बच्चे के जन्म के बाद की रस्में

मोनिका अग्रवाल

16th July 2021

हम एक ऐसे देश का हिस्सा हैं, जहां रीती रिवाज और अनुष्ठानों का खास महत्व है। बच्चे के जन्म के बाद से ही शुरू होने वाले ये अनुष्ठान के अपने अलग ही मायने होते हैं, जिनके बारे में शायद ही आपको पता हो।

बच्चे के जन्म के बाद की रस्में

बच्चे के जन्म के बाद की रस्में

छोटे बच्चों को एक मां से बेहतर कोई नहीं समझता। और समझे भी क्यों ना भला? मां उस बच्चे को अपनी कोख में पूरे नौ महीने रखती है। बच्चे के जन्म से पहले ही गर्भवती माँ से कई तरह के रीति रिवाज पूरे करवाए जाते हैं। वहीं जब बच्चे का जन्म हो जाता है, तो हमारी भारतीय संस्कृति में ऐसे कई अनुष्ठान हैं, जिन्हें पूरा करना होता है। ये पल परिवार और बच्चे की जिन्दगी खुशियों से भर जाते हैं। इन सभी अनुष्ठानों का अपना अलग-अलग महत्व है। जिनसे कई तरह की धारणाएं भी जुड़ी होती हैं। जो कभी कभी हमें आश्चर्यचकित तक कर देती हैं। तो चलिए आज इस लेख के जरिये जानते हैं नवजात के लिए उन अनुष्ठानों के बारे में, जिनका उद्देश्य क्या है, इस बारे में अपने कभी सोचा भी नहीं होगा।

मुंडन-हिंदू और मुस्लिम रीति रिवाज में बच्चों का पहला अनुष्ठान और 16 संस्कार में से एक है मुंडन। इस परम्परा का पूरा किया जाना बेहद जरूरी है। यह क्रिया बच्चे के जन्म के तीन से पांच साल में की जाती है। मुस्लिम परम्परा के अनुसार बच्चे के बाल मुंडवाने के पीछे का तात्पर्य ये होता है कि बच्चा अल्लाह का सेवक बन जाता है। और उससे नकारात्मकता से छुटकारा मिलता है। वहीं हिंदू परम्परा के अनुसार मुंडन से शरीर और आत्मा की शुद्धि होती है। साथ ही बच्चे के बाल गंगा में बिखेरना शुभ माना जाता है।

कर्ण छेदन- भारतीय परम्परा के अनुसार बच्चों का कान छिदवाने की काफी पुरानी मान्यता है। इस अनुष्ठान को बच्चे के जन्म के तीन साल के अंदर करवाना होता है। इस संस्कार को मुंडन के साथ भी कराया जा सकता है। इस परम्परा की जड़ें बहुत गहरी हैं। ऐसा माना जाता है कि इस संस्कार के बाद सारी बुराई दूर हो जाती है। जैसे कि बच्चियों में पीरियड्स से जुड़ी समस्या ना आये। विज्ञान के नजरिये से देखा जाए तो ये काम एक जरूरी एक्यूपंक्चर है, जिसकी मदद से हिस्टीरिया जैसी समस्या से छुटकारा मिलता है और बच्चा स्वस्थ रहता है।

कम्युनिटी वेलकम- कम्युनिटी वेलकम यानि कि सामुदायिक स्वागत ज्यादातर भारतीय परिवारों की खास परम्पराओं में से एक है। जिसमें कोई धार्मिक स्थल भी शामिल होता है। जहां हम बच्चे के लिए आशीर्वाद लेने के लिए जाते हैं और बच्चों को अन्य लोगों से भी मिलवाते हैं। कई लोग इसे उत्साह के साथ मनाते हैं। इसे तब मनाया जाता है तब बच्चे का जन्म होता है। इसे जन्मे के 40 दिनों के अंदर मनाया जाता है। इस दिन माता-पिता अपने बच्चे का नामकरण करते हैं। सिख परिवारों के मुताबिक इस परम्परा के जरिये राहत मर्यादा में स्थापित होता है। इसे काफी सख्ती के साथ मनाया जाता है।

अन्न प्राशन-कई मांओं को बच्चे को शहद खिलाने की सलाह दी जाती है। अन्न प्राशन की रस्म कई हिंदू और मुस्लिम समुदायों में अदा की जाती है। जिसमें बच्चे को कुछ मीठा खिलाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि मीठा खिलाने से बच्चा भी मीठा बोलता है। ऐसा भी कहा जाता है कि, शहद से पेट के दर्द को कम करने में मदद मिलती है। साथ ही बच्चे पर पॉजिटिव प्रभाव भी डालती है।

बच्चे का पहला शब्द- जब बच्चा पैदा होता है, तो उसके बाद बच्चे  के बोलने का बेसब्री से इन्तजार पूरा परिवार करता है। हर कोई बच्चे के मुंह से पहला शब्द सुनने के लिए तरसता है। मुसलमानों में अगर बच्चे ने पहला शब्द अजान बोला तो उसे बेहद शुभ माना जाता है, और उसका कनेक्शन सीधा अल्लाह से है, ऐसा माना जाता है। वहीं हिंदू समुदाय में बच्चे के मुंह से पहला शब्द मां का होता है, तो उसे शुभ माना है। इस दौरान बच्चे के कान में माता पिता फुंसफुसाते भी हैं। जिसका जुड़ाव परम्परा से होता है।

बच्चे का जब जन्म होता है, तो कई रीति रिवाज ऐसे होते हैं, तो हमें हमारी संस्कृति की जड़ों से जोड़ते हैं। एक परम्परा का हर समुदाय में अपना अपग अलग महत्व है। ये हमारी भारतीय संस्कृति की विरासत है जो हमें हमारे बड़े बुजुर्गों से मिली, और उन्हें ओनके बड़े बुजुर्गों। जो पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से चली आ रही हैं। बच्चे के जन्म के बाद से साड़ी परम्पराओं का पालन इसलिए किया जाता है, ताकि बच्चा आगे और भविष्य में सुरक्षित रहे।

यह भी पढ़ें-बच्चों की डाइट और फिजिकल एक्टिविटी का रखें ध्यान,लॉकडाउन मेंशिशु की त्वचा की देखभाल

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