कैसे करें एडॉप्टेड चाइल्ड की प्यार-भरी परवरिश

दामिनी यादव

6th May 2021

अगर आप अपनी सूनी गोद भरने के लिए या फिर अपने परिवार में एक और सदस्य बढ़ाने के लिए बच्चा एडॉप्ट करने के बारे में सोच रहे हैं तो एक बार ये आलेख ज़रूर पढ़ें।

कैसे करें एडॉप्टेड चाइल्ड की प्यार-भरी परवरिश

जब भी आप किसी बच्चे को एडॉप्ट करते हैं, यानी गोद लेते हैं तो उस बच्चे को एक घर और प्यार करने वाले पेरेंट्स मिलते हैं और आपको अपने घर की बगिया में पालने-संभालने को एक खूबसूरत सा पौधा, जिसे आपको एक मज़बूत वृक्ष बनाना है। ये कई अजनबी जि़ंदगियों के एक साथ जुड़ने और फिर साथ-साथ चलने का नाम है।

समय के साथ जहां और दूसरी चीज़ों में बदलाव आया है, वहीं शादी के बारे में भी लोगों की धारणा बदली, जिससे लेट-मैरिज का कॉन्सेप्ट बहुत ज़्यादा बढ़ चला और फिर लेट-कंसीव करने से प्रेगनेंसी भी थोड़ी मुश्किल हो गई, जैसाकि हम आज के समाज में देख ही रहे हैं। इसके और भी दूसरे कई कारण हैं, लेकिन अगर गोद सूनी रह जाए तो उस सूनेपन को भरने में किसी बच्चे को गोद लेने, यानी एडॉप्ट करने का विकल्प सबसे अच्छा ऑप्शन है।

हालांकि ये बहुत अच्छी बात है कि एडॉप्शन का चलन आज काफी सहज भी हुआ है और बढ़ा भी है, लेकिन अभी भी ऐसे बहुत लोग हैं, जिन्हें किसी पराए बच्चे को अपनाने में बहुत हिचकिचाहट होती है। उनके मन में तरह-तरह की आशंकाएं होती हैं, ढेरों सवाल होते हैं। ये बहुत स्वाभाविक भी है, लेकिन बच्चा एडॉप्ट करने के लिए सिर्फ़ इतना काफी है कि आप एक बच्चे को इंसान बनाने में सक्षम हैं। याद रखिए, किसी बच्चे को जन्म देना और जि़ंदगी देना, दो अलग बातें हैं।

एक बच्चे और पेरेंट्स के बीच के तार जिस्म से ज़्यादा दिल से जुड़े होते हैं। कोई भी बच्चा अपना घर या पेरेंट्स नहीं चुन सकता, लेकिन पेरेंट्स ये चुन सकते हैं कि वह बच्चा उनकी गोद में आए या न आए, यानी एक बच्चे को जीवन देने का काम पेरे्ंट्स ही करते हैं, चाहे वह बच्चा आपका बायलॉजिकल हो या एडॉप्टेड। बच्चा एडॉप्ट करते समय पूरी तरह से सोच-समझकर ये निर्णय ज लीजिए और एक बार तय कर लेने के बाद सिर्फ़ ये याद रखिए कि जिस बच्चे को आपने गोद लिया है, उसकी इतिहास चाहे कुछ भी रहा हो, उसका भविष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ आप हैं। यहां हम कुछ ऐसे प्वॉइंट्स बता रहे हैं, जिनका ध्यान रखकर आप अपने बच्चे की परवरिश को और बेहतर बना सकते हैं। 

  1. बच्चे को सिर्फ़ प्यार समझ में आता है, इसलिए किसी भी और बात को याद रखने की बजाय सिर्फ़ ये याद रखिए कि जिसने आपकी सूनी गोद भरी है, आप भी उसकी जि़ंदगी से प्यार का अभाव और हर सूनापन दूर कर देंगे।
  2. प्यार सिर्फ़ करना ही का$फी नहीं होता। उसे जताना, उसका इज़हार करना भी उतना ही ज़रूरी है। ये बात बड़ों के मनोविज्ञान तक पर लागू होती है और यहां तो हम बच्चों की बातें कर रहे हैं। उस बच्चे के साथ बच्चा बन जाइए। हंसिए, तुतलाइए, उसके साथ ढेरों बातें बनाइए, उसे बार-बार चूमिए, सीने से लगाइए। बस, एक ही काम मत कीजिएगा। ये सब करते हुए एहसान मत जताइए। चाहे आप उस बच्चे को प्यार दें या उपहार, उसे ये मत जताइए कि वह कितना भाग्यशाली है। न तो खुद ऐसा करें, न ही अपने किसी परिचित, दोस्त, रिश्तेदार वगैरह को ऐसा करने दें।
  3. ये  बात भी हमेशा ध्यान रखिए कि आप अपने बच्चे को लाड़-प्यार तो भरपूर दें, लेकिन इसकी सीमा हमेशा इतनी हो कि यह उस बच्चे को बिगाड़ने या जि़द्दी बनाने का काम न कर दे। सही अनुशासन भी सच्चे प्यार का ही एक रूप होता है।
  4.  बच्चा एडॉप्ट करने वाले अधिकांश पेरेंट्स ये गलती करते हैं, वे उस बच्चे से एडॉप्शन की बात छिपाए रखते हैं। ये गलत है, क्योंकि ये बात कभी न कभी, कहीं न कहीं से उस तक पहुंचेगी ही। बेहतर है कि आप जितनी जल्दी हो सके, सही समय देखकर और सही तरीके से इस बात को उस बच्चे को बता दें। यकीन कीजिए, किसी भी बच्चे के लिए एक ही बात मायने रखती है और वह ये कि उसे घर-परिवार और परवरिश कैसी मिल रही है।
  5. अगर आपने बच्चे को उसकी शिशु अवस्था में ही अपना लिया है, तब भी उसके पोषण का पूरा ध्यान रखिए, क्योंकि ये बच्चे आमतौर पर गर्भ से ही पोषण की कमी से जूझ रहे होते हैं। ये भी काफी हद तक संभव होता है कि गर्भ में ही किसी तरह की नशे की चपेट में भी ये आ चुके हों। ऐसा तब होता है, जब उस बच्चे की बायलॉजिकल मां या उसके आस-पास का परिवेश इस तरह का रहा हो।
  6. अगर आपने थोड़ा बड़ा बच्चा अपनाया है तो इस बात को याद रखिए कि अभी तक अनुशासन के नाम पर या किसी भी और कारण से इन बच्चों को खाने-पीने की सीमित मात्रा ही मिलती रही है, इसलिए भोजन को लेकर इनके मन में एक तरह की लालसा या डर रहता है और ये अपने पास हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा भोजन रखना चाहते हैं। इस मनोविज्ञान को समझकर उसका निदान कीजिए।
  7. एडॉप्टेड बच्चे को भी नॉर्मल ही रहने दीजिए। उसे वे सारे अधिकार दीजिए, जो आपका बच्चा होने के नाते उसका हक है, जैसे- रूठना, जि़द करना, गुस्सा करना, ढेर सारी बातें शेयर करना, शरारतें करना, शोर मचाना वगैरह।
  8. बच्चे से न तो हर समय सहानुभूति दिखाते रहें और न ही एक्ट्रा स्पेशल फील कराएं। वह अब आपका बच्चा है और उसे बस वही रहने दें। प्यार की मिठास न तो इतनी कम रखें कि ज़ायका ही न आए और न इतनी बढ़ा दें कि डायबिटिज़ हो जाए। याद रखिए, बच्चे प्यार के अभाव में भी बिगड़ते हैं और प्यार की अधिकता से भी।
  9. बच्चे ही नहीं, बड़े भी, किसी भी तरह के बदलाव को धीरे-धीरे ही अपना पाते हैं, उसके अनुकूल हो पाते हैं। ऐसा करने में किसी को कम समय लगता है तो किसी को ज़्यादा। इस स्थिति को नॉर्मल होने में जो समय लग रहा है, उसे लगने दीजिए। बस ये जान लीजिए कि ये साथ पलों का नहीं, उम्र भर का है तो इसे संवरने में भी चाहे पल लगे या उम्र, लगने दीजिए।

 

एडॉप्टेड चाइल्ड की परवरिश में अहमियत एडॉप्शन को नहीं, रिश्ते को दीजिए। बच्चों के लिए सिर्फ़ यही मायने रखता है कि उनकी परवरिश कैसी हो रही है, चाहे वे आपके बायलॉजिकल बच्चे हों या एडॉप्टेड। उनके लिए सिर्फ़ आपका प्यार और केयर मायने रखती है। बच्चा कोई भी हो, उसकी जि़ंदगी को बनाने में सिर्फ़ अच्छी पेरेंटिंग का योगदान होता है। किसी और बात का कोई महत्त्व रह ही नहीं जाता। आप जब भी बच्चे को एडॉप्ट करें, सही समय पर और सही तरीके से उसे ये बात बता ज़रूर दें। इसमें छिपाने जैसा कुछ है ही नहीं। बस ध्यान आपको एक बच्चे के रूप में उसके मनोविज्ञान का रखना है।

कुछ अर्सा पहले आर्काइव्ज़ ऑफ पीडियाट्रिक एंड एडोलसेंट मेडिसिन में प्रकाशित एक शोधरिपोर्ट के आधार पर ये बात उभरकर सामने आई थी कि गोद लिए गए बच्चों के पालनपोषण में ऐसे किसी डर का कोई कारण नहीं होता, जैसाकि आमतौर पर बच्चा एडॉप्ट करने वाले पेरेंट्स के मन में होता है। यदि बच्चे को उसकी किशोरावस्था में गोद लिया जा रहा है तो उसका थोड़ा खास ख्याल रखने की ज़रूरत होती है, ताकि आगे चलकर उसे एडॉप्टीज़ एक्सटर्नलिजि़ंग डिज़ीज़ जैसे- अटेंशनडेफिसिटी/हायपरएक्टिविटी (एडीएचडी) तथा ओप्पोज़ीश्नल डीफेंट डिसऑर्डर आदि जैसे समस्याओं से बचाया जा सके। इनके होने का कारण ये होता है कि ये बच्चे मां के गर्भ में ही हानिकारक पदार्थों जैसे- शराब या किसी और तरह के नशे के संपर्क में आ चुके होते हैं।

इनमें पोषण की भी भारी कमी देखने को मिलती है। यह भी गर्भ से ही होती है, इसलिए इनके सही पोषण पर ध्यान दिए जाने की बहुत ज़रूरत होती है। जन्म के बाद भी इन बच्चों ने तकलीफ, भूख, अभाव, कुपोषण, उपेक्षा, मारपीट, दुख जैसी स्थितियों का सामना बहुत ही कम उम्र में कर लिया होता है। जो भी पेरेंट्स इन्हें एडॉप्ट करते हैं, ये उनका पहला फज़र् बन जाता है कि वे उन सब बातों को उस बच्चे के लिए धुंधली याद बना दें। डॉ. मार्गरेट केएस का कहना है कि गोद लिए बच्चे के पेरेंट्स को घबराने की कोई ज़रूरत नहीं होती। एडॉप्टेड बच्चे को भी वही केयर चाहिए, जो हर बच्चा चाहता है। हां, यदि अपने एडॉप्टेड बच्चे की किशोरावस्था में उसकी कोई भी बात आपको चिंता में डालती है तो उसके लिए आप तुरंत एक्टपर्ट की मदद ज़रूर लें। ठीक उसी तरह, जैसे किसी भी आम बच्चे के साथ होता है।

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