भवन की वास्तु का स्वास्थ्य से सम्बन्ध

पं. वी.के. शर्मा

8th June 2021

हम भवन बनाते हैं अपनी सुख-समृद्घि के लिए, लेकिन कई बार हमसे वास्तु में अनदेखी हो जाती है, जिसका हमारे काम-धंधे से लेकर स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। आइए जानें इससे बचने के उपाय।

भवन की वास्तु का स्वास्थ्य से सम्बन्ध

वास्तु दोष का प्रभाव जिस प्रकार से आपके कारोबार, धन, संपदा एवं व्यापार पर पड़ता है, ठीक उसी प्रकार से इसका प्रभाव व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। वास्तु का प्रभाव व्यक्ति के स्वास्थ्य ऌपर जानने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि भवन की दिशाओं का सम्बन्ध व्यक्ति के शरीर से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है। इसको जानने के लिए भवन की पूर्व दिशा को लग्न मानते हुए भवन की कुण्डली बना लें अर्थात् भवन को 12 भागों में विभाजित कर लें। (देखे चित्र-1) 

चित्र-1 में भवन के 12 भाग, व्यक्ति के शरीर के 12 अंगों का प्रदर्शन कर रहे हैं। भवन के जिस भाग में दोष होगा वह व्यक्ति के शरीर के उसी भाग के अंग को प्रभावित करेगा अर्थात रोग देगा। इसको जानने के लिए हम एक-एक करके सभी भागों के दोषपूर्ण होने का प्रभाव व्यक्ति के शरीर पर देखेंगे। आइए उदाहरण द्वारा समझें।

  • यदि भवन की पूर्व दिशा में दोष है तो भवन में रहने वालों की आंखें कमजोर हो जाएंगी, उच्च रक्तदाब (॥द्बद्दद्ध क्च.क्क), सिर में दर्द या माइग्रेन की तकलीफ होगी। नींद ठीक प्रकार से नहीं आएगी। 
  • भवन की उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में दोष हो तो व्यक्ति को मुख से सम्बन्धी परेशानी रहेगी। जीभ पर छाले , दांत व कानों की बीमारी होगी, ऊंचा सुनाई देगा।
  • उत्तर भाग के मध्य से ऊपर के भाग में दोष हो तो कन्धों में दर्द रहना, चक्कर आना की शिकायत रहेगी। 
  • उत्तर दिशा में दोष हो तो दिल का रोगी, छाती से जुड़ी बीमारी, अस्थमा, टी.वी., खांसी, जुकाम आदि होते हैं।
  • उत्तर-पश्चिम दिशा के ऊपर उत्तरी भाग में दोष है तो पीठ में दर्द, रीढ़ की हड्डïी में बीमारी और सन्तान को कष्ट होता है।
  • उत्तर-पश्चिम दिशा में दोष हो तो व्यक्ति को आंतों से सम्बन्धित रोग होते हैं और पैर खराब रहते हैं।
  • पश्चिम दिशा में दोष हो तो व्यक्ति को आंत विकार, उदर, कब्ज आदि की शिकायत रहती है। 
  • दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) में दोष हो तो सेक्स सम्बन्धी रोग और स्त्री रोग सम्बन्धी परेशानी रहती है। 
  • दक्षिण-पश्चिम दिशा में दक्षिण के ऊपर की ओर दोष हो तो इससे जांघों में दर्द या इनसे सम्बन्धित रोग होता है।
  • दक्षिण दिशा में दोष हो तो इससे घुटनों में दर्द रहता है। चलने-फिरने में परेशानी होती है और बैठने में दिक्कत होती है।
  • दक्षिण दिशा से ऊपर की ओर दोष हो तो व्यक्ति का रक्त दाब नीचा हो जाता है। घुटने से नीचे के भाग यानी पिण्डलियों व पांव में दर्द रहता है।
  • दक्षिण-पूर्व दिशा (आग्नेय कोण) में दोष हो तो पांवों में सूजन व दर्द रहता है।

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