शुभता के प्रतीक चिह्न

ई. आर. प्रसाद

8th June 2021

वास्तुशास्त्र का धर्म से भी गहरा नाता है। वास्तुशास्त्र में प्रयोग किए जाने वाले विभिन्न धर्मों के प्रतीक चिह्न किस प्रकार हमारे जीवन के लिए शुभ फल देने वाले और मंगलकारी होते हैं, आइए जानें इस लेख से।

शुभता के प्रतीक चिह्न

वास्तु, फेंगशुई, रेकी, प्राणिक हीलिंग आदि प्राचीन कलाओं में विभिन्न प्रकार के प्रतीकों, यंत्रों, मंत्रों तथा मूर्तियों के प्रयोग की सलाह दी आती है, परंतु आज भी लोगों का एक वर्ग ऐसा है, जो यह मानता है कि इससे कोई लाभ नहीं होता। हालांकि आज वक्त बदल चुका है। आज की तारीख में दुनिया में ऐसी अनेक विधियां एवं उपकरण मौजूद हैं, जिनका उपयोग कर हम किसी भी प्रतीक, यंत्र, मूर्ति आदि से निकलने वाले सकारात्मक एवं नकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होते हैं। गृहारम्भ में विशिष्ट योग का भी उल्लेख प्राप्त होता है जिनमें स्वाति नक्षत्र, सिंह लग्न, शुक्ल पक्ष, सप्तमी तिथि, शुभयोग एवं जिन्होंने इस ऊर्जा को मापने की इकाई तैयार की, उन्हीं के नाम पर इस ऊर्जा के स्तर को भी में मापते हैं। धातु एवं फेंगशुई में उपयोग होने वाले कुछ प्रतीक, यंत्र एवं मूर्ति की चर्चा यहां की जा रही है, जिनका उपयोग कर अब तक बहुत से लोग लाभ प्राप्त करते रहे हैं। 

वास्तु शास्त्र में प्रयोग होने वाले मुख्य धार्मिक चिह्न ú, मंगल कलश, पंचांगुलक, मीन, स्वस्तिक आदि हैं। ú शब्द संपूर्ण ब्रह्मांड, अपरिमित बल तथा प्रणव (गणेश) का प्रतीक है। इस शब्द को देखने एवं उच्चारण करने मात्र से मन तो एकाग्र हो ही जाता है, साथ ही वातावरण भी शुद्ध हो जाता है, क्योंकि इसका उच्चारण करते वक्त हमारे शरीर से सारे चक्र जागृत हो जाते हैं। जल से भरा तथा पत्र-पुष्पों से अलंकृत कलश वैदिक काल से ही सुमंगल, समृद्धि एवं संपन्नता का सूचक है। सृष्टि का सृजन जल से भरा हुआ है अत: जल यहां ब्रह्मïांड की सर्जना का प्रतीक है। आम की पत्तियां सृजन के पश्चात जीवन की निरंतरता का बोधक हैं। इसके ऊपर रखा नारियल इसकी शुभता में वृद्धि करता है। मांगलिक अवसरों जैसे गृह प्रवेश, विवाह आदि के समय हल्दी तथा पिसे हुए चावल से दाहिने हाथ के पंजे को दीवार पर लगाने की प्रथा वर्षों पुरानी है। इसमें पांच की संख्या पंचतत्त्व का द्योतक है, जिससे ब्रह्मांड का सृजन हुआ है। हाथ कर्म का प्रतीक है। बौद्ध धर्म में तो विभिन्न मनोदशाओं को बुद्ध की हस्त मुद्राओं से ही संकेतित किया जाता है। 

मीन सच्चे प्रेम का प्रतीक है। यात्रा आरंभ करने या घर से बाहर जाने के पूर्व मीन यानी मछली का दर्शन हो जाए तो यह अच्छा शकुन माना जाता है। पौराणिक मतों के अनुसार मीन भगवान विष्णु का पहला अवतार है। प्रलय के समय इसी ने नाव के रूप में मनु और सृष्टि को बचाया था। एक प्रकार से उन्होंने ही उनकी रचना की। इसे कामदेव की ध्वजा का प्रतीक भी माना जाता है। स्वस्तिक के सिरों पर समकोण पर मुड़ी रेखाएं अंतहीन मानी जाती हैं, जिनका कोई स्पर्श या संधि बिंदु नहीं है, क्योंकि ब्रह्मांड अनंत है। यह सृष्टि के इस गूढ़ रहस्य का सूचक है। गगन से पृथ्वी तक ब्रह्मांड के चतुर्भुजी आकार की तरह स्वस्तिक चारों भुजाओं का प्रतीक है। उपरोक्त मांगलिक चिह्नों के अलावा ईसाइयों का शुभ प्रतीक चिह्न क्रॉस, इस्लाम का शुभ प्रतीक चिह्न 786 तथा अर्धचंद्र है। इन मांगलिक चिह्नïों को घर के मुख्य द्वार के आस-पास लगाने से प्रवेश द्वार एवं घर की ऊर्जा बढ़ जाती है। 

बौद्घ धर्म के प्रतीक

  • बौद्ध धर्म में आठ शुभ चिह्नों का जिक्र आता है, जिनमें पहली सैरन्या (सुनहरी मछलियां) जो जीवन सागर को आसानी से पार करने की क्षमता का द्योतक है और मानव के दोनों आंखों का प्रतिनिधित्व करती हैं। 
  • दूसरा पेमा (कमल का फूल) है जो इस बात का प्रतीक है कि आप मन को पाप के मैल से बचाए रखें, जिस तरह कमल कीचड़ में उगकर भी गंदगी से परे रहता है। यह हृदय तथा वाणी की पवित्रता का प्रतीक है। 
  • तीसरा पालभेउ (अनंत गांठे) हैं, यह हर प्राणी से प्रेम भाव रखने का प्रतीक है तथा ईश्वर एवं प्राणियों के मध्य एकात्मकता दर्शाता है एवं शरीर में सोने का प्रतीक है।
  • चौथा चोक्यो खोरबो (धर्म चक्र) है, यह समय का प्रतीक है, जो कभी रुकता नहीं। शरीर में यह पैरों का प्रतीक है।
  • पांचवां दुग (छाता) है। यह ऐसे आश्रम  का द्योतक है, जिसकी छत्रछाया में आप कष्टों से बचते हैं। यह अध्यात्म का प्रतीक है और मानव शरीर में सिर का प्रतिनिधित्व करता है। यह छतरी की तरह स्वार्थ से परे होकर कर्म करने का उपदेश देता है।
  • छठा मुंथा (कलश) है। यह धर्म, समृद्धि एवं दीर्घ जीवन का द्योतक है। 
  • सातवां शुंगकर (श्वेत शंख) है। यह सभी पापों से मुक्त होकर पुनर्जन्म से मुक्ति देने अर्थात मोक्ष के प्रति जागरुकता का प्रतीक है। 
  • आठवां ग्याल्तसेन (विजय पताका) है। यह पताका पाप पर पुण्य की विजय का प्रतीक है। अधर्म पर धर्म की विजय इस ध्वज का मूक संदेश है। 

फेंग शुई का उद्भव भी चूंकि बौद्ध धर्म से हुआ है, इसलिए इस कला में प्रतीकात्मक चीजों का बहुत महत्त्व है। इस कला में मस्तिष्क ऊर्जा तथा शरीर को ऊर्जा दोनों को महत्त्व दिया जाता है। मस्तिष्क ऊर्जा द्वारा जब हम यह महसूस करते हैं कि बुद्धा हमारे यहां धन एवं समृद्धि की गठरी लेकर आ रहे हैं, तो हमारा शरीर उस अहसास से ऊर्जावान होता है। इसी प्रकार फेंगशुई में अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं एवं प्रतीकों का सहारा लिया जाता है, जो हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के भावों द्वारा उसे ऊर्जावान कर सके। जैसे- फाउंटेन (झरना) धन एवं समृद्धि का, कछुआ दीर्घायु होने का , सारस (क्रेन) ईमानदारी का, मछली सफलता का, हाथी बुद्धिमता का, हिरण धन का, चमगादड़ भाग्य का, कमल स्वच्छता एवं निर्मलता का, ऌफूलदान शांति का प्रतीक है। 

इसी प्रकार विभिन्न यंत्रों का प्रयोग भी सदियों से करते आ रहे हैं। जैसे- श्री यंत्र एवं कुबेर यंत्र का उपयोग धन प्राप्ति के लिए दुकान या तिजोरी में किया जाता है। उसी प्रकार बगलामुखी यंत्र का प्रयोग ऐसी फैक्ट्री या दुकान में किया जाता है, जहां शत्रुओं से भय हो। छिन्नमस्ता यंत्र का प्रयोग पुत्र प्राप्ति तथा दरिद्रता के नाश के लिए किया जाता है। काली यंत्र का उपयोग घर में सुख एवं लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु किया जाता है। मृत संजीवनी यंत्र का उपयोग ऐसे घरों में किया जाता है, जहां लोग ज्यादा बीमार हो रहे हों। मातंगी यंत्र का उपयोग गृहस्थ सुख पाने हेतु, पुत्र पाने हेतु या कन्या के विवाह में अवरोध दूर करने हेतु किया जाता है।

यह भी पढ़ें -बुद्घ सारे संसार की ज्योति है

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