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घूमने जाएं गंगा किनारे जहां विराजते हैं स्वयं भगवान

माशा

2nd June 2017

गंगा नदी के किनारे बसे मंदिर श्रद्धा का केंद्र हैं। गंगा नदी उत्तराखंड से होती हुई उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल तक जाती है। इन प्रदेशों के अनेक शहरों में अनेक मंदिर हैं जो गंगा की पवित्रता को संजोए हैं।

घूमने जाएं गंगा किनारे जहां विराजते हैं स्वयं भगवान
 
गंगा देश की सबसे विशाल नदी है। वेदों, पुराणों और रामायण-महाभारत में भी इसका व्यापक उल्लेख है। अनेक पवित्र तीर्थस्थल इसके किनारे बसे हैं। गंगा नदी को स्वर्ग की नदी भी कहा जाता है। आइए जानते हैं गंगा किनारे बसे कुछ प्रसिद्ध धार्मिक जगाहों के बारे में - 
 
गंगोत्री मंदिर, गंगोत्री
 
गंगा नदी का उद्गम गंगोत्री में होता है। गंगोत्री उत्तरकाशी से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां गंगा जी का मंदिर है। समुद्र तल से लगभग तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर भोज के वृक्षों से घिरा हुआ है। इस मंदिर का गंगोत्री शहर से गहरा नाता है। प्राचीन काल में यहां एक शिला थी जिसे भागीरथी शिला कहा जाता है। किंवदंती है कि इसी शिला पर बैठकर भगीरथ ने तप किया था। इस शिला के निकट एक मंच था जिस पर यात्रा के दिनों में देवी-देवताओं की मूर्तियां प्रतिस्थापित की जाती थीं। इन मूर्तियों को गांवों के विभिन्न मंदिरों जैसे श्याम प्रयाग, गंगा प्रयाग, धराली तथा मुखबा आदि गावों से लाया जाता था और फिर मौसम खत्म होने के बाद उन्हीं गांवों को लौटा दिया जाता था।
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
18वीं शताब्दी में गढ़वाल के गुरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने यहां मंदिर का निर्माण करवाया। इसके प्रबंध के लिए मुखबा गांव से पंडों को नियुक्त किया गया। बाद में जयपुर के राजा माधोसिंह द्वितीय ने मंदिर को एक नया रूप दिया। प्रत्येक वर्ष दीवाली में गंगोत्री मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं और देवी गंगा को बाजे और जुलूस के साथ मुखबा गांव में लाया जाता है। अक्षय तृतीया को मंदिर के कपाट खोल दिए जाते हैं। इस समय बर्फ और ग्लेशियर पिघलने शुरू हो जाते हैं तथा गंगोत्री मंदिर पूजा के लिए खुल जाते हैं। देवी गंगा के गंगोत्री वापस लौटने की यात्रा को पारंपरिक रीति-रिवाज़ के साथ मनाया जाता है।
 
भरत मंदिर और मंसा देवी मंदिर
 
हरिद्वार और ऋषिकेश- दो निकटवर्ती तीर्थ स्थल हैं जिनके बीच लगभग 25 किलोमीटर की दूरी  गंगा नदी के किनारे बसे मंदिर श्रद्धा का केंद्र हैं। भरत मंदिर ऋषिकेश का सबसे पुराना मंदिर है जिसे 12वीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने बनवाया था। शंकराचार्य का श्रीयंत्र भी इस मंदिर में रखा हुआ है। यह मंदिर बहुत सुंदर है और मंदिर के अंदरूनी गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा एक शालिग्राम पत्थर पर उकेरी गई है। आम तौर पर श्रीराम के छोटे भाई भरत के लिए अलग से कोई मंदिर नहीं है लेकिन ऋषिकेश में भरत जी ही नहीं, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को समर्पित मंदिर भी हैं। भरत मंदिर का मूल रूप तैमूर के आक्रमण के समय क्षतिग्रस्त हो गया था लेकिन मंदिर की बहुत सी चीजें अब भी संरक्षित हैं।
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
इसी तरह हरिद्वार का मंसा देवी मंदिर भी बहुत प्रसिद्ध है। यह मंदिर हरिद्वार में शिवालिक पर्वत श्रृंखला के मुख्य शिखर पर स्थित है। इसी पर्वतमाला के दूसरे शिखर पर मां चंडी देवी का मंदिर है। दोनों के बीच हर की पैड़ी है। मंसा देवी को दुर्गा की दशम् शक्ति भी कहा गया है। मान्यता के अनुसार महिसासुर का वध कर दुर्गा ने यहीं विश्राम किया था। इस मंदिर में ब्रह्मï के मन से उत्पन्न तथा ऋषि जरत्काऊ की पत्‍‌नी सर्पराज्ञी देवी मां मंसा की तीन मुख और पांच भुजाओं वाली अष्टनाग वाहिनी मूर्ति स्थापित है। मंसा देवी अपने भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। नवरात्रों में मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर परिसर में ही मौजूद है वर्षो पुराना स्नोही वृक्ष जिस पर डोरी बांधने से मनोकामना पूरी होती है।
 
वाल्मीकि आश्रम, बिठूर
 
कानपुर के निकट स्थित है बिठूर, जहां गंगा नदी रामकथा के भावनात्मक पक्ष का स्मरण दिलाती है। बिठूर में गंगा किनारे स्थित है वाल्मीकि आश्रम। कहते हैं, जब श्री राम ने सीता का परित्याग कर दिया था तो सीता को वाल्मीकि बिठूर के इस आश्रम में ले आए थे। वाल्मीकि के इस आश्रम में तीन मंदिर हैं। मुख्य मंदिर वाल्मीकि का है। इस आश्रम में तीन बड़ी-बड़ी मूर्तियां हैं, जिनमें पहली मूर्ति वाल्मीकि की है। वाल्मीकि की मूर्ति पद्मासन मुद्रा में है और वाल्मीकि दाएं हाथ में मोर पंख की कलम लिए हुए हैं। इस मूर्ति के पास शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए (भगवान) विष्णु की मूर्ति स्थापित है। दूसरे मंदिर को सीता मंदिर कहते हैं। इस मंदिर में कुश को गोद में लिए और लव की उंगली पकड़े हुए सीता जी की मूर्ति स्थापित है।
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
आश्रम के पास एक कुंड भी बना हुआ है। इस कुंड को 'सीता कुंड कहा जाता है। इस कुंड के संबंध में कहा जाता है कि इसी कुंड से सीता जी पाताल में समाई थीं। इसके पास ही एक विशाल घंटा लटका है। अष्ट धातु से निर्मित यह घंटा साढ़े सात मन वजन का है। इसी घंटे के पास स्वर्ग सीढ़ी बनी हुई है। कहते हैं कि यह स्वर्ग जाने का रास्ता है।
 
हनुमान मंदिर, इलाहाबाद
 
इलाहाबाद में गंगा नदी का संगम यमुना और सरस्वती नदियों से होता है। यहां नदी किनारे बना हनुमान मंदिर दुनिया भर में मशहूर है। यहां लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा है। यह प्रतिमा 20 फीट लंबी है।जब मुग़लों ने हनुमान जी की प्रतिमा उस जगह से निकालने की खुदाई शुरू की तो पूरी सेना भी मिलकर उन्हें वहाँ से हिला भी नहीं सकी I वे जितनी खुदाई करते मूर्ति उतनी ही नीचे चली जाती I आज इसीलिए हनुमान जी की मूर्ति  ज़मीन से करीब दस फ़ीट नीचे है I कहा जाता है कि वर्ष में दो बार गंगा जी उनके मंदिर में दर्शन के लिए आती है और ऐसा कई सालों से लगातार होता चला आ रहा है I
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
कहा जाता है कि लंका विजय के बाद भगवान राम जब संगम स्नान कर भारद्वाज ऋषि से आशीर्वाद लेने प्रयाग आए तो उनके सबसे प्रिय भक्त हनुमान इसी जगह पर मूर्छित हो गए। सीताजी ने उन्हें अपनी सुहाग के प्रतीक सिंदूर से नई जिंदगी दी और हमेशा स्वस्थ एवं आरोग्य रहने का आशीर्वाद प्रदान किया। सीताजी द्वारा सिंदूर से जीवन देने की वजह से ही बजरंग बली को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा है।
 
विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी
 
गंगा नदी के तट पर स्थित वाराणसी शहर विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक माना जाता है। इस शहर के हृदय में बसा है काशी विश्वनाथ मंदिर को भगवान शंकर के 12 ज्योतिॄलगों में से एक माना जाता है। माना जाता है कि निर्वासन में कई साल बिताने के पश्चात भगवान शिव इस स्थान पर आए थे और कुछ समय तक काशी में निवास किया था। ब्रह्मïजी ने उनका स्वागत दस घोड़ों केरथ को दशाश्वमेघ घाट पर भेजकर किया था।
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
गंगा तट पर संकरी विश्वनाथ गली में स्थित विश्वनाथ मंदिर कई मंदिरों और पीठों से घिरा हुआ है। यहां पर एक कुआं भी है, जिसे 'ज्ञानवापी की संज्ञा दी जाती है, जो मंदिर के उत्तर में स्थित है। विश्वनाथ मंदिर के अंदर एक मंडप व गर्भगृह है। गर्भगृह के भीतर चांदी से मढ़ा भगवान विश्वनाथ का 60 सेंटीमीटर ऊंचा शिवलिंग है। यह शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित है। माना जाता है कि यह मंदिर बहुत पुराना है। लेकिन 1176 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने इस मंदिर के पुनर्निमाण के लिए काफी धनराशि दान की थी। यह भी माना जाता है कि लाहौर के महाराजा रंजीतसिंह ने इस मंदिर के शिखर के पुनर्निमाण के लिए एक हजार किलो सोने का दान किया था। मंदिर में रोजाना सुबह ढाई बजे मंगल आरती होती है। दोपहर को भोग आरती होती है।
 
दक्षिणेश्वर काली मंदिर
 
कोलकाता के उत्तर में विवेकानंद पुल के पास दक्षिणेश्वर काली मंदिर स्थित है। दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण 1847 में शुरू हुआ। जान बाजार की महारानी रासमणि ने स्वप्न देखा था जिसके अनुसार मां काली ने उन्हें निर्देश दिया कि मंदिर का निर्माण किया जाए। इस भव्य मंदिर में मां की मूर्ति श्रद्धापूर्वक स्थापित की गई। इस मंदिर को बनने में लगभग आठ साल लगे। दक्षिणेश्वर मां काली का मुख्य मंदिर है। भीतरी भाग में चांदी से कमल का फूल बनाया गया है, जिसकी हजार पंखुडिय़ां हैं। इसी पर मां काली शस्त्रों सहित भगवान शिव के ऊपर खड़ी हुई हैं। इस मंदिर के पास पवित्र गंगा नदी है जिसे बंगाल में हुगली नदी के नाम से जानी जाता है।
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
इस मंदिर में 12 गुंबद हैं। इस विशाल मंदिर के चारों ओर भगवान शिव के बारह मंदिर स्थापित किए गए हैं। प्रसिद्ध विचारक रामकृष्ण परमहंस ने मां काली के मंदिर में देवी की आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त कर इसी स्थल पर बैठ कर धर्म-एकता के लिए प्रवचन दिए थे।रामकृष्ण इस मंदिर के पुजारी थे तथा मंदिर में ही रहते थे। उनके कक्ष के द्वार हमेशा दर्शनार्थियों के लिए खुले रहते थे। यह मंदिर तीन मंजिला है। ऊपर की दो मंजिलों पर नौ गुंबद समान रूप से फैले हुए हैं। इस मंदिर के सामने नट मंदिर स्थित है। मंदिर की उत्तर दिशा में राधाकृष्ण का दालान स्थित है।  
 
 
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