लोकमाता अहिल्याबाई होलकर

एम.आई. राजस्वी

8th June 2021

अहिल्याबाई होलकर ने उस युग में मालवा प्रांत की बागडोर संभाली, जब महिलाएं अपने पति की मृत्यु होने पर उनकी चिता के साथ ही सती हो जाती थीं, किंतु अहिल्याबाई ने ना सिर्फ राज्य के प्रति अपना दायित्व निर्वाह किया, बल्कि वैदिक धर्म की पुर्नस्थापना भी की।

लोकमाता अहिल्याबाई होलकर

भारतवर्ष की भूमि में कई ऐसे वीर महापुरुषों और महिलाओं ने जन्म लिया, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश और समाज के हित में न्योच्छावर कर दिया। इन्हीं महान् विभूतियों में से एक नाम है रानी अहिल्याबाई होलकर का। अपनी दूरदर्शिता एवं कुशल प्रबंधन के कारण होलकर वंश का सर्वाधिक प्रसिद्घ नाम और पहचान बन गईं अहिल्याबाई होलकर।

जीवन परिचय

31 मई, 1725 को अहिल्याबाई का जन्म महाराष्ट के औरंगाबाद जिले के चौड़ी नाम गांव में एक साधारण परिवार में हुआ। इनके पिता माणकोजी शिंदे किसान थे और माता का नाम सुशीलाबाई था। अहिल्याबाई बचपन से ही शिव भक्त थीं। 12 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह मालवा के प्रसिद्घ सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खांडेराव होलकर से संपन्न हुआ। खांडेराव होलकर को राज-काज में दिलचस्पी नहीं थी और वह स्वभाव से उदंड थे। लेकिन अहिल्याबाई के पति प्रेम ने खांडेराव के समूचे जीवन में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। वह न केवल राज-काज में रुचि लेने लगे, बल्कि उनका आक्रोशित स्वभाव भी शांत और सौम्य होता चला गया। दूसरी ओर उनकेससुर मल्हारराव को अपने पुत्र की अपेक्षा पुत्र-वधु की सूझ-बूझ, योग्यता और कार्यक्षमता पर अत्यधिक विश्वास था। वे शासकीय मामलों में अहिल्याबाई का पूर्ण सहयोग लेते थे। धीरे-धीरे अहिल्या राज्य के सभी कार्यों का कुशलतापूर्वक संचालन करने लगीं। मल्हारराव होलकर की अनुपस्थिति में वह संपूर्ण राज्य व्यवस्था को सुचारु बनाए रखती थीं। उनकी शासन व्यवस्था से राज्य के अधिकारीगण और प्रजाजन संतुष्ट थे। अहिल्याबाई हर क्षेत्र में मल्हारराव का पूर्ण सहयोग करतीं। वह रणभूमि में जाकर अपने ससुर के मार्गदर्शन में युद्घ की बारीकियों को भी जानने का प्रयास करने लगी थीं। यहां तक कि उन्होंने मल्हारराव के साथ कई युद्घ क्षेत्र में जाकर अदम्य साहस का परिचय भी दिया। मल्हारराव के आदेश पर उन्होंने कई दुरुस्थ स्थानों की यात्रा कर भौगोलिक और सामाजिक ज्ञान अर्जित किया। इस प्रकार अहिल्याबाई ने मल्हारराव के सहयोग एवं दिशा निर्देशन में राज-काज की संपूर्ण जानकारी ले ली थी। अब कई प्रमुख आदेश पत्र भी उनके नाम से आने लगे थे। इस बीच अहिल्याबाई ने एक पुत्र और पुत्री को जन्म दिया। पुत्र का नाम मालेराव होलकर तथा पुत्री का नाम मुक्ताबाई रखा गया। संतान प्राप्ति के साथ ही अहिल्याबाई के जीवन में उत्तरदायित्व भी बढ़ता गया किंतु उन्होंने अपना हर उत्तरदायित्व निभाया और राज-काज में पहले की भांति ही अपना सहयोग देती रहीं।

मालवा की महारानी

1754 में मल्हारराव होलकर और सुरजमल जाट के बीच युद्घ छिड़ा। मल्हारराव की ओर से इस युद्घ का संचालन खांडेराव कर रहे थे और उनके साथ ही उनकी पत्नी अहिल्याबाई। यह युद्घ महीनों चला। अंतत: इस युद्घ में खांडेराव वीरगति को प्राप्त हुए। अपने पति की  चिता के साथ सती होने को तैयार अहिल्याबाई को मल्हारराव ने ऐसा करने से रोक दिया। कम आयु में वैधव्य झेलने को विवश अहिल्याबाई ने स्वयं को मानवता और मालवा की सेवा में समर्पित कर दिया। सन् 1766 में मल्हारराव होलकर की मृत्यु के पश्चात मालवा प्रांत की बागडोर अहिल्याबाई के पुत्र मालेराव होलकर ने संभाली किंतु 1767 में उनके जवान पुत्र मालेराव की भी मृत्यु हो गई। मालवा प्रांत को बिखरने से बचाने के लिए उन्होंने यहां का उत्तराधिकारी बनने का निर्णय लिया और पेशवाओं से आग्रह किया कि उन्हें क्षेत्र की प्रशासनिक बागडोर सौंपी जाए। तत्पश्चात 1 दिसंबर 1767 को अहिल्याबाई मालवा की महारानी प्रतिष्ठिïत हुईं उन्होंने मल्हारराव के दत्तक पुत्र एवं सर्वाधिक भरोसेमंद सेनानी सूबेदार तुकोजीराव को अपना प्रधान सेनापति नियुक्त किया। अहिल्याबाई के शासक बनने का राज्य के कई लोगों ने विरोध भी किया। किंतु महारानी अहिल्याबाई की अद्भुत शक्ति व पराक्रम देखकर प्रजा उनपर भरोसा करने लगी।

राज्य की बागडोर एक महिला के हाथों में देख उनके विरोधी मुखर हो उठे। उन्होंने अहिल्याबाई को एक अबला नारी समझने की भूल कर उनके विरुद्घ कई कुचक्र रचे, लेकिन महारानी अहिल्याबाई ने कई बार युद्घ में अपनी प्रभावशाली रणनीति से सेना का कुशलतापूर्वक नेतृत्व किया और विजयी हुईं। वह अपनी प्रजा की रक्षा के लिए सदा युद्घ के लिए तैयार रहतीं। वह हाथी पर सवार होकर शत्रुओं का सामना करती थीं। वह एक बेहतरीन तीरंदाज थीं। कई युद्घ में महिला सेना का नेतृत्व वह स्वयं करती थीं।

कुशल प्रशासक

महारानी को अपने शासनकाल के आरंभिक दौर में अनेक विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। राज्य भर में चारों ओर चोर-डाकुओं, भीलों का आतंक छाया था। इनपर लगाम लगाने में यशवंतराव फणसे नामक वीर नव युवक ने महारानी का पूरा साथ दिया। महारानी अहिल्याबाई ने अपनी पुत्री मुक्ताबाई का विवाह यशवंतराव से  करवा दिया। 

अहिल्याबाई का शासन प्रबंध उच्च कोटि का था। उन्होंने अपना शासन प्रबंध सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्य को जिलों, तहसीलों और ग्राम पंचायतों में विभाजित कर दिया था उनकी गणना एक आदर्श शासक के तौर पर संपूर्ण भारत में होने लगी थी।

अहिल्याबाई ने शिक्षा का भी प्रचार-प्रसार किया एवं कला-कौशल के क्षेत्र में भी अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। उन्होंने धर्म के क्षेत्र में भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए। शिव भक्त तो वो थीं ही। उन्होंने कई बड़े मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोंद्घार कराया। काशी का विश्व प्रसिद्घ मंदिर 'काशी विश्वनाथ मंदिरों का निर्माण करवाया। भगवान शंकर में उनकी गहरी आस्था थी। शिव की एक पिंडी हमेशा अपने हाथ में रखती थीं। वह समस्त राजकीय आज्ञाओं पर अपने हस्ताक्षर की जगह श्री शंकर लिखती थीं। इसी श्री शंकर की आज्ञा से समस्त राजकाज चलता था।

महारानी ने जिस श्रद्घा-भक्ति के साथ शिव मंदिरों का निर्माण कराया, उसी श्रद्घा भक्ति के साथ राम और कृष्ण मंदिर भी बनवाए। उन्हें मुस्लिम संप्रदाय के लोगों से भी कोई द्वेष नहीं था। उनके राज्य में मुस्लिम प्रजा को भी वे सभी सुख-सुविधाएं उपलब्ध थीं, जो हिन्दू प्रजा को थी। उन्होंने देश में कई मस्जिदों का भी निर्माण कराया। फकीरों, मौलवियों आदि को रहने के लिए निवास स्थान भी भेंट किए गए। उनकी आर्थिक सहायता भी की जाती थी।

रानी का कहना था, 'मैं ईश्वर के प्रदान किए गए दायित्व को निभा रही हूं। मेरा दायित्व प्रजा को सुखी रखना है। मैं यहां पर अपनी सत्ता और शक्ति के बल पर जो भी कार्य कर रही हूं, उसका उत्तर मुझे परलोक में ईश्वर को अवश्य देना पड़ेगा। जो धन-दौलत मैं प्रजा के लिए खर्च करती हूं, यह मेरा नहीं प्रजा का ही है। मैं जो कुछ प्रजा से लेती हूं, वह मेरे ऊपर कर्ज के समान है। भगवान जाने इस कर्ज को मैं अदा कर पाऊंगी अथवा नहीं।'

महत्त्वपूर्ण निर्णय

महारानी के सत्ता संभालने के पूर्व जब कोई नि:संतान स्त्री विधवा हो जाए तो उसकी धन-संपत्ति शासन द्वारा जब्त कर ली जाती थी। महारानी अहिल्याबाई ने इस शासनादेश को रद्द कर दिया। अब नि:संतान विधवाओं को भी अपनी धन-संपत्ति का इच्छानुसार उपयोग करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई। साथ ही नि:संतान विधवाओं को दत्तक पुत्र गोद लेने का भी अधिकार दिया गया।

महारानी ने अपने शासन प्रबंध को सुदृढ़ बनाने की दिशा में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए। मल्हारराव होलकर के शासनकाल में राज्य की राजधानी इंदौर थी, जिसे एक समृद्घ और विकसित शहर बनाने में अहिल्याबाई ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज इंदौर की पहचान भारत के समृद्घ एवं विकसित शहरों में होती है। 

अब अहिल्याबाई ने महेश्वर नामक सुंदर तथा पौराणिक नगर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया। महेश्वर पवित्र नदी नर्मदा के तट पर बसा था। भारत के प्राचीन साहित्य में महेश्वर का 'महिष्मतीÓ के नाम से कई स्थानों पर उल्लेख मिलता है। इस नगर को राजा महिष्मान ने बसाया था, जिनके नाम पर इस नगर का नाम महिष्मती रखा गया।

अहिल्याबाई एक छोटे से प्रांत की रानी होने के बावजूद अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता, सूझबूझ, दूरदर्शिता, वात्सल्य, धर्मपरायणता के कारण संपूर्ण भारत में सम्मानित दृष्टिï से देखी जाने लगीं। अपने जीवन काल में ही सारे प्रियजनों को खोकर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और प्रजा को ही अपनी संतान मान उनके प्रति अपने दायित्व का पूर्ण निर्वाह किया। प्रजा उन्हें 'देवी मां', 'रानी मां' जैसे सम्मानसूचक शब्दों से संबोधित करने लगी थी। 

अपने जीवन के अंतिम क्षणों में महारानी अहिल्याबाई होलकर अपनी प्रजा के लिए 'लोकमाता' बनकर 13 अगस्त, 1795 को इस संसार से विदा हो गईं।

पुस्तक- 'अहिल्याबाई होलकर' से साभार

यह भी पढ़ें -पर्यावरण पर महान हस्तियों के विचार

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