महिलाओं की समस्याओं को आज भी आधा-अधूरा ही समझा जाता है

अंशु गुप्ता

8th May 2021

अब मैं इस बीस साल के सफर को पीछे मुड़कर देखता हूं तो एक लंबा सफर नज़र आता है। जब मैंने शुरुआत की थी तो कोई ऐसा अनुभुव भी नहीं था और न ही ऐसी कोई नेटवॄकग थी। हम लोग तो बिल्कुल ही नए थे।

महिलाओं की समस्याओं को आज भी आधा-अधूरा ही समझा जाता है

इस क्षेत्र में आपके शुरुआती अनुभव क्या रहे थे?

अब मैं इस बीस साल के सफर को पीछे मुड़कर देखता हूं तो एक लंबा सफर नज़र आता है। जब मैंने शुरुआत की थी तो कोई ऐसा अनुभुव भी नहीं था और न ही ऐसी कोई नेटवॄकग थी। हम लोग तो बिल्कुल ही नए थे। एनजीओ शब्द से तो मेरा दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था कि सोचूं कि मुझे अपना कोई एनजीओ शुरू करना है। गूगल का तो बीस साल पहले हमने नाम भी नहीं सुना था कि इस बारे में इतनी आसानी से अवेयर हो जाएं, जैसा आज हो सकता था। किसी भी चीज़ के बारे में जानने का यही तरीका होता था कि या तो लाइब्रेरी में बैठकर ढूंढ़ा जाए, जो कि मुझसे कभी हुआ नहीं। दूसरा तरीका था कि किसी नेटवॄकग के ज़रिये जाकर मिल लो। वह भी नहीं हो पाया। फिर यही हो सकता था कि फोन पर बात कर लो। उस समय एसटीडी बूथ हुआ करते थे।

मैं आया था मीडिल क्लास बैकग्राउंड से। सो कॉल भी एसटीडी के बूथ रेट के हिसाब से ही चला करती थी। बार-बार मीडिल क्लास वैल्यूज़ आड़े आती थीं। हालांकि काम तो समाज का ही था, फिर भी हम समाज को ही ये नहीं कह सकते थे कि हमें इस काम के लिए पैसा भी चाहिए। तब का हर दिन स्ट्रगल का एक पूरा चैप्टर होता था। सब-कुछ मुश्किल होते हुए भी इंटरेस्टिंग था। एक तरह से अच्छा भी था, क्योंकि तभी हम अपने रास्ते अपने दम पर  निकाल सके। अब बीस साल बाद देखते हैं तो ये तो एक बहुत बड़ा फिल्ड हो चुका है। अब बहुत सारे लोग इस सेक्टर में काम कर रहे हैं। इस पर अवेयरनेस भी खूब है। खूब बातें, सेमिनार, कॉन्फ्रेंस वगैरह भी होती हैं। अच्छा है।

रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड मिलने का आपके लक्ष्य पर क्या असर पड़ा?

मुझे नहीं लगता कि इससे मेरे लक्ष्य, काम या तरीके पर कोई फर्क नहीं पड़ा। हां, इतना ज़रूर है कि लोग जानने लगे। खुद को भी और दूसरे जो बहुत से लोग हमसे जुड़े हैं, उन सभी को बहुत अच्छा लगा। जब मैग्सेसे ने कल्चर ऑफ गिविंग को चेंज करने की बात की सेनिटेशन में तो हम सभी को इस बात का सुकून मिला कि कुछ लोग वाकई हमारे मकसद को, हमारे काम करने के ढंग को और उसकी गहराई को समझते हैं। एक बात और ये भी है कि हम जैसे लोग, जो एक मिडिल क्लास फैमिली से निकलकर शहरों में आते हैं, उनके लिए ये सोच भी पाना कि लाइफ में हमारा नाम भी कभी किसी ऐसी लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जोकि सिर्फ एक इंस्पीरेशनल लिस्ट है, बहुत ही सुखद अनुभव तो है, लेकिन बहुत बड़ी जि़म्मेदारी भी है।

इस वक्त आप किन क्षेत्रों में काम करने की सख्त ज़रूरत महसूस कर रहे हैं?

मुझे लगता है कि सबसे ज़्यादा पानी पर काम करने की ज़रूरत है, क्योंकि हम अपने काम में पिछले कई सालों में ये देखा भी है और साबित भी किया है कि बहुत सारी समस्याओं की जड़ पानी ही है, चाहे बात इकोनॉमिक इश्यूज़ की हो, सोशल इश्यूज़ की हो, माइग्रेशन जैसी बड़ी और गंभीर समस्या की हो। कुछ ऐसी कोशिशें हुईं, जहां पर पीने के पानी को लेकर बात हुई, लेकिन शायद ही ऐसे ज़्यादा एफर्ट हुए हों, जहां पर इन समस्याओं की जड़ को समझा गया। मुझ कभी-कभी बहुत गुस्सा आता है इस बात पर कि भारत कोई ड्राई कंट्री नहीं है। यहां बहुत सारे हिस्सों में भारी बारिश अपने समय पर होती है।

यहां वॉटर प्रॉब्लम से ज़्यादा वॉटर मैनेजमेंट प्रॉब्लम है। ये बिल्कुल सच बात है कि अगर हम बारिश के पानी को रोक सकें, पानी की वेस्टेज को रोक सकें तो बहुत हद तक न्यूट्रीशन, माइग्रेशन पर असर पड़ेगा। आज आप ऐसी बहुत सारी जगहें देख सकती हैं, जहां मिडडे मील के नाम पर कागज़ों में कुछ-कुछ होता रहता है, लेकिन बच्चे हालात के चलते अपने पेरेंट्स के साथ पलायन करते हैं, माइग्रेशन करते हैं, क्योंकि उनके लिए पानी शिक्षा से ज़्यादा बड़ी समस्या है। तो आप सोचिए कि पानी का सीधा असर बच्चे की एजुकेशन पर भी है, डेवलपमेंट पर भी है। उसके बाद देखते हैं तो शहरों के लिए सबसे बड़ा इश्यू सेनिटेशन का है, जो है तो गांव में भी। अब देखिए कि धड़ाधड़ टॉयलेट बन रहे हैं, लेकिन बने इस तरीके से हैं कि पानी की प्रॉपर व्यवस्था नहीं है। टॉयलेट के $खाली होने की प्रॉपर व्यवस्था नहीं है। आखर में सारा गंद उसी पानी में मिक्स हो रहा है, जो हम पीने को मजबूर हैं। कोई प्रॉपर डिज़ाइन नहीं है, कोई मैकेनिज़्म नहीं है।

इस तरीके से आपको पता भी नहीं चलता कि आप एक प्रॉब्लम को सॉल्व करने में चार और खड़ी कर देते हैं। सेनिटेशन तो समस्या है ही, सच मानें तो आज शहरों की मुख्य समस्या भी पानी ही है। ये और बात है कि बोतलों में ही सही, अभी शहरों को पानी मिल रहा है तो वे इस समस्या की गंभीरता को समझ नहीं पा रहे हैं, जबकि नलों में प्रॉपर पानी आना तो कब का बंद हो चुका। अभी सबसे बड़ी अड़चनें क्या हैं? एक तरफ बहुत अच्छी सोच के हज़ारों लोग हमसे जुड़ते चले जाते हैं, दूसरी तरफ एक माइंड सेट ऐसा भी है लोगों का, जिसकी वजह से मैं कहता हूं कि हिंदुस्तान ऐसे गिने-चुने देशों में से है, जहां लोग बचा हुआ खाना अपनी मेड के लिए रखते हैं।

हमारे पास बहुत बड़ी तादाद में फटे-टूटे जूते आते हैं, गंदे-पुराने बर्तन आते हैं, यहां तक कि ब्लड लगे हुए अंडरगारमेंट्स तक आते हैं तो ये एक मानसिकता का सवाल है कि हम एक वर्ग को कैसे ट्रीट करते हैं। मुझे लगता है कि यदि हम वाकई बदलाव चाहते हैं तो वह यही मानसिकता वाला इश्यू है, जहां बहुत काम की ज़रूरत है। दूसरी बात ये है कि बहुत सारी संस्थाओं को, कॉर्पोरेट को ही नहीं, सरकार तक को लगता है कि सामान बांटना बहुत बड़ा समाधान है। किसी को लैपटॉप बांट दो, किसी को साइकिल बांट दो, खाना बांट दो।

इस तरह से आप एक इंसान की डिगनिटी खत्म करते चले जा रहे हैं। ये तो हमारी राह का सबसे बड़ा रोड़ा है, क्योंकि हम तो उससे बिल्कुल विपरीत लड़ाई लड़ रहे हैं। तीसरा जो हम देख रहे हैं, डिज़ास्टर, यानी प्राकृतिक आपदाओं की फ्रीक्वैंसी बढ़ी है। आप किसी इलाके में सालों तक जमकर काम कीजिए, कोई एक बाढ़ आती है और लोगों को दोबारा से शून्य पर पहुंचा देती है, इसलिए समस्याओं से ज़्यादा  समस्याओं के कारण समझना और उन पर काम करना ज़रूरी है।

संस्थापक- गूंज संस्था पुरस्कार- रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड, 2015 विशेषता- अपने सोशल वर्क के ज़रिये लोगों को दान देकर उनकी गरिमा को नष्ट करने की बजाय, उन्हें काम देकर उसका दाम चुकाने की रीत चलाई। अपनी संस्था की कार्यशैली से 'बेकार शब्द को हमेशा के लिए मिटा दिया। यहां एक टूटे हुए खिलौने, पूजा में इस्तेमाल के बाद बेकार रह गई चुन्नियां, खराब कैसेट्स, इस्तेमाल के बाद बची रह गई सेफ्टी पिन से लेकर, खून के धब्बों से भरे अंडरगारमेंट्स तक का 'सदुपयोग होता है। 

आपके साथ बहुत सी घरेलू महिलाएं भी जुड़ी हुई हैं। इस बारे में कुछ बताइए।

गूंज में तो अस्सी प्रतिशत से ज़्यादा घरेलू महिलाएं ही हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि एक पुरुष की कमाई का ज़्यादा हिस्सा कहां जाता है, इस बात पर सवाल उठ सकता है, लेकिन एक महिला की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा घर में और अपने बच्चों की पढ़ाई पर ही लगता है।

एक आम महिला की, चाहे वह अर्बन हो या रूरल, आप क्या स्थिति पाते हैं?

हम सा$फ पाते हैं कि समाज अभी तक रूढ़िवादी सोच से मुक्त नहीं हो पाया है। आर्थिक आत्मनिर्भरता को हमने महिला सशक्तीकरण का बहुत बड़ा आधार मान लिया है, लेकिन क्या हम इसका दूसरा पहलू जानने की कोशिश करते हैं कि नौकरी करने से एक महिला को मिला पैसा उसे एक सुविधा तो दे देता है, लेकिन आठ-दस घंटे काम करके जाने वाली कितनी महिलाओं के पति घर में उनके साथ बर्तन धुलवाने का काम करते हैं, क्योंकि वह महिला भी उन्हीं की तरह काम करके, थककर आई है? हमने महिलाओं की समस्याओं को भी दूसरी समस्याओं की तरह ही आधा-अधूरा समझा है।

घरेलू महिलाओं को अक्सर उसके परिवार वाले तक ज़्यादा अहमियत नहीं देते। फिर वह समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को कैसे निभा सकती हैं?

हम पूरी जि़ंदगी ये कहकर नहीं बैठ पाएंगे कि कोई हमें जगह नहीं दे रहा। अगर कोई चीज़ आपका हक है और वह आपको सही तरीके से नहीं मिल रहा तो छीन लीजिए। मैं तो इसे सही मानता हूं। जब आप सत्ता का विरोध करेंगी तो अपने विरोध के लिए भी तैयार रहिए, क्योंकि ये हक आपको इतनी आसानी से नहीं मिलने वाला, वर्ना कब का मिल चुका होता। सबसे बड़ी बात कि एक महिला दूसरी महिला का दमन बंद करे। फिर दोनों महिलाएं मिलकर अपना हक लें। जब आप वन प्लस वन बनेंगे, तभी स्थिति बदलेगी।

गृहलक्ष्मी मैगज़ीन के रीडर्स को क्या मैसेज देना चाहेंगे?

मैं तो एक बहुत सादी सी बात कहता हूं कि अगर आपको अपनी जगह बनानी है तो उसका संघर्ष भी आपका अपना ही होगा। हमें याद रखना है कि आज इस देश को व्यूअर्स की नहीं, डूअर्स की ज़रूरत है। मैं समझता हूं कि ये गृहलक्ष्मी के हर पाठक का दायित्व है और उसके लिए एक मौका है कि वह व्यूअर्स से डूअर्ट में कंवर्ट हों और शुरुआत अपने आस-पास की ज़रूरत को समझने और उसमें योगदान देने से करें।

यह भी पढ़ें -अपने बॉस से कभी न कहें ये 11 बातें

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