जन-जन के प्रिय तुलसीदास

देवप्रिया मल्ल

5th June 2021

श्रावण मास की अमावस्या के सातवें दिन तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है। 'रामचरितमानसÓ उनकी अमर कृति है। तुलसीदास को जन-जन का कवि भी माना जाता है। आइए लेख से जानें उनकी जीवन यात्रा को।

जन-जन के प्रिय तुलसीदास

भगवान राम के नाम का ऐसा प्रताप है कि जिस व्यक्ति को लोग रामबोला कहते थे वह व्यक्ति जब भगवान राम की शरण में गया तो वह गोस्वामी तुलसीदास हो गया। तुलसीदास यूं ही भगवान राम की शरण में नहीं गए थे, वह तो एक गृहस्थ थे, ऐसा व्यक्ति जो अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करता था, इसका एक कारण भी है कि तुलसीदास अनाथ थे। उनका पालन-पोषण चुनियां नाम की दासी ने किया था। स्वयं जिस बच्चे के मां-बाप ने उसे अपशकुन समझा हो और एक दासी को सौंप दिया हो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है। वर्तमान परिवेश में प्रत्येक मनुष्य अपने को भाग्य का दोषी ठहराता है। उसे तुलसीदास के जीवन से सीखना चाहिए। यूं तो कहा जाता है तुलसीदास जब पैदा हुए तो उनके मुंह में 32 दांत थे। उनके मुंह से राम-राम निकल रहा था, पर तुलसीदास जब गृहस्थ बने तो उनकी आसक्ति सिर्फ अपनी धर्म पत्नी रत्नावली में थी। वे पूजा-पाठ तो करते थे, पर वह उनकी आजीविका चलाने का माध्यम भर था। जब रत्नावली ने कहा

'अस्थि-चर्ममय देह मम, तामें जैसी प्रीति।

ऐसी जो श्रीराम महे, होति नतो भव भीति

अर्थात हाड़-मांस के शरीर में जितनी आपकी आसक्ति है उतनी अगर भगवान राम में होती तो आपका कल्याण हो जाता। तुलसीदास को पत्नी की यह वाणी चुभ गई। यही वाणी उन्हें भगवान की शरण में ले गई। हालांकि रत्नावली ने इसकी बड़ी भारी कीमत चुकाई, आजीवन वह घुट-घुट कर मरी। तुलसीदास रत्नावली के अंतिम संस्कार में सम्मिलित अवश्य हुए थे।

तुलसीदास एकाएक राम के भक्त नहीं हुए। उनके जीवन में बहुत बाधाएं आईं, वह विचलित भी हुए। किसी संबंध को भूलना इतना आसान नहीं होता विशेषतौर पर मनुष्य का जिस संबंध से अगाध प्रेम रहा हो। इसकी झलक रामचरित मानस के कई काण्डों में मिलती है

दीपशिखा सम जुबति तन मन जनि होस पतंग।

भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग॥

स्त्रियों का शरीर दीपक की लौ के समान है, हे मन! तू उसका पतिंगा न बन। काम और मद को छोड़कर श्रीराम चन्द्र जी का भजन कर और सदा सत्संग कर।

तुलसीदास जी जानते थे काम, क्रोध, मद और लोभ पर विजय प्राप्त करना मनुष्य केलिए अत्यंत कठिन है तभी तो वे कहते हैं-

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धरि।

तिन्ह महं अति दारुज दु:खद मायारूपी नारि॥

अर्थात काम, क्रोध, मद और लोभ, मोह आदि अज्ञान की प्रबल सेना है। इनमें मायारूपिणी स्त्री तो अत्यंत दारुण दु:ख देने वाली है।

तुलसीदास को नारी जाति से तिरस्कार मिला था इसलिए नारी जाति को उन्होंने वही दिया जो उन्हें मिला था।

वे कहते हैं

सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता,

मोहबिपिन कहुं नारि बसंता।

जत तप नेम जलाश्रय झारी।

होई ग्रीष्म सोषाई सब नारी॥

हे मुनि! सुनो। पुराण वेद और संत कहते हैं, मोह रूपी वन को विकसित करने के लिए स्त्री वसंतऋतु के समान है। जप, तप, नियमरूपी संपूर्ण जल के स्थानों को स्त्री ग्रीष्मरूप होकर सर्वथा सोख लेती है। जो संत होते हैं उनके लिए भक्ति का मार्ग अत्यंत कठिन होता है। यही बाधाएं तुलसीदास के सामने आईं इसलिए तुलसीदास रामनाम रूपी नौका में सवार हुए।

तुलसीदास जी कहते हैं

बहु बासना मसक हिम रासिहि।

सदा एकरस अज अबिनासिहि॥

मुनि रंजन भजन महि भारहि।

तुलसीदास के प्रभुहि उदारहि॥

बहुत ही वासनाओं रूपी मच्छरों का नाश करने वाले श्रीराम रूप हिमराशि (बर्फ के ढेर) को भजो, नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरधुनाथ जी को भजो। मुनियों को आनंद देने वाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले और तुलसीदास के उदार (दयालु) स्वामी श्रीराम जी को भजो। तुलसीदास जी के जीवन में बहुत सी बाधाएं आईं,

वे कहते हैं-

काहु को बल भजन को,

कोउ तप करे सुधरि।

तुलसी के बल राम को,

सोए पांव पसरि॥

तुलसीदास जी ये जानते थे कि जीवन में वाणी का विशेष महत्त्व है क्योंकि जिह्वïा पर मां सरस्वती का निवास होता है

तुलसी मीठे वचन ते,

सुख उपजत चहुं ओर।

वशीकरण इक मंत्र है,

तज दे वचन कठोर॥

तुलसीदास जी को यह अनुभव था कि मनुष्य कुछ समय के लिए भक्ति का मार्ग अवश्य अपना ले परंतु इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य है। उन्होंने जब इंद्रियों पर विजय प्राप्त की तो उन्हें गोस्वामी की उपाधि मिली। गो का अर्थ है इंद्रियां। उन्होंने लिखा है-

इंद्री द्वार झरोखा नाना।

तहं-तहं सुर बैठे करि धाजा।

आवत देखहिं विषय बयारी।

ते हाठे देहिं कपाट उधारी॥

इंद्रियों के द्वार हृदयरूपी घर के अनेकों झरोखे हैं, वहां-वहां (प्रत्येक झरोखे पर) देवता अड्डïा जमाकर बैठे हैं, ज्योंही वे विषय रूपी हवा को आते देखते हैं त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं। तुलसीदास बहुत बार प्रताड़ित हुए इसलिए उन्होंने कहा है-

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद।

संत पुराननिगम आगम बद।

संत पुराण वेद आदि सभी कहते हैं कि भक्ति का मार्ग अत्यंत दुर्लभ है। तुलसीदास जी ने इसलिए कहा है

भायं कुभायं अनख आलस हूं।

नाम जपत मंगल दिसि दस हूं॥

राम नाम अनख अर्थात क्रोधित होकर जपो, आलस्य से जपो तो भी परिणाम सुखद होता है। भगवान राम को जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय तुलसीदास को ही जाता है। तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' पूरे भारत में लोकप्रिय है। तुलसीदास का अधिकांश समय काशी, अयोध्या एवं चित्रकुट में ही बीता। अपने अंतिम समय में वे काशी आ गए और यहीं उन्होंने सन् 1623 ई. में अपने प्राण त्याग दिए।

यह भी पढ़ें -क्यों है बौद्घ धर्म में स्तूप का इतना महत्त्व

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