क्यों है बौद्घ धर्म में स्तूप का इतना महत्त्व?

भावना श्रीवास्तव

12th May 2021

स्तूप का शाब्दिक अर्थ होता है- 'किसी वस्तु का ढेर। जिसका प्रयोग पवित्र बौद्घ अवशेषों को रखने के लिए किया जाता है। स्तूप का बौद्घ धर्म में विशेष महत्त्व है। आइए लेख में इस पर विस्तार से चर्चा करें।

क्यों है बौद्घ धर्म में स्तूप का इतना महत्त्व?

जब से बौद्ध धर्म पृथ्वी पर आया तभी से स्तूप बनने शुरू हुए। स्तूप संस्कृत का शब्द है। यह प्रतीक है ज्ञानोदय का यह सिर का ऊपर का हिस्सा है। जिसका अर्थ होता है शिखर तक पहुंचना। यह पवित्र गतिविधि है स्तूप बहुत शक्तिशाली हैं जो हमारी नकारात्मक सोच को शुद्ध करते हैं। जहां कहीं भी स्तूप बनाए जाते हैं वह स्थान बनता है बहुत ही शक्तिशाली, उपचारात्मक और प्रेरित करने वाला यह प्रचलित दर्जा है कला और वास्तुशिल्प का।

कब और कैसे बने स्तूप

स्तूपों का निर्माण होना कैसे शुरू हुआ, इस विषय में एक कथा प्रचलित है। जब भगवान गौतम बुद्ध अंतिम क्षणों में रोग- शय्या पर पड़े थे तब उनके पास बैठे दुखी भिक्षुगण यह जानना चाहते थे कि उनकी मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार कैसे करें? तब उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनन्द से कहा 'आनन्द जैसे चक्रवर्ती राजा का होता है इसीलिए उनके शिष्यों ने जब भगवान बुद्ध का देहान्त हुआ उनके दाहसंस्कार के बाद उनकी अस्थियों के ऊपर मिट्टी और पाषाणों का स्तूपाकार ढेर निर्मित कर दिया। इससे यह पता चलता है कि स्तूप मृत्यु संबंधी थे। तथा यह किसी के अंतिम संस्कार स्थल या मृतक की अस्थियों के ऊपर बनाए जाते थे। इस प्रकार बौद्ध स्थापत्य कला की शुरुआत स्तूप से हुई। उस समय महान बोधिसत्वों की अस्थियों पर बनाई गई समाधियां स्तूप कहलाने लगीं।

यद्यपि प्रारंभ में अस्थियों के ऊपर ही स्तूप बनाए जाते थे। किंतु बाद में आगे चलकर बौद्ध धर्म के स्मारक स्थानों पर भी स्तूप बनाए जाने लगे। भगवान बुद्ध की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियों के प्रश्न को लेकर विवाद हुआ था। इस वजह से उनकी अस्थियों को राजग्रह, वैशाली, कपिलवस्तु, अल्लकप, पावा, रामग्राम, वैदद्धीप, कुशी नगर, इन आठ स्थानों पर रखवाकर स्तूप बनवा दिए गए थे। कहा जाता है कि अशोक ने उन आठ स्थानों से अस्थियां निकालकर उन्हें चौरासी हजार स्तूपों में सुरक्षित कराया था। इस बात पर संशय हो सकता है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि अशोक ने भारी संस्था में स्तूपों का निार्माण कराया था। अशोक के बाद भी स्तूपों का निर्माण हुआ था। जिनमें सांची और सारनाथ के स्तूप अधिक महत्वपूर्ण है।  

स्तूपों का निर्माण कैसे होता था

सबसे पहले स्तूप मिट्टी और कच्ची मिट्टी से बनाए जाते थे। इनका निर्माण श्मशान या मुख्य मार्गों के चौराहे पर होता था। इन स्तूपों में महापुरुषों की भस्म, केश, नश और अस्थियां एक पिटारी में इक्कठा करके रखी जाती थीं। यह स्तूप वृत्तात्मक या वर्गाकार बनाए जाते थे। इनके चारों तरफ कहीं पर पत्थर की वेष्टनिया है और कहीं नहीं है सबसे पुराना स्तूप नेपाल की सीमा पर पिग्रहवा में है। जो कहा जाता है कि अशोक से भी पहले और बुद्ध के कुछ समय बाद का है। धरती पर इसका व्यास 116 फुट है तथा ऊंचाई केवल 22 फुट है। यह 35 सेमी. 25 सेमी. 8 सेमी. मोटी ईंटों का बना है। प्राचीन स्तूप भीतर से खोखले या ठोस कच्ची ईंटों से बने हैं और पत्थर की रेलिंग से घिरे हैं। मिट्टी की ईंटों से बने होने पर भी अक्सर उन्हें पक्की जुड़ाई से ऊपर से ढक देते थे। सांची और सारनाथ के स्तूप इसी प्रकार से बने हैं। स्तूपों के नीचे आधार को मेधि कहा जाता है। मेधि की भूमि, रेलिंग व स्तूप के बीच प्रदक्षिणा पथ का काम देती है जो गुम्बजा आकार होता है उसके ऊपर हर्मिका होती है जिसके ऊपर निकली हुई धातुष्टि नीचे अंड को भेदती हुई गहरी चली जाती है। यह यष्टि ऊपर के छत्र या छत्रों का दंड बन जाती है चोटी पर बने कलश को वर्ष स्थल कहते हैं। यह स्तूप का साधारण रूप है। वैसे उसका आकार बाद में बदलता गया है।

धर्म राजिक स्तूप

वाराणसी में सारनाथ के पास धर्मराजिक स्तूप है। माना जाता है कि इसे अशोक ने ही निर्मित कराया था। छठी से बारहवीं सदी तक हम स्तूप को छह बार आच्छादित (पत्थर की शिलाओं का आवरण) किया गया था। यह स्तूप पाषाण के ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है तथा इसके ऊपर का भाग ईंटों का बना है।

बौद्ध गया के स्तूप

गया में महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए इस स्थान को बौद्ध गया कहते हैं। बुद्ध की मृत्यु के बाद यहां भी वेदिका निर्मित हुई थी। राजा पूर्व वर्मा ने इनका विस्तार करवाया था। इसकी परिधि में अनेक छोटे-छोटे स्तूप बने हुए हैं। यह स्तूप मरहुत के स्तूप से कला के क्षेत्र में उच्चतर समझा जाता है।

सांची के स्तूप

सांची का स्तूप बौद्ध स्थापत्य कला में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर इसका निर्माण करवाया था। एक सदी बाद इसमें परिवर्तन हुए। यह विदिशा से छह मील की दूरी पर स्थित है। इसकी ऊंचाई 54 फीट है तथा अर्द्धगोलाकार है इस स्तूप में मौर्यकालीन ईंटों का प्रयोग किया गया है। जो 16 इंच लंबी, 10 इंच चौड़ी तथा 3 इंच मोटी है।

सांची की पहाड़ी के पत्थर भी इसमें प्रयुक्त किए गए हैं, ईंटों से चिनाई करने के बाद उन पर आठ इंच मोटा चूने का लेप किया गया है। इसकी वेदिका का व्यास 120 फीट है तथा स्तूप का व्यास 100 फीट है। वेदिका की ऊंचाई 11 फीट है तथा वेदिका में चौकोर खंभे हैं। खंभों को जोड़ने में चूने व गारे का प्रयोग किया गया है। खंभों की ऊंचाई 9 फीट है तथा इन खंभों को 2 फीट चौड़ी फलकों से जोड़ा गया है। खंभे व फलक कलापूर्ण कृतियों से अलंकृत हैं। तोरणद्धारों पर यदा यक्षणियों व महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित चित्र उत्कीर्ण हैं। सांची के तोरणों पर सात मानुषी बुद्ध, बुद्ध के अवशेषों के लिए संघर्ष, भगवान के विभिन्न प्रदर्शन तथा षंडदन्त, वेसन्तर, महा कवि आदि जातकों का चित्रण भी मिलता है स्तूप के चारों तरफ पत्थर की रेलिंग हैं तथा प्रदशिणां पथ भी है। स्तूप के सबसे ऊपरी भाग पर दंडमय छत्र है। रेलिंग पर भी बुद्ध जीवन से संबंधित अनेक गाथाएं उत्कीर्ण हैं। पशु-पक्षी, देव, यक्ष, गन्धर्व, मानव आदि भी पाषाण में उत्कीर्ण हैं। काश्यप का धर्म परिवर्तन और राजा शुद्धोधन के दीक्षित होने की घटनाओं को भी प्रस्तर पर उत्कीर्ण किया गया है। मूल स्तूप के चारों तरफ पहाड़ी पर अन्य कई स्तूप बने हुए हैं यह स्तूप भी कलात्मक है। अलंकरण की दृष्टि से रांची के स्तूप के तोरण द्वारों की कला सर्वोत्तम मानी जाती है।

दक्षिण भारत के स्तूप

दक्षिण भारत में भी अनेक स्तूपों का निर्माण हुआ था। जिसमें अमरावती और नागार्जुन कोंडा के स्तूप सबसे अधिक प्रसिद्ध है अमरावती का स्तूप वर्तमान आंध्रप्रदेश में कृष्णा नदी के दक्षिणी तट पर बना हुआ है यह स्तूप उत्तरी भारत के स्तूपों से भिन्न है। इसका चबूतरा ईंटों से बनाया गया है जबकि उत्तर भारत के चबूतरे ठोस मिट्टी से बने हुए हैं। अमरावती का स्तूप आंध्र सातवाहन शासकों की कीर्ति का प्रतीक है। यह स्तूप संगमरमर की शिला पट्टिकाओं से ढका हुआ तथा इन पट्टिकाओं पर बुद्ध के जीवन उसकी उपासना के अनेक दृश्य, मानव आकृतियां, पशु-अलंकरण, तोरण आदि  अंकित किए गए हैं। भगवान बुद्ध के जन्म के प्रतीक हाथ को जिस रूप में यहां उत्कीर्ण किया गया है। वैसा और कहीं उपलब्ध नहीं है। हाथी के आकृति के सिरे पर वृक्ष की पूजा दिखाई गई है। अमरावती के स्तूप का अलंकरण सर्वोपरि है क्योंकि इसके अलंकरण की और विशेष ध्यान दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसका अलंकरण वर्षों तक निरन्तर चलता रहा। किंतु नागार्जुन कोंडा के स्तूप में अमरावती जैसी सजीवता नहीं है।

बौद्ध धर्मावलम्बी कनिष्क के स्तूप

बौद्ध धर्मावलम्बी कनिष्क ने भी अनेक स्तूप बनवाए। कनिष्क द्वारा अपनी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) में बनाया हुआ स्तूप अपनी भव्यता ऊंचाई और कला के लिए प्रसिद्ध था। इस स्तूप की ऊंचाई 638 फुट, आधार पांच मंजिलों का 150 फुट, इसकी परिधि 1250 गज तथा इसकी रेलिंग 150 फुट है। सबसे ऊपर स्वर्ण ताम के लगे 25 चक्र थे। उनके पास मूर्तियों से अलंकृत एक-एक मीटर और दूसरा डेढ़ मीटर ऊंचा स्तूप था। वहीं दो मूर्तियां भी थीं जिनमें से एक में बुद्ध बोधिवृक्ष के नीचे पालथी लगाकर बैठे दिखाए गए हैं।

कनिष्क के बाद के स्तूप

कनिष्क के बाद दूसरी से लेकर पांचवीं शताब्दी तक उत्तर पश्चिम भारत में अनेक स्तूप बनाए गए। इन स्तूपों की विशेषता यह थी कि गांधार शैली के बने हैं। इस शैली के स्तूपों की विशेषता यह थी कि वे कृत्रिम ऊंचे चबूतरों पर बनाए जाते थे। और उनकी ऊंचाई बहुत ज्यादा होती थी। उनको ऊंचा दिखाने के लिए उन पर कृत्रिम छत्र लगा दिया जाता था। इसका प्रदक्षिणा पथ वर्गाकार होता था। इन स्तूपों पर बुद्धमूर्तियां प्रचूर मात्रा में अंकित होती थीं। इन स्तूपों के निकट महाविहार होते थे ऐसे विशाल स्तूपों के अवशेष रावलपिंडी (पाकिस्तान) तक्षशिला, मणिक्यमाला, बहलोल, जमालगढ़ी तथा चार सद्धा (पेशावर जिला) में उपलब्ध हुए हैं। पांचवीं से छठी शताब्दी में सिंधु प्रदेश में गांधार शैली के कई स्तूप बनाए गए। मीरपुर में एक ऐसा स्तूप प्राप्त हुआ जिसके आधार पर तीन कोठरियां हैं। जिनमें बुद्ध की प्रतिमाएं प्रतिस्थापित हैं।

गुप्त काल के स्तूप

गुप्त काल में भी सर्वत्र स्तूप बने। अधिकतर वे गांधार प्रदेश, मथुरा आदि में थे। मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग में उनमें से दो आज भी विद्यमान हैं। एक सारनाथ में दूसरा पटना के निकट राजगिर में। स्तंभों की यह परंपरा पिछले काल तक लगातार चलती रही। उनमें से कुछ सांची के स्तूपों (जिनमें बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र आदि मोदगलायन की अस्थियां संचित हैं।) की भांति अस्थि रखने के लिए खोखले बने थे। कुछ केवल स्मारक के रूप में ठोस बाद में प्राय: पूजा के लिए भी उनका निर्माण होने लगा। तीर्थस्थान पर जाते ही बौद्ध अपने निजी दो दो, चार-चार, दस-दस फुट ऊंचे स्तूप खड़े कर लेते थे। दसवीं ग्यारवीं शताब्दी में मिट्टी चूने के ठीकरे स्तूप की आकृति उभारे हुए प्रस्तुत हुए हैं।

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