माहवारी- सच से दूर है सच्चाई

दामिनी यादव

5th May 2021

नहंसो मर्दो कि जब मैं इस माहवारी के दर्द से छटपटाती हूं, क्योंकि इसी माहवारी के दर्द से मैं वो अभ्यास पाती हूं, जब नौ महीने बाद अपनी जान पर खेलकर तुम्हें दुनिया में लाती हूं, और इसी माहवारी की बदौलत मैं समय आने पर तुम्हें भ्रूण से इंसान बनाती हूं...

माहवारी- सच से दूर है सच्चाई

ये मेरी ही एक कविता 'माहवारी की अंतिम पंक्तियां हैं। शायद इन शब्दों से परे माहवारी की गहनता को समझने के लिए कुछ हो भी न, लेकिन आज भी गांवों तो दूर, बड़े शहरों से लेकर कथित मेट्रो सिटीज़ तक में इस विषय पर खुलकर बात करना एक बड़ी चुनौती है। आज भी इस विषय पर मौन रहना ही सबको 'नैतिक लगता है। माहवारी को एक स्त्री के नियमित जीवन में होने वाली एक सामान्य घटना न मानकर, इसे उसका 'अशुद्ध काल या 'नापाक होना माना जाता है। इसी वजह से औरत के अस्तित्व के साथ ही अस्तित्व में आई माहवारी के साथ कितनी गलतफहमियां, कितने संक्रमण, कितनी गंभीर बीमारियां, कितनी बंशिदें, कितने ही विवाद और कितनी ही समस्याएं जुड़ गईं, मगर जब इस पर बात ही नहीं होती तो इन समस्याओं के समाधान निकलेंगे कहां से?

परंपरा पाखंड नहीं होती

अभी कुछ ही समय बीता है इस बात को, जब सबरीमल मंदिर में सभी आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश का मामला एक बार फिर से गर्मा गया था। इस मंदिर में पहले बारह साल से अधिक और पचास साल से कम आयुवर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित था, यानी जिस आयुवर्ग में महिलाओं को माहवारी होती है। मंदिर की इस पाबंदी को कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का फैसला महिलाओं के पक्ष में आया था और सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिल गई थी। ज़ाहिर है, इस बात का कड़ा विरोध होना था, क्योंकि ये मामला धर्म की सत्ता को चुनौती देने का था, लेकिन हैरानी भी और दुख भी इस बात का था कि इस $फैसले का विरोध करने वालों में बड़ी संख्या स्वयं महिलाओं की ही थी।

भारत में आज भी इस बात में कुछ नया नहीं है कि माहवारी के दौरान औरतें पूजा-पाठ से दूर रहती हैं। वे अचार छूने से परहेज़ करती हैं, क्योंकि वे मानती हैं कि इससे अचार खराब हो जाएगा। ये कुछेक बातें उन सैकड़ों पबंदियों में से इक्का-दुक्का हैं, जिन्हें भारतीय महिलाएं कल भी मानती थीं और आज भी मानती हैं। मानो माहवारी न हुई, कोई खतरनाक घिनौना संक्रमण हो गया!

ये सब बातें करते हुए हम ये तक याद नहीं रखते कि माहवारी केवल भारतीय महिलाओं को ही नहीं होती है। विदेशी महिलाएं भी हर महीने इस मासिक चक्र से गुज़रती हैं। वर्तमान समय में वे पुरानी जीएल केयर्स २८ गृहलक्ष्मी जून २०१९ न हंसो मर्दो कि जब मैं इस माहवारी के दर्द से छटपटाती हूं, क्योंकि इसी माहवारी के दर्द से मैं वो अभ्यास पाती हूं, जब नौ महीने बाद अपनी जान पर खेलकर तुम्हें दुनिया में लाती हूं, और इसी माहवारी की बदौलत मैं समय आने पर तुम्हें भ्रूण से इंसान बनाती हूं... माहवारी- सच से दूर है सच्चाई दामिनी यादव मान्यताओं और वर्जनाओं को तोड़ भी रही हैं। अक्सर इस विषय में बात करते हुए प्रगतिशील लोग कह देते हैं कि माहवारी तो पूरी दुनिया में हर महिला को होती है, लेकिन इस दौरान वे तो अछूत नहीं बना दी जातीं।

दरअसल ये बात अधूरा सच है। प्रसिद्ध लेखिका सिमोन द बोउवार ने कहा था कि औरत का चेहरा पूरी दुनिया में एक सा ही है। ये उन्होंने पूरी तरह से सही कहा था। चाहे बात अरब के देशों की हो, चीन की हो, अमेरिका- अफ्रीका की हो या फ्रांस-जर्मनी की, माहवारी को लेकर हर जगह कोई न कोई भ्रांति, वर्जना या रोक-टोक ऐसी मिल ही जाती है कि लोग ये मानते चले जाने को विवश रहते हैं कि माहवारी किसी बीमारी से कम नहीं। जैसेकि चीन के लोग मानते हैं कि शरीर से निकलने वाला मवाद या अपशिष्ट तो गंदा है ही, मासिक धर्म का रक्त सबसे घिनौना है, क्योंकि ये अजन्मे गर्भ का रक्त होता है।

इसी तरह कैथलिक धर्म की मान्यता के अनुसार माहवारी के दौरान महिलाएं अशुद्ध हो जाती हैं और ये एक बड़ी वजह रही कि ईसाई धार्मिक मान्यता वाले देशों में महिलाएं लंबे समय तक ऊंचे ओहदों से दूर रखी गईं। कहने का मतलब ये है कि केवल ये कह देना कि माहवारी से जुड़ी भ्रांतियां और रूढ़िवाद सिर्फ भारत तक ही सीमित है, सही नहीं है। इस विषय में अनु भारतीय की किताब 'मैन्स्ट्रूएशन, रिलिजन एंड सोसायटी और इसी जैसी कई और किताबें समस्या से जुड़े मनोविज्ञान को समझने में बहुत मददगार साबित होती हैं। फिर भी पूरे अध्ययन से एक बात तो साफ हो ही जाती है कि इस समस्या का समाधान हमारे पूरे समाज की मानसिकता में छिपा है। ये तो इस विषय का केवल एक पक्ष है।

असल में आज भी शहरों तक में अगर किसी दुकान पर सैनेटरी पेड मांगा जाए तो उसे काली थैली में लपेटकर, छिपाते हुए पकड़ाया जाता है और गांव में तो सैनेटरी पेड इस्तेमाल ही न के बराबर होते हैं। हम ये बात एक शहर में बैठकर लिख रहे हैं, इसलिए इस पर यकीन करना भी मुश्किल लगता है कि भारत के बहुत से हिस्सों में महिलाएं माहवारी के दौरान सूखा हुआ गोबर, सूखे पत्ते, राख जैसी चीज़ें तक इस्तेमाल करती हैं। माहवारी के दौरान शहरों में भी बहुत सी महिलाएं आर्थिक अभाव में कपड़ा इस्तेमाल करती हैं, लेकिन ये कड़वा पहलू कम ही लोग जानते हैं कि एक बार की माहवारी के दौरान इस्तेमाल हो चुकने के बावजूद इसी कपड़े को महिलाएं धो-धोकर कई बार इस्तेमाल करती हैं।

ये बार-बार इस्तेमाल हुआ कपड़ा ही अनेक महिलाओं में भयानक संक्रमण का कारण बन जाता है तो ज़रा सोचकर देखिए कि जो महिलाएं मजबूर है सूखा गोबर, सूखे पत्ते, राख जैसी चीज़ें इस्तेमाल करने के लिए, उनका हश्र क्या होता होगा। हमारे देश का एक बड़ा वर्ग अभी भी 'वंचित वर्ग के अंतर्गत ही आता है, जिसके लिए दो समय की रोटी भी नियमित मिलना एक चुनौती है। ऐसे में माहवारी के दौरान इस्तेमाल करने के लिए पेड खरीदना उनकी स्थिति का घिनौना मखौल है। माहवारी से होने वाले दर्द के बावजूद, गांवों ही नहीं, शहरी महिलाएं भी बिस्तर पर लेटकर आराम नहीं करतीं, बल्कि अपने रोज़मर्रा के कामों में ही लगी रहती हैं। कुछ महिलाओं को दर्द नहीं भी होता, लेकिन अधिकांश महिलाओं को न सिर्फ दर्द होता है, बल्कि ये दर्द ऐसा होता है, जो उन्हें सीधा खड़ा तक नहीं होने देता, लेकिन फिर भी वे महिलाएं न सिर्फ़ सीधी खड़ी होती हैं, बल्कि अपने परिवार की रीढ़ की हड्डी की तरह तनी होती हैं, सारे कामों को सुचारू रूप से अंजाम देती हुई। हां मगर, इन्हीं जिम्मेदारियों के साथ ही साथ सहनी हैं पाबंदियां भी। तकलीफ तो शहरी महिलाओं की भी कम नहीं है, लेकिन गांव की महिलाएं आज भी कठिन शारीरिक श्रम करती हैं।

माहवारी के दौरान जितने सैनेटरी पेड इस्तेमाल होंगे, उतनी ही प्लास्टिक शीट भी बढ़ती जाएंगी, क्योंकि हर पेड में प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल होता ही है।

माहवारी के कारण उनकी तकलीफ का हम अंदाज़ा तक नहीं लगा सकते। कितनी ही बच्चियां इन पांच-छह दिनों में स्कूल तक नहीं जा पाती हैं, क्योंकि उनके पास पेड नहीं होते हैं। हालांकि कई संस्थाएं इस दिशा में का$फी राहत-कार्य करने की कोशिश कर रही हैं। वे स्कूलों में जाकर बच्चियों को मुफ्त पेड बांटती हैं, ताकि वे बच्चियां पेड की उपयोगिता समझकर उसे इस्तेमाल करें और नियमित रूप से स्कूल जाएं, ताकि उनकी पढ़ाई खराब न हो। ये कोशिश तो अच्छी है, मगर अधूरी है। जिस देश में आज भी हज़ारों-लाखों बच्चे 'मिड डे मील के लालच में स्कूल जाते हैं, वहां पेड की उपयोगिता अभी भी ज़्यादातर लोगों की समझ में नहीं आएगी। उनके लिए ये बेकार का खर्च है, जिसे हर कोई अफोर्ड नहीं कर सकता। माहवारी तो हर महीने होती है, मुफ्त पेड थोड़ी न हमेशा मिलते रहेंगे! इसके साथ ही इस वर्ग में सैनेटरी पेड इस्तेमाल न किए जाने की एक और वजह ये भी है कि पेड कैरी करने के लिए पेंटी पहने होना ज़रूरी है, जबकि इस वंचित वर्ग के लिए तो अंडरगारमेंट्स एक 'लग्ज़री या 'विलास है, ज़रूरत नहीं। ज़रूरत तो 'रोटी की होती है और कपड़ा तो सिर्फ़ इतनी मिल जाना ही का$फी होता है, जितने में शरीर छिप जाए। सैनेटरी पेड, उसके लिए अंडरगारमेंट्स, ये सब उनके लिए पूरी तरह से फजूलखर्ची है। कपड़े को ही वे बेस्ट ऑप्शन मानती हैं, क्योंकि कपड़ा तो बार-बार धोकर, सूखाकर फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि पेड तो एक बार इस्तेमाल कर लेने के बाद फेंकना ही पड़ता है।

समाधान में छिपी समस्या

माहवारी के दौरान सैनेटरी पेड को बढ़ावा देकर महिलाओं को संक्रमण से बचाने और उनके लिए इन पांच-छह दिनों को सहज बनाने की बात तो अपनी जगह ठीक है, लेकिन इसी के साथ जो एक $खतरा पूरी दुनिया पर लगातार बढ़ रहा है, उसकी सिरे से अनदेखी हो रही है। वह खतरा है प्लास्टिक का। सभी जानते हैं कि प्लास्टिक रोज़मर्रा के जीवन में जितनी सुविधा देता है, उससे ज़्यादा ये पर्यावरण पर खतरे को बढ़ा रहा है, क्योंकि प्लास्टिक को नष्ट करना एक चुनौती है, जिसे हम अभी हल नहीं कर पाए हैं। ऐसे में माहवारी के दौरान जितने सैनेटरी पेड इस्तेमाल होंगे, उतनी ही प्लास्टिक शीट भी बढ़ती जाएंगी, क्योंकि हर पेड में प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल होता ही है। इसके अलावा माहवारी के पांच-छह दिनों में पेड इस्तेमाल करने से प्लास्टिक लगातार त्वचा के संपर्क में रहती है, जोकि $खुद अपने- आप में एक बड़ा ख़तरा है। एक ऐसा खतरा, जिस पर केवल पेड की उपयोगिता देख रहे समाज की नज़र भी नहीं पड़ी है। दिक्कत ये है कि जो इन समस्याओं को समझकर इनके समाधान तलाश करने की कोशिश कर रहे हैं, वे समस्या को भी अपने ही चश्मे से देख रहे हैं और समाधान भी, जबकि ज़रूरत इन समस्याओं के मूल को समझकर, उस पर ज़मीनी स्तर पर काम करने की है। साथ ही ये भी अहम है कि एक समस्या का समाधान करते-करते कहीं दूसरा कोई उससे भी बड़ा संकट न पैदा हो जाए, लेकिन ये सब तो तब होगा, जब इस पर बात हो। माहवारी पर बातचीत तो अभी तक कुछेक सेमिनार, गोष्ठियों से निकलकर आम वर्ग तक नहीं पहुंच पाई है तो इसके समाधान का साझापन कहां से आएगा? सोचिए-सोचिए, इस सवाल का सीधा ताल्लुक हमारे अपने अस्तित्व से है। 

यहभीपढ़ें - अधूरा-अधूरा सा है महिला सशक्तीकरण

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