आध्यात्मिक और धार्मिक सुधार की आवश्यकता

पंकज के. सिंह

13th May 2021

भारत में सामाजिक, आध्यात्मिक और धार्मिक सुधार की दिशा में आवश्यक पहल नहीं हो रही है। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या में गलत तत्त्व प्रवेश कर गए हैं।

आध्यात्मिक और धार्मिक सुधार की आवश्यकता

आतंकवाद वास्तव में अंधविश्वास और पाखंड की पराकाष्ठा है। सर्वधर्म समभाव और व्यापक जनजागरण की अलख जगाकर ही वैश्विक कट्टरपंथ और आतंकवाद से निपटा जा सकता है। संपूर्ण विश्व के शिक्षकों और पवित्र सोच रखने वाले धर्माचार्यों और जनसमुदाय को सांप्रदायिक सौहार्द्र बनाने के लिए एक साझा मंच तैयार करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो कट्टïरपंथ का यह दानव संपूर्ण मानव सभ्यता को कुछ ही समय में निगल लेगा, जब आस्था को लेकर खुली सोच और वैज्ञानिक दृष्टिïकोण को नकार दिया जाता है तो वहां अंधविश्वास का जन्म होता है।

धर्म में अंधविश्वास और अंधभक्ति का आना कोई नई प्रवृत्ति नहीं है। हजारों वर्षों से मानव सभ्यता को स्वार्थी तत्त्वों द्वारा इसी आधार पर भ्रमित किया जाता रहा है। अशिक्षा और असमानता ने इस सोच को और अधिक पुष्टï किया है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद से ही भारत में तुष्टिकरण की नीति को राजनीति का स्थायी अंग बना दिया गया।

आज भारत अनेक प्रकार के हितसंवर्गों और वर्ग-संप्रदायों में विभक्त हो गया है। प्राय: सभी अपने सामुदायिक हितों की ही बात करते हैं। समग्र रूप से इस राष्ट का चिंतन करने वाले समूह न के बराबर हैं। देश के कथित अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा केवल निजी हित के मुद्दे उठाए जाते हैं। राजनैतिक दलों पर यह दबाव डाला जाता है कि जो उनकी उचित-अनुचित मांगें मानेगा, उसी का वे समर्थन करेंगे। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक जैसे बंटवारे ने भी अंधविश्वास को बढ़ाने का काम किया है। धर्म आधारित इस पहचान के कारण लोगों की धर्म पर निर्भरता बढ़ गई है।

लोकतांत्रिक देश भारत में ऐसा नहीं होना चाहिए था। भारत में सामाजिक सुधारों की बात तो बहुत होती है, किंतु आध्यात्मिक और धार्मिक सुधार की दिशा में आवश्यक पहल नहीं हो रही है। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या में गलत तत्त्व प्रवेश कर गए हैं। इन पर रोकथाम लगनी चाहिए। जब जीवन के किसी भी क्षेत्र में अयोग्य व्यक्ति को प्रवेश नहीं दिया जाता, तो धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में ही यह प्रवेश बेरोक-टोक क्यों जारी है।

जिस प्रकार वकालत, प्रशासन, चिकित्सा, उत्पादन, व्यवसाय, कारोबार, तकनीक, विज्ञान, खेल-कूद, कला, संस्कृति, साहित्य, पत्रकारिता इत्यादि सभी क्षेत्रों में कोई-न-कोई न्यूतम शैक्षणिक योग्यता तथा कौशल की आवश्यकता पड़ती है तथा प्रमाणिक संस्थाओं द्वारा इन योग्यताओं का सार्वजनिक परीक्षण भी किया जाता है, वैसी किसी योग्यता की आवश्यकता और परीक्षण की जरूरत आखिर अध्यात्म क्षेत्र में क्यों नहीं है। भारत में सार्वजनिक मंच तथा रेडियोटेलीविजन व अन्य संचार माध्यमों के द्वारा देश के आध्यात्मिक गुरुओं व धर्माचार्यों को समाज के मध्य सार्वजनिक बहस व शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए।

इस प्रकार राजनैतिक क्षेत्र में विभिन्न राजनैतिक दल और प्रत्याशी समाज के समक्ष अपना पक्ष और एजेंडा रखते हैं, उसी प्रकार आध्यात्मिक गुरुओं व महंतों, मौलवियों को भी समाज के समक्ष विभिन्न विषयों पर अपना दृष्टिïकोण प्रकट करना चाहिए। उन्हें मानने अथवा न मानने वाले को उनसे प्रश्न पूछने तथा शेष समाज को इस विचार-विमर्श का परीक्षण करने का अवसर और अधिकार मिलना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक अध्यात्म क्षेत्र में सुयोग्य और वास्तविक ज्ञानी व्यक्ति प्रभावी नहीं हो सकेंगे। अभी अध्यात्म का क्षेत्र एकमार्गी बना हुआ है। तथाकथित गुरु जो भी कह देता है, श्रद्घालु भक्तिभाव से उसे ही सत्य मान लेते हैं।

तर्क-वितर्क और शास्त्रार्थ की स्थिति कहीं दिखाई नहीं पड़ती। शास्त्रार्थ और बौद्घिक विमर्श के अभाव के कारण ही अध्यात्म और दर्शन के क्षेत्र में विश्व गुरु रहा भारत आज वैश्विक समाज में हास्यास्पद स्थिति का शिकार है। धार्मिक सुधारों के क्षेत्र में हमें अविलंब कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। इस दिशा में कतिपय प्रयास हो भी रहे हैं, किंतु समस्या की गंभीरता को देखते हुए उन्हें पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

हाल ही में प्रयाग में धर्म सुधार की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास करते हुए पहली बार 14 तथाकथित बाबाओं और महंतों को फर्जी घोषित करके अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने वह कदम उठाया है, जो धर्म को ढोंग और कुरीतियों से मुक्ति दिलाने में सहायक हो सकता है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। वास्तव में यह निर्णय और पहले हो जाना चाहिए था।

इस प्रकार की प्रक्रिया को निरंतर जारी रखते हुए समाज से ऐसे पाखंडी तत्त्वों को ढूंढ-ढूंढकर बाहर निकालने और उनके बहिष्कृत करने की आवश्यकता ह भारत में सामाजिक, आध्यात्मिक और धार्मिक सुधार की दिशा में आवश्यक पहल नहीं हो रही है। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या में गलत तत्त्व प्रवेश कर गए हैं। 

यह भी पढ़ें -सुख खोजने की कला - मुनिश्री तरुणसागरजी

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