ताकि नौ महीने का सफ़र हो आसान

सरिता शर्मा

9th June 2021

प्रेग्नेंट होना किसी महिला के लिए खुशी की बात होती है और इसमें आने वाली तकलीफों को सहज रूप से महसूस करके घरेलू नुस्खों से दूर कर सकते हैं और प्रेग्नेंसी को एन्जॉय कर सकते हैं। यहां एक बात ध्यान रखने वाली है कि अपनी डॉक्टर से नियमित जांच करवाना भी जरूरी है।

ताकि नौ महीने का सफ़र हो आसान

मां   बनने का अनुभव होते ही एक औरत की पूरी दुनिया ही बदल जाती है। गर्भावस्था का नौ महीनों का यह सफर उसको अनेक मनोभावों से परिचित कराता है। नए-नए अनुभवों के साथ वह अपनी प्रेगनेंसी को एन्जॉय करती है। प्रेग्नेंट होते ही आपका शरीर आपको संकेत देना शुरू कर देता है। दरअसल जैसे ही आप गर्भ धारण करती हैं तो आपके पीरियड्स बंद हो जाते हैं। पीरियड्स बंद होने में आपके शरीर से निकलने वाला हार्मोन प्रोजेस्ट्रोन अहम भूमिका निभाता है।

गर्भावस्था के पहले तीन महीने बहुत ही खास होते हैं। इस समय भ्रूण गर्भ में आकार ले रहा होता है अत: आपको कोई भी स्वास्थ्य समस्या हो तो डॉक्टर से पूछे बिना कोई दवा न लें, क्योंकि आपके खान-पान का पूरा असर भ्रूण के विकास पर पड़ता है। प्रेग्नेंट औरत के शरीर में होने वाले बदलाव उसकी दिनचर्या को तो प्रभावित करते ही हैं साथ में वह मानसिक रूप से भी कई चिंताओं से घिरी रहती है कि कुछ गलत न हो जाये। इन दिनों में उसे मॉॄनग सिकनेस, चक्कर आने, सीने में जलन, गैस और उलटी आने जैसी समस्याओं से गुजरना पड़ता है। जरा सी लापरवाही से गर्भपात का डर भी बना रहता है। प्रेग्नेंट होना किसी महिला के लिए खुशी की बात होती है और इसमें आने वाली तकलीफों को सहज रूप से महसूस करके घरेलू नुस्खों से दूर कर सकते हैं और प्रेग्नेंसी को एन्जॉय कर सकते हैं। यहां एक बात ध्यान रखने वाली है कि अपनी डॉक्टर से नियमित जांच करवाना भी जरूरी है। अगर कोई भी समस्या गंभीर हो तो उसी समय डॉक्टर से संपर्क करें।

प्रेग्नेंसी में आने वाली समस्याएं

उलटी आना और जी मिचलाना

एस्ट्रोजन हार्मोन की अधिकता के कारण ऐसा होता है। गर्भ के पहले तीन महीनों तक यह तकलीफ होती है और धीरे-धीरे अपने आप ही खत्म भी हो जाती है। एक तरह से यह आपके प्रेग्नेंट होने का सूचक भी है। ऐसा होना यह भी दर्शाता है कि आपकी प्लासेंटा सही से विकसित हो चुकी है और हार्मोन्स अपना काम कर रहें हैं। इस दौरान-

  • सुबह उठते समय आराम से उठें। थोड़ी देर बैठने की स्थिति में ही रहें और फिर बिस्तर से उठकर खड़े हो जाएं।
  • अदरक का छोटा सा टुकड़ा लेकर मुंह में रख लें और चूसती रहें।
  • नींबू काटकर काले नमक के साथ चाटने से भी आराम मिलता है।
  • सौंफ, दालचीनी और जीरे को पानी में उबालकर चाय की तरह पीयें।
  • हरी इलायची दिन में तीन-चार बार चबाएं।
  • रात को एक गिलास पानी में थोड़े से काले चने भिगो दें और सुबह पानी छान कर पी लें, यह एक प्रभावशाली उपाय है।
  • पुदीने का रस, शहद और नींबू का रस मिलाकर चाटने से भी आराम मिलता है।

गैस बनना

प्रेगनेंसी में प्रोजेस्ट्रान हार्मोन शरीर की मांसपेशियों को लचीला बना देता है, जिससे पाचन-तंत्र की मांसपेशियां भी ढीली हो जाती हैं और पाचन क्रिया पर असर पड़ता है। इससे गैस बनने लगती है। प्रेग्नेंसी के तीन महीने बाद विकसित हो रहे शिशु के कारण गर्भाशय का आकार बढ़ने लगता है, जिससे आस-पास के अंगों पर दबाव पड़ता है और गैस की समस्या शुरू हो जाती है। 

  • तली और भारी चीज़ें खाने से बचें। आर्टिफिशियल स्वीटनर्स, चाय और काफी का सेवन बंद कर दें। 
  • अजवायन को पानी में उबाल कर छान कर उसमें सेंधा नमक मिलाकर पीएं।
  • खाने में हींग के तड़के को जरूर शामिल करें।
  • छाछ और रॉक साल्ट मिलाकर पीने से भी आराम मिलता है।
  • फल और हरी सब्जियां भरपूर मात्रा में इस्तेमाल करें। 
  • थोड़ी सैर करें ताकि आप ऐक्टिव रहें और आपका ब्लड सर्कुलेशन बना रहे।

बार-बार पेशाब आना

प्रेग्नेंसी में रक्त का आवागमन शरीर में तेजी से होता है और हार्मोनल बदलाव किडनी में तेजी से रक्त संचार करते हैं जिससे मूत्राशय जल्दी भर जाता है और बार-बार पेशाब आता है। गर्भाशय बढ़ने से मूत्राशय पर भी दबाव पड़ता है, जिससे पेशाब रोकने की क्षमता कमजोर हो जाती है। प्रेग्नेंसी के छठे या सातवें महीने में ऐसा अक्सर होता है।

  • खाने में दहीं लें।
  • दिन में दो बार गाजर का जूस लें या शाम को रोज़ एक सेब खाएं।
  • सुबह नाश्ते के बाद दो केले खाना फायदेमंद रहता है।
  • तीन दाने पिस्ता, चार काली मिर्च के दाने और तीन मुनक्के पीस कर दिन में दो बार लें।
  • भुने चने और गुड़ मिला कर सेवन करें।

प्रेग्नेंसी में कब्ज़

आहार में फाइबर की कमी, पानी की कमी, हार्मोनल बदलाव और कम शारीरिक गतिविधियों के कारण ऐसे में कब्ज़ होना आम बात है। अगर आप डॉक्टर की सलाह पर ऑयरन की मेडिसिन ले रही हैं तो भी आप कब्ज़ की समस्या से पीड़ित हो सकती हैं।

  • खट्टे फल जैसे कि संतरा, आम, सेब, बेर और आलूबुखारा खाएं।
  • सलाद और दाल सूप लें।
  • किशमिश को रातभर पानी में भिगो दें और सुबह पानी पी लें।
  • गाजर, मूली, दलिया और पत्तागोभी का सेवन करें।
  • पानी का ज्यादा सेवन करें।

पैरों में सूजन होना

जैसे-जैसे गर्भ में पल रहे शिशु का आकार बढ़ता है तो प्रेग्नेंट महिला का भार भी बढ़ने लगता है। उसका पेट बाहर निकलने के साथ पैरों में सूजन आने लगती है, जिससे चलने-फिरने में भी मुश्किल होने लगती है। मौसम में बदलाव, लम्बे टाइम तक खड़े रह कर काम करने, भोजन में पोटेशियम की कमी और कैफीन की अधिकता भी सूजन का कारण बनती है। गर्भाशय के बढ़ते आकार के कारण शरीर की नसों पर प्रेशर पड़ता है, जिससे ब्लड सर्कुलेशन में बाधा आती है। इस प्रक्रिया में खून को नीचे से ऊपर दिल तक जाने में रूकावट उत्पन्न होती है, यह भी एक कारण है।

  • पैरों को हल्के गरम पानी में डालें, लेकिन इससे पहले हल्के हाथों से पैरों की मालिश करें।
  • आधा चम्मच दालचीनी पाउडर, एक चम्मच जैतून ऑयल और एक चम्मच मिल्क लेकर पेस्ट बना लें और दो-तीन घंटों के लिए लगाकर छोड़ दें। 
  • आरामदायक चप्पल डालें।

त्वचा पर स्ट्रेच मार्क्स पड़ना

शिशु के विकास के दौरान जब त्वचा अपनी फ्लेक्सिबिलिटी से अधिक खिंच जाती है तो त्वचा में मौजूद कोलेजन टिशू कमजोर होकर टूट जाते हैं। इस कारण गुलाबी या लाल रंग के स्कार्स दिखने लगते हैं। बाद में यही स्ट्रेच मार्क्स में तब्दील हो जाते हैं। इसका असर जांघों, कूल्हों पर, पेट और ब्रेस्ट पर देखने को मिलता है।

  • चौथा-पांचवां महीना शुरू होते ही किसी भी तेल  से मसाज करना शुरू कर दें। 
  • अंडे के सफेद हिस्से को फेंट कर प्रभावित स्थानों पर लगाएं।
  • विटामिन-ई ऑयल से मसाज करना भी फायदेमंद है।
  • एलोवेरा जेल और कॉ$फी पाउडर को मिलाकर पेस्ट बनाएं और उन जगहों पर अप्लाई करें।

भूख बहुत कम लगना

आपके द्वारा लिया जाने वाला भोजन शिशु के स्वस्थ विकास के लिए बहुत जरूरी होता है। ठीक से खाना न खा पाने के कारण बच्चे को प्रयाप्त पोषण नहीं मिल पाता है। इन दिनों महिलाएं गंध और स्वाद के प्रति संवेदशील हो जाती हैं, जिससे उनको खाने के प्रति अरुचि होने लगती है।

  • दिन में तीन बार खाने की बजाए कई बार थोड़ा-थोड़ा खाने की कोशिश करें।
  • आपका आहार प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स से भरपूर होना आवश्यक है।
  • तरल पदार्थों का सेवन अधिक करें।
  • शिशु के मस्तिष्क के विकास के लिए ओमेगा-3 खाद्य लें।
  • आपका भोजन फाईबरयुक्त हो।
  • सिट्रिक फ्रूट्स अधिक खाएं। ज्यादा मसालेदार और तला-भुना न खाएं।

खून की कमी

अगर गर्भवती महिला पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व न ले तो शरीर में जरूरी लाल रक्त कोशिकाएं नहीं बन पाती हैं। इस हालत में खून की कमी होने पर थकावट और कमजोरी तो महसूस होती ही है साथ ही शिशु की जान भी खतरे में पड़ जाती है।

  • ऑयरन युक्त खाद्य जैसे कि अंडा, मछली, पनीर, सोयाबीन और मिल्क प्रोडट्स को अपने भोजन का हिस्सा बनाएं।
  • चुकंदर, गाजर और पालक का जूस पीयें।
  • ऑयरन की कमी को पूरा करने के लिए लोहे की कढ़ाई में खाना पकाएं। 
  • अंकुरित अनाज, पालक, साग खाएं।
  • पके आम का दूध के साथ सेवन करें। 
  • नारियल पानी हीमोग्लोबिन तेजी से बढ़ाता है।

ब्रेस्ट का  आकार बढ़ना

शिशु के लिए उसके जन्म से पहले ही स्तनों में दूध बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। ब्रेस्ट का आकार बढ़ जाता है और कई बार कोलोस्ट्रम यानि पीला गाढ़ा तरल भी लीक होने लगता है।

  • अंतिम के महीनों में नॄसग ब्रा पहनने को प्राथमिकता दें।
  • ब्रा जरूर पहनें वरना स्तनों के लटकने का डर रहता है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • अपने पीरियड्स बंद होने की सही डेट अपनी डॉक्टर को बताएं ताकि वह आपको पूरी जानकारी दे सके।
  • प्रेगनेंसी में ज्यादा देर तक खड़े रहने वाले काम, पैरों के भार बैठना, भारी सामान उठाने और सीढियां उतरने-चढ़ने से बचना जरूरी है। 
  • ऊंची हील न पहनें। 
  • डॉक्टर द्वारा बताई मेडिसिन नियमित खाएं।
  • तंग कपड़े न पहनें।
  • हमेशा सकारात्मक ही सोचें, अच्छा साहित्य पढ़ें, खुश रहें और खुद को व्यस्त रखें।
  • पौष्टिक आहार लें और अपने शिशु से बातें करें। 
  • ईश्वर का धन्यवाद करें कि उन्होंने आपको मां बनने का सौभाग्य दिया है।

यह भी पढ़ें -कोल्ड प्रेस्ड ऑयल के साथ खाना को बनाएं फायदेमंद

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