अनमोल तोहफ़ा - गृहलक्ष्मी लघुकथा

मोनिका राज

14th July 2021

विदाई का वक़्त हो चला था. अनु बारी-बारी से सभी बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद ले रही थी. अब मालती बुआ की बारी थी. बड़ी भाभी ने चुहल की," अनु तो बुआ जी की फेवरेट है. देखे बुआजी इसे क्या तोहफ़ा देती है?"

अनमोल तोहफ़ा - गृहलक्ष्मी लघुकथा

बुआजी ने अनु को प्यार से गले लगाते हुए कहा - "वैसे तो मेरी बिटिया रानी बहुत होशियार है, फ़िर भी मेरे नसीहतों की पोटली में से तुम्हारे लिए तोहफ़ा यह है कि अपने सास-ससुर को अपने माँ -बाउजी की तरह ही मानना और हमेशा उनके साथ वही बर्ताव करना जैसा तुम अपनी भाभी से अपने माँ-बाउजी के लिए उम्मीद करती हो. इससे रिश्तों में प्रेम और अपनापन हमेशा बना रहेगा." 

बुआजी की बात सुनकर अनु के चेहरे पर चमक आ गई. वाकई बुआ जी का तोहफा सबसे अनमोल था. इस नसीहत के रूप में बुआ जी ने उसे नए रिश्तों को निभाने के जादुई मंत्र जो दिया था.

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