जैन धर्म के श्रद्धा स्थल

सुनीत भास्कर

12th May 2021

यूं तो भगवान महावीर व जैन धर्म से जुड़े विश्व भर में कई मंदिर हैं परंतु कुछ मंदिर ऐसे हैं जो अपनी मान्यता और कारीगिरी के लिए बेजोड़ हैं। जिनकी खूबसूरती व नक्काशी को देखने के लिए लोग विश्व के कोने-कोने से आते हैं। प्रस्तुत है ऐसे मंदिरों की झलक व परिचय।

जैन धर्म के श्रद्धा स्थल

भक्तगण अपने इष्ट के स्मृति चिह्नï स्वरूप मंदिर बनवाते हैं। यही मंदिर परस्पर प्रेम-भाव, एकता व सौहार्द्र के प्रतीक बन जाते हैं। जैन धर्म में श्वेतांबर व दिगंबर जैन मंदिर बनवाने की परंपरा रही है। इन मंदिरों की विशेषता यह है कि अधिकांश मंदिर, कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।

कर्नाटक का जैन मंदिर

कर्नाटक के हासन जिले में सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ 'श्रावण बेलगोला है। यहां भगवान बाहुबलि या गोमटेश्वर की 57 फुट ऊंची प्रतिमा एक ही पत्थर खंड को तराश कर बनाई गई है। पर्वत शिखर तक पहुंचने के लिए 600 सीढ़ियां पार करनी पड़ती हैं। पूर्ण रूप से नग्न मूर्ति, एक सटीक अनुपात में बनी हैं। मूर्ति का महामस्तकाभिषेक करने की परंपरा काफी समय से चली आ रही है। 12 वर्ष में एक बार, 70 फुट ऊंचा मचान बनाया जाता है, जिस पर 30 पुजारी एक साथ खड़े होकर भगवान के मस्तक पर एक हजार आठ सौ कलशों का जल उड़ेलते हैं व 15 बहुमूल्य धातुओं से मूर्ति का शास्त्रीय विधि से प्रक्षालन किया जाता है। इस स्थान के आसपास जैन तीर्थों के अवशेष देखे जा सकते हैं।

राजस्थान का जैन मंदिर

राजस्थान का एकमात्र पर्वतीय स्थल, एक प्रमुख जैन तीर्थ भी है। 11वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य चालुक्य राजाओं ने दिलवाड़ा के जैन मंदिर बनवाए। मंदिरों में संगरमर की अद्भुत कारीगिरी मन मोह लेती है। विमल शाह व तेजपाल के मंदिर की वास्तुकला व मूर्तिकला अद्वितीय है। मंदिर के भीतर भी चारों ओर तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की 50-60 मूर्तियां हैं। दूसरा मंदिर पीतलहार मंदिर है जहां भगवान ऋषभ देव की 108 मन की पंचधातु की मूर्ति है। खतरवसी के तीन मंजिला मंदिर में भगवान चिंतामणि पार्श्वनाथ विराजमान हैं। चौथा मंदिर, कुंवारी कन्या व रसिया बालम का है। मंदिरों की नक्काशीदार छतें, सुंदर बेलें, जालीदारी नक्काशी से सजे तोरण, पशु-पक्षियों की आकृतियां व जैन तीर्थंकरों की सौम्य प्रतिमाएं मन मोह लेती हैं।

गुजरात के जैन मंदिर

गुजरात के अहमदाबाद शहर में हठी सिंह मंदिर, सफेद संगमरमर का बना जैन मंदिर है। यह पांचवें तीर्थंकर धर्मनाथ को समर्पित है। इसकी बारीक नक्काशी आबू के दिलवाड़ा मंदिरों की याद दिलाती है। अहमदाबाद के ही भोयणी गांव में स्त्री तीर्थंकर भगवान मल्लीनाथ का तीर्थ स्थान है। वे जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर थे। यहां प्रतिवर्ष माघ, माह में मेला भी लगता है। पालीनाना नगर व शत्रुंजय पर्वत, जैनियों के प्रमुख तीर्थस्थल हैं।

यह स्थान मंदिरों का महानगर कहलाता है। जैन भक्तों द्वारा बनाए गए यह मंदिर, जैन तीर्थंकरों को समर्पित हैं। भक्तों का मानना है कि मंदिर निर्माण करवाने से उनकी आत्मा को मोक्ष प्राप्त होगा। शंत्रुजय पहाड़ के मंदिर सबसे सुंदर हैं। यह जैन धर्म के पांच पवित्रतम पर्वतों, आबू, कैलाश, गिरनार, सिद्धाचल व पारसनाथ में एक है। इसे 'सिद्वाचल भी कहते हैं। इस पर्वत की घाटी में पालीताना शहर बसा है। यहां बने संगमरमर के 683 मंदिर, प्राचीन स्थापत्यकला के अद्भुत नमूने हैं। यह मंदिर विभिन्न समूहों में बने हैं तथा हर समूह के अंदर एक मुख्य मंदिर है, जिसके आसपास छोटे-छोटे मंदिर हैं। इनकी बारीक नक्काशी मन मोह लेती है।

यहां के आदिनाथ मंदिर, कुमारपाल मंदिर व विमलशाल मंदिर मुख्य रूप से दर्शनीय हैं। इस पर्वत पर रात्रि में जैन-मुनियों तक को रुकने की आज्ञा नहीं है। 600 मीटर की ऊंचाई पर बने इन मंदिरों तक पहुंचने के लिए रोप-वे की सुविधा है। गिरनार पर्वत भी एक जैन तीर्थ है। इस शिखर पर 16 जैन मंदिर स्थित हैं। 'श्री नेमिनाथ जी का मंदिर सबसे सुंदर है। इसकी मूर्ति सोने के आभूषणों से सुसज्जित है।

झारखंड व बिहार के जैन मंदिर

झारखंड के सबसे ऊंचे पर्वत पारसनाथ को जैन धर्मावलंबी, श्री सम्भेद शिखर के नाम से पुकारते हैं। यहां जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ स्वामी ने अंत में मोक्ष प्राप्त किया, उन्हीं के नाम पर पर्वत का नाम पड़ा। इस पर्वत की वंदना करने में 28-30 कि.मी. का भ्रमण करना पड़ता ह झारखंड के सबसे ऊंचे पर्वत पारसनाथ को जैन धर्मावलंबी, श्री सम्भेद शिखर के नाम से पुकारते हैं। यहां जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया।

कुंथुनाथ स्वामी तथा गणधर महाराज की टोंक आदिनाथ स्वामी की टोंक, पार्श्वनाथ स्वामी का भव्य श्वेत मंदिर, नंदीश्वर द्वीप, सहस्रकूट जिन चैत्यालय में जिनेंद्र देव की एक हजार मूर्तियां व मान स्तंभ आदि पवित्र धार्मिक स्थल हैं। कोल्हुआ पर्वत पर, तालाब के किनारे, एक विशाल गुफा में काले पत्थर से निर्मित नव सर्प छत्रों से युक्त प्रतिमा है। जैनी इसे 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति मानते हैं तथा हिन्दू भैरवनाथ की मूर्ति मानते हैं। दोनों धर्मों के अनुयायी अपनी आस्था के अनुसार पूजन करते हैं।

ईसा से 490 वर्ष पूर्व भगवान महावीर ने पावापुरी में ही निर्वाण प्राप्त किया था अत: यह स्थान जैन धर्मानुयायियों के लिए प्रमुख है। पावापुरी में कई छोटे-बड़े जैन-मंदिर हैं, जिनमें पांच मंदिर प्रमुख हं। यहां के 'जल मंदिर में भगवान महावीर का दाह-संस्कार हुआ था। यह सुंदर मंदिर कमल के फूलों से भरी झील से घिरा है। कहते हैं कि भगवान महावीर का पूरा शरीर कपूर की तरह उड़ गया था केवल बाल और नाखून बचे थे, उनके दाह-संस्कार में काफी भीड़ थी। दाह की राख उठाते-उठाते लोग मिट्टी उठाने लगे और वहां एक गड्ढï बन गया। जिसने बाद में तालाब का रूप ले लिया। इस तालाब के बीच में ही कमल सरोवर पर जल मंदिर बनाया गया है। जहां महावीर भगवान ने प्रथम व अंतिम उपदेश दिया, वहां 'समोसरण मंदिर बना है।

दादावाड़ी मंदिर भी समोसरण मंदिर के पास है। इसमें प्रथम गणधर, पंचम गणधर, सुधर्मा गणधर तथा भगवान महावीर की मूर्तियां हैं। पावापुरी के अधिकांश मंदिर, भगवान महावीर की स्मृति में ही बने हैं। 24वें तीर्थकर भगवान महावीर ने अपने जीवन के 14 वर्ष राजगीर में बिताए। यहां हर पहाड़ी पर जैनियों द्वारा मंदिर बनवाए गए हैं अत: यह प्रमुख जैन तीर्थ है। इस स्थान पर 22 तीर्थंकरों के समवसरण हुए। विपुलांचल पर्वत पर दिगंबर व श्वेतांबर मंदिर हैं। उदयगिरी व स्वर्णगिरी पर्वत पर भी दिगंबर व श्वेतांबर जैन मंदिर हैं। वैशाली के निकट कुंडग्राम में भगवान महावीर स्वामी का जन्म हुआ अत: जैन धर्मावलंबी इसे भी तीर्थ मानते हैं। भगवान महावीर के पिता सिद्धार्थ, वैशाली के राजा थे।

उत्तर प्रदेश के जैन मंदिर

श्रावस्ती को भी धार्मिक स्थान माना जाता है क्योंकि वह तीसरे तीर्थंकर संभवनाथ व आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभा नाथ की जन्मस्थली है। छठे तीर्थंकर पद्मप्रभ का जन्म कौशांबी में हुआ। यहां के जैन मंदिर में उनकी कमलासीन प्रतिभा भी है। भुवनेश्वर का जैन मंदिर भुवनेश्वर से कुछ दूरी पर उदयगिरी व खण्डगिरी के जैन मंदिर हैं। यह गुफाएं जैन धर्म से संबंधित हैं तथा विश्व की प्राचीन गुफाओं में एक हैं। यह दोनों अलग-अलग चट्टानें हैं, जो आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हैं। यहां कुल 40 गुफाएं हैं। उदयगिरी के गुफा मंदिर, वास्तु के अद्भुत नमूने हैं। रानी व गणेश गुफा को सबसे सुंदर माना जाता है। खंड गिरी गुफाओं में भी सतधर गुफा काफी सुंदर है। यह स्थान जैन ऋद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं। इसके बाहरी प्रांगण की दीवारों में जैन तीर्थंकरों के चित्र उकेरे गए हैं।

मध्य प्रदेश के जैन मंदिर

ग्वालियर के किले की चट्टानी दीवारों पर भी जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं। जैनियों के प्रथम तीर्थंकर, आदिनाथ की मूर्ति सबसे सुंदर है। यह विशाल मूर्तियां अपने आकार के कारण समस्त उत्तर-भारत में बेजोड़ हैं। इंदौर में भी दिगंबर जैनियों का पवित्र स्थल है। इस कांच के मंदिर की छतों व दीवारों पर मोती, बहुरंगी मनके व शीशे बहुत ही सुंदर तरीके से सजाए गए हैं। राजस्थान के पाली जिले में, रनकपुर मंदिर हैं। इसकी नक्काशी देखकर ऐसा लगता है मानों हाथीदांत पर कारीगिरी की गई हो।

यह भव्य जैन मंदिर 1,444 स्तंभों पर खड़ा है। कोई भी दो गुंबद, शिल्पकारी में एक से नहीं हैं। मंदिर में स्थापित मुख्य प्रतिभा, आदिनाथ जी की है। इस मंदिर में उनकी चार मुख वाली प्रतिभा स्थापित की गई है। कहते हैं कि सकपुर के इस मंदिर को 1439 में 'धरनाशाह ने बनवाया था। जिसे पूरा करने में 80 वर्ष लगे। इनके अतिरिक्त दिल्ली का दिगंबर जैन लाल मंदिर, जूना, नकोदा, अरधुना व चौमुखा जैन मंदिर आदि भी जैनियों की श्रद्धा व आस्था के केंद्र हैं। भारत के विभिन्न भागों में जैनियों के सुंदर मंदिर उनके भक्ति-भाव के साक्षात प्रमाण हैं।

विराट का अगाशी जैन मंदिर

जैनियों का प्रसिद्ध अगाशी जैन मंदिर भगवान शंखेश्वर पार्श्वनाथ मुबंई के उपनगर शहर विरार से छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 700 साल पुराना मंदिर केवल जैन धर्मावलंबियों की श्रद्धा का केंद्र ही नहीं है, बल्कि इतिहासकारों के लिए भी जिज्ञासा का विषय है। प्राकृतिक संपदा से भरपूर यह मंदिर करीब पांच एकड़ भूखंड पर बना है जो जैनियों में समवसरण महामंदिर के नाम से भी जाना जाता है। सफेद पत्थर से निर्मित शंखेश्वर पार्श्वनाथ के इस मंदिर का शिल्प और स्थापत्य की दृष्टि से विशिष्ट महत्त्व है। जैन साधुओं और साध्वियों के लिए यहां उपाश्रय बने हुए हैं। इस मंदिर में जैनियों के साथ ही अन्य धर्मावलंबियों के आगमन पर भी किसी प्रकार की पाबंदी नहीं है। इसे देखने के लिए जैन ही नहीं, बल्कि इतिहास प्रेमियों के अलावा वास्तुकारों की भी भीड़ लगी रहती है।

बेजोड़ कारीगरी का जीवंत उदाहरण

इस मंदिर का निर्माण दिवंगत जैन आचार्य विजयदक्ष सूरीश्वरजी और प्रभाकर विजयजी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से हुआ था। गोलाकार कक्ष के रूप में निर्मित शंखेश्वर पार्श्वनाथ का मंदिर तीन मंजिला है, जिन्हें मड़ या खंड के रूप में पुकारा जाता है। मंदिर के प्रस्तर स्तंभों और गोलाकार कक्ष समेत दरवाजों पर भी बहुत खूबसूरत कलाकृतियों को उकेरा गया है। ये कलाकृतियां उस जमाने के शिल्पियों की बेजोड़ कारीगरी का जीवंत उदाहरण हैं। मंदिर के प्रथम खंड में सफेद पत्थर की पार्श्वनाथ की चार भव्य मूर्तियां चारों दिशाओं में विराजमान हैं। पद्यासन की मुद्रा में स्थित इन मूर्तियों के शीर्ष पर शेषनाग बने हुए हैं। इसी खंड में 24 तीर्थंकरों के कलात्मक लघु मंदिर भी हैं। इस खंड में कुल 63 मूर्तियां हैं।

प्रांगण में अन्य भव्य दर्शनीय मंदिर

मंदिर के दूसरे खंड में ऋषभदेव, वारिसेण स्वामी, वर्धमान स्वामी और चंद्रानन स्वामी की मूर्तियां भी हैं। करीब दो फुट लंबी ये मूर्तियां भी सफेद पत्थर से निर्मित हंै। तीसरे खंड में चारों दिशाओं में शंखेश्वर पार्श्वनाथ की पीतल की चार मूर्तियां स्थापित हैं। दर्शनार्थियों और इतिहास प्रेमियों के लिए मंदिर पर मुख्य आकर्षण चौथा खंड है जिसमें एक फुट की लंबी श्याम रंग की भगवान शंखेश्वर पार्श्वनाथ की 700 साल पुरानी मूर्ति है। बताते हैं कि यह मूर्ति राजस्थान के सलंबर से मिली थी। पास में ही शंखेश्वर पार्श्वनाथ की दो फुट की ऊंची शेषनागधारी तीन नवीन मूर्तियां भी हैं। मुख्य मंदिर के दायें ओर कमल की आकृति का पद्मावती देवी का मंदिर है।

इस मंदिर में पद्मावती देवी की मुख्य मूर्ति के अलावा 16 अन्य देवियों की मनमोहक मूर्तियां स्थापित हैं। मुख्य मंदिर के बायें ओर गौतम गुरु मंदिर है। इसमें गौतम स्वामी की मुख्य मूर्ति सहित इस तीर्थ के संस्थापक विजयदक्ष सुरीश्वरजी के गुरुदेव विजयनेमिसूरीजी और विजय लावण्यसूरीजी की भव्य मूर्तियां स्थापित की गई हैं।

यह भी पढ़ें -परिस्थितियों से लड़कर कमाई खुशिया

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