वर्तमान क्षण में रहो - श्री श्री रविशंकर

श्री श्री रविशंकर

14th June 2021

संसार में जितना भी सृजनात्मक कार्य हुआ है, चाहे वह नृत्य के क्षेत्र में, संगीत में, ड्रामा या चित्रकला के क्षेत्र में, वह सब कुछ किसी अज्ञात शक्ति या केन्द्र से संचालित हुआ। बस सहज रूप से घट गया। तुम उसके कर्ता नहीं हो।

वर्तमान क्षण में रहो - श्री श्री रविशंकर

विनम्रता हमारी आत्मा की पूर्णता का द्योतक है। क्रोध तो तुम्हारे चैतन्य की एक विकृति मात्र है, और यह तुम्हें नीचे की ओर ले जाता है। इसलिए इसे पाप कहा गया है। परन्तु विकार तुम्हारी चेतना पर बहुत उथले रूप से छाए बादलों की भांति है - वे कोई बहुत गहरे नहीं बैठे हैं। भारत में एक पुरानी कहावत है कि पापों को धोने के लिए गंगा में डुबकी लगा लो और जैसे तुम्हारे शरीर से बाहर की धूल-मिट्टी और साबुन धुल जाता है, वैसे ही पाप भी धुल जायेंगे, क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपर लगी धूल-मिट्टी के ही समान हैं। हृदय से निकली एक प्रार्थना ही तुम्हें सारे भूतकाल के पापों से मुक्त कराने में पर्याप्त है।ï

तुम्हें अपनी गलती का पता ही तब चलता है, जब तुम निर्दोष हो जाते हो। जब तुम गलती कर चुके हो और उससे बाहर आ जाते हो, तभी तुम्हें उस गलती का ज्ञान होता है। बीते हुए काल में जो गलती तुमसे हुई या और भी जो कुछ हुआ, अब इस वर्तमान क्षण में, तुम अपने को पापी या उस गलती का कर्ता मानकर दु:खी मत होओ। क्योंकि वर्तमान क्षण में तुम फिर से नए, शुद्घ और निष्कलंक हो। भूतकाल की गलतियां भूतकाल के साथ विलीन हो गईं।

माताएं प्राय: ऐसा ही करती हैं। वे बच्चों पर बुरी तरह बिगड़ती हैं और उन्हें बुरा-भला कहती हैं और बाद में अपराध भाव से भरकर कहती हैं, ''ओहो बेचारा, मैंने इस पर इतना क्रोध किया, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था,' अब वे बहुत समय तक इसी पश्चाताप में घिरी रहती हैं और पश्चाताप के कारण वे अपने को फिर से क्रोध करने के लिए तैयार कर लेती हैं। ठीक है, जीवन में कभी-कभी क्रोध के क्षण भी आते हैं। तुमसे क्रोध तभी होता है, जब तुम्हारी चेतना जाग्रत नहीं होती। अब ऐसा हो गया तो हो गया, बस भूल जाओ अब खत्म। अब, इस समय, इस वर्तमान क्षण में रहो, जाग्रत हो जाओ। बस।

कृष्ण भी अर्जुन से यही कहते हैं, ''अर्जुन, तुम सोचते हो, तुम वह नहीं करोगे, जो तुम्हें करना चाहिए? मैं कहता हूं यद्यपि तुम न भी चाहो तो भी तुम वही करोगे।'' कृष्ण बड़ी चतुराई से कहते हैं, ''उचित तो यही है कि तुम स्वयं को मेरे प्रति समर्पण कर दो। सब कुछ छोड़कर मुझे समर्पित हो जाओ और जैसे मैं कहता हूं, वैसे ही करो। ''फिर कहते हैं,'' मैंने जो भी तुम्हें समझाना था, कहना था, कह दिया। अब तुम स्वयं सोचो और जो भी तुम्हें ठीक लगे, वैसा ही करो। ''फिर साथ ही कृष्ण कहते हैं'' परन्तु याद रखो, तुम करोगे वही, जो मैं चाहता हूं।'

कृष्ण के इन अन्तिम वाक्यों से लोग बहुत उलझन में पड़ गए। इसका अर्थ करने के लिए सैंकड़ों समीक्षाएं की गई हैं। इन तीन विरोधाभासी वक्त्तव्यों के लिए एक-एक ''सभी कुछ समर्पण कर दो, जैसा मैं कहता हूं वैसा करो, मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करूंगा।'' दूसरा- ''सोचो और देखो। जो भी तुम्हें ठीक लगे, वैसा ही करो।'' और तीसरा- ''तुम करोगे वही, जो मैं चाहता हूं।'' जब हम सत्व, रजस और तमस के विषय में बात कर रहे थे तो हमने देखा कि तुम्हारी कुछ करने की प्रबल लालसा या कर्तापन तुममें निष्क्रियता या सुस्ती (तमस) को दूर हटा देता है। एक बार सुस्ती देर हुई तो तुम फिर से कार्यरत हो जाते हो। पूरी तरह कार्य में तल्लीन होते ही तुम्हें अनुभव होता है कि तुम तो कुछ कर ही नहीं रहे हो, यह सब कुछ तुम्हारे द्वारा हो रहा है। तुम सिर्फ दृष्टïा बन जाते हो। यह अनुभूति बहुत महत्त्वपूर्ण है।

तुम्हें भी अपने कुछ कार्य के बाद ऐसा प्रतीत हुआ होगा कि कार्य के आरम्भ में तो लगा, ''मैंने यह सब किया है।'' परन्तु धीरे-धीरे समय के साथ ज्यों-ज्यों कार्य होता जाता है तो तुम्हें लगता है कि यह सब कुछ तो स्वयं हो रहा है। तुमने तो कुछ भी नहीं किया, वह सब जैसे अपने आप होता चला गया। ऐसा लगा है कि नहीं?

संसार में जितना भी सृजनात्मक कार्य हुआ है, चाहे वह नृत्य के क्षेत्र में, संगीत में, ड्रामा या चित्रकला के क्षेत्र में, वह सब कुछ किसी अज्ञात शक्ति या केन्द्र से संचालित हुआ। बस सहज रूप से घट गया। तुम उसके कर्ता नहीं हो।

यह भी पढ़ें -अभूतपूर्व दार्शनिक एवं अन्यतम योगी- श्री अरविंद

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