सुख खोजने की कला - मुनिश्री तरुणसागरजी

मुनिश्री तरुणसागरजी

13th May 2021

मानव तन पाकर कुछ ऐसा कर जाओ कि तुम्हारा मनुष्य होना सार्थक हो जाये। खाना-पीना और सोना क्या यही जीवन है? यह जीवन नहीं है। यह तो सभी करते हैं। जीवन भोजन नहीं, भजन है। जीवन पदार्थ नहीं, परमार्थ है। जीवन स्वप्न नहीं, यथार्थ है।

सुख खोजने की कला - मुनिश्री तरुणसागरजी

एक महिला बोली : मुनिश्री! मैं बड़ी दु:खी हूं। यों तो भगवान की कृपा से सब कुछ है लेकिन मेरे पति कभी मंदिर नहीं जाते, कभी सत्संग नहीं करते। मैं कह-कहकर थक चुकी लेकिन उन पर कोई असर ही नहीं पड़ता। वे मुझे रोज स्कूटर पर बैठाकर मंदिर लाते हैं लेकिन जब तक मैं मंदिर में पूजा करती हैं वे बाहर खड़े मेरा इंतजार करते रहते हैं। मैं कहती हूं कि चलो तुम भी भगवान के दर्शन कर लो तो वे इसके लिए तैयार नहीं होते।

मैंने कहा : बस इतना ही दु:ख है। मैंने उससे कहा : पति मंदिर नहीं जाता इस बात के लिए उसकी आलोचना मत कर बल्कि इस बात के लिए उसे धन्यवाद दे कि वह तुझे मंदिर जाने से, सत्संग में आने से मना नहीं करता। महिला बोली : मैंने तो ऐसा कभी सोचा ही नहीं। महिला के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई। यही है दु:ख में से सुख खोजने की कला। मैंने उस महिला से कहा : देख! जितना इंतजार तू अंदर मंदिर में भगवान का नहीं करती होगी उससे भी अधिक इंतजार तेरा पति बाहर तेरा करता है। इसलिए उसकी आलोचना बंद कर और उसे आज से धन्यवाद देना शुरू कर दे। अपनी सोच सकारात्मक रखो। नकारात्मक विचार निराशा पैदा करते हैं। सकारात्मक सोच शक्ति देती है।

याद रखो : घृणा से चढ़ी हुई आंखें उस मालिक को पसंद नहीं, झूठ बोलती जिह्वा उस मालिक को पसंद नहीं, गलत रास्ते पर जाते पांव उस मालिक को पसंद नहीं और दूसरों का हक छीनते हाथ उस मालिक को पसंद नहीं हैं तो फिर श्रद्धा से झुका सिर उस मालिक को पसंद है, सत्य की गवाही देती जीभ उस मालिक को पसंद है, सत्य के पथ पर बढ़ते पैर उस मालिक को पसंद है, दूसरों का सहयोग करते हाथ उस मालिक को पसंद हैं। जो मालिक को पसंद है, वही करना है और आगे बढ़ना है। एक मोटा आदमी कार में बैठा था। एक दुबला-पतला मनुष्य वहां आया और बोला: क्या इस कार में सिर्फ हाथी बैठ सकते हैं।

मोटे आदमी ने जवाब दिया कि नहीं। इसमें गधे भी आ सकते हैं। जैसे को तैसा। आदमी जो बोयेगा वही तो काटेगा। रावण अपनी करनी से नरक जाता है तो उसकी पत्नी मंदोदरी अपनी करनी से स्वर्ग जाती है। पतिपत्नी के अपने-अपने कर्म हैं। जैसी जिसकी भावना होगी, भाव भी वैसा ही मिलेगा।

जैन धर्म में एक ग्रन्थ है- आत्मानुशासन।उसमें लिखा है कि चार चीजें सर्वाधिक दुर्लभ है : (1) मनुष्यपन, (2) धर्मश्रवण, (3) श्रद्धा, (4) संयम्। मनुष्य बनना कोई हंसी- खेल नहीं है। जन्म-जन्मान्तरों का पुण्य जब जोर मारता है तब किसी को मनुष्य योनी मिलती है।

बड़े भाग मानुष तन पाया।

मानव तन पाकर कुछ ऐसा कर जाओ कि तुम्हारा मनुष्य होना सार्थक हो जाये। खानापीना और सोना क्या यही जीवन है? बीवी, बच्चे और व्यापार क्या यही जीवन है? कपड़ा, रोटी और मकान क्या यही जीवन है? जर, जोरू और जमीन क्या यही जीवन है? यह जीवन नहीं है। यह तो सभी करते हैं। आहार, भय, मैथुन और निद्रा ये चार संज्ञाएं तो पशु में भी पाई जाती हैं। जीवन भोग नहीं, त्याग है। जीवन भोजन नहीं, भजन है। जीवन पदार्थ नहीं, परमार्थ है। जीवन स्वप्न नहीं, यथार्थ है।

मैं पूछता हूं : तुम्हारे तन पर किसका अधिकार है? मां कहती है, इसे मैंने 9 माह तक अपने पेट में रखा है, मैंने जन्म दिया है। इसे पाला है, पोसा है, अत: इस पर मेरा अधिकार है। बाप कहता है : अच्छा, मैं न होता तो इसका जन्म कहां से होता? अत: इस पर मेरा अधिकार है। बीच में पत्नी आ जाती है। कहती है, हटो जी! शादी से पहले तुम्हारा अधिकार रहा होगा। अब तो इस पर मेरा अधिकार है। अपने मां-बाप का घर छोड़ आई हैं, अत: इस पर मेरा अधिकार है। एक दिन आदमी मर जाता है। लोग उठाकर उसे श्मशान में रख आते हैं। श्मशान कहता है अब इस पर मेरा अधिकार है। इसीलिए तो मेरे पास आ गया। मुर्दे को चिता पर लिटाते हैं, आग लगाते हैं तो अग्नि कहती है अब यह मेरा भोजन है, इस पर मेरा अधिकार है। मैं पूछता हैं आखिर तुम्हारे शरीर पर किसका अधिकार है? मुझसे पूछो तो मैं कहूंगा कि सही मायने में इस शरीर पर भक्ति, तप और साधना का अधिकार है। 

यह भी पढ़ें -मन का स्वभाव - आचार्य महाप्रज्ञ

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