अंतिम संस्कार - गृहलक्ष्मी कहानियां

सुशील सरित

21st July 2021

सुबह के छह बज रहे थे। सारी रात कुर्सी पर बैठे बैठे हो गयी थी।सुषमा को बार-बार नींद के झोंके आ रहे थे। यह समीर भी जाने कहां रह गया ।वैसे छह बजते न बजते वो आ ही जाता था । शायद क्रॉसिंग पर फंस गया हो। दो दिन पहले जब अम्मा जी का टेस्ट कराया था ,तब यह उम्मीद नहीं थी ,कि बात इतनी सीरियस हो जाएगी ।माना की अम्मा जी अस्सी से ऊपर हो रही थीं और उन्हें ब्लड प्रेशर और डायबिटीज भी थी, लेकिन छोटे-मोटे बुखार खांसी के अलावा उन्हें कोई और बीमारी हुई हो और वह दो दिन बिस्तर पर पड़ी रही हों ऐसा तो कभी नहीं हुआ।

अंतिम संस्कार - गृहलक्ष्मी कहानियां

 दस साल पहले जब सुषमा शादी होकर आई थी, तब की अम्मा जी और आज की अम्मा जी में ,अगर कोई फर्क आया था ,तो बस इतना, कि उनके बाल कुछ ज्यादा सफेद हो गए थे। लेकिन इस बार जब एक हफ्ते पहले अम्मा जी को बुखार आया, तो उतरा ही नहीं। बाबूजी तो पहले से ही काफी कमजोर थे और दिल के मरीज भी थे, इसलिए सुषमा पर ही सारा भार आ पड़ा। बाबू जी ने रणवीर को फोन भी किया लेकिन "बाबूजी रिजर्वेशन एक हफ्ते बाद का है। तुरंत तो मिलेगा नहीं। रिजर्वेशन मिलते ही आ जाऊंगा" कहकर रणबीर ने अपनी मजबूरी जाहिर कर दी।

वैसे रणबीर की बात ठीक भी थी। अब दो हजार किलोमीटर दूर से कोई बिना रिजर्वेशन के आभी कैसे सकता है।" देखो कोविड फैला हुआ है तुम अम्मा जी का टेस्ट करा लो" बाबूजी ने जब तीसरे दिन कहा ,तो सुषमा सोच में पड़ गई। जेठ जी तो पटना में बैठे हुए थे और पिछले हफ्ते ही लंबी बीमारी से उठे थे। उन्हें डॉक्टर ने 2 हफ्ते का कंपलीट बेड रेस्ट बताया था। उन्हें फोन करना बेकार था। उसके मायके में उसके भाई समीर के अलावा कोई था नहीं और समीर को भी पता नहीं क्यों अम्मा जी ज्यादा पसंद नहीं करती थी। तो भी क्या मुंहफट जरूर है ,लेकिन भागदौड़ तो कर ही लेगा ,सोच कर सुषमा ने समीर को ही फोन किया। "जीजी परेशान मत हो। मैं देख लूंगा "समीर ने फोन पर सिर्फ इतना ही कहा और आते ही मोर्चा संभाल लिया। पूरे शहर में महामारी फैली हुई थी। ऐसे में किसी बड़े डॉक्टर को अम्मा जी को देखने को राजी करना बहुत आसान काम तो नहीं था, लेकिन समीर ने जाने कैसे सब मैनेज कर लिया। "कोविड टेस्ट पॉजिटिव आने का मतलब हॉस्पिटल में भर्ती कराना पड़ेगा। "समीर ने जब सुषमा से कहा तो वह बाबूजी के पास पहुंची ,लेकिन "अरे नहीं यही घर पर ठीक हो जाएंगी "कहकर बाबू जी ने उसको समझा दिया  पर रात को ही अम्मा जी को सांस लेने में परेशानी होने लगी और सुबह ही ,भर्ती कराने के अलावा कोई चारा नहीं है, यह बात बाबूजी की भी समझ में आ गई ,लेकिन इस महामारी के समय में हॉस्पिटल में बेड मिलना क्या आसान काम था। समीर ने पांच घंटे दौड़-धूप और फोन पर फोन करके किसी तरह हॉस्पिटल में एक बेड की व्यवस्था की और टैक्सी में अम्मा जी को ले जाकर भर्ती भी करा दिया गया ,लेकिन यह तीन दिन कैसे बीते सुषमा ही जानती थी। ना डॉक्टर सीधे मुंह बात कर रहा था और ना कोई नर्स या वार्ड बॉय। ऊपर से हॉस्पिटल का डरावना माहौल। समीर के अलावा किसी का सहारा नहीं। इधर इंफेक्शन का डर ,उधर हर घंटे बाबूजी का फोन कि "क्या हाल है ।"

"रामवती के घर से कौन आया है" नर्स में जब आवाज लगाई तो सुषमा चौंक कर उठ खड़ी हुई। "हां मैं हूं। क्या हाल है अम्मा जी का?" सुषमा के होठों पर एक सामान्य सा सवाल उभरा। "देखो तुम्हारी अम्मा जी अब नहीं रहीं। घर से किसी को बुलाना हो तो बुला लो।  दो घंटे में फॉर्मेलिटी पूरी होकर बॉडी मिल जाएगी। कोविड केस है ,और तुम्हें पता ही होगा, कि अंतिम संस्कार वैसा नहीं होगा जैसे आमतौर पर होता है और हां हॉस्पिटल का बाकी बिल भी देना होगा । मंगवा लेना। "नर्स ने एक सांस में सारी बात कह डालीं और बिना जवाब का इंतजार किए वापस चली गई। "अम्मा जी नहीं रही" नर्स का यह पहला वाक्य  ही सुषमा के हाथ पांव फुलाने के लिए काफी था। उसे लगा कि उसके पांव कांप रहे हैं। वह खड़ी नहीं रह पाएगी। वह दोबारा उसी कुर्सी पर ढेर हो गई । दिमाग में तमाम सारे खयालात उथल-पुथल मचाने लगे । जेठ जी अभी बीमारी से उठे हैं और कोविड केस में तो वैसे भी अंतिम संस्कार जल्दी से जल्दी कराना पड़ता है। उधर प्रदीप के आने का तो सवाल ही नहीं और बाबू जी  भी कौन से बिस्तर से उठने लायक हैं। उन्हें भी परसों बुखार हो गया था। वह तो उनकी हिम्मत है ,जो अपने आप को संभाले रहते हैं ,वरना। क्या होगा कैसे होगा। सुृषमा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। " क्या हुआ जीजी ,बहुत परेशान हो "अचानक समीर ने आकर जब उसके कंधे पर हाथ रखा ,तो वह फफक पड़ी। "सम्हालो जीजी ,संभालो अपने आप को "समीर पल भर में ही सब समझ गया। सुषमा आंखें बंद करके सुबकती रही। शादी के बाद इस घर में आने के बाद ,उसे हालांकि कोई तकलीफ कभी नहीं हुई ,लेकिन अम्मा जी ने कभी उसे वह जगह भी नहीं दी, जो उन्होंने बड़ी बहू को दी थी। इसी दिवाली को ही अम्मा जी जब दोनों बहुओं के लिए साड़ियां लाईं, तो बड़ी बहू की साड़ी और उसकी साड़ी में जमीन आसमान का अंतर था। रात को प्रदीप से सुषमा  ने दबे स्वर में कहा भी तो "अरे भाभी कॉलेज में प्रोफेसर हैं। उन्हें तो अच्छी साड़ी होनी ही चाहिए। तुमको कहां जाना है "कहकर प्रदीप ने हंसकर टाल दिया। एक साड़ी क्या जब भी मौका मिलता या दोस्तों रिश्तेदारों के सामने अगर कभी प्रशंसा करने की बात आती या कोई बहुओं के बारे में पूछता, तो अम्मा जी बड़ी बहू की शान में इतने कसीदे पढ़ती थीं, कि उसे अपना छोटापन अपने आप महसूस होने लगता। माना कि बड़ी बहू के घर से ज्यादा नगद आया था, लेकिन शादी के दो साल बाद ही वह ट्रांसफर करवा कर पटना चली गई। तबसे अम्मा जी बाबूजी की सेवा ,रिश्तेदारों को देखना ,आने जाने वालों का ख्याल रखना ,यह सब कौन कर रहा है। लेकिन अम्मा जी को यह कभी नजर नहीं आया। "छि जो चला गया उसके बारे में यह क्या सोच रही हूं" सुषमा ने अपने आप को कोसा। डेढ़ -दो घंटे भी चुके थे। बॉडी मिलने ही वाली थी ।

"सुनो इनके घर से और कोई आया, इनके हस्बैंड तो हैं ना या बेटे होंगे उन्हें बुला लो। अब बॉडी के साथ तो ज्यादा से ज्यादा एक- दो आदमी ही जाएंगे।

 रस्में कौन पूरी करेगा" नर्स ने आकर फिर सुषमा को टोंका।

रस्में कौन पूरी करेगा यह सवाल सुषमा के दिमाक पर हथौड़ी की तरह बजने लगा।

सुषमा ने कांपती उंगलियों से  बाबूजी को रिंग किया और बाबूजी अम्मा जी नहीं रहीं "सुबकते सुबकते बाबूजी को सारी बात बता डाली। बाबूजी चुपचाप सुनते रहे और जब बोले तो लगा कि कहीं दूर से आवाज आ रही है" देखो बेटा रणबीर और प्रदीप यहां हैं नहीं और ना ही बॉडी को उनके लिए रोका जा सकता है और मैं तो शायद घर से बाहर गेट तक भी ना पाऊंगा। "कहते -कहते फोन पर ही बाबूजी का गला भर्रा गया। "बाबूजी .... "सुषमा को समझ में नहीं आया कि आखिर बाबूजी को तसल्ली दे भी तो कैसे दे। "देखो बेटा मैं तुम्हारी स्थिति समझ रहा हूं। मैं बहू बेटी में कोई अंतर नहीं समझता। इसलिए बिना किसी संकोच के अंतिम संस्कार की  सारी रस्में तुम्हें ही निभानी है और मैं यह भी जानता हूं कि मैं भी बस दो एक दिन का ही मेहमान हूं । मेरी तुमसे यही रिक्वेस्ट है कि प्रदीप , रणबीर आ भी जायें तो भी मेरे अंतिम संस्कार की रस्में तुम ही निभाओगी। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि अगर कहीं पुनर्जन्म होता है तो अगले जन्म में तुम मेरे घर बेटा बनकर ही जन्म लेना। कहते - कहते बाबूजी का गला फिर रुंध गया और बाबू जी ने फोन काट दिया। "हां बाडी के साथ कौन चलेगा"बाडी बाहर निकालते निकालते वार्ड बॉय ने आवाज़ लगाई।

"मैं चलूंगी "सुषमा उठ खड़ी हुई।

"आप" वार्ड बॉय को झटका सा लगा।

" क्यों मैं इनकी छोटी बहू हूं ,क्या मैं नहीं चल सकती "सुषमा के स्वर में दृढ़ता थी। "नहीं ,वह बात नहीं, लेकिन वहां जो रस्में वगैरह होती है ,वह ...'' वार्ड बॉय को अब भी कुछ समझ में नहीं आया ।

"वह भी सब मैं ही करूंगी "सुषमा के स्वर में अब गंभीरता थी।

" मेरा मतलब, इनके पति या लड़के वगैरा नहीं है क्या" वार्ड बॉय अब भी मानने को तैयार नहीं था।

" सब हैं, लेकिन इस समय मैं और केवल मैं हूं और मैं ही सब करूंगी "कहकर सुषमा ने चलने का इशारा किया और समीर को साथ आने का इशारा कर बॉडी के साथ वार्ड बॉय के पीछे पीछे चल दी।

  यह भी पढ़ें -अनोखा दूल्हा - गृहलक्ष्मी कहानियां

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