क्रान्तिकारी पुरोधाओं का अप्रतिम बलिदान

डॉ. हनुमान प्रसाद उत्तम

15th June 2021

आज भारत को आजाद हुए 70 वर्ष से अधिक हो चुके हैं। जिस आजाद भारत में हम सांस ले रहे हैं उसके लिए एक लंबा संघर्ष चला था। कई शूरवीरों के बलिदान के बाद हमें यह सुख प्राप्त हुआ है।

क्रान्तिकारी पुरोधाओं का अप्रतिम बलिदान

रूसी क्रांतिकारी विचारक प्रिंस क्रोपोटकिन का कथन था, 'मानव समाज के जीवन में ऐसे अवसर आया करते हैं, जब क्रांति एक अनिवार्य सामाजिक आवश्यकता हो जाया करती है... जब वह पुकार कर कहती है कि वह अवश्यम्भावी है। तब मानव समाज को भी क्रांति की ऐसी आंधी की आवश्यकता दिखलाई देने लगती है जो अपने पवित्र पवन से आलसी हृदयों में स्ऌफूर्ति दे और समाज में श्रद्धा, आत्मत्याग तथा वीरता के भावों का संचार कर दे।'

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सन् 1918 में ब्रिटिश सरकार 'मांटेग्यू चेम्सफोर्ड' सुधार योजना लेकर आई। इसमें अन्य बातों के अलावा सबसे प्रमुख बात यह थी कि दस वर्ष बाद एक कमीशन नियुक्त किया जाना था। कमीशन यदि वातावरण अनुकूल समझेगा, तो भारतीयों को उत्तरदायी शासन सौंप दिया जाएगा, ऐसा आश्वासन भी दिया गया।

तदनुसार दस वर्षों बाद सन् 1928 में एक अंग्रेज मि. साइमन की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया गया जिसके सभी सातों सदस्य अंग्रेज ही रखे गए। इसी वर्ष जब 'साइमन कमीशन' भारत के लिए रवाना हुआ, तो कांग्रेस व अन्य सभी दलों ने इसका देश भर में बहिष्कार कर प्रबल विरोध किए जाने का निश्चय किया।

उपर्युक्त घटनाक्रम से कुछ वर्षों पूर्व ही उत्साही नवयुवक सरदार भगतसिंह क्रांतिकारियों के भीष्म पितामह श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल के संपर्क में आकर और उनसे प्रभावित होकर उन्हीं के द्वारा स्थापित क्रान्तिकारी संंस्था 'हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन' के सक्रिय सदस्य बन बन चुके थे।

भगतसिंह की अनिच्छा के बावजूद जब घर वालों ने उनके विवाह के प्रयास तेज कर दिए, तो भगतसिंह श्री सान्याल की सहायता से लाहौर छोड़ कानपुर चले आए जहां श्री सान्याल ने उनका परिचय 'प्रतापÓ के क्रांतिकारी संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी से कराकर उन्हें उनके प्रताप प्रेस में रखवा दिया। भगतसिंह ने अब अपना नाम बदल कर 'बलवंतÓ रख लिया एवं इसी नाम से लेखादि व प्रेस के अन्य कार्य करने लगे। यह सन् 1923-24 की बात है।

शीघ्र ही भगतसिंह क्रांतिकारी कार्यों में सक्रिय बटुकेश्वर दत्त, विजय कुमार सिंह एवं चन्द्र शेखर आजाद के संपर्क में आए। इनके अतिरिक्त प्रताप प्रेस में पूर्व से ही कार्यरत क्रांतिकारियों सुरेश चंद्र भट्टाचार्य एवं राम दुलारे त्रिवेदी से उनकी घनिष्ठता हो जाना स्वाभाविक ही था।

सन् 1925 में सुप्रसिद्ध 'काकोरी षड्यंत्र काण्ड' के अंतर्गत क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू हो जाने पर कानपुर के प्रमुख क्रांतिकारी सुरेश चंद्र भट्टाचार्य, राजकुमार सिन्हा एवं राम दुलारे त्रिवेदी भी पकड़े गए। चंद्र शेखर आजाद एवं कुन्दन लाल गुप्ता फरार हो गए। सभी प्रमुख क्रांतिकारियों के पकड़े जाने एवं लंबी सजाएं हो जाने के कारण क्रान्तिकारी संस्था 'हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन' एक  प्रकार से विस्खलित ही हो चुकी थी, परंतु भगतसिंह फरारी जीवन व्यतीत कर रहे महान क्रांतिकारी चंद्र शेखर आजाद से किसी प्रकार संपर्क स्थापित कर उन्हीं के नेतृत्व में संस्था को पुन: संगठित करने का गुरुतर कार्य किया।

अब तक भगतसिंह क्रांतिकारियों के बीच से एक दार्शनिक व उच्च कोटि के चिंतक के रूप में उभर कर सामने आ चुके थे। इन्हीं के प्रयास से सन् 1928 में संस्था के प्रमुख उद्देश्यों-'पूर्ण प्रजातंत्र की स्थापना' एवं 'मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण न हो' के मद्देनजर संस्था का नया नाम 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट एसोसिएशन' रख दिया गया। भगतसिंह व चंद्रशेखर आजाद ने देश भर में बिखरे पड़े क्रांतिकारी साथियों को संस्था में लाकर पुन: सक्रिय किया। इनमें प्रमुख थे बटुकेश्वर दत्त, यतींद्र नाथ दास, राजगुरु, किशोरी लाल, विमल प्रसाद जैन, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, डॉ. गया प्रसाद, सुखदेव, सुशीला दीदी, दुर्गा देवी वोहरा (दुर्गा भाभी), प्रो. नंद किशोर निगम एवं श्री विजय कुमार सिंहा।

8 अगस्त 1928 को संस्था की दिल्ली बैठक में चंद्रशेखर आजाद को संस्था के अंतर्गत 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी' का कमांडर इन चीफ नियुक्त किया गया। इसी बैठक में साइमन कमीशन का बहिष्कार करने कलकत्ता, सहारनपुर, आगरा और लाहौर में बम फैक्ट्रियां बनाने तथा सरकारी खजानों को लूटकर रकम जमा करने के निर्णय लिए गए।

अत: 30 अक्टूबर, 1928 को कुख्यात साइमन कमीशन देश का दौरा करते हुए जब लाहौर पहुंचा, तो वहां भी उसे अन्य स्थानों की तरह भारी विरोध का सामना करना पड़ा। भगतसिंह एवं उनके साथियों ने लाहौर में प्रदर्शन एवं हड़ताल में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उस समय लाहौर में पूर्ण हड़ताल थी। अधिकांश लोग काले कपड़े पहने हुए थे। हर ओर अद्भुत उत्साह था। पंजाब केसरी लाला लाजपतराय के नेतृत्व में निकल रहे विशाल जुलूस में महिलाओं और बच्चों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया।

जुलूस में 'साइमन कमीशन-वापस जाओ' के जोरदार नारे लग रहे थे। जुलूस इतना विशाल था कि पुलिस उसे संभाल पाने में असमर्थ थी। इसके बावजूद लाहौर के पुलिस अधीक्षक जे. ए. स्कॉट ने हड़ताल एवं प्रदर्शन कर रहे जुलूस को तितर-बितर करने के लिए उस पर लाठी चार्ज का आदेश दिया। लाठी की पहली चोट लाला लाजपतराय की छाती पर पड़ी, दूसरी उनके कंधे और तीसरी उनके सिर पर। लाला जी बुरी तरह लहूलुहान हो गए। यह सारा दृश्य भगतसिंह भी देख रहे थे। वे आवेश में आकर प्रतिक्रिया में लाठी चला रहे पुलिस वालों की ओर लपके ही थे कि लालाजी ने स्वयं चिल्लाकर उन्हें अहिंसक बने रहने को कहा। इस पर भगतसिंह मन मसोस कर घायलों की देखभाल करने में जुट गए। उधर लहूलुहान लालाजी को युवकों की भीड़ तुरंत अपने घेरे में लेकर जमी रही और 'साइमन वापस जाओ' का नारा लगाती रही। गंभीर रूप से घायल हो जाने के बावजूद लाला जी ने पूर्व निर्धारित विशाल जनसभा में पहुंचकर गर्जना की, 'मैं यह घोषणा करता हूं कि मुझ पर जो लाठियां बरसाई गई हैं, वे भारत में ब्रिटिश शासन के कफन में आखिरी कील साबित होगी।Ó सभा के तुरंत बाद लाला जी को अस्पताल ले जाया गया। 18 दिन बाद 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।

इस घटना से देश भर में शोक एवं क्षोभ की लहर दौड़ गई। देश भर के सारे अखबारों ने इस घटना की कटु निंदा करते हुए अग्रलेख लिखे। संपूर्ण राष्ट्र में फैले आक्रोश का अनुमान तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब लाला जी की मृत्यु पर कलकत्ता में विशाल शोकसभा हुई, तो देशबंधु चित्तरंजन दास की पत्नी वासंती देवी ने उस सभा में क्रांतिकारियों का खुल्लमखुल्ला आह्वान करते हुए कहा, 'नौजवानों को चूड़ियां पहन लेनी चाहिए यदि वे राष्ट्र के इस अपमान का बदला न ले सकें।

सारे देश की इस मांग को सर आंखों पर लेते हुए भगतसिंह व चंद्रशेखर आजाद ने दिसम्बर 1928 को लाहौर में अपनी साथियों की एक विशेष बैठक की। बैठक में राष्ट्र के इस अपमान का तुरंत बदला लेने का दृढ़ निश्चय किया गया। लाला जी की मृत्यु नवम्बर मास की 17 तारीख को हुई थी, अत: स्कॉट को मारने की तिथि भी दिसम्बर मास की 17 तारीख ही निश्चित की गई। इस कार्य का अंजाम देने के लिए सभी साथियों ने अपने आपको प्रस्तुत किया। अंतत: भगतसिंह ही इस कार्य के लिए चुने गए। उनकी सहायता के लिए पार्टी के दो सर्वश्रेष्ठ निशानेबाज आजाद व राजगुरु एवं स्कॉट को पहचानने के लिए जयगोपाल का जाना तय हुआ। एक सप्ताह तक पुलिस अधीक्षक स्कॉट की गतिविधियों का अध्ययन किया गया। निश्चित तिथि 17 दिसम्बर, 1928 को सभी साथी पुलिस अधीक्षक कार्यालय के बाहर पहुंचकर पूर्व योजनानुसार अपनी-अपनी पोजीशन ले लिए। अपराह्न 4 बजकर 20 मिनट पर स्कॉट तो नहीं, साण्डर्स अपनी मोटर साइकिल स्टार्ट कर कार्यालय से बाहर निकला। ज्यों ही वह मुख्य द्वार से बाहर निकलकर सड़क पर आया, वहां खड़े जयगोपाल ने रूमाल हिलाकर अपने साथियों को संकेत दे दिया। संकेत पाते ही सबसे पहले राजगुरु ने साण्डर्स पर गोली चलाई। पहली ही गोली से वह मोटर साइकिल समेत जमीन पर गिरकर ढेर हो गया। परंतु भगतसिंह इतने आक्रोश में थे कि राजगुरु द्वारा विश्वास दिलाए जाने के बावजूद कि साण्डर्स का काम तमाम हो चुका है, वे साण्डर्स के पास पहुंचकर उस पर दनादन अपनी सारी गोलियां खाली कर बैठे।

हेड कांस्टेबल चाननसिंह उनके पीछे दौड़ा। इस प्रकार का कोई भी खतरा होने पर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने हेतु चंद्र शेखर आजाद निकट ही डी. ए. वी. कॉलेज की दीवार पर पहले से ही तैयार बैठे थे। आजाद ने जब देखा कि चाननसिंह, भगतसिंह को पकड़ने ही वाला है, तो पहले उन्होंने चानन को रुक जाने की चेतावनी दी। परंतु चानन ने चेतावनी की कोई परवाह न कर पीछा करना जारी रखा। अत: चाननसिंह पर अचूक निशाना साधकर आजाद ने अपनी जबर्दस्त निशानेबाजी का परिचय दिया। चाननसिंह वहीं ढेर हो गया। सभी साथी डी. ए. वी. कॉलेज के अहाते को पार कर सुरक्षित बच निकले। अगले दिन अखबारों में यह खबर प्रमुखता से साथ छपी, साथ ही लाहौर में जगह-जगह दीवारों पर पर्चे चिपके मिले,'हम लोगों ने राष्ट्रीय अपमान का बदला ले लिया।'

लाहौर और उसके आसपास सी. आई. डी. का जाल बिछ जाना स्वाभाविक था। उस समय लाहौर से बच निकलना किसी करिश्मे से कम नहीं था। परंतु क्रांतिकारियों ने तो यह करिश्मा भी कर दिखाया।

क्रांतिवीर सुखदेव की बनाई योजनानुसार भगतसिंह ने अपनी दाढ़ी और केश कटवा लिए तथा टाई-सूट और फेल्ट हैट पहनकर सुखदेव के साथ दुर्गा भाभी के घर पहुंचे। उनके साथ राजगुरु भी नौकर की वेशभूषा में थे। उन दिनों दुर्गा भाभी के पति क्रांतिवीर भगवती चरण वोहरा कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में कलकत्ता गए हुए थे और भाभी गोद के बच्चे शची के साथ घर में अकेली थीं। सुखदेव के साथ आए दो अजनबी चेहरों को देख पहले तो भाभी सुखदेव पर बहुत बिगड़ी, परंतु जब उन्होंने भगतसिंह का असली परिचय कराया, तो भाभी अवाक रह गईं।

अगले दिन भोर पहर पूर्व योजनानुसार वे तीनों कलकत्ता जाने वाली ट्रेन पकड़ने हेतु घर से बाहर निकल गए। लाहौर स्टेशन के चप्पे-चप्पे पर गुप्तचरों का जाल बिछा हुआ था। आने-जाने वाले प्रत्येक यात्रियों पर वे नजर रख रहे थे। ठीक समय पर वे तीनों स्टेशन पहुंच गए। लाहौर में सर्दियों  में चलने वाली तेज हवा का पूरा लाभ उठाते हुए भगतसिंह ने ओवरकोट पहन रखा था। सिर पर रखी फेल्ट हैट दायीं तरफ इस प्रकार झुकी हुई थी कि चेहरा साफ न दिखे। उनकी बायीं गोद में छोटा बच्चा 'शची' था जिससे बायीं तरफ का चेहरा भी साफ न दिखे। दायां हाथ रिवाल्वर सहित जेब में था। साथियों ने यह तय कर रखा था कि यदि किसी ने भी उन्हें रोककर पूछताछ करने की कोशिश की, तो उसका जवाब गोलियों से दिया जाएगा। भगतसिंह और भाभी इत्मीनान से 'कलकत्ता मेल' की द्वितीय श्रेणी के कूपे में शची को साथ लिए बैठ गए। भगतसिंह की अपने जीवन की यह पहली और अंतिम कलकत्ता यात्रा थी। यहीं उनका परिचय क्रांतिकारियों के बीच बम-विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध क्रांतिवीर यतींद्रनाथ दास से हुआ था। 

8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में जन विरोधी 'टेड्र डिस्प्यूटेड बिल' पेश होने वाले थे। इन बिलों के जरिए सरकार को श्रमिक हड़तालों पर रोक लगाकर हड़ताल करने तथा कराने वालों एवं सरकार के खिलाफ मुंह खोलने वाले राजनैतिक कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को बिना मुकदमा चलाए अनिश्चित काल तक जेल में बंद करने का अधिकार मिलने वाला था।

उपर्युक्त निर्धारित तिथि को क्रांतिवीर भगतसिंह व बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय असेम्बली में पहुंचकर उन दोनों बिलों को पेश किए जाते समय विरोध स्वरूप दो बम विस्फोट किए। इस विस्फोट के साथ ही दोनों क्रांतिवीर देश में सर्वप्रथम 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा अपने स्थान पर खड़े रहकर लगातार लगाते रहे। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

दिल्ली में सजा सुनाए जाने के बाद उन दोनों को लाहौर लाया गया, जहां इन पर और इनके अन्य साथियों पर 'द्वितीय लाहौर षड्यंत्र कांड' के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया।  सारे नियम -कानून ताक पर रखकर 'न वकील, न दलील, न अपील' के तहत इस मुकदमे का फैसला सुना दिया गया। फैसले में भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी एवं अन्य साथियों को सात साल से लेकर आजीवन काला पानी तक का दंड दिया गया।

देश के कई बड़े नेताओं ने लाहौर सेन्ट्रल जेल में भगतसिंह से भेंट कर उन्हें समझाने का प्रयास किया कि ऌफांसी से बचने के लिए वे दया याचिका प्रस्तुत कर दें, परंतु भगतसिंह इस प्रस्ताव से कतई सहमत नहीं हुए। उनका तर्क था कि उनके बलिदान से देश में उत्तेजना और राजनैतिक चेतना फैलेगी, वह देश के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

नियमानुसार फांसी हमेशा भोर पहर ही दी जाती है परंतु 24 मार्च 1931 निर्धारित तिथि होने के बावजूद ब्रिटिश जेल अधिकारी फांसी गुप्त रखने के उद्देश्य से 23 मार्च, 1931 की सायंकाल ही फांसी देने की तैयारी करने लगे। लाहौर जेल के निकट ही एक इंजीनियर साहब का बंगला था। जेल के अंदर लग रहे नारों-'इंकलाब जिंदाबाद', 'भारत माता की जय' और 'वंदेमातरम्' की आवाजों को सुन वे अपने बंगले से बाहर आए। उन्होंने देखा कि जेल को चारों ओर से शस्त्र पुलिस ने घेर रखा है और जेल के अंदर लग रहे नारों की तेजी निरंतर बढ़ती ही जा रही है। कुछ सशंकित हो उन्होंने यह सूचना कांग्रेस कमेटी के दफ्तर को टेलीफोन पर दे दी। कांग्रेस कमेटी वालों को असलियत समझते देर नहीं लगी। उस समय भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह लाहौर में ही एक जनसभा में भाग ले रहे थे। कुछ ही क्षणों में यह सूचना उन तक भी पहुंच गई।

उधर सायंकाल 6.45 बजे तीनों क्रांतिवीरों -भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को फांसी पर लटका दिया गया। फांसी चढ़ने तक जेल में बंद अन्य सभी कैदियों ने क्रांतिकारियों के नारों का पूरा साथ दिया। फांसी के तुरंत बाद जेल के दीवार तोड़कर विशेष ट्रकों में शवों को रखकर अधिकारियों ने सशस्त्र पुलिस की निगरानी में लाहौर से कई किलोमीटर दूर फिरोजपुर के निकट सतलज नदी के किनारे ले जाकर चुपचाप उनका दाह संस्कार कर दिया और आनन-फानन अधजले शवों को ही नदी में ऌफेंक दिया। अंग्रेजों की यह घृणित हरकत भी ज्यादा देर तक छुप न सकी और यह सूचना जेल के बाहर नारे लगा रही विशाल भीड़ तक पहुंच गई। देखते ही देखते सतलज के किनारे विशाल जनसमूह इकट्ठा हो गया। लोगों ने नदी से भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव के अधजले शवों को निकाल कर सम्मान सहित पुन: दाह संस्कार किया।

इसमें दो राय नहीं कि क्रांतिकारी आंदोलन के इन पुरोधाओं के अप्रतिम बलिदान ने ही उनका नामोनिशान मिटा देने का षड्यंत्र रचने वाले अंग्रेजों को 16 वर्ष बाद स्वयं अपना बोरिया बिस्तर बांधकर भारत से चले जाने को विवश कर दिया। क्रांतिकारी शहीदों की स्मृति को हमारा कोटिश: नमन-वंदन।  

यह भी पढ़ें -महापुरुष की पहचान - परमहंस योगानंद

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