हृदय परिवर्तन - गृहलक्ष्मी कहानियां

बिंदु त्रिपाठी

5th May 2021

यूं तो जि़ंदगी हमेशा कोई न कोई सबक उम्र भर ही देती रहती है, लेकिन कई बार इसके सबक जीना सिखाने के लिए, पहले मौत की दहलीज़ तक पहुंचा देते हैं। रमेश और रीता के बिखरते घरौंदे का अंजाम क्या हुआ, ये बताती इस कहानी में कई टूटते घरों को बचाने की ताकत है।

हृदय परिवर्तन - गृहलक्ष्मी कहानियां

'लो आज फिर देर हो गई। इन सिटी बसों में बैठना तो किसी सजा से कम नहीं है। ज्यादा सवारियां बिठाने के चक्कर में खड़ी हुई तो बस खड़ी ही रहेगी। बस में बैठी दूसरी सवारियों का जो समय बर्बाद होता है, उससे इन्हें क्या? इन्हें तो बस पैसों से मतलब है। रीता मन ही मन बड़बड़ाती हुई जैसे-तैसे घर पहुंची।

अब कपड़े बदल ही रही थी कि पीछे से रमेश ने चिल्लाना शुरू कर दिया- 'अरे, तुम आ गई। चलो अब जरा जल्दी से एक कप चाय दे दो। आज तो बहुत थक गया हूं।

ऑफिस में कुछ ज्यादा ही काम था आज। रीता झुंझला पड़ी,

'आप थक गए हैं तो मैं कौन-सा आराम करके चली आ रही हूं? मैं भी तो थक-हारके ही आई हूं ऑफिस से। अभी कपड़े भी नहीं बदले हैं। आज जरा आप ही चाय बना लीजिए। तब तक मैं भी फ्रेश हो जाती हूं। रमेश ने भी शब्दबाण चलाया, 'तुमसे तो कुछ बोलना ही बेकार है। थककर आई हो तो आराम से सो जाओ न। मैं बाहर जाकर चाय पी लूंगा।

रमेश का शब्दबाण रीता के दिल को छलनी कर गया। आज वह सह नहीं पाई, वह भी गुस्से में बड़बड़ाने लगी।

'हां, हां जाओ! चाय ही क्यों, पूरा खाना भी खाकर आना। वैसे भी मेरी हिम्मत नहीं है खाना बनाने की। आखिर मैं भी तो थक कर आती हूं।

इंसान हूं मैं, कोई मशीन नहीं, जो घर में काम करूं, ऑफिस में भी काम करूं, फिर भी न थकूं। अगर तुम थकते हो तो मैं भी तो थकती हूं। कभी मेरी भी परवाह की है तुमने? 'अरे तो एहसान किसे जता रही हो? मत करो नौकरी। किसने कहा है नौकरी करने को। इतना सज-धज कर जाती हो, गुलछर्रे ही तो उड़ाती होगी।

घर का काम तो होता नहीं है, चली है बाहर नौकरी करने। अरे मुझे सब पता है, तुम कौन-सी नौकरी करने जाती हो।

'अपनी जुबान को लगाम दो। इस महंगाई में तुम्हारी पांच हजार रुपये की नौकरी से अगर घर चल जाता न तो मुझे कोई शौक नहीं है कि बसों में धक्के खाऊं और ऑफिस में बॉस की डांट सुनूं। मजबूरी में मुझे नौकरी करनी पड़ रही है, पर तुम यह सब क्या समझो।

रमेश पैर पटकता हुआ बाहर निकल गया चाय पीने और रीता बैठ गई आंसू बहाने। रोजरोज के झगड़ों से वह तंग आ गई है। करे भी तो क्या? उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। 'मम्मी, मम्मी, जल्दी से कुछ खाने को दो, बहुत भूख लगी है।

ट्यूशन से लौटकर बस्ता पटकते हुए रिंकी ने सैंडविच बनाने का फरमान जारी कर दिया। उस बेचारी को क्या पता कि मम्मी-पापा के बीच क्या कुछ हुआ है। अपनी प्यारी बिटिया रिंकी का चेहरा देखकर रीता को कुछ तसल्ली हुई। उसका क्रोध भी कुछ ठंडा पड़ चुका था अब तक।

'हां बेटा, जल्दी से मुंह-हाथ धोकर आओ। तब तक मैं तैयार करती हूं। रीता ने अपने चेहरे का भाव छिपाया और लग गई काम में। वह नहीं चाहती कि पतिपत्नी के बीच के तनाव का कोई बुरा असर उनकी बेटी के कोमल मन पर पड़े। यह बेटी ही तो वह सहारा है, जिसके कारण रीता अब तक सब कुछ सहती आई है।

'रिंकी बेटा आपका नाश्ता तैयार है। जल्दी आओ। 'आई मम्मी। रिंकी बोलते हुए बाहर आकर बैठ गई और बोली, 'मम्मी, आप भी मेरे साथ खाइए न। 'नहीं बेटा, आप खाओ, मुझे अभी भूख नहीं है।

रिंकी सात साल की हो चुकी है। मम्मीपापा के बीच तकरार की बातें काफी-कुछ समझ में आने लगी हैं उसे। 'मम्मी! आज फिर पापा ने आपसे लड़ाई की? 'नहीं बेटा, नहीं तो। 'नहीं मम्मी, मुझे सब पता है। जब पापा आपसे लड़ते हैं, तब आपको बहुत गुस्सा आता है और तभी आप खाना भी नहीं खाती हैं।

'नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है। आप आजकल कुछ ज्यादा बोलने लगी हो। चलो, ३२ गृहलक्ष्मी जून २०१९ यूं तो जि़ंदगी हमेशा कोई न कोई सबक उम्र भर ही देती रहती है, लेकिन कई बार इसके सबक जीना सिखाने के लिए, पहले मौत की दहलीज़ तक पहुंचा देते हैं।

रमेश और रीता के बिखरते घरौंदे का अंजाम क्या हुआ, ये बताती इस कहानी में कई टूटते घरों को बचाने की ताकत है। हृदय परिवर्तन बिंदु त्रिपाठी कहानी जून २०१९ गृहलक्ष्मी ३३ चुपचाप खाओ और अपना होमवर्क करो। रिंकी खामोश हो गई। होमवर्क करने में उसका बिल्कुल मन नहीं लग रहा था।

वह समझ गई थी कि आज भी मम्मी-पापा के बीच झगड़ा हुआ है। तभी कॉलबेल बज उठी- शायद पापा आ गए। वह दौड़ कर पापा के पास पहुंची। पापा... पापा। रमेश उसे धक्का देते हुए अंदर चला गया। शराब के नशे में चूर था। वह सहमकर चुपचाप अपने कमरे में चली गई।

अचानक मम्मी-पापा के जोर-जोर से लड़ने की आवाजें आने लगीं। रीता व रमेश दोनों एक- दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे थे।

रमेश हमेशा रीता पर बेवजह शक करता रहा। रीता का नौकरी करना उसे बिल्कुल पसंद नहीं है।

'तुम्हें नौकरी छोड़नी होगी। 'मैं नौकरी नहीं छोडूंगी। तुम्हारी पांच हजार रुपये की तनख्वाह से घर नहीं चल सकता। महंगाई किस कदर बढ़ गई है, कुछ खबर है तुम्हें? बेटी बड़ी हो रही है, पांच हजार रुपये में तो उसकी फीस भी पूरी नहीं होगी, खाओगे क्या? पहले खुद कमाओ, फिर मेरी नौकरी छुड़वाना। 'बदतमीज, नालायक, जुबान लड़ाती है..। तड़ाक-तड़ाक। रमेश का जोरदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा और वह वहीं धड़ाम से गिर पड़ी। दर्द से झटपटाती रीता के आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। वह बस रोए जा रही है, अपनी फूटी किस्मत को कोसे जा रही है।

बिना किसी कुसूर के वह ऐसे ही पिछले आठ सालों से पति की ज्यादती का शिकार बनती आई है। इधर रिंकी डरी-सहमी अपने कमरे में बैठी रही। मम्मी-पापा के झगड़े से आज वह बहुत डर गई है। अभी भी उसे पापा के लड़ने और मम्मी के रोने की आवाज आ रही है।

उसके बालमन में विचार आया कि पड़ोस में रहने वाले अंकल को इसकी खबर दी जाए, ताकि वे आकर उसके मम्मी-पापा को समझा कर झगड़ा खत्म करवा सकें। पहले भी तो वे कई बार मम्मी-पापा के झगड़े का निपटारा कर चुके हैं।

रिंकी को यह भी ध्यान न रहा कि रात के ग्यारह बज रहे हैं, उसे बाहर जाना चाहिए या नहीं। बस घर का दरवाजा खोला और तेजी से सड़क की ओर भागी। अचानक ही दौड़ कर सड़क पर आ जाने से सामने से आ रहा ट्रक अनियंत्रित होकर उसे ठोकर मारता हुआ निकल गया।

रिंकी ट्रक की चपेट में आने से तो बच गई, पर गंभीर रूप से घायल हो गई थी। सिर से काफी खून बह रहा था। सड़क से गुजर रहे लोगों ने उसे अस्पताल पहुंचाया। अंदर लड़ाई-झगड़े में व्यस्त रीता व रमेश को खबर ही नहीं कि बाहर क्या-कुछ हो गया।

काफी देर के बाद एक सज्जन ने उन्हें आकर खबर दी कि आपके घर के सामने एक सात- आठ साल की बच्ची दुर्घटनाग्रस्त हो गई है, क्या आप लोग उसे जानते हैं। वह तो अस्पताल में बेहोश पड़ी है, कुछ बोल ही नहीं पा रही है। वह बच्ची इसी घर के पास देखी गई थी, इसलिए मुझे लगा, शायद आप लोग ही उसके बारे में कुछ बता सकें। रीता रिंकी के कमरे की ओर भागी। कमरे में रिंकी को न पाकर उसके तो होश ही उड़ गए।

'रिंकी... जोर से चिल्लाती हुई वह बाहर आई। रिंकी कमरे में नहीं है। मेरी बच्ची रिंकी... प्लीज आज मुझे जल्दी उसके पास ले चलिए। सूचना देने वाले सज्जन ने कहा, 'आप बिल्कुल घबराइए मत। मैंने उसे सिटी अस्पताल में भर्ती करा दिया है। वहां डॉक्टर बहुत अच्छी तरह उसका ट्रीटमेंट कर रहे हैं। आप लोग चलिए मेरे साथ।

अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी रिंकी को देख रीता के सब्र का बांध टूट गया। 'रिंकी-रिंकी... मेरी बच्ची, ये क्या हो गया तुझे? कुछ बोल मेरी बच्ची। रीता उसके पलंग के पास ही बैठकर रोने लगी। रमेश का भी बुरा हाल था। वह उस सज्जन से ही दुर्घटना के बारे में पूछताछ करने लगा।

रमेश मन ही मन अपनी गलती स्वीकार कर रहा था। अपनी बच्ची की तरफ ध्यान नहीं दे पाया और पत्नी से भी बहसबाजी करता रहा। इसी बीच यह दुर्घटना हो गई। अचानक रिंकी बेहोशी की हालत में धीरे-धीरे बड़बड़ाने लगी, 'पापा, प्लीज मम्मी को मत मारो।

पापा मत लड़ो। मम्मी प्लीज आप भी मत लड़ो। पापा, मम्मी को मत मारो, मत मारो। रमेश डॉक्टर के पास दौड़ा, 'डॉक्टर प्लीज, जल्दी चलिए। शायद मेरी बेटी को होश आ गया है। डॉक्टर ने आकर मुआयना किया, 'आपकी बेटी शायद बहुत दहशत में है। बहुत डरी हुई है। किसी घटना का इसके मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ा है।

आपको इसका बहुत ध्यान रखना होगा। मैं अभी कुछ दवाइयां लिख देता हूं, आप देते रहिएगा। दो दिन तक बिना कुछ खाए-पिए रीता अपनी बेटी के सिरहाने बैठी रोती रही। वह यही सोच- सोच कर परेशान हुई जा रही थी कि अगर बच्ची को कुछ हो जाता तो वह क्या करती, कहां जाती। यह बच्ची ही तो है, जिसका चेहरा देख- देख कर वह जी रही है और इसके पापा के अत्याचारों को सह रही है।

आज रिंकी को पूरी तरह होश आ चुका है। अपने मम्मी, पापा को अपने पास खड़ा रोते देख वह भी रो पड़ी।

'पापा, मम्मी, प्लीज आप लोग झगड़ा मत करना। नहीं तो मैं फिर अंकल को बुलाने जाऊंगी और ट्रक से टकरा जाऊंगी। 'अच्छा... तो तुम अंकल को बुलाने जा रही थी और तभी यह एक्सीडेंट हुआ। 'हां मम्मी। रीता व रमेश दोनों अपनी बेटी के सामने आज अपने-आपको लज्जित महसूस कर रहे थे।

'बेटा, आप जल्दी से ठीक हो जाओ। फिर हम अच्छे से साथ में रहेंगे और कभी झगड़ा नहीं करेंगे। 'प्रॉमिस? 'हां बेटा प्रॉमिस। आज रिंकी की जो हालत हुई, वह रीता व रमेश के आपसी तनाव व झगड़े की वजह से हुई। उन्हें अपनी इस गलती का एहसास हो गया है कि उनके आपसी बर्ताव का उनकी बच्ची पर कितना बुरा असर पड़ रहा है। उसके भविष्य को ध्यान में रख कर दोनों ने तय कर लिया कि अब वे कभी ऐसा नहीं करेंगे।

आज रिंकी की अस्पताल से छुटटी  हो गई। दोनों अपनी बेटी को ले कर घर जा रहे हैं। इन दो दिनों के उपचार ने रिंकी की चोट का इलाज किया था और रमेश की सोच का। वह अपनी पत्नी को और बेटी को लेकर बढ़ चला उस मकान की तरह, जिसे उसे अब एक घर बनाना है। 

यह भी पढ़ें -विधवा - गृहलक्ष्मी कहानियां

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