लक्ष्मी से नारायणी तक कुछ भी तो नहीं बदला

राजेश कुमार

9th July 2021

विश्व-गुरु बनने की राह में भारत की नजर चंद्रयान के द्वारा अंतरिक्ष में तो है पर यहीं उसकी धरती पर हो रहे लैंगिक भेदभाव को दूर करने में उसे सालों लग जाएंगे।

लक्ष्मी से नारायणी तक कुछ भी तो नहीं बदला

महिलाओं को घर की लक्ष्मी यानी गृहलक्ष्मी कहा जाता है, लेकिन यह भी विडंबना ही है कि जिसे लक्ष्मी की संज्ञा दी गई है, उसे हमेशा धन का मोहताज रहना पड़ा है। कहने को महिला घर-गृहस्थी संभालती है, लेकिन घर खर्च की एक-एक कौड़ी का हिसाब उसे अपने विष्णुदेव यानी पति महाशय को देना पड़ता है, क्योंकि भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में पुरुषों को ही कुबेर का सनातन दावेदार मान लिया गया है।

सदियां बदल गईं, महिलाएं तवा-बेलन छोड़कर रोजगार के मैदान में भी कूदीं लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता अब भी इनके लिए दूर की कौड़ी है। और यह बात और दीगर हो जाती है जब भारत की पहली पूर्णकालिक महिला वित्तमंत्री यानी निर्मला सीतारमण संसद में अपना पहला पूर्ण बजट पेश महिलाओं को समर्पित करते हुए 'नारी तू नारायणी' का जिक्र करती हैं।

इनकी जुबान में कहें तो नारी लक्ष्मी तो थी ही और अब नारायणी भी हो गई, लेकिन सवाल वही है कि जिस तरह इस बार बजट लेदर के ब्रीफकेस से निकलकर मखमली कपड़े में आ गया, कहीं लक्ष्मी का आवरण भी सतही तौर पर बदलकर नारायणी तो नहीं हो गया है। आइए, जानते हैं-

गौरतलब है कि बजट पेश करने के दौरान सीतारमणजी ने 'महिला केंद्रित योजनाओं' से आगे बढ़ने और महिलाओं के ही नेतृत्व की बात कही है, साथ ही बजट में महिलाओं के स्वयंसेवी समूहों को बढ़ावा देने के लिए हर जि़ले में उनके लिए फंड का ऐलान भी किया है। स्वयंसेवी समूह की हर उस सदस्य को 5,000 रुपये की ओवरड्राफ़्ट सुविधा देने की बात भी कही गई है, हालांकि यह सुविधा सिर्फ उन्हीं के लिए है, जिसके पास जनधन खाता होगा।

इधर, निर्मला सीतारमणजी ने यह भी बताया कि महिलाएं इस योजना के तहत 1 लाख तक का लोन ले सकेंगी। हालांकि, यह सुविधा स्वयंसेवी समूह से जुड़ी महिलाओं से लिए होगा। वहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं की कारोबार में मदद के लिए 15वें वित्तीय आयोग के तहत अलग स्कीम लाने के बाबत बात हुई।

बजट की उपरोक्त लुभावनी बातों के इतर उन्होंने सरकारी योजनाओं का हवाला देते हुए स्वच्छ भारत अभियान, उज्ज्वला योजना, सौभाग्य योजना, सुकन्या योजना व अयुष्मान योजना की तारीफ में कसीदें गढ़ते हुए कह डाला कि ये सभी योजनाएं महिलाओं को आर्थिक तौर पर समृद्ध करने के लिए हैं।

लेकिन इस सबके बीच सवाल कई हैं, जिनके जवाब नहीं मिले तो इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि बजट महिला पेश कर रही हैं या पुरुष, लेदर ब्रीफकेस में है या मखमली कपड़े में और नारी लक्ष्मी है या नारायणी...

चिंतनीय बात और सवाल ये है कि सरकार महिला आंत्रप्रेन्योरशिप को प्रमोट कर रही है। मुद्रा, स्टार्टअप और स्टैंडअप स्कीम के तहत प्राथमिकता देने की बात कह रही है, लेकिन आर्थिक सर्वे सारी पोल खोलते हुए बता रहे हैं देश भर में करीब 92त्न वेंचर कैपटिलिस्ट पुरुष हैं और ये अभी भी महिला स्टार्टअप में निवेश करने से कतराते हैं, इसलिए बीते इसलिए महिला उद्यमियों की संख्या पुरुषों के मुकाबले बेहद कम है। इसके चलते महिला उद्यमी तकनीकी क्षेत्र में प्रवेश कम करती हैं।

इसके अलावा बजट में लोन व बैंकिंग आदि मामलों में महिलाओं को छूट देने के बाबत कहा गया है, लेकिन दिल्ली जैसे महानगर में प्रधानमंत्री मुद्रा लोन योजना के तहत महज 2 लाख के लोन के लिए जहां महिला को कागजी कार्यवाई और भागदौड़ में महीनों लग जाते हों वहां ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी एक सुनहरी कहानी लिखना बीरबल की खिचड़ी सरीखा है, जो सालों से पक ही रही है मुंह किसी के नहीं लगी।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण संसद में अपना पहला पूर्ण बजट पेश महिलाओं को समर्पित करते हुए 'नारी तू नारायणी' का जिक्र करती हैं। जिस तरह इस बार बजट लेदर के ब्रीफकेस से निकलकर मखमली कपड़े में आ गया, कहीं लक्ष्मी का आवरण भी सतही तौर पर बदलकर नारायणी तो नहीं हो गया है।

उसी तरह ऐसा कोई सेक्टर नहीं है, जहां महिलाओं के साथ आर्थिक भेदभाव न होता हो। भारत की सामाजिक-आर्थिक प्रगति में महिलाओं की भूमिका बस इतनी है कि श्रमशक्ति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 29 प्रतिशत है और ज्यादातर महिलाओं द्वारा किया जाने वाला आधे से अधिक श्रम अवैतनिक है और असुरक्षित है। कॉर्पोरेट्स में अभी भी उच्च पद पुरुषों के शिकंजे में हैं, जहां भारत की लगभग आधी महिलाओं का कोई बैंक या बचत खाता न हो वहां आर्थिक सशक्तीकरण की बात करना ही व्यर्थ है?

अगर बजट में बड़े-बड़े वादे करने के बजाए देश की जीडीपी में महिलाओं की हिस्सेदारी के  प्रतिशत को 17 प्रतिशत से बढ़ाकर 50त्न करने पर जोर दिया जाए तब तो बजट के कोई मायने हैं। आईएमएफ का अनुमान भी यही कहता है कि देश की श्रमशक्ति में महिलाओं की समान भागीदारी से भारत की जीडीपी में 27 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।

बहरहाल इस बजट के दौरान जो उल्लेखनीय था वो यह कि सीतारमणजी देश का आम बजट पेश करने वाली दूसरी महिला हैं। उनसे पहले देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 28 फरवरी 1970 को वित्त-मंत्री के रूप में पहला बजट पेश किया था और दूसरी अहम बात यह कि इस बार संसद में सबसे ज्यादा महिलाएं चुनकर आई हैं और 78 महिला सांसदों के साथ रिकॉर्ड बना, लेकिन वो कहते हैं न कि महिलाओं के लिए दिल्ली अभी भी दूर है और तब तक रहेगी जब तक भारत में लैंगिक और आर्थिक असमानता की खाई नहीं पटेगी। और जिस दिन यह खाई भर गई तो फिर सिर्फ बजट पेश करना ही पर्याप्त होगा, उसे महिलाओं को समर्पित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। हमारे खुद के अर्थ विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर महिलाओं के साथ भेदभाव न किया जाए तो 2025 तक देश की जीडीपी में 700 बिलियन डॉलर का इजाफा हो सकता है।

बस हमें आज के बजटीय दौर में यह संकल्प लेने की जरूरत है कि चाहे कुछ भी हो जाए हमें तो बस उस गृहलक्ष्मी को सशक्त करना है जिसने सदियों से घर का बजट संभाला और सुधारा है, फिर देखिए देश की अर्थव्यवस्था किस तरह रॉकेट की स्पीड से आसमान छूती है। 

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