अभूतपूर्व दार्शनिक एवं अन्यतम योगी- श्री अरविन्द

डॉ.विभा खरे

7th June 2021

भारत भूमि को ऋषियों की भूमि कहा जाता है। यहां अनेक महान ऋषि मुनियों ने जन्म लेकर इस धरा को पवित्र किया है। उन्हीं में से एक थे श्री अरविन्द, जिनके होने से यह धरती पवित्र हुई। श्री अरविन्द जी की जीवन यात्रा पर आइए डालते हैं एक नजर।

अभूतपूर्व दार्शनिक एवं अन्यतम योगी- श्री अरविन्द

श्री अरविन्द एक महान दार्शनिक थे। उनका साहित्य, उनकी कविता, उनका चिन्तन अद्भुत है। उन्होंने वेदों का रहस्य खोला, मानव इतिहास को नई दृष्टि दी, राजनीति तथा समाज शास्त्र की नई व्याख्या की। मनोविज्ञान को नया आधार दिया। वे पूरब और पश्चिम के पूर्ण समन्वय थे। भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक आधार को उन्होंने खोज निकाला था और भारत माता को वे एक जीवित जाग्रत शक्ति मानते थे। वे राष्ट्र नेता थे। उनकी वाणी में ओज था और उनके शब्दों में जादू। श्री मां के शब्दों में 'श्री अरविन्द पूर्ण ज्ञान, पूर्ण दृष्टि तथा पूर्ण शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। आज भी, आप उनका कोई ग्रंथ उठा लीजिए। उनके कुछ शब्द पढ़िये, आपको सत्य और शक्ति का साक्षात्कार होगा। 

पन्द्रह अगस्त 1872 को वे कलकत्ता में जन्में उनके पिता की इच्छानुसार वे पश्चिमी वातावरण में पले और अंग्रेजी उनकी मूल भाषा बनी। तत्पश्चात् शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे विलायत चले गये। वहां वे चौदह वर्षों तक रहे। इस अवधि में उन पर जो संस्कार पड़े, उनका उनके जीवन के निर्माण में हाथ होना स्वाभाविक है। 

वे अंग्रेजी, फे्रंच, लैटिन तथा ग्रीक में पारगंत हो गये। वे अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे। वे अपना अधिकांश समय अंग्रेजी साहित्य कविता, उपन्यासादि फे्रंच साहित्य और प्राचीन, मध्यकालीन तथा अर्वाचीन यूरोपीय इतिहास के अध्ययन में लगाते थे। उनको कविता लिखने का शौक था। उन्होंने कुछ कविताएं लैटिन तथा ग्रीक में भी लिखीं। 

जब इक्कीस वर्ष की अवस्था में श्री अरविन्द देश लौटे और उन्होंने भारत भूमि का चरणों से स्पर्श किया तो उन्हें सहसा अद्भुत एवं अवर्णनीय शान्ति का अनुभव हुआ। मानों वे उस भारत जननी की आत्मा से तदाकार हो गये जिसको उन्हें आगे चलकर राष्ट्रीय रूप में सचेतन करना था। 

1893 से 1906 तक श्री अरविन्द ने विभिन्न सामाजिक सेवाओं का अनुभव प्राप्त किया। इसी बीच मृणालिनी देवी से उनका विवाह हुआ। वे महाराजा बड़ौदा के सहायक रहे। उन्होंने अध्यापन कार्य भी किया। इस अवधि में, इन्होंने कविता, नाटक, अनुवाद, संस्कृत, बंगला तथा अन्य भारतीय भाषाओं में दक्षता प्राप्त की। 1904 में वे योग की ओर विशेष रूप से आकर्षित हुए। चार वर्ष पश्चात् 1908 में ही, उन्हें विष्णु भास्कर लेले नामक महाराष्ट्रीय योगी के साथ बैठकर मुक्ति तथा निर्वाण की एक निश्चयात्मक अनुभूति उपलब्ध हो गयी। योग-साधना में वे स्वयं अपने गुरु बने। 

बंगाल विभाजन के समय राष्ट्रीय आन्दोलन जोरों पर था। 1906 में श्री अरविन्द प्राध्यापक पद से त्याग पत्र देकर आंदोलन में कूद पड़े और शीघ्र ही प्रगतिशील राष्ट्रवादियों के नेता बन गये। 'वन्देमातरमÓ पत्र, जो उस समय देश में आग उगल रहा था और जनता को क्रांति के लिये तैयार कर रहा था, श्री अरविन्द की प्रेरणा से ही संचालित होता था। 

अलीपुर बम केस से छूटने के कुछ दिन बाद, 1910 में वे पुडुचेरी चले गये और अपनी आत्मा के आदेश के अनुसार योग साधना में रत हो गये। 

श्री अरविन्द की यह योग साधना केवल अपने लिए या केवल देश के हित के लिए नहीं थी। यह योग साधना तो उन्होंने मानव चेतना से ऊपर एक उच्चतम चेतना को पृथ्वी पर उतारने के हित से की, जिसके द्वारा मनुष्य का रूपान्तर सम्भव है तथा जिसके पास मानव तथा सृष्टि की समस्त समस्याओं के हल की कुंजी है। 

श्री अरविन्द ने यह देखा कि आधुनिक मानव विज्ञान तकनीक, प्रशासन तथा संगठन के क्षेत्र में तो निरन्तर प्रगति कर रहा है, किन्तु मानव की समस्याएं और उलझती जा रही है। तब क्या इस भौतिक प्रगति को नकारा जाये? नहीं, बल्कि इसका हल यह है कि इस प्रगति को भोगने वाला मानव स्वयं अपने आपको बदले और अर्ध पशु की स्थिति से अपने को ऊपर उठाये। 

मानव के इस रूपान्तर को सिद्ध करने के लिए श्री अरविन्द ने अपना शेष जीवन लगा दिया। उन्होंने अति मानस चेतना से साक्षात्कार किया, उसे उतारा। वह शक्ति अब पृथ्वी पर कार्यरत है। 

एकोहम बहुस्याम जिस एक ने अपने को 'अनेकÓ में परिवर्तित किया है, वह 'एक' ही 'अनेक' में जाग्रत होकर अनेक को एकत्व के सूत्र में बांध देगा। इसी भविष्य को पृथ्वी पर उतारने के लिये भगीरथ के समान श्री अरविन्द ने प्रयत्न किया है। 

डार्विन के सिद्धांत के अनुसार जड़ से प्राण, प्राण से मन का उद्गम हुआ है। इस मन से जड़ित मानव अब अपने को विकास क्रम का अन्तिम चरण मान बैठा है, जो उसका भ्रम है, जो उसका अहंकार है। मानव के बाद अतिमानव का आगमन अनिवार्य है। पुरानी मान्यताएं, पुरानी बातें, पुराने युग के साथ जा रही हैं। नया युग, नई सृष्टि लेकर आ रहा है। 

यह भी पढ़ें -धर्म के नाम पर अधर्म

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