डायपर पहनाना कितना है सुरक्षित? जानें इसकी एबीसीडी

स्पर्धा रानी

10th June 2021

नवजात शिशु से लेकर 3-4 साल तक के बच्चों का दिन भर डायपर पहने रहना आम बात है। इससे बच्चों के कपड़ों को बार-बार बदलने और गंदा होने का डर भी नहीं रहता, लेकिन डायपर पहनाते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है, आखिर सवाल आपके नन्हें-मुन्ने का है।

डायपर पहनाना कितना है सुरक्षित? जानें इसकी एबीसीडी

सुरभि की मां जब उसके पास रहने आई तो उन्होंने देखा कि सुरभि अपने 2 महीने की बिटिया को 24 घंटे डायपर पहनाए रखती है। यही नहीं, सुरभि का 3 साल का बेटा भी पूरे दिन डायपर पहने रहता है। यह देख सुरभि की मां कामना जी ने सुरभि को डांटा और कहा कि पूरे दिन बच्चों को डायपर पहनाए रखने में मां की तो सहूलियत हो जाती है लेकिन बच्चे को कहां अच्छा लगता होगा! सुरभि यह सुनकर मन मसोस कर रह गई। उसने अपनी मां को यह कहा कि ऑफिस के काम के साथ घर के काम और दो बच्चों के लालन- पालन में उसे यही एक चीज थोड़ी राहत भरी लगती है कि उसे बार-बार शुशु के कपड़ों को साफ नहीं करना पड़ता और न ही बार-बार शुशु कराने के लिए ध्यान रखना पड़ता है।

सुरभि और कामना जी जैसी कई मांएं हमारे आस- पास हैं, जिनमें से कुछ को दिन भर डायपर पहनाए रखना पसंद होगा तो कुछ को नहीं। क्या हमारे बच्चे के लिए डायपर सुरक्षित है? यह सवाल हर मां के मन में कई बार आता होगा, वह चाहे मां बनने वाली हो या किसी नवजात की मां हो। हर व्यक्ति की डायपर को लेकर अलग-अलग सोच होती है। बड़े-बुजुर्ग अमूमन डायपर को असुरक्षित मानते हैं। उनके अनुसार, आज की मांएं अपनी आराम के लिए बच्चों को पूरे दिन डायपर में रखती हैं। उनमें से कई मांओं को तो ऐसा लगता है कि डायपर पहनने से बच्चों के पैरों के बीच की जगह चौड़ी हो जाती है, जबकि यह सरासर गलत है। मॉडर्न मांओं को पता है कि उनके बच्चे के लिए क्या सही है और क्या गलत। कामकाजी महिलाओं को अपने बच्चों के लिए डायपर का इस्तेमाल आसान लगता है, क्योंकि इस तरह से उन्हें आसानी होती है। फिर चाहे वे वर्क फ्रॉम होम करते हुए खुद बच्चों का ध्यान रखें या आया के भरोसे छोड़ें। 

डायपर ब्रीदेबल मटीरियल के बने होते हैं, जिन्हें खास तौर पर नवजात शिशुओं के लिए तैयार किया जाता है, और ये पूरी तरह से सुरक्षित हैं। यदि आप इसका इस्तेमाल सही तरीके से करें तो यह किसी भी तरह से खराब नहीं है। 

डायपर पहनाते समय जरूरी बातें 

शिशु को डायपर पहनाते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना जरूरी है। कुछ बच्चों की स्किन सेंसिटिव होती है तो डायपर पहनाते समय आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि कहीं उन्हें किसी तरह का रैश तो नहीं हो रहा है। डायपर पहनाने का मतलब यह नहीं है कि आप देर तक उन्हें एक ही डायपर में रहने दें। हर 3 से 4 घंटे के बीच डायपर को बदलना ही चाहिए। अगर आपका बच्चा गीले डायपर में रह गया तो उसे ठंड लगने का जोखिम हो सकता है। अगर बच्चे ने डायपर में पॉटी कर दी है तो बिना एक मिनट की भी देरी किए डायपर तुरंत बदलना चाहिए। एक के बाद दूसरा डायपर पहनाने से पहले थोड़ा समय बच्चे को बिना डायपर के रहने दें। इससे उसकी स्किन सांस ले पाएगी। अगर आप घर से बाहर निकल रही हैं तो अपने बैग में एक्स्ट्रा डायपर जरूर रखें।

कैसे चुनें डायपर का साइज 

नवजात शिशु के लिए डायपर चुनते समय आप दो साइज चुन सकती हैं- एक्स्ट्रा स्मॉल या स्मॉल। बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, उसका वजन भी बढ़ता जाता है। डायपर पर वजन के अनुसार साइज लिखा रहता है। आप उसकी मदद से अपने बच्चे के लिए सही साइज का डायपर चुन सकती हैं। एकदम फिटिंग वाले डायपर की बजाय थोड़ा ढीला डायपर ही पहनना सही रहता है।

कैसे रखें रैश फ्री

बच्चे को डायपर पहनाने से पहले हमेशा डायपर वाली जगह पर नारियल का तेल जरूर लगाएं। डायपर हटाने के बाद वहां पहले पानी से धोएं और मुलायम कपड़े से पोंछें। आप चाहें तो किसी अच्छे वेट टिश्यू का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। फिर तेल लगाने के बाद ही डायपर पहनाएं। रैश से बचाने के लिए हमेशा एक साइज बड़ा डायपर ही चुनें। डायपर समय-समय पर बदलती रहें अन्यथा रैश बच्चे को बहुत परेशान कर सकता है। अमूमन लोग डायपर पहनाते समय पाउडर लगाते हैं, इससे बचें।

डायपर खरीदने से पहले 

डायपर बच्चे की स्किन के सीधे संपर्क में रहता है, इसलिए यह सलाह दी जाती है कि डायपर खरीदने से पहले कुछ चीजों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। रात में इस्तेमाल के लिए वे डायपर खरीदें, जिन्हें ओवरनाइट के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है। दिन के समय हेवी डायपर पहनाने से बचें। जेल बेस या स्किन क्रीम वाले डायपर का इस्तेमाल सही रहता है या फिर आप क्लोथ डायपर खरीदें।

डायपर के कुछ आम मिथक 

डायपर से जुड़े कुछ ऐसे मिथक हैं, जिनके बारे में सच जानना सबके लिए जरूरी है, खासकर नई मांओं के लिए-

रैश का कारण 

डायपर ही सिर्फ एक वह वजह नहीं है, जिसकी वजह से आपके बेबी को रैश होते हैं। इसके लिए शिशु के पेशाब और पॉटी से निकला केमिकल और नमी भी जिम्मेदार होते हैं। इसके बाद इसमें जुड़ता है गीला और खराब फिटिंग वाला डायपर। कई बार बच्चे को खिलाया गया फूड भी इस रैश का जिम्मेदार हो सकता है।

बड़े साइज से नहीं होता रैश 

यह बिल्कुल गलत सोच है, आपको ऐसा डायपर लेना चाहिए जो बढ़िया फिट वाला और कम्फर्टेबल हो, न कि ढीला हो। यदि डायपर बहुत ढीला होगा तो उससे शुशु बाहर निकलने का खतरा रहता है।

रात में बार-बार डायपर चेक करना जरूरी नहीं 

ऐसा करने की बिल्कुल जरूरत नहीं, जब तक कि आपके शिशु ने पॉटी की हो या वह बहुत ज्यादा पेशाब कर रहा हो। यूं तो डायपर को हर 2-3 घंटे पर बदलते रहना जरूरी है लेकिन रात के समय जब आप नाइट स्पेशल डायपर अपने बच्चे को पहनाती हैं तो बार-बार चेक करने की जरूरत नहीं पड़ती। रात को ऐसे भी बच्चे दिन की तरह बार-बार शुशु नहीं करते हैं। हां, यह जरूर है कि उसके सोने से ठीक पहले आप उसे डायपर पहनाएं।

पाउडर ना लगाएं 

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पेडियाट्रिक्स की सलाह है कि बच्चे को डायपर पहनाते समय पाउडर कतई ना लगाएं। आज के समय में ड्राईनेस के लिए पाउडर लगाने की जरूरत नहीं है क्योंकि आज के डायपर बखूबी वह काम करते हैं। हां, आप चाहें तो डायपर रैश क्रीम जरूर लगा सकती हैं।

गीला नहीं है तो ना बदलें डायपर 

चूंकि डायपर गीला नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको डायपर बदलना नहीं है। वह जितनी देर तक एक ही डायपर पहना रहेगा, उसे इन्फेक्शन होने का खतरा ज्यादा रहेगा। बेहतर तो यह है कि आप हर 2-3 घंटे पर डायपर बदलती रहें।

क्लोथ डायपर 

फायदे : क्लोथ डायपर का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह डिस्पोजेबल डायपर से सस्ता पड़ता है। इसे एक साथ बहुत ज्यादा खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसको धो कर दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है। यह बच्चों के लिए टॉयलेट ट्रेनिंग को भी आसान बनाता है। 

घाटा : डिस्पोजेबल डायपर की तुलना में क्लोथ डायपर में बहुत समय लगता है। अगर बच्चे ने इसे गन्दा किया तो इसे तुरंत धोकर दूसरा डायपर पहनाना पड़ता है।

डिस्पोजेबल डायपर 

फायदे : यह आपका कम समय लेता है। गन्दा होने पर इसे रोल कीजिए और सीधे डस्टबिन में डाल दीजिए। इसे कैरी करना भी आसान है।

घाटा : डिस्पोजेबल गंदे डायपर पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हैं और ये नॉन बायो-डिग्रेडेबल भी होते हैं।

डायपर फैक्ट्स 

पॉटी ट्रेनिंग में देरी : यह बात बिल्कुल सच है कि जो बच्चे लगातार डायपर पहने रहते हैं, उन्हें पॉटी ट्रेनिंग में समय लगता है। रिसर्च भी बताते हैं कि जो बच्चे डिस्पोजेबल की बजाय क्लोथ डायपर पहनते हैं, उन्हें टॉयलेट और पॉटी ट्रेनिंग में कम दिक्कत होती है और वे जल्दी सीख जाते हैं। 

तरह-तरह के डायपर : अब के डायपर पहले से कहीं ज्यादा अच्छी क्वालिटी में आने लगे हैं। एडजस्टेबल स्ट्रैप और वेल्क्रो की वजह से ये कम्फर्टेबल हो गए हैं। अब डिस्पोजेबल लाइनर वाले डायपर आने लगे हैं, जिन्हें हटाकर आप सीधे फ्लश कर सकते हैं। 

नैचुरल डायपर : वूल, बैम्बू, ऑर्गेनिक कॉटन और हेम्प क्वालिटी के नैचुरल क्लोथ डायपर लोगों की पसंद बनते जा रहे हैं। माइक्रोफाइबर या फ्लीस क्वालिटी के डायपर पर्यावरण के लिए सही नहीं हैं।

इको फ्रेंडली डायपर : इको फ्रेंडली होने का मतलब यह नहीं कि ये अपने आप बायोडिग्रेड हो जाएंगे। ये पूरी तरह से बायोडिग्रेड नहीं होते हैं और यदि होते भी हैं तो पेशाब और पॉटी समस्या है।

यह भी पढ़ें -बच्चों में बढ़ता तनाव और अभिभावक

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