परिस्थितियों से लड़कर कमाई खुशिया

गृहलक्ष्मी टीम

8th May 2021

आज दुनिया का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां महिलाओं ने अपनी दृढ़ता और मेहनत से नाम न कमाया हो। अपने सपनों को पूरा करने के लिए वे घर से बाहर निकलीं और दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गईं।

परिस्थितियों से लड़कर कमाई खुशिया

कभी खाने को थे लाले, अब फूलों से महक उठा जीवन

कभी चीथड़ों में लिपटा बदन और कई-कई  जून भूखे पेट रहकर जिंदगी गुजारने वाली आशा देवी ने जब ठान लिया कि इस जिंदगी से तौबा कर अच्छी जिंदगी गुजारेंगे तो उनके जीवन में फूलों ने दस्तक दी। फूलों की खेती से अपने जीवन को नई दिशा देने वाली आशा देवी ने न सिर्फ अपने, बल्कि दर्जन भर और महिलाओं के जीवन में ऐसी खुशबू बिखेरी है कि उजड़ने के कगार पर पहुंची उनके जीवन की बगिया भी गुलजार हो उठी।

मेहनत और शिक्षा पर किया भरोसा

बिहार की राजधानी पटना से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित है बिहटा प्रखंड। यूं तो इस प्रखंड का अमहरा गांव आर्थिक और शैक्षणिक रूप से समृद्ध है, पर इसी गांव के एक कोने में कच्चे मकानों की दहलीज के भीतर कुछ महिलाओं की जिंदगी गरीबी की घुटन से कुम्हला रही थी। ऐसे में जीवन को बदलने की चाहत में प्रखंड की आशा देवी और सुनीता देवी घर की दहलीज लांघ कुदाल पकड़ खेतों में कूद पड़ीं। अपने छोटे से हिस्से की जमीन की छोटी सी बगिया में फूलों की खेती शुरू कर दी। 

दूसरों के लिए बनीं प्रेरणा

फूलों की खेती से दोनों महिलाओं का जीवन बदल गया और इसे देखते ही देखते दूसरे घरों से भी लगभग दर्जन-भर महिलाएं निकल पड़ीं। पहले तो सबने साक्षरता की सूची से खुद को जोड़ा। इसके बाद शुरू हुई, गरीबी से लड़ाई। जब हाथ से हाथ मिले और ताकत बने, तब बैंक भी साथ आए। सबने मिलकर 'ज्योति जीविका समूह बना डाला और बैंक से कर्ज लेकर सामूहिक रूप से फूलों की खेती में उतरीं, तब फूलों की खुशबू दूर-दूर तक बिखरने लगी और लक्ष्मी की कृपा भी बरसने लगी। आज न सिर्फ आशा देवी और सुनीता देवी, बल्कि अन्य सभी की जिंदगी में भी खुशहाली छा गई है। इनके फूलों की बाजार में काफी डिमांड है, इसलिए अच्छे दाम मिल जाते हैं। इनकी गरीबी भी छू मंतर हो गई और इन महिलाओं ने अपने ऊपर लदे कर्जों से भी मुक्ति पा ली है।

ये हैं बिहार की मशरूम लेडी, खुद से बदली किस्मत 

बात खेती-किसानी की करें तो देश में ऐसी कितनी ही सफल महिला किसान हैं, जो माटी से सोना उपजाने का काम कर रही हैं। ऐसी ही एक महिला किसान हैं बिहार की अनीता देवी, जो नालंदा जिले के चंडीपुर प्रखंड स्थित अनंतपुर गांव का एक चर्चित नाम हैं। बिहार में 'मशरूम लेडी के नाम से मशहूर हैं। वे खेत में ट्रेक्टर चलाती हैं, फसल उगाती हैं और महिलाओं को इसके लिए प्रेरित करती हैं कि ठान लीजिए तो मुश्किल कुछ नहीं है।

मुश्किल दिनों में दिखाई सूझ-बूझ

आठ साल पहले अनीता के पति संजय कुमार को जब नौकरी नहीं मिली तो वे हताश होकर गांव में खेती करने लगे। किसी तरह घर का खर्च चल जाता था। अनीता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहती थी, इसके लिए उन्होंने खुद ही कुछ नया करने की ठानी। अनीता बताती हैं कि वे गृह विज्ञान से स्नातक हैं। एक बार वे जिले में हरनौत कृषि विज्ञान केंद्र पर लगे कृषि मेले में गईं। केंद्र के वैज्ञानिकों ने उन्हें मशरूम की खेती के फायदे बताए। अनीता को मशरूम की खेती का ख्याल आया और उन्होंने ठान लिया कि वे इसे ही अपने रोजगार का हिस्सा बनाएंगी। मशरूम उत्पादन की पूरी ट्रेनिंग के लिए वे उत्तराखंड स्थित पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय गईं और वहां वैज्ञानिकों से मशरूम उत्पादन की नवीनतम तकनीक की जानकारी ली। फिर उन्होंने समस्तीपुर स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद कृषि यूनीवर्सिटी से भी मशरूम की खेती के बारे में ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग लेकर उन्होंने आयस्टर और बटन मशरूम का उत्पादन शुरू कर दिया। अनीता के पति संजय ने मशरूम की बिक्री का जि़म्मा संभाल लिया। अनीता का यह व्यवसाय चल निकला। धीरे-धीरे उन्होंने अपने साथ गांव की अन्य महिलाओं को भी साथ जोड़ा और बड़े पैमाने पर मशरूम उत्पादन करने लगीं।

बनाई अपनी लिमिटेड कंपनी

जब उनसे और महिलाएं जुड़ने लगीं, मशरूम का उत्पादन अच्छा-खासा होने लगा तो अनीता ने 'माधोपुर फॉर्मर्स प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड की स्थापना की। उनके ग्रुप से आज 5 हजार महिलाएं जुड़ी हुई हैं। इस कंपनी से उन्हें 15-20 लाख रुपये सालाना की आमदनी हो रही है। 

मेंटल हेल्थ की दिशा में फैला रही हैं जागरुकता

देश  की मेंटल हेल्थ को दुरुस्त रखने और इस दिशा में लोगों में जागरुकता फैलाने की दिशा में काम कर रहीं डॉ. प्रकृति पोद्दार 'माइंड ओवर इमेज की संस्थापक 'पोद्दार फाउंडेशन की मैनेजिंग ट्रस्टी हैं और पोद्दार वेलनेस लिमिटेड की निदेशक भी हैं। मेंटल हेल्थ की दुनिया में अपनी पहचान बना चुकीं प्रकृति के लिए इस दिशा में आना इतना आसान नहीं था। उस वक्त इस तरह की बातें लोग कम करते व सुनते थे। दूसरा, वे ऐसे परिवार में पली-बढ़ी थीं, जहां सभी बैंकर थे और बड़े होते हुए उनके पापा प्रकृति के लिए भी यही चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे प्रकृति की रुचि अपनी नानी, जो कि एक फेथ हीलर थीं, के काम में भी बढ़ने लगी। हालांकि उनके करियर की शुरुआत तो पापा की पसंद के अनुसार ही हुई, लेकिन प्रकृति तब ज्यादा अच्छा महसूस करती थीं, जब वे किसी से बात करती थीं, किसी की परेशानी सुनती थींं और उसे कुछ सुझाव देतीं या फिर उसकी कोई मदद कर पाती थीं।

बैंकिंग छोड़, वेलनेस से जुड़ीं

कनाडा में कई साल रहने के बाद स्वदेश लौटकर प्रकृति ने कॉर्पोरेट और पर्सनल वेलनेस के क्षेत्र में काम करना शुरू किया। कुछ समय बाद उन्होंने माइंड ओवर इमेज कंसल्टिंग की स्थापना की। ये एक ऐसा संस्थान है, जो व्यक्ति की मेंटल हेल्थ से जुड़ी परेशानियों पर तो काम करता ही है, उसे कॉर्पोरेट काउंसलिंग, सॉफ्ट स्किल डेवलपमेंट और लाइफ कोचिंग भी देता है। ये देश का एकमात्र ऐसा वेलनेस केंद्र है, जहां लोगों की पारंपरिक और आधुनिक तरीके से काउंसलिंग व मेंटल हेल्थ में सुधार किया जाता है। प्रकृति यहीं पर नहीं रुकीं। उन्होंने गहन हीलिंग के लिए कई नई तकनीकों का विकास और प्रयोग किया और आज वे एक प्रामाणित न्यूरोफीडबैक टेक्नीशियन हैं।

जरूरतमंदों के लिए शुरू किया काम

बड़े कॉर्पोरेट हाउसेज़ व पढ़े-लिखे उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों के साथ काम करने के बाद प्रकृति ने ऐसे जरूरतमंद लोगों के लिए काम करना शुरू किया, जिनकी मेंटल हेल्थ पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। इन्हीं लोगों के लिए काम करते हुए उन्होंने 'पोद्दार फाउंडेशन की नींव रखी। बतौर मैनेजिंग ट्रस्टी वे हमेशा नए तरीकों से लोगों को उन परिस्थितियों से बचाने की कोशिश करती हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। 'साइलेंस तोड़ो संस्था की ऐसी ही एक पहल है, जिसमें लोगों के मन में मानसिक रोगों के प्रति मौजूद कुंठा को कम करने की कोशिश की जाती है। आज वे अपनी संस्था से ग्राम पंचायत, आंगनवाड़ी की सदस्यों के साथ-साथ देश के कई स्कूल्स और गांवों में भी लोगों को मानसिक रोगों के प्रति जागरूक करती हैं।

पा चुकी हैं कई सम्मान

मानसिक रोगों के प्रति ऐसे समय से काम करने की शुरुआत करना, जब लोग इसके बारे में बात करने से भी हिचकिचाते थे, प्रकृति ने ये पहल की और आज उनकी मेहनत के लिए कई बार उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है। वे अक्सर अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय मंचों पर अपने विचार रखती रही हैं।

यह भी पढ़ें -नहीं करने चाहिए प्रेगनेंट महिलाओं को ये काम, हो सकती है दिक्कत

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