आज भी अभिशप्त है विधवाओं का जीवन

सुशील सरित

9th June 2021

आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व के आम भारतीय परिवारों में कम उम्र में विधवा हो गई महिलाओं की जो स्थिति थी, उसके चित्र अभी भी मन की डायरी के पृष्ठों पर साकार नजर आते हैं।

आज भी अभिशप्त है विधवाओं का जीवन

पति के किसी भी कारण से असमय मृत्यु हो जाने पर, विधवाओं के प्रति न केवल परिवार का, बल्कि पूरे समाज का जिस प्रकार नजरिया बदल जाता था,  वो किसी को भी, आज भी आश्चर्य में डाल सकता है। सामाजिक दबाव, न केवल उनका साज-सिंगार छीन कर उन्हें एक सफेद धोती तक सिमट जाने पर मजबूर कर देता था, वरन् शादी-विवाह और तीज-त्यौहार जैसे मांगलिक अवसरों पर, उन्हें इस कदर उपेक्षित किया जाता था कि वह स्वयं ही अपने घर की किसी अंधेरी कोठरी तक सीमित होकर रह जाती थीं।

कुछ कठोर परिवार तो स्पष्ट निर्देश भी दे देते थे कि मांगलिक अवसरों पर उनकी उपस्थिति ही अशुभ है, अत: उन्हें उन अवसरों पर दूर ही रखा जाए। सास और ननद की दृष्टि में तो वे अपने पति की मृत्यु की जिम्मेदार ही घोषित कर दी जाती थीं  और उन्हें अभाग्यशाली मान लिया जाता था। घर का बचा खुचा भोजन, साल में मुश्किल से एक-दो बार सादी-सफेद धोती, उनकी नियति थी जीवन की अन्य रंगीनियों से संबंध का तो उनके लिए कोई अर्थ ही छोड़ा नहीं जाता था। अगर संयोग से वह किसी से थोड़ा हंस-बोल लीं, तो उन्हें खरी-खोटी सुनाने में कोई नहीं चूकता था। घर में लगी लगाई  नौकरानियों को हटाकर उनके काम का भार भी इन्हीं विधवाओं को सौंप दिया जाता था। नई आई बहू  पर उनका साया ना पड़े, इसका विशेष ध्यान रखा जाता था, क्योंकि उनका साया पड़ना अशुभ  होगा, ऐसी धारणा समाज में व्याप्त थी।

राजा राममोहन राय और ऋषि दयानंद जैसे समाज सुधारकों ने उनकी स्थिति को सुधारने की और विधवाओं के पुनर्विवाह हेतु एक आंदोलन चलाने का काफी प्रयत्न किया। इनकी स्थितियों को केंद्र बनाकर कुछ फिल्में भी बनीं, जिनमें- प्रेम रोग और कटी पतंग आज भी लोगों को याद होगी, किन्तु रूढ़ियों और व्यक्तिगत स्वार्थों की मजबूत रस्सियों की पकड़ ज्यादा ढीली नहीं हो पाई।

इधर जब से एकल परिवार, महिलाओं का उच्च शिक्षा में प्रवेश और उनका जॉब करना जैसी प्रवृत्तियां महिलाओं के जीवन से जुड़ी, तब से ये दृश्य कुछ बदले तो हैं, लेकिन इस बदलाव की लहर केवल महानगरों, नगरों और कुछ उन्नत कस्बों तक ही पहुंच पाई है। आज भी इस तस्वीर का 80त्न हिस्सा वैसा का वैसा ही है। इस संपूर्ण त्रासदी का सबसे दर्दनाक हिस्सा उन बाल विधवाओं का जीवन है, जो ब्रज क्षेत्र में वृंदावन, मथुरा, बरसाना, नंदगांव, बनारस, काशी, अयोध्या आदि धार्मिक स्थलों पर अपना जीवन बिताने को मजबूर कर दी गई हैं। मंदिरों और आश्रमों के बाहर, दोपहर के भोजन के समय, चिलचिलाती धूप, कंपकंपाती सर्दी या बरसात में भीगती, भोजन की आस में केवल एक धोती पहने कतार में लगी या मंदिरों-आश्रमों में, सुबह-शाम केवल एक वक्त की रोटी के बदले, तीन-तीन घंटे कीर्तन करती या सड़कों पर भीख मांगती महिलाओं को यहां कभी भी देखा जा सकता है। कुछ के सिर मुंडे हुए तो कुछ के बाल बेतरतीबी से कटे हुए, न चेहरे पर रौनक, ना ही आंखों में कोई आशा। इनमें हर उम्र, जाति और प्रांत की महिलाएं शामिल हैं। 16 साल से लेकर 90-95 साल तक की महिलाएं। इन महिलाओं का कुसूर केवल इतना है कि यह विधवाएं हैं, वह भी बाल विधवाएं। पति की मौत के बाद अभिशाप समझ कर परिवार द्वारा तिरस्कृत, घर से निकाली गईं बाल विधवाएं। कुछ को उनके घर वाले छोड़ गए, तो कुछ खुद ही भटकती-भटकाती यहां चली आई हैं। कुछ को कुछ समाजसेवी संस्थाओं की मदद से रहने-खाने का आसरा मिल गया, कुछ मंदिरों-आश्रमों में नाम मात्र की सुविधाओं के बदले लगभग दासी जैसी जिंदगी बिता रही है। बाकी भीख मांग कर गुजारा करने पर मजबूर। वृंदावन, मथुरा, नंदगांव, बरसाना, गोवर्धन, काशी, अयोध्या आदि सभी धार्मिक स्थलों पर, एक मोटे अनुमान के अनुसार इनकी संख्या सात करोड़ के आसपास है।

इस समस्या के मूल में क्या है 

इस समस्या के मूल में है बाल विवाह। यद्यपि कानून की नजर में बाल विवाह गैर कानूनी है, लेकिन बिहार, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में आज भी 40 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पहले ही हो जाता है। देश के 22 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में अभी कुछ वर्ष पूर्व हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण संख्या 5 के अनुसार, आंध्र प्रदेश में 12 प्रतिशत, असम में 11 प्रतिशत, बिहार में 11 प्रतिशत, त्रिपुरा में 21.9 प्रतिशत और इन सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल में 16.4 प्रतिशत महिलाएं 15 से 19 वर्ष की आयु वर्ग में या तो मां बन चुकी थीं या गर्भवती थीं। इसी सर्वेक्षण के अनुसार बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में 41 प्रतिशत से भी ज्यादा लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पहले ही हो गया था और उनके पतियों की उम्र इनकी उम्र से कम-से-कम दुगनी और कईयों की 3 गुनी से भी ज्यादा थी। मतलब साफ है कि शादी के साथ ही कुछ समय बाद विधवा हो जाना इनके नसीब के साथ जोड़ दिया गया था ।

क्यों छोड़ा जाता है इन्हें वृंदावन या धार्मिक स्थलों पर?

पति की मौत के बाद एक ओर तो जमीन-जायदाद पर कब्जा करने की नियत से इनके सारे अधिकार छीन लिए जाते हैं और वे भविष्य में अपने अधिकारों के प्रति आवाज ना उठा सकें, इस भय से उन्हें वृंदावन जैसे स्थलों पर छोड़ दिया जाता है।

वृंदावन जैसे स्थानों पर, यह भक्ति में लीन होकर, अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को भूल जाएंगी और विचलित नहीं होगी, यह विश्वास भी वृंदावन जैसे स्थानों पर इनके छोड़े जाने के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

इसका एक दु:खद पहलू यह भी है, कि इस असामाजिक निर्णय में ऐसी स्त्रियों के मायके वालों की भी लगभग मौन सहमति होती ही है। जाहिर है कि इस असामाजिक नृशंस प्रथा को  समाज का भी मूक समर्थन प्राप्त है।

वृंदावन आदि स्थानों पर छोड़ दिये जाने के बाद सिवा मृत्यु की प्रतीक्षा के उनके लिए कोई विकल्प नहीं बच पाता है।

शारीरिक शोषण का शिकार भी बनती हैं यह

इन स्थानों पर सक्रिय आपराधिक तत्व और उनके संगठित गिरोह न केवल इनका समय-समय पर खुद शारीरिक शोषण करते हैं वरन् लालच या धमकी देकर इनका उपयोग जिस्म के बाजार में भी किया जाता है।

किसी राजनीतिक दल की नजर इन पर क्यों नहीं पड़ती?

एक प्रश्न मन में उठना स्वाभाविक है कि आज जब सभी चुनाव जातीय समीकरण को आधार बनाकर लड़े जाते हैं, तो किसी भी दल का ध्यान इनकी ओर क्यों नहीं जाता। इसका सीधा सा कारण यह है कि इनमें से अधिकांश की ना तो कोई पहचान है, ना उन पर मतदाता पहचान पत्र है। दूसरे इनका कोई संगठन भी नहीं है। अत: वह वोट बैंक नहीं मानी जातीं और यह भी सच है कि समाज से लगभग बहिष्कृत, किसी तरह अपना पेट भरने और तन ढांकने की कोशिश में लगी, इन बाल विधवाओं की अपने मौलिक अधिकारों को हासिल करने में कोई दिलचस्पी भी नहीं रह जाती।

क्या इनको दोबारा समाज की मुख्यधारा में नहीं लाया जा सकता

यह कठोर सत्य है कि काफी समय से परित्यक्त जीवन जी रही विधवाएं न केवल अपनी काफी जिन्दगी गुजार चुकी हैं, बल्कि उन्हें जीवन की रंगीनियों में कोई दिलचस्पी भी नहीं बची है, लेकिन वे विधवाएं जो अभी कम उम्र की हैं, उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस शामिल करने का अभियान चलाना चाहिए। कुछ एनजीओ इस दिशा में कार्य कर रहे हैं, लेकिन इनकी संख्या नगण्य ही है। अगर सरकार इस ओर ध्यान दे तो सदियों से चली आ रही अन्याय की यह कहानी नया मोड़ ले सकती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विधवाओं के प्रति आवाज उठी है

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन् 2011 में ऐसी महिलाओं की समस्याओं के प्रति समाज में जागरूकता फैलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस की घोषणा की गई थी।

23 जून को इसका आयोजन होता है और सती प्रथा, बाल विवाह और बेमेल विवाह की आंच में झुलसी इन बाल विधवाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधारने की आवाज उठाने के लिए यह अंतरराष्ट्रीय प्रयास है, लेकिन विधवाओं का पुनर्विवाह, आर्थिक स्वावलंबन, पारिवारिक सम्पत्ति, सामाजिक और नैतिक अधिकारों की रक्षा के लिए इस युद्ध में जब तक समाज के जागरूक लोग साथ नहीं आएंगे, तब तक अपने देश भारत में 7 करोड़ से अधिक संख्या में इस त्रासदी को झेल रहीं इन अभिशप्त विधवाओं को न्याय नहीं मिलेगा।

यह भी पढ़ें -हिंदू धर्म में वृक्षों का महत्त्व

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