मोक्ष - गृहलक्ष्मी कहानियां

सुधा गोयल

14th May 2021

पुण्य कमाने की लालसा लिए गोमती चल पड़ी थी अपने बेटे श्रवण के साथ इलाहाबाद। आखिर उसकी वर्षों की अभिलाषा जो पूरी होने वाली थी, लेकिन कुंभ स्नान में ऐसा क्या हुआ जिसकी गोमती ने कभी कल्पना भी नहीं की थी?

मोक्ष - गृहलक्ष्मी कहानियां

'मां कुंभ नहाने चलोगी? काफी दिन से कह रहीं थीं कि मुझे गंगा नहला ला। इस बार तुम्हें नहला ही लाता हूं। ट्रेन से टिकट करा ली है। सुनकर चहक उठी गोमती, 'तू सच कह रहा है श्रवण? मुझे यकीन नहीं आ रहा। 'यकीन करो मां। मैं झूठ नहीं बोल रहा। ये देखो टिकटें, श्रवण ने जेब से टिकटें निकाल कर गोमती को दिखाईं। 'अब जाने की तैयारी कर लेना। जो भी सामान चाहिए बता देना। अगले सप्ताह आज के ही दिन चलेंगे। 'कौन-कौन चलेगा बेटा?

सभी चल रहे हैं न। 'नहीं मां, सब जाकर क्या करेंगे? कुंभ पर बहुत भीड़ रहती है। सबको संभालना मुश्किल होगा। बस मैं और तुम चलेंगे। गोमती ने श्वेता की ओर देखा। उनके अकेले जाने से कहीं बहू नाराज न हो। उन्हें लगा कि इतनी उम्र में अकेले बेटे के साथ कैसे जाएंगी? श्रवण उन्हें कैसे संभालेगा? घर में तो जैसे तैसे अपना काम कर लेती हैं। बाहर कैसे उठेंगी बैठेंगी। घड़ी-घड़ी श्रवण का सहारा मांगेंगी। फिर कहीं सबके सामने श्रवण झल्लाने लगा तो...? दुविधा हुई उन्हें। 'अब क्या सोचने लगीं मां जी। आपके बेटे कह रहे हैं तो घूम आओ। हम सब तो कहीं न कहीं जाते ही रहते हैं। फिर कभी चले जाएंगे। अब के बाद पूरे बारह साल बाद कुम्भ पड़ेगा। 'बहू, क्या श्रवण मुझे संभाल पाएगा? गोमती ने अपना संशय सामने रखा। सुनकर श्रवण हंस पड़ा।

'मां को अब अपने बेटे पर विश्वास नहीं है। जैसे बचपन में आप मेरा ध्यान रखती थीं, ऐसे ही रखूंगा। कभी भी आपका हाथ नहीं छोडूंगा। खूब मेला घुमाऊंगा। श्रवण की बात पर सभी हंसने लगे। गोमती प्रसन्न हो गई। उसकी चिर प्रतिक्षित अभिलाषा पूर्ण होने जा रही थी। कितनी बार श्रवण से कह चुकी थीं कि मरने से पहले एक बार कुम्भ स्नान करना चाहती हैं। कुम्भ पर नहीं ले जा सकता तो ऐसे ही हरिद्वार ले चल। वक्त खिसकता रहा। बात टलती रही। अब जब श्रवण अपने आप कह रहा है तो उनका मन प्रसन्नता से नाचने लगा। उन्होंने बहू बेटे को आशीर्वाद से लाद दिया। एक रात एक दिन का सफर तय कर वसंत पंचमी के दिन दोनों इलाहाबाद पहुंचे। गोमती का तो सफर में ही बुरा हाल हो गया। ट्रेन की छुक- छुक और सीटी ने रात भर सोने नहीं दिया, श्रवण का हाथ थामे बार-बार टायलेट जाती रही। ट्रेन खिसकने लगती तो पांव डगमगाने लगते। गिरती पड़ती सीट तक पहुंचती। 'अभी सफर शुरू हुआ है। आगे कैसे करोगी? संभालो स्वंय को। संभाल रही हूं बेटा, पर इस उम्र में हाथ पांव झूला बने रहते हैं। पकड़ ढीली हो जाती है। इसका इलाज मुझ पर नहीं है। वे बेबस सी हो जाती। 'कोई बात नहीं। मैं हूं न। सब संभाल लूंगा।

गोमती की आंखें पनियाली होने लगीं। अपनी उमंग बेमानी लगती। नाहक श्रवण को तंग किया। वह भी पूरी रात जागता रहता है। इससे तो बाल्टी में गंगाजल डालकर ही नहा लेती। उन्हें अब लगा कि श्रवण क्यों टालता रहा। खैर राम- राम करते सफर पूरा हुआ। गाड़ी रुकी तो प्लेटफार्म की चहल पहल और भीड़ देखकर हैरान रह गईं। श्रवण ने एक कुली के सिर पर सामान रखवाया और मां का हाथ पकड़कर स्टेशन से बाहर आ गया। मौसम को भी आज ही बिगड़ना था। ठंडी हवाएं चलने लगीं। घटाएं घुमड़े लगीं। क्या पता कब बरसने लगे। श्रवण ने थोड़ी देर स्टेशन पर ही रुकने का फैसला किया। मां के साथ वेटिंग रुम में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद मां से बोला, 'मां नित्य कर्म से यहीं निबट भी लो। जब तक बारिश रुकती है हम यहीं रुकेंगे। उसने इशारे से बता दिया कि कहां जाना है।

थोड़ी देर में गोमती लौट आईं, फिर श्रवण चला गया। श्रवण जब लौटा तो उसके हाथ में चाय के दो कुल्हड़ और गरमागरम समोसे की थैली थी। मां बेटे दोनों ने चाय पी और समोसे खाएं। थोड़ा आराम मिला तो गोमती की आंखें झपकने लगी। पूरी रात आंखों में कटी थी। वहीं सोफे की टेक लेकर आंखें मूंद लीं। करीब घंटे भर बरस कर बादल थमे। बादलों की ओट से सूरज झांकने लगा। वर्षा के कारण स्टेशन पर भीड़ बढ़ गई थी। अब छंटने लगी।  श्रवण ने भी एक ऑटो रिक्शा पकड़ गंगा घाट तक जाने का मन बनाया। रिक्शे ने मेला क्षेत्र शुरू होते ही उन्हें उतार दिया। करीब एक किलोमीटर चलकर गंगा घाट तक पहुंचे। गिरते पड़ते बड़ी मुश्किल से एक डेरे में स्थान मिला। दोनों ने चादर बिछा कर अपना सामान जमाया और नहाने चले गए। गोमती ने अपने जीवन में इतनी भीड़ नहीं देखी थी।

कहीं लाउडस्पीकर का शोर, कहीं भजन गाती और गंगा मैया की जय जयकार करती टोलियां, कहीं साधु संतों के प्रवचन, कहीं रामायण पाठ, खिलौने वाले, झूले वाले, पूरी कचौड़ी, चाट व मिठाई की दुकानें, धार्मिक किताबें, तस्वीरें, मालाएं, सिंदूर की दुकानें, हर जाति धर्म के लोग, देख देखकर वे चकित थीं। लगता था कि वे किसी दूसरे लोक में आ गई हैं। वे श्रवण का हाथ कसकर थामें थीं। रास्ता बनाता श्रवण उन्हें किनारे तक ले आया। यहां भी खूब भीड़ और धक्कमपेल थी। श्र

वण ने हाथ पकड़कर मां को स्नान कराया, फिर स्वयं किया। गोमती ने फूल बताशे गंगा में चढ़ाए। जाने कबसे मन में बसी साध पूरी हुई थी। हर्षातिरेक में आंसू निकल पड़े। हाथ जोड़कर प्रार्थना की। 'गंगा मैया श्रवण सा बेटा हर मां को देना। आज उसी के कारण तुम्हारे दर्शन कर सकी हूं। गोमती ने एक बोतल में गंगा जल भरा। चलते-चलते गंगा को प्रणाम किया। पता नहीं दुबारा देख भी पाऊंगी या नहीं। श्रवण ने गोमती को मेला घुमाया। खूब खिलाया पिलाया। 'थक गई हूं अब। नहीं चला जाता श्रवण गोमती के कहने पर श्रवण उन्हें डेरे पर ले आया। 'मां, तुम आराम करो। मैं घूम कर अभी आया। थोड़े रुपये अपने पास रख लो उसने रुपये मां को थमाए।

'मैं रुपयों का क्या करुंगी? तू है मेरे पास। फिर सौ दो सौ रुपये मेरे पास है। गोमती ने मना किया। 'वक्त वे वक्त काम आएंगे। तुम्हारा ही कुछ लेने का मन हो या कहीं मेले में मेरी जेब ही कट जाए तो... श्रवण के समझाने पर गोमती ने रुपये रख लिए। उन्हें ध्यान आया कि ऐसे मेलों में चोर उच्चके खूब घूमते हैं। लोगों को बेबकूफ बनाकर हाथ की सफाई दिखाकर खूब ठगते हैं। श्रवण चला गया और गोमती थैला सिर के नीचे लगा बिछी चादर पर लेट गई। उनका मन आह्लादित था।

श्रवण ने खूब ध्यान रखा है। लेटेलेटे आंख झपक गई। जब खुलीं तो देखा कि सूरज अस्ताचल को जा रहा है। श्रवण अभी लौटा नहीं है। उन्हें चिंता हो आई। अनजान जगह, अजनबी लोग, श्रवण के बारे में किससे पूछूं। अपना थैला टटोलकर देखा। सब कुछ यथा स्थान सुरक्षित था। कुछ रुपये एक रुमाल में बांध कर थैले में डाल लायीं थीं। सोचा था पता नही विदेश में कहां जरूरत पड़ जाए। वे डेरे से बाहर आकर इधर-उधर देखने लगी।

आदमियों का रेला एक तरफ तेजी से भागता आ रहा था। वे कुछ समझ पाती कि चीख पुकार मचने लगी। पता लगा कि मेले में हाथी बिगड़ जाने से भगदड़ मच गई है। काफी लोग भगदड़ में गिरकर कुचलने से मर गये हैं। सुनकर गोमती का कलेजा मुंह को आने लगा। कहीं उनका श्रवण... इसी कारण अभी तक नहीं आया है। उन्होंने एक यात्री से जाकर पूछा, 'भैया, ये किस समय की बात है? 'मांजी, चार बजे नागा साधु हाथियों पर बैठ कर स्नान करने जा रहे थे और पैसे फेंकते जा रहे थे। उन्हीं पैसों को लूटने के कारण यह कांड हुआ। जो जख्मी हैं उन्हें अस्पताल पहुंचाया जा रहा है और जो मर गये हैं उन्हें सरकारी गाड़ी से वहां से हटाया जा रहा है। आपका भी कोई है?

'भैया, मेरा बेटा दो बजे घूमने निकला था अभी तक नहीं लौटा। 'उसकी कोई फोटो है मांजी? 'फोटो तो नहीं है। अब क्या करूं? गोमती रोने लगी। 'मांजी, आप रोओ मत। देखो सामने पुलिस चौकी है वहीं जाकर पता कर लो। गोमती ने चादर समेट थैले में रखी और पुलिस चौकी पर पंहुच कर रोने लगी। लाउडस्पीकर से कई बार एनाउंस कराया गया। फिर एक सहृदय सिपाही अपनी मोटर साइकिल पर बिठा कर गोमती को वहां ले गया जहां मृतकों को इक_ा किया गया था। एक दो अस्थायी बने अस्पतालों में भी ले गया जहां जख्मी पड़े लोग कराह रहे थे। डाक्टर उनकी मरहम पट्टी में जुटे थे।

श्रवण का वहां कहीं भी पता न था। तभी गोमती को ध्यान आया कि कहीं श्रवण डेरे पर लौट आया हो और उनको ढूंढ रहा हो या उन्हें डेरे पर न पाकर उन्हीं की तलाश कर रहा हो या इंतजार कर रहा हो। हालांकि वे पुलिस चौकी पर उसका हुलिया बता आईं थीं। और लौटने तक रोक रखने को कह आईं थीं। गोमती ने आकर पता किया तो उन्हें मालूम हुआ कि कोई भी उन्हें पूछने नहीं आया। वे डेरे में गयी वहां भी नहीं। आधी रात कभी डेरे में कभी पुलिस चौकी पर कटी।

जब रात के बारह बज गए तब पुलिस वालों ने कहा, 'मां जी, आप डेरे में जाकर आराम करो। आपका बेटा पूछने आया तो आपके पास भेज देंगे। गोमती आशा भरी नजरों से देखती पुत्र के लिए व्याकुल डेरे पर लौट आई। चादर बिछा कर लेट गई, लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर। कहां चला गया श्रवण? इस कुम्भ नगरी में कहां-कहां ढूंढूं? यहां कौन अपना है? यदि श्रवण न लौटा तो अकेले घर कैसे लौटूंगी। बहू का सामना कैसे करुंगी। स्वयं को ही कोसने लगीं। व्यर्थ ही कुम्भ नहाने की जिद्द ठान बैठी।

टिकट ही तो लाया था, यदि मना कर देती तो टिकट भी वापिस हो जाते। ऐसी फजीहत तो न होती। फिर गोमती को ख्याल आया कि कहीं कोई श्रवण को बहला फुसलाकर तो नहीं ले गया। वह है भी सीधा। आसानी से औरों की बातों में आ जाता है। किसी ने कुछ सुंघाकर बेहोश ही कर दिया हो और सारे पैसे व घड़ी अंगूठी छीन ली हो। मन में उठती शंकाओं का अंत नहीं था। दिन निकला। नहाना धोना सब भूल गयी। सीधी पुलिस चौकी पर। एक ही दिन में पुलिस चौकी वाले उन्हें पहचानने लगे थे। देखते ही बोले, 'मांजी, तुम्हारा बेटा नहीं लौटा? रोने लगी गोमती, 'कहां ढूंढूं तुम्हीं बताओ। किसी ने मार-काटकर कहीं डाल दिया हो तो? तुम्हीं ढूंढ़ कर लाओ। गोमती का रोते रोते बुरा हाल।

'अम्मां, धीरज धरो। हम जरूर कुछ करेंगे। सभी डेरों में एनाउंस कराएंगे। आपका बेटा मेले में जहां कहीं भी होगा जरूर लौटकर आएगा। आप अपना नाम और पता लिखा दो। अब जाओ। स्नान-ध्यान करो। भगवान पर भरोसा रखो। पुलिस वालों को भी गोमती से हमदर्दी हो आई थी। गोमती डेरे में लौट आईं। गिरती-पड़ती गंगा भी नहा ली। मन ही मन प्रार्थना करने लगी, 'हे गंगा मैया, मेरा श्रवण जहां भी हो सकुशल हो। वह मुझे मिलेगा तो पांच सेर दूध चढ़ाऊंगी। वही तेरे दर्शन कराने लाया था और वही हाथ छुड़ा कर गुम हो गया। अब मैं अभागिन क्या करूं। हे भगवान, कोई चमत्कार करो। खोया पुत्र वापिस मिल जाए तो जाकर बहू को मुंह दिखा सकूं।

पूजा अर्चना से निबट गोमती हर आने जाने वाले को गौर से देखने लगी। उनकी निगाहें दूर दूर तक आने जाने वालों का पीछा करतीं। कहीं  अम्मां, धीरज धरो। हम जरूर कुछ करेंगे। सभी डेरों में एनाउंस कराएंगे। आपका बेटा मेले में जहां कहीं भी होगा जरूर लौटकर आएगा। आप अपना नाम और पता लिखा दो। अब जाओ। स्नान-ध्यान करो। भगवान पर भरोसा रखो। पुलिस वालों को भी गोमती से हमदर्दी हो आई थी। श्रवण दिख जाए। गंगा घाट पर बैठे सुबह से दोपहर हो गई। कल शाम से पेट में पानी की बूंद भी नहीं गई थी। ऐंठन सी होने लगी। ध्यान आया यदि यहां स्वयं बीमार पड़ गई तो श्रवण को कैसे ढूंढेगी। उसे ढूंढना है तो स्वयं को ठीक रखना होगा। यहां कौन है उसका जो मनुहार करके खिलाएगा। उसने आलू की सब्जी के साथ चार पूड़ियां खायीं। गंगा जल पीया। कलेजे को थोड़ी शांति मिली।

चार पूड़ियां शाम के लिए बंधवा लीं। यहां तक न आ सकी तो डेरे में ही खा लेगी। भूखा प्यासा श्रवण लौटेगा तो उसे खिला देंगी। श्रवण का ध्यान आते ही कुछ केले भी खरीद लिए। ढूंढती-ढूंढती अपने डेरे में पहुंच गई। पुलिस चौकी में भी झांक आईं। देखते-देखते आठ दिन निकल गये। मेला उखड़ने लगा। श्रवण भी नहीं लौटा। अब पुलिस वालों ने सलाह दी, 'मांजी, अपने घर लौट जाओ। लगता है आपका बेटा अब नहीं लौटेगा। 'मैं इतनी दूर अपने घर कैसे जाउंगी? मैं तो अकेले कभी कहीं आई गई नहीं, वे फिर कलपने लगी। 'अच्छा मां जी, अपने घर का फोन नम्बर बताओ। घर से कोई आकर ले जाएगा। पुलिस वाले ने कहा। 'घर से मुझे लेने कौन आएगा?

अकेली बहू कैसे आएगी? 'बहू किसी नाते-रिश्तेदारों को भेज कर बुलवा लेगी। आप किसी का भी नम्बर बताओ। गोमती ने दिमाग पर लाख जोर मारा, लेकिन हड़बड़ी में नम्बर याद नहीं आया। दु:ख और परेशानी में ऐसा ही होता है। अपना क्या कोई भी नम्बर याद नहीं रहता। दिमाग में सभी गड्मगड हो गये।

अपनी बेबसी पर आंख भर आई। बुढ़ापे में यादाश्त भी कमजोर हो जाती है। पुलिस चौकी में उन्हें बैठे रोते देखकर राह चलता एक यात्री ठिठका और पुलिस वालों से रोने का कारण पूछने लगा। पुलिस वालों की सारी बात सुनकर वह यात्री बोला, 'आप इन महिला को मेरे साथ भेज दीजिए। मैं भी उधर का ही रहने वाला हूं। आज शाम चार बजे की ट्रेन से जाऊंगा। इन्हें ट्रेन से उतार बस में बिठा दूंगा। आराम से अपने गांव पीपला पहुंच जाएंगी। सिपाहियों ने गोमती को उस अनजान व्यक्ति के साथ कर दिया। उसका पता और फोन नम्बर अपनी डायरी में लिख लिया। गोमती उनके साथ चल तो रही थी, पर मन ही मन डर भी रही थी कि कहीं ये कोई ठग न हो। पर कहीं न कहीं तो विश्वास करना पड़ेगा। वरना इस निर्जन में कब तक रहेगी। जैसे उस व्यक्ति ने गोमती के मन की बात ताड़ ली हो। 'मेरा नाम विठ्ठनलाल है। लोग मुझे बिट्टू कहकर बुलाते है। राजकोट में विठ्ठनलाल हलवाई की दुकान है। आप अपने गांव में पहुंच कर किसी से भी पूछ लेना। भरोसा रखो मुझ पर। यदि कहोगी तो घर तक छोड़ आऊंगा।

अब मुंह खोला गोमती ने, 'भैया, विश्वास के सहारे ही तो तुम्हारे साथ आई हूं। इतना उपकार ही क्या कम है कि तुम मुझे अपने साथ लाए हो। तुम मुझे बस में बिठा दोगे तो पीपला पहुंच जाऊंगी। पर बेटे के न मिलने का $गम मुझे खाए जा रहा है। अगले दिन गोमती लगभग एक बजे बस से उतरकर पैदल ही अपने घर की ओर चल दी। उसके पैर मन मन भारी हो रहे थे। उन्हें यही समझ नहीं आ रहा था कि बहू का सामना क्या कहकर करेंगी। क्या बताएंगी कि श्रवण कहां है। इसी सोच विचार में घर के द्वार तक पहुंच गई। वहां खूब चहल पहल थी। घर के आगे कनात लगी थीं। खाना चल रहा था। एक बार को तो गोमती को लगा कि गलत जगह पर आ गई है। तभी पौत्र तन्मय और पौत्री गौरा की नजर उन पर पड़ी।

वे आश्चर्य और खुशी से चिल्लाए, 'पापा-मम्मी देखो, दादी लौट आईं हैं। दादी जिंदा हैं। उनके चिल्लाने की आवाज सुनकर सब दौड़कर बाहर आ गए। शोर मच गया, 'अम्मां आ गईं। गोमती आ गई, श्रवण भी दौड़कर आ गया। और लिपट गया, 'तुम कहां चली गईं थीं मां? मैं तुम्हें ढूंढ-ढूंढ कर थक गया। श्वेता भी दौड़कर लिपट गई। 'हमने तो सोचा था कि मांजी... '...नहीं रहीं। यही न बहू। गोमती के जैसे ज्ञान चक्षु खुल गये। 'इसीलिए आज अपनी सास की तेरहवीं कर रही हो और तू श्रवण, मुझे छोड़कर यहां चला आया। यही सोचा होगा कि अकेली बूढ़ी औरत घर कभी नहीं पहुंचेगी। वहीं मरखप जाएगी। मैं तो पगला उठी थी।

घाट-घाट तुझे ढूंढती फिरती। तू सकुशल है, तुझे देख कर मेरी जान लौट आईं। दोनों की निगाहें नीचे झुकी और आपस में टकराईं, 'अब ये दावत मां के लौट आने की खुशी में है। सब खुशी-खुशी खाओ। मेरी मां वापिस आ गई है। खुशी से नाचने लगा श्रवण। औरतों में कानाफूसी होने लगी, लेकिन सब फिर भी श्वेता और श्रवण को बधाई देने लगे, 'अच्छा है जो तुम्हारी सासू मां लौट आईं। तुम तो जाने क्या समझ रहीं थीं और वे जाने कहां-कहां भटक रही होंगी। बड़ी जीवट वाली हैं, जो इतनी दूर से अकेले लौट आईं। '...हां बहन, जाको राखे साइयां मार सके ना कोय। जितने मुंह उतनी बातें, लेकिन सबका एक ही अंत कि गोमती सकुशल अपने घर लौट आईं हैं। वे सभी रिश्तेदार जो गोमती की गमी में शामिल होने आए थे गोमती के पांव छूने लगे। कोई बाजे वालों को बुला लाया। बाजे बजने लगे।

लड़के बच्चे नाचने कूदने लगे। माहौल एक दम बदल गया। श्रवण को देख कर गोमती सब भूल गई। भगवान ने उसकी मनौती मानी ली थी। भगवान पर उसका विश्वास और भी प्रकट हो गया। शाम होते-होते सारे रिश्तेदार खा-पीकर अपने-अपने घर चले गए। रात को थककर सब अपने-अपने कमरों में जाकर सो गए। गोमती को भी काफी समय बाद निश्चिंतता की नींद आई। अचानक रात में आंखें खुल गईं। वे पानी पीने उठीं। श्रवण के कमरे की बत्ती जल रही थी। धीरे-धीरे बोलने की आवाजें आ रहीं थीं। बातों के बीच मां शब्द सुनकर वे रुककर कमरे के बाहर कान लगा कर सुनने लगीं। श्वेता कह रही थी, 'तुम तो मां को मोक्ष दिलाने ले गए थे। मां तो वापस आ गईं। 'मैं तो मां को डेरे में छोड़ आया था। मुझे क्या मालूम था कि मां लौट आएंगी। मां का हाथ गंगा में छोड़ नहीं पाया।

पिछले आठ दिनों से मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही थी। मैंने मां को मारने या त्यागने का महापाप किया है। मैं सारे दिन सोचता, भूखी प्यासी मां कहां-कहां भटक रही होंगी। मां ने मुझ पर विश्वास किया और मैंने उनके साथ विश्वासघात किया। मां को इस प्रकार गंगा घाट पर छोड़ने का अपराधबोध बना रहेगा। अच्छा हुआ मां लौट आईं और मैं मां की मृत्यु का कारण बनते-बनते रह गया। भगवान का लाख-लाख शुक्र है। सुनकर गोमती के आगे जमीन कांपने लगी। सारा दृश्य उनकी आंखों के सामने आ गया। वे इन आठ दिनों में लगभग सारा मेला क्षेत्र घूम लीं। जगह-जगह घोषणा कराई, पर अपने नाम की घोषणा कहीं नहीं सुनी। इतना बड़ा झूठ बोला श्रवण ने। मुझसे मुक्त होने के लिए इलाहाबाद लेकर गया। मैं इतनी भार हो गई हूं कि मेरे अपने मुझसे मुक्त होना चाहते हैं। वे स्वयं संभाल पाती कि वहीं धड़ाम से गिर पड़ीं। सब झेल गई पर अपनों का ये सदमा न झेल पाई...। 

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