खोटे सिक्के - गृहलक्ष्मी कहानियां

गृहलक्ष्मी टीम

14th June 2021

‘जी, इन्हें कहाँ रक्खूँ?’ एक सहमी-सी आवाज़ पर सब घूम पड़े। देखा, एक छोटा लड़का थैली हाथ में लिए भयभीत-सा खड़ा है।

खोटे सिक्के - गृहलक्ष्मी कहानियां

‘क्या है इसमें?' कड़ककर मि. खन्ना ने पूछा। आवाज़ में ऊँचे पद का गर्व बोल रहा था।

‘जी, खोटे सिक्के हैं। वहाँ मेरा बाबा खोटे सिक्के चुन रहा है, उसी ने भेजे हैं।' डर के मारे लड़के के गले से पूरी तरह आवाज़ भी नहीं निकल रही थी।

‘तो, इन्हें यहाँ क्यों लाया है, जा, उधर ले जा।' झिड़ककर खन्ना साहब ने लड़के को भगा दिया है। हर बात को जानने के लिए बेहद उत्सुक छात्राओं के दल में एक ने पूछा-‘टकसाल में खोटे सिक्के कैसे आए?' स्वर काफी मीठा था। निरंतर बड़ी-बड़ी मशीनों की कर्कश आवाज़ सुनने के आदी खन्ना साहब को लगा जैसे किसी ने मिसरी घोलकर कानों में उँडेल दी हो। क्रोध और रौब को एक ओर हटाकर, होंठों पर मधुर मुस्कान और आवाज़ में स्निग्धता लाकर बोले-‘देखिए, बहुत सावधानी के बावजूद कभी-कभी बहुत सारे सिक्के बिगड़ ही जाते हैं। जहाँ सिक्के ढलते हैं, अगर उस मशीन में ज़रा-सी भी खराबी हो जाती है, तो सारे सिक्कों की शेप बिगड़ जाती है और फिर उनकी गिनती खोटे सिक्कों में होने लगती है।'

‘टकसालवाले करते क्या हैं इन खोटे सिक्कों का?' एक ओर से प्रश्न आया।

‘चला देते होंगे, और क्या देखती नहीं, बाज़ार में कितने खोटे सिक्के चलते हैं।' बड़े ही शोख़ ढंग से दूसरी ओर से शंका का समाधान हुआ।

‘जी नहीं, खोटे सिक्कों को हम चला नहीं देते, वापस टकसाल में ही खपाते हैं। जो चीज़ हमारी टकसाल में खोटी होती है, उसकी जिम्मेदारी तो हमारी है। उसे बाहर क्यों भेजेंगे भला?' खन्ना साहब ने इस ढंग से कहा, मानो बता रहे हों, देखो हमारी नैतिकता को। हमें क्या इतना गया-गुज़रा समझा है कि अपनी गलती को दूसरों के सिर मढ़ दें?

खन्ना साहब टकसाल के उच्चपदाधिकारी हैं। वे गाइड का काम कभी नहीं करते। पर परसों जब उन्हें सूचना मिली कि लखनऊ से किसी कॉलेज की छात्राओं का एक दल कलकत्ते के दर्शनीय स्थानों को देखने के लिए आया है, और वे टकसाल देखने की भी अनुमति चाहता है तो सहर्ष अनुमति देने के साथ ही दिखाने के लिए वे स्वयं ही तैनात हो गए। ठीक ग्यारह बजे बस पर से करीब बीस-बाईस छात्राओं ने दो अध्यापिकाओं के साथ टकसाल में प्रवेश किया। रंग-बिरंगे दुपट्टों और विभिन्न प्रकार के सेंटों की मिलीजुली सुगंध से जैसे एकाएक ही वहाँ मधुमास आ गया। बड़े तपाक से खन्ना साहब ने सबका स्वागत किया और बड़ी नम्रता से अपना परिचय दिया। उससे भी अधिक शालीनता और विनय से परिचय दिया अपने पद-गौरव का, फिर एक बार सतर्क नज़रों से सबके चेहरों को पढ़ा कि उस पद का रौब, आँखें फाड़-फाड़कर अपने चारों ओर देखती, खूसर-फुसर करतीं, एक दूसरी को ठेलती उन लड़कियों पर भी पड़ा या नहीं? इसके बाद टकसाल का संक्षिप्त इतिहास बताते हुए उन्होंने अंदर प्रवेश किया। एक चपल-सी छात्रा ने अपने स्वभाव से भी अधिक चपल दुपट्टे को काबू में रखने का प्रयास करते हुए कहा-‘हमारी तलाशी नहीं ली जाएगी टकसाल में? सुनते हैं कि यहाँ घुसते और निकलते हुए सबकी तलाशी ली जाती है।'

‘आप लोग तो हमारी मेहमान है। मेहमानों की भी कोई तलाशी लेता है भला? वह तो यहाँ काम करनेवाले मजदूरों की तलाशी ली जाती है।' मुस्कराकर खन्ना साहब ने कहा।

सबसे पहले वे एक बड़े हॉल में पहुँचे, जहाँ कई भट्टियाँ बनी हुई थीं।

‘इन भट्टियों में कच्ची धातु को गलाया जाता है।' यह कहकर जैसे ही खन्ना साहब ने एक भट्टी के मुँह का ढक्कन खोला कि भट्टी के पास झुंड लगाकर खड़ी लड़कियाँ झटका खाकर दो कदम पीछे हट गईं। आग की एक लहर जैसे सबको झुलसा गई। खन्ना साहब ने बताया : ‘यह तो साधारण भट्टी है। आपको बिजली की भट्टी भी दिखाऊँगा, उसमें तो आप बिना रंगीन चश्मा चढ़ाए देख भी नहीं सकतीं। लगता है जैसे सूरज सामने उतर आया हो।' इसके बाद उन्होंने सारी प्रक्रिया समझाई कि किस प्रकार कच्ची धातु को गलाकर सिक्कों के उपयुक्त बनाया जाता है, और उसके लंबे-लंबे बार्स बनाए जाते हैं। बड़े धैर्य और रुचि के साथ वे हाथों का संकेत कर-करके समझा रहे थे और सारी छात्राएँ उसके चेहरे पर यों नज़र गड़ाए सुन रही थीं, मानो वहाँ का सारा ज्ञान सोख लेंगी। खन्ना साहब कोई चीज़ हाथ में उठाते तो बीस-बाईस सिर इस तरह चारों ओर घिर आते मानो गुड़ की डली पर मक्खियाँ बैठ गई हों। जिस किसी भी हॉल से वे गुज़रते, वहाँ काम करनेवालों की गति अपने-आप ही बढ़ जाती। वे और अधिक मनोयोग और कुशलता से काम करने लगते। कभी-कभी खन्ना साहब किसी मशीन के पास खड़े हो जाते और रोबीले स्वर में हुक्म देते-‘मशीन को चला दो।' झटके से मशीन चलाई जाती और खन्ना साहब उसका ब्योरा समझाते। साथ में आई हुई अधेड़ावस्था की अध्यापिकाएँ शुरू से ही खन्ना साहब की उपेक्षा पा रही थीं। उन्हें खन्ना साहब की लड़कियों में यह आवश्यकता से अधिक दिलचस्पी और आकर्षण अच्छे नहीं लग रहे थे। वे ठेलमेल में कभी जाने-अनजाने में लगे हलके-फुलके धक्कों को भी काफी संदेह की नज़र से देखकर जब-तब छात्राओं को फटकार देतीं थीं, तुम लोग सिर पर ही क्यों चढ़ी जाती हो? दूर रहकर क्यों नहीं देखती, सुनी?' और एक बार छात्राओं के झुंड और खन्ना साहब में संतोषजनक दूरी उत्पन्न कर देतीं, पर छात्राओं की अत्यधिक जिज्ञासा और आतुरता तथा खन्ना साहब की आवश्यकता से अधिक रुचि में वह दूरी कब और कहाँ खो जाती, कोई जान ही नहीं पाता।

घूमते-घूमते वे एक बड़े से हॉल में आए, जहाँ की दैत्याकार मशीनें कान के पर्दे फाड़ देनेवाली आवाज़ में बेतहाशा दहाड़ रही थीं। खन्ना साहब के शब्द उसी भीषण गर्जना में ही खो जाते थे। परिस्थिति का फायदा उठाकर मुँह को अति निकट लाकर वे बता रहे थे-‘यहाँ पर तैयार धातु के बड़े-बड़े बार्स को पतला किया जाता है। छात्राएँ मशीनों से काफ़ी दूर खड़ी थीं, फिर भी उनका शरीर जैसे झुलसा जा रहा था। आग से लाल लंबीलंबी सलाखें पटापट ऊपर से नीचे गिर रही थीं, और नीचे हाथों में बड़ी-बड़ी सँडासियाँ लिए मजदूर उन सलाखों को उसी गति के साथ उठा-उठाकर पास ही पानी की नालियों में पटकते जा रहे थे। नालियों का पानी बुरी तरह खौल रहा था, और उनमें से गरम-गरम भाप उठ रही थी। आकार-प्रकार को देखकर ही जाना जा सकता था कि ये सलाखें उठानेवाले जीव मनुष्य हैं, वरना उसके भाव-शून्य चेहरे और मशीन की तरह निरंतर खटखट चलते हाथों को देखकर मशीन का ही भ्रम होता था। शोख़, हसीन और कमसिन छात्राओं की उपस्थिति भी उन मजदूरों की गति में किसी प्रकार का व्यतिक्रम उपस्थित नहीं कर पाई। वर्षों से निरंतर मशीनों के बीच काम करते रहने के कारण वे सावनी समाँ और वासंती बहारों को शायद भूल चुके थे। उनकी रगों का खून शायद जलकर राख हो गया था। जिंदा रहने के लिए बड़ी तत्परता से वे मौत से खेल रहे थे। लड़कियों के चेहरे दया और भय से आक्रांत हो उठे।

‘हाय राम, कैसा खतरनाक काम है।' एक ने कहा। दूसरी ने उससे भी अधिक सहानुभूति से कहा-‘मैं तो इतनी दूर खड़े-खड़े भी भुर्ता हुई जा रही हूँ, ये पास रहकर कैसे काम करते होंगे?' एक ने खन्ना साहब से पूछा-‘यह तो बड़ा ही खतरनाक काम है, ज़रा-सी चूक में सलाख सीधी टाँग पर ही आ गिरे।'

‘जी हाँ, सो तो है ही। बहुत-सी दुर्घटनाएँ होती हैं। अभी कोई दो महीने पहले ही एक आदमी की दोनों टाँगें कट गईं।'

‘त्...त्...सच? फिर भी ये लोग यह काम करने आते हैं, अपनी जान को जोखिम में डालकर?' किसी ने पिघलकर पूछा।

‘काम करने? अरे, एक की जगह खाली होती है तो पचासों टूट पड़ते हैं। आप जानती नहीं हमारे देश में इंसान की जान बड़ी सस्ती है।'

‘चलो बाबा, यहाँ से। यहाँ तो अब देखा नहीं जाता।' इस वीभत्स दृश्य को देखना उन लोगों के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों ही दृष्टियों से असह्य हो रहा था। वहाँ से चलकर उन्होंने एक-एक करके सब देखा कि किस प्रकार ताँबे के इन मोटे-मोटे बारों का पतला किया जाता है, फिर पैसे के आकार के गोल-गोल टुकड़े काटे जाते हैं, उन पर राजकीय मोहर और सन की छाप पड़ती है, उन्हें साबुन और सोडे के पानी में धोकर साफ़ किया जाता है। फिर पाँच-सात आदमी बैठकर ढेरियाँ बनाकर अपने सधे हाथों से खोटे सिक्के चुनते हैं, और उन्हें बकौल खन्ना साहब, वापस मिंट में ही खपा दिया जाता है। और यह सब देखते-देखते लड़कियों के ताज़ा गमकते चेहरे क्लांत होकर मुरझा गए। वहाँ पर उन लोगों के लिए चाय और जलपान की व्यवस्था भी थी। दो नौकर खन्ना साहब की आज्ञा प्रतीक्षा में हाथ बाँधे खड़े थे। नाज़-नखरों से पली ये लड़कियाँ, जिन्हें कभी गरीबी या अभावों की छाया ने भी नहीं छुआ था, मजदूरों की उस वीभत्स झाँकी को देखकर बड़ी आतंकित हो उठी थीं। बैठते ही पूछा-‘इन मज़दूरों को तनख्वाह क्या मिलती होगी?'

‘साठ रुपये मासिक।'

‘आदमी यों साठ रुपये की ख़ातिर अपनी जान जोखिम में डाल देता है?' एक ने अपार आश्चर्य और दहशत से पूछा।

संसार को मात्र किताबों के द्वारा जाननेवाली इन अनुभवहीन छात्राओं की बुद्धि पर खन्ना साहब मुस्करा उठे। गद्दीदार कुर्सियों पर बैठकर रसगुल्ले और गरमा-गरम समोसे खाती हुई उन छात्राओं का दिल मज़दूरों की दुर्दशा पर करुणा से पसीजा जा रहा था। तभी बाहर से एक औरत के रोने की आवाज़ से बातों का क्रम टूट गया। खन्ना साहब की भौंहों पर सलवटें उभर आईं। परिस्थिति समझने के लिए वे कुर्सी से उठे ही थी कि एक मैलेकुचैले कपड़े पहने, आँख-नाक से पानी बहाती बुढ़िया भीतर चली आई और खन्ना साहब के पैरों पर गिर पड़ी। घृणा से खन्ना साहब ने पाँव खींच लिए। गुस्सा उनको इतना आ रहा था कि यदि ये कोमल शरीर और उससे भी कोमल दिलवाली लड़कियाँ उस समय वहाँ न बैठी होती तो उसके सिर पर कसकर लात जमा देते।

कड़ककर खन्ना साहब ने पूछा, ‘कौन है तू? यहाँ कैसे चली आई?' तभी रोकता-थामता चपरासी आ गया। उसने बताया कि दो महीने पहले जिस मजदूर की दोनों टाँगें कट गई थीं, यह उसी की स्त्री है। स्त्री रोते-राते सिर पटक-पटककर हाथ जोड़-जोड़कर कह रही थी-‘उसे कोई छोटा-मोटा काम दे दीजिए सरकार, नहीं तो हम भूखों मर जाएँगे। बैठे-बैठे वह खोटे सिक्के चुनने का काम ही कर देगा।'

‘दिमाग खराब हो गया है। जिसके दोनों टाँगें नहीं हैं वह क्या खाक काम करेगा? चलो हटो यहाँ से। मौके-बेमौके सिर खाने आ जाते हैं।'

‘अब कहाँ जायें सरकार? बीस साल तक आप लोगों की नौकरी की, आपकी नौकरी में ही टाँग गई, अब कहाँ जाएँ सरकार? हम पर दया करिए, नहीं तो बाल-बच्चे भूखों मर जाएँगे।'

‘नौकरी में टाँग गई तो मुआवजा नहीं मिल गया दो सौ रुपये? अब क्या जागीर लिख दूँ उसके नाम? चपरासी, बाहर निकालो इसे।'

मेरे आदमी को बेकार कर दिया... अब वह कहाँ जाए... उसे यहीं कोई काम दे दो हजूर... नहीं तो...' पर वह वाक्य पूरा करती, इससे पहले ही चपरासी उसे घसीट ले गया।

लड़कियों के चेहरों पर व्याप्त करुणा को देखकर खन्ना साहब के लिए सफाई पेश करना ज़रूरी हो गया। बोले-‘टाँगें कट गईं तो हमने दो सौ रुपये मुआवजे के दे दिए और हम कर भी क्या सकते हैं? यों इन लोगों को यहाँ बिठाना शुरू कर दें तो टकसाल अपंगों का अड्डा ही बन जाए। आये दिन ही तो यहाँ ऐसी दुर्घटनाएं होती रहती हैं।'

इसके बाद बड़ी कुशलता से उन्होंने बात का प्रसंग बदलकर ऐसे चुटकुले सुनाना शुरू किया कि लड़कियाँ हँस-हँसकर दुहरी होने लगीं।

यह भी पढ़ें -प्रेम की दीवार - गृहलक्ष्मी कहानियां

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