, 'इस औरत को मुफ्त में सफर करना है।' ड्राइवर ने बैठे-बैठे ही पांव पछाड़ा।

'सिर्फ़ पांच पैसे कम हैं।' विधवा ने श्री तोलाराम की ओर घूमते हुए कहा, 'आप ही मदद कर दीजिए।' श्री तोलाराम ने जेब में रखी डिबिया से पान की एक और गिलौरी निकालकर मुंह खोला। 'बस में भीख मांगते हुए आपको शर्म आनी चाहिए।' क्लर्क बोला।

'कंडक्टर!' खादीधारी युवक भड़क उठा था, 'मुंह क्या देखते हो? बाहर खदेड़ दो। बस 'डिले' हो रही है।' विधवा गिड़गिड़ाती, पांच पैसे की भीख मांगती बस से उतर गई।

अब श्री तोलाराम ने खिड़की से बाहर सिर के साथ गर्दन भी निकालकर पान की दूसरी पीक मारी, धूप में बस को घूरती खड़ी विधवा की ओर देखा और गला खंखारकर बड़बड़ाए, 'पता नहीं कब सुधरेगी यह कौम!' और पिघलते कोलतार की सड़क पर टायरों के निशान छोड़ती बस कोलाबा से आर.सी. चर्च की दिशा में आगे बढ़ गई।

यह भी पढ़ें - ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूं? - गृहलक्ष्मी कहानियां

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